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Showing posts with the label Sangita Verma

वो मुझे छोड़ कर जा रही थी

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🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 बीते पलों में जीने की,आदत पुरानी  हो गई, ओस की बूंदों के जैसी, क्षणिंक कहानी हो गई, सन सनाती चल रही है कुछ हवाये, ओस की बूंदों की कमसिन सी अदाएं, एक फूल के आगोश में वो आ गई है, शबनम सी सिमट के शरमा गई है, जानती है क्या है,अस्तित्व अपना, है मगर कुछ ही पल का, उसका सपना, धूंप के आवेश से  वो मिट जाएगी, न जाने किन लम्हों में सिमट जाएगी, कुछ बूंदे सहसा, गुनगुना रही थी, हाले दिल वो अपन सुना रही थी, फूल से लिपट के कुछ तराने गा रही थी, चमक उसकी चांदी सी, वो रिझा रही थी फूल मुस्कुरा रहा था, हाल ए दिल सुन रहा था, व्याकुल ह्रदय की वेदना,वो अपनी छुपा रहा था, वो मुझे छोड़ कर जा रही थी वो ओस की बूंदे मिट्टी में समा रही थी संगीता वर्मा ✍️✍️ .....

किस्मत का खेल

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🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 मेहनत से इंसान की किस्मत बदल जाती है, फिर हाथों की लकीरें भविष्य क्यों बताती है। किस्मत का खेल अजब ही निराला है , क्या हाथों की लकीरों में ही, किस्मत का उजाला है। अद्भुत सी कश्मकश अद्भुत सा खेल है, माथे की लकीरों से किस्मत का मेल है। मेहनतकश इंसान हतोत्साहित हो जाता है, जब किस्मत वाला इंसान बाजी मार जाता है । यूं तो दुनिया में देखें, खेल अजब निराले, जिसपर चाबी किस्मत की उनके वारे न्यारे। एक सबक विधाता ने, सबके लिए लिख डाला, मेहनतकश इंसान ही,होता किस्मत वाला। किंतु हाथों की लकीरों का बड़ा बोलबाला, सबके हाथों में नहीं होता किस्मत का ताला, ऊपर वाले ने कर्मों का खाता जो लिख डाला है, मेहनतकश इंसान ही असल में किस्मत वाला है।          संगीता वर्मा  ✍️✍️

शहीद दिवस

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🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 नमन उन देश के वीर दीवानों को, हो गए जो शहीद,उन परपरवानों  को, कि नहीं परवाह कभी तन मन की--- एक ही ख्वाहिश थी जीवन की, कर दिए प्राण निछावर---   देश के वीर जवानों ने,  ना कोई ख्वाहिश जीवन की, मर मिटे सरहद बचाने में, उनका देश की रक्षा में--- जीवन संपूर्ण गुजरता है, ना परिवार की चिंता करते हैं,  दिल देश के लिए, धड़कता है,  मेरे अमन पसंद वीर, ये कहते हैं---  नस नस में तिरंगा रहने दो, मत बांटो हमको मजहब में, मेरे दिल में तिरंगा रहने दो, शगीता वर्मा ✍✍

धरती पर स्वर्ग

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🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 जीवन खाली गागर है,गुरु ज्ञान रूपी सागर है, सागर में अमृत होता है, गंगा जल जैसा होता है, गुरु अमृत रूपी ज्ञान से,जीवन गागर भर जाते हैं, हम अज्ञानी मानव को, धरती पर स्वर्ग दे जाते हैं स्वर्ण कलश बनाते हैं,खुशियां जग में फैलाते हैं, गुरु की महिमा है महान,नहीं कोई है अनजान, गुरु ज्ञान रूपी सागर हैं,बुद्धि विवेक की गागर हैं--- गुरु जीवन का उजियारा,गुरु से रौशन है जग सारा, जिसके सर पर हाथ गुर का, जीवन सरस बन जाता है, गुरु ही ज्ञान गुरु ही ध्यान,गुरु परमेश्वर कहलाते है, मुक्ति गुरु शक्ति गुरु,गुरु भक्ति कहलाते है, अंधकार रूपी जीवन में,गुरु प्रकाश बन जाते है, भटके हुए राही को,गुरु सही राह दिखाते हैं, हर कदम पर राह दिखाते,धरती को स्वर्ग बनाते हैं गुरु की महिमा गाते गाते, जीवन अनमोल बनाते हैं। संगीता वर्मा ✍️✍️

बिंदिया

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. ⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ ॐ ⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ नैनो की मधुशाला में,डूब जाने को जी चाहता है,  पास बैठो घड़ी दो घड़ी तुम,कुछ बताने को जी चाहता है,  गुनगुनाने को जी चाहता है, मुस्कुराने को जी चाहता है,  बोली मे तेरी खनक है, नैनों में तेरी चमक है, लिखता हूं तुझपे कविता, मेरे जीवन में तुझसे दमक है,  रात की चांदनी हो तुम, सुबह की तुम धूंप हो, मेरा ख्वाब हो तुम, हमेशा मेरा स्वरूप हो, मेरा सुरूर हो तुम,मेरा गुरूर हो, तुमसे ही मेरी दुनिया, मेरा तुमसे जहान है मेरे दिल की धड़कन तू मेरा सम्मान है माथे पे तेरी बिंदिया,दिल को चुरा रही है  चूड़ी की तेरी खन -खन नींदे उड़ा रही है तुमसे ही मेरी दुनिया मेरा जहान है अर्धांगिनी हो तुम मेरी, तुम ही से मेरा मान है, नैनो की मधुशाला में, डूब जाने को जी चाहता है, पास बैठो घड़ी दो घड़ी तुम, कुछ बताने को जी चाहता है संगीता वर्मा✍✍

बड़की अम्मा

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गांव से थोड़ी दूर छोटकी तलैया के उस पार जो आठ दस फूस की  टूटी फूटी  झोपड़ियां दिख रही थी  , अरे वही ... जहां से एक रास्ता ससुर खदेरी नदी को जाता है और दूसरा रास्ता जंगल की ओर जाता है  जहां से अक्सर भेड़िया उन झोपड़ियों के सामने बंधी हुई बकरियों को अपना शिकार बना लेता है । वहीं पर तो बसा हुआ था एक छोटा सा पुरवा... जहां इक्के दुक्के लोग ही अपना बसेरा बनाए हुए थे। कुल आठ दस घर रहे होगें। जिसमें एक घर बड़की अम्मा का भी था । वही पुरवा उन घरों का परिवार था समाज था, कुल  दुनिया थी उनकी सुख दुख बांटने के लिए उन्हें शहर बजार जाने की जरूरत नहीं होती थी वो लोग तो एक दूसरे के साथ हंस बोल कर ही अपना मनोरंजन कर लेते थे। दिन भर लोगों के खेतों में काम करके या मेहनत मजूरी करके जो चार पैसा उन्हें मिलता उससे शाम को दाल चावल पिसान खरीद के लाते और परिवार के साथ मिलकर खाते । जब कभी कोई काम नहीं मिलता तब भी उनके चेहरे पर संतोष रहता। अगर किसी की झोपड़ी में खाना बना है और बगल वाली झोपड़ी में लोग भूखे बैठे हैं तो खाना खाने बैठे लोगों के गले से कौर नीचे नहीं उतरता था। पूरे पुरवे क...

पतंग और डोर

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🪁🪁🪁🪁🪁🪁🪁🪁 ओस की बूंदे हर पत्ते पर,  मोती सा श्रंगार लिए, शरद ऋतु की मीठी मीठी, खुशबू का उपहार लिए, पतंग बन गई है प्रेयसी,  मांझा प्रेम की धार  लिए,     दान दृष्टि के माध्यम से,  भारत का संस्कार लिए,   गुड और तिल के मिश्रण से,  स्वाद की चटकार लिए,                 मकर संक्रांति आ गई देखो, हर्ष और उल्लास लिए।   संगीता वर्मा✍️✍️ #मकर संक्रांति की आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनएं

स्वामी विवेकानंद

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💐💐💐💐💐💐💐💐 जन्म लिया भारत भूमि पर, अनगिनत महानो ने, करते वंदन मुख वचन से, अपने शुभ बखानों में, जो बने त्याग की परिभाषा, लाखों की भीड़ में ऐसे थे, थी जीवन  बलिदान की अभिलाषा, वो महापुरुष ऐसे थे, महापुरुष, महाज्ञानी युवा सन्यासी की एक कहानी है, संस्कार,संस्कृति की  नदीयों सा, वो तो बहता पानी है, भारत भूमि के बेटे की,ये कथा बड़ी निराली है, विश्व के कौने-कौने में,सम्मान दिलाने वाली है, सतगुरु के चरणों में वंदन, अध्यात्मिकता के छंद बने, दृढ़ संकल्पों से जगत में, स्वामी विवेकानंद बने, सब लोगों में पहचान गए, वो एक दृष्टि में जान गये, गुरु परमहंस और रामकृष्ण, असली शिष्य मान गए, संस्कृति संस्कार का हर, मानव को उपहार दिया, शुभ मुख वचन से वेदो मंत्रों का प्रचार किया, चारों दिशाओं में समर्पित,वेदों की महिमा को गाता, मंत्र मुग्ध था  हर एक प्राणी, सुनता मनोहर उनकी गाथा,  मां भुवनेश्वरी की आंख के तारे थे,पिता विश्वनाथ के सहारे थे, उनके दर्शन मात्र से ही लोगों के वारे न्यारे थे,  जीवन अपना  जी ना सके वो इन फूलों की घाटी में,  उस एक पुष्प की अमर गंध है बस...

विश्व हिंदी दिवस की आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं 🙏🌹

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राष्ट्रभाषा में सरताज है हिंदी सुमधुर, सरस,सरल ,आवाज है हिंदी , हिंदी है मातृभाषा संस्कार इसी से--- समृद्ध करें और भी व्यवहार इसी से, बड़ी ही पावन, निर्मल, निश्चल सी भाषा, तुलसी की यह, रहीम की रसखान की भाषा, मीरा कभी सूर के वरदान की भाषा, पढ़ने में लिखने मे ,बड़ी ही आसान सी भाषा, यूं तो अनेक देशों की भाषाये है अनेक---  लेकिन अपनी राष्ट्रभाषा देवनागरी है विशेष, कवियों की लेखकों की प्रिय यह भाषा, हर गजल ,कविता में खूब इसे तराशा, हिंदी दिवस है आज किंतु बात तब बने--- प्रत्येक दिन ही वर्ष में हिंदी दिवस मने, हिंदी थी, हिंदी है ,हिंदी ही रहेगी, यह अपनी मातृभाषा है,  युगो युगांतर तक इसकी जोत जलती रहेगी, आओ नमन करे सभी, अपनी है हिंदी भाषा, रहेगी जीवित सदा, अपनी यही अभिलाषा, संगीता वर्मा, ✍️✍️ #हिंदीदिवस #कविता #मातृभाषा #हिंदीभाषा #हिंदीदिवसकी शुभकामनाएं #poetry #VishwaHindidiwas #विश्वहिंदीदिवस

कोहरे की रात का घेरा

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🌺🌼🌺 ॐ 🌺🌼🌺🌼 गम और खुशी सहती है, कुछ भी नहीं कहती है, अनजानी इन राहों में---  हर पल चलती रहती है,  गम और ....... तू ही हमें यह बता दे, होगा कब आखिर सवेरा, चारों तरफ तो देखा---  कोहरे की रात का है घेरा, गम और........ नाम क्यों तेरा जिंदगी है, क्यों घट रही है उम्र अक्सर, क्या यही तेरी बंदगी है, या डर के जीना जिंदगी है,  गम और ......... जमाने की आदत बुरी है, हर एक मीठी छुरी है, ना करना किसी पर भरोसा, जिंदगी यही कहती है, गम और............ क्यों इतना कोई ना समझता,  दुख से पुराना है रिश्ता, धूप छांव कभी सुख की, आती जाती रहती है,     गम और........... गम और खुशी सहती है, कुछ भी नहीं कहती है, अनजानी इन राहों में, हर-पल चलती रहती है,      संगीता वर्मा✍✍

