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मोहब्बत जताना आना चाहिए

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अगर है किसी से मोहब्बत  जताना        आना चाहिए  पानी है अगर जन्नत तो पहले  मर जाना         आना चाहिए  हरपल कोई खुश रहे मुमकिन कहाँ जो यार रूठे मनाना आना चाहिए  मोहब्बत की वैसे तो शर्तें नहीं कोई इश्क दरिया है आग का,    डूब के जाना आना चाहिए  सिकन्दर है हर कोई      अपनी जंग का बात दिलबर की हो जो, झुक जाना आना चाहिए  मोहब्बत को ही ख़ुदा मान बैठे जो फिर उसे सज़दा भी आना चाहिए               -----दीपक कुमार

------जज़्बात-----

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दर्द दिल का उसे क्यूँकर दिखाया जाए वो मिले किसी मोड़ पे तो मुस्कुराया जाए है शर्मिंदा वो खुद अपने हालात पर क्यूँकर उसे उसकी नजरों में गिराया जाए सितम किये होंगे सितमगर ने बहुत लड़खड़ाया है वो चल हाथ बढ़ाया जाए प्यार का शायद हो यही उसूल सताया उसने पर उसे ना सताया जाए वादा भले रहा हो फलक तक साथ चलने का अब वो जाना चाहता है चल उसे छोड़ आया जाए जिसकी वजह से मेरे चेहरे पे मुस्कान अब भी है उसे कैसे कोई गम दूँ उसे क्यूँ रुलाया जाए चंद लाइनों में समेट दी जिंदगी अपनी क्यूँ रो रो कर सबको अपना हाल सुनाया जाए...                ---दीपक कुमार

---------तुम और मैं------

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जब तुम देख रहे होते हो पेड़ की एक पत्ती मुझे उसमें दिखती है  विशाल वृक्ष की विशाल शाखायें इसलिए नहीं तोड़ता उन्हें जब तुम एक नाज़ुक कली देख रहे होते हो मैं उसमें देखता हूँ एक खूबसूरत फूल इसलिए नहीं मसलता उन्हें जब तुम देख रहे होते हो एक नन्हा कोकून मुझे दिखती है खुद में सिमटी एक तितली जो अगले ही पल  पसारेगी अपने खूबसूरत इंद्रधनुषी पंख जब आप देखते हैं एक असहाय वृद्ध तब मैं देख रहा होता हूँ ताउम्र कंधों पर जिम्मेदारियों के बोझ से झुकी उसकी कमर मैं उसे दया नहीं सम्मान की नजरों से देखता हूँ जब तुम देख रहे होते हो  वीरानी में पड़ी रेल की सुनी पटरियों को तब मैं सुन रहा होता हूँ रेलगाड़ी के पहियों की धुन मुझे छू के गुजरती हवा की सरगम उस पल मैं देख रहा होता हूँ खिड़की से पीछे छूटते पेड़ और पहाड़ आंखों से ही छू रहा होता हूँ  नदियों की धार और महसूस कर रहा होता हूँ रेलगाड़ियों में बैठे यात्रियों की धड़कनें उनके घर पहुचने की बेताबी बहुत फर्क है तुम्हारे और मेरे देखने में...            ---दीपक कुमार

किसी ने देखी नहीं मुस्कुराहट उसके गालों की

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फेरे ले लिए हैं रूह ने और के संग घर में अब हो रही तैयारी वलीमें की किस्मत चल चुकी है दांव अपना अब बारी मेरी है चाल चलने की उठकर चल दिये हैं सब अपने घर को अब तैयारी हमारी है महफ़िल से जाने की तुझसे दूर होके इतनी मौतें मर चुका हूं मैं अब ख़्वाइस बची नहीं है जीने की फूलों कलियों तितलियों में उलझ के रह गए हैं लोग किसी ने देखी नहीं मुस्कुराहट उसके गालों की         ---दीपक कुमार