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हिन्दी देश के जनमानस के लिए राष्ट्रभाषा थी, है, रहेगी ।

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संसार में आपस में संवाद कायम करने के लिए जबसे बोलियों का उद्भव और तत्पश्चात भाषाओं का विकास हुआ, तब से मनुष्य न केवल आपसी बर्ताव के लिए, बल्कि आपसी संबंधों के लिए भी इन पर पूरी तरह से आश्रित हो गया और धरती के सभी भौगोलिक क्षेत्रों में वहां के स्थानीय निवासियों द्वारा अपनी-अपनी आवश्यकताओं और परिवेश के अनुसार भाषाओं और अपने-अपने व्याकरण का आविष्कार हुआ और समय के साथ यह चीजें परिष्कृत होती चली गयीं।                  इतिहास को देखें तो हमें भली प्रकार यह पता चलता है कि अपनी बोली, अपनी भाषा में कार्य करने वाले लोगों ने न केवल उत्कृष्ट कार्य किया, बल्कि अपने युग में वह सिरमौर भी बन पाए। कारण यह था कि उनका जो शासन-प्रशासन व कारोबार था, वह उनकी आत्मिक बोलियों द्वारा संचालित था और शासन-प्रशासन व कारोबार करने वाले तथा उस कारोबार से जुड़े हुए सभी लोगों का संवाद उनकी अपनी भाषाओं में ही होता था। जिससे न केवल उस संवाद की आत्मीयता बनी रहती थी, बल्कि सभी लोगों में भी एक प्रकार के भाईचारे का आत्मीयतापूर्ण रिश्ता कायम हो जाया करता था और यह सच आज भी बिल्कुल इसी...