सूर्य

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सूरज की किरणें जब खिलखिलाती है, अपने संग सुंदर सा पैगाम लाती है, जन्म बड़ा अनमोल है, जग रोशन कर लो, उम्मीदों की एक डोर से, आंचल को भर लो, सूर्यास्त का भी,अंदाज निराला है, मदहोश मस्ती में, थोड़ा मतवाला है, चुपके से आ जाता है, आंखों में ख्वाब सजाता है, थकान रूपी नैनो को लोरी दे जाता है, एक रात आती है पैगाम लाती है, अंधकार में भी कुछ कह जाती है,  एक सुबह होती है जगमगाती है , एक ऊर्जा रूपी, संदेश दे जाती है, सूर्य अस्त उदय का, एक ताना-बाना है, कभी खुशी कभी गम का, बस एक बहाना है, संगीता वर्मा ✍️✍️........

नववर्ष

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🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 वही धरती, वही अकाश, वही सूरज का प्रकाश,  वही चांद,वही तारे, वही रात और दिन के बदलते नजारे, बदलता मौसम, बदलती ऋतुए, बदला दो हजार इक्कीस, नहीं मन में कोई, बीते वर्ष के प्रति टीस, कुछ पाया है,कुछ खोया है,कुछ अनुभवों को संजोया है, इस बीते साल में सभी ने, कुछ अपनों को भी खोया है, रोग विकारों से मुक्ति हो,हो खूबसूरत एक उजाला,  दो हजार बाईस लेकर आए, एक अमृत का प्याला,        मिटे कभी ना भाईचारा, धर्म युद्ध से करें किनारा, धर्म प्रेम की बातें सीखें,सीखें सभी सहज सरीखे, संगीता वर्मा ✍️✍️

एक कप चाय

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⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ ॐ ⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ जब कहते हैं वो चाय की तलब है, तुम्हारे हाथ की चाय में स्वाद गजब है,  अपनी प्रशंसा सुनकर खुश मैं हो जाती हूं, और करें तारीफ मैं चाय नहीं बनाती हू, कहती हूं उनसे तुम ही बना  दो ना, अपने हाथ की चाय भी कभी पिला दो ना, अपने हाथ की पी कर हो गई मै बोर, भावनाओं को समझा करो, जरा करो तुम गौर, कहते हैं मैं बना दूंगा पर तुम मेरी बनाओगी---  मैं अच्छी नहीं बनाता तुम भी नहीं पी पाओगी, चलो कोई बात नहीं फिर भी तुम बना दो ना--- अपने हाथ की चाय का स्वाद भी चखा दो ना, वह खुश हो जाते हैं---  और अपने हाथों से चाय बना कर लाते हैं, एक घूंट भर्ती हूं मैं,वो मेरी तरफ टकटकी लगाते हैं, और तारीफ सुनने के लिए व्याकुल हो जाते हैं, कहते हैं वह बात नहीं है, तुम्हारे हाथों जैसा स्वाद नहीं है,  सुन सुन कर मैं यह बातें, मन ही मन खुश हो  जाती हूं, और एक कप चाय अपने हाथ की बनाकर उन्हें पिलाती हूं संगीता वर्मा✍✍

तुलसी_पूजन_दिवस

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.⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ हे माँ तुलसी नमस्तुते,  ⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ नाम तुम्हारा अपरम्पार,  ⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ पूजे सारा जग संसार,  ⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ सुरस, सुरसा, श्री, लक्ष्मी देवी, ⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ तुलसी, वृन्दावनी,  ⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ माँ तुम अमृत दायनी,  ⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ कष्टों से निवारणी,  ⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ विष्णु प्रिय हो तुम माता, ⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ बदल देती सबका भाग्य विधाता ⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ सुख समृद्धि से सुसज्जित,    ⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ जय हो मेरी तुलसी माता,  ⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ संगीता वर्मा✍✍

