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Showing posts with the label Shilpa Modi

व़ो वक्त भी क्या वक्त था

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जब सांझा चूल्हा घर में जलता था दादी, सौंधी -सौंधी मिट्टी से चूल्हा लेप दिया करती थी मांँ कोयला सजाकर अग्नि प्रज्वलित कर देती मांँ, चाची, ताई हंसी ठिठोली करती हुई मिलकर खाना बनाने की तैयारी करती एक रोटी बेलती दूजी सेंक दिया करती पच्चास रोटियां सेंककर भी माथे पर सिकंज नहीं डालती  बड़े प्यार से अपने हाथों से खाना खिलाती सबके खाने के बाद अंत में स्वयं खाती है दादी अपने पोता- पोती की लाड लड़ाकर कहानियांँ सुनाया करती प्रेम से बनाए हुए खाने की स्वाