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प्रेम की निशानी- काला तिल

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------------------------ कई साल बीत गए,पर हर दिन जब भी मैं आईने के सामने खड़ी होती हूँ, तुम्हारी याद बिना वजह ही आ जाती है।मैं कतई नही चाहती कि तुम कभी भी याद आओ लेकिन तुम्हारे कहे शब्द अक्सर मुझे तुम्हारी याद दिला जाते है। तुमने कहा था जब भी आईना देखो तो मुझे याद रखना.....ये तुम्हारे गले में काला तिल है न....ये मैं हूँ...अब बोलो कभी भुला पाओगी मुझे? तुम चले गए,समय बदले ज़माना हो गया,कोई कारण भी नही तुम्हे याद करने का...फिर भी .....जब भी आईने के सामने खड़ी होती हूँ तो.....तुम्हारी ये प्रेम की निशानी दिख जाती है।मुझे ही क्यो ,अक्सर गले के मेरे इस तिल को देखते हुए कहते है....ये बहुत सुंदर है,मेरे चेहरे पे मीठी मुस्कान आ जाती है।किसे क्या कहूं.... लोगो के पास बहुत कुछ होता होगा पर मेरे साथ तो तुम न होते हुए भी मेरे पास 24 घण्टे मौजूद हो। श्रद्धा निगम बाँदा उप

सन्नाटा

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सिन्हा साहब के अचानक स्वर्गवास हो जाने पर सबके मुंह से यही निकला,--क्या होगा मिसेस सिन्हा का। कितनी पटती थी मियां बीबी में...अच्छे खासे स्वस्थ थे सिन्हाजी... क्या शानदार व्यक्तित्व के मालिक।कैसी सुंदर जोड़ी थी दोनो की।सुनते है उस ज़माने में प्रेम विवाह किया था..लोग आपस मे बात कर रहे थे.।महिलाये दुख के साथ धीमे धीमे बतिया रही थी..कैसी लगेगी बिना साज श्रृंगार के कामिनी... महिलाओ में ज़्यादा कानाफूसी इसी बात की हो रही थी,उच्च शिक्षा प्राप्त कामिनी,।पहनने ओढ़ने की बेहद   शौक़ीन थी।,सुंदर बिछुए से सजे उनके पैर ,।हाथ मे भरी भरी चूड़ियां..माथे पर लाल बिंदी और सजा चटक लाल सिंदूर उनके सांवले रंगत को चमकदार बना देता था।महंगी और सुर्ख रंग की साड़ियां ही उनका पहनावा। हो भी क्यो न सिन्हाजी उच्च अधिकारी तो थे ही,और उन्होंने मिसेस सिन्हा का कभी खर्च को लेकर हाथ भी न पकड़ा था। बिंदास...हँसमुख ,और हाज़िर जवाबी की वजह से किसी भी महफ़िल की जान होती थी कामिनी सिन्हा।56 -57 बरस में भी ऊर्जा से भरपूर..अपनी हाज़िरजवाबी से महफ़िल की जान होती थी.. शुद्धता के दिन घर की महिलाये बेचैन और कामिनी मौन ,एक तरह की चुप्पी...