मानव का प्रकृति से खिलवाड़

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🌹🌹🌹 ॐ 🌹🌹🌹  कैसी ये हवा चली है,औऱ मचा  है हाहाकार , जहर हवा में फैल रहा है ,हर एक व्यक्ति है लाचार  सोचती हूं कौन करेगा,इस जगत का कल्याण , पाप पुण्य पे भारी है, सब देख रहे है भगवान , कुछ तो उसने सोचा होगा,होकर हम सबसे नाराज , खुदा बन रहा था हर व्यक्ति,फैला रहा था भ्रष्टाचार ,   संभल जा तू बंदे ना कर  प्रकृति से खिलवाड़ , पाप का दोषी है हर व्यक्ति ,संकट में है सारा संसार , देवताओं की पावन धरा पर , जन्मे राम कृष्ण अवतार माँ दुर्गा की पावन धरा पर-- कन्या पूजी जाती देवी समान। फिर भी हे मानव तूने,किया कन्या का अपमान,  अपनी गंदी नियत से आखिर क्यों बनता है तू अनजान, माँ गंगा ना छोड़ी तूने ,मैला किया नरक समान। मांस मदिरा पीकर घट रहा मानव जाति का मान। अपने कर्मों से क्यों राक्षस रूप धारण कर रहा विनाश काले विपरीत बुद्धि धारण क्यों कर रहा प्राकृतिक प्रकोप  के कारण  जगत संकट से लड़ रहा स्वर्ग सी पावन धरा को, किया तूने नरक समान। कुदरत के इस उपहार का तू--- करता रहा घोर अपमान, कभी धर्म के नाम पर जीवो का संघार किया, कभी आहार समझ तूने,पशुओं पर अत्याचार...

विश्वासघात

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🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 बाल्यावस्था की यात्रा को पूरा करके जब सारा ने युवावस्था में कदम रखा इस अवस्था में जो हर किसी को होता है पहला प्यार होना स्वाभाविक ही था उसे अपने सीनियर से प्यार हो गया एक तरफा प्यार नहीं कह सकते दो तरफा था लेकिन जात पात और सामाजिक कुरीतियों के कारण यह प्यार परवान नहीं चढ़ पाया, सारा ने अपने घर परिवार और खानदान की इज्जत को सर्वोपरि रखा और अपने प्यार को कभी जुबां पर आने नहीं दिया, दिल में ही प्यार को दफन कर दिया अपनी पढ़ाई पूरी करने के साथ-साथ सारा की शादी भी हो गयी, सारा की छोटी बहन सिया जिससे सारा को बहुत प्यार था दोनों बहनों में आपसी संबंध बहुत ही मीठे थे ससुराल में आया जाया करती थी सारा ने जब पहली संतान को जन्म दिया तो सिया उसकी देखभाल के लिए घर आई थी और उसने बखूबी अपनी बहन के प्रति जिम्मेदारी निभाई यह देखकर सारा के मन में अपने बहन के प्रति और सनेह ही बढ़ने लगा सिया का बहुत जल्दी सारा के घर आने का सिलसिला शुरू रहा कभी-कभी सारा के पति आदित्य भी सिया को घर ले आते थे सारा को अपनी बहन पर अटूट विश्वास था लेकिन कभी-कभी विश्वास भी आंखों में धूल झोंक देता है कभी-कभी ...

