कत्ल का राज
यूँ तो अभी दिसंबर महीने की शुरुआत ही थी लेकिन दिल्ली की सुबह घने कोहरे की चादर में ढँककर और अलसाने लगी थी। ऐसी ही एक सुबह में जब राजौरी गार्डन पुलिस स्टेशन में नाईट ड्यूटी पर तैनात सिपाही अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे ही खुद को कम्बल के घेरे में समेटकर नींद की आगोश में समाये हुए थे, फ़टे चीथड़ों में खुद को ढँकने की कोशिश करता हुआ एक भिखारी तेज़ी से दौड़ता हुआ उनके सामने पहुँचा और हाँफते हुए बोला "साहब जल्दी चलिये खून हो गया है।" ऊँघते हुए हवलदार जिसका नाम सुरेश था, उसने उस भिखारी की आवाज़ सुनकर किसी तरह आँख खोली और बोला "हो गया तो होने दे। मरने वाला तो मर गया हम जिंदों को क्यों इस ठंड में मारने चला आया?" सुरेश की बात सुनकर भिखारी चुप होकर एकटक उसे देखने लगा। "ऐसे क्या देख रहा है बे? जबरदस्ती ले जायेगा क्या?" सुरेश ने फिर उसे झिड़का। भिखारी कुछ कहता कि तभी थाना प्रभारी इंस्पेक्टर मयंक की गाड़ी थाना परिसर में प्रवेश कर चुकी थी। गाड़ी की आवाज़ सुनते ही दूसरा हवलदार बरन जो अब तक सो रहा था वो भी एक झटके में उठकर बैठ गया। अंदर आने पर जब मयंक की नज़र भिखारी पर पड़ी तो उस...