महत्वता शून्य हो जाएगी

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🌻🍂🌻🍂 ॐ 🌻🍂🌻 संसार की खूबसूरत संरचना है नारी, परमात्मा ने,नारी जाति की-- संरचना, बड़ी ही फुर्सत में की होगी, सौभाग्य, शक्ति,सम्मान,भाग्यशाली--      कितनी अनगिनत विशेषताएं भी दी होंगी, लेकिन, क्या  पता था इस कलयुग में-- नारी की दुर्दशा हो जाएगी-- और इन सारी विशेषताओं की-- महत्वता,शुन्य हो जाएगी-- पत्नी के रूप में नारी को-- ग्रह लक्ष्मी कहा गया है,  लेकिन, उस लक्ष्मी का-- सम्मान, कहां हुआ है, डर है कहीं, यह स्त्री जाति--  लुप्त ना हो जाए-- सौभाग्य, शक्ति,सम्मान-- भाग्यशाली, ऐसी विशेषताएं-- भी,उसके साथ विलुप्त ना हो जाए, लेकिन, ऐसा होना आसान नहीं है, नारी नहीं तो पुरुष जाति का-- अस्तित्व नहीं है, स्वाभिमान नहीं है। संगीता वर्मा ✍✍

शतरंज

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⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ इरादे नेक,नियत सच्ची हो--- तो कामयाबी कदम चूमती है , ईश्वर का आशीर्वाद बनकर--- इर्द-गिर्द घूमती है,  क्या हुआ जो तुम--- थोड़े से नादान हो , इस शतरंजी दुनिया से--- थोड़े से अनजान हो,  पासे फेक रहे हैं--- सब अपनी अपनी मर्जी से, दिलों को आहत करते हैं--- अपनी ही खुदगर्जी से, लेकिन वो उंगली पकड़े है--- सही राह दिखा रहा है, हर मुश्किल से पहले ही --- हम को बचा रहा है, लेकिन उसकी कृपा से--- हम फिर भी अनजान हैं--- नादान है थोड़े से --- क्योंकि हम इंसान हैं। संगीता वर्मा✍✍

सैनिक केसरी

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🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳 ना ही तन चाहिए ना भवन चाहिए, मातृभूमि की रक्षा हो, ऐसा फन चाहिए,  मां भारती की रक्षा की खातिर, सीना ताने खड़े रहे हाजिर , अब कर लो चाहे जतन या हवन, पहले से बांधे हैं सर पर कफन, कर कष्टों से अपनी वो दोस्ती, हंसते-हंसते मिटा दी अपनी हस्ती, हम फूलों की सेज पर सोते रहे, वो कांटे गले से लगाते रहे, मां भवानी के सैनिक की देहरी , तन में है  केसरी मन में है केसरी, सात रंगों से बढ़कर छटा केसरी, देखो अंबर की आभा हुई केसरी, हर सैनिक के दिल में है केसरी, तन पर लिपटा तिरंगा हुआ केसरी सो रहे देखो चेहरे पर मुस्कां लिए, मातृभूमि की मुक्ति का अरमां लिए , मां भवानी के पुतो की देहरी , रग रग में तिरंगे की है केसरी, तन में है केसरी मन में है केसरी, हर सैनिक के मन में छटा केसरी, केसरी केसरी केसरी केसरी.....

सपनो का घर

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⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ ॐ ⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘ याद आती है मुझे, मेरी मां के घर की, बीता था बचपन जिसमें, उस गुजरे सफर की, लगता था मुझको,वो सपनो  से भी सुंदर वो मेरी मां का घर, मुझे लगता था मंदिर सोचा ना था दिन ये,कभी  बदल जाएंगे-- छूटेगा घर मां का, रिश्ते सब छूट जाएंगे-- बचपन की वो यादें, संग साथी सहेलियां-- छूट गए सब मेरे, लगती है अब पहेलियां, वापस नहीं लौट कर,वो गुजरे पल आते हैं, सच ही कहावत है रिश्ते सब बदल जाते हैं, जी लो ये लम्हे जो पास अपने हैं, बदलाव एक सच्चाई है,बन जाते सपने हैं, जी लो उन लम्हों को जो आसपास है, बदलेंगे एक दिन वो भी, जो अपने खास है, बदलाव तो प्रकृति का नियम है दोस्तों-- जो आज है वह कल नहीं, यह सच है दोस्तों, प्यार में वह ताकत है, मुट्ठी में बांध लो-- इधर- उधर ना भटको, खुश रहो खुशियों को थाम लो।                                               संगीता वर्मा✍✍                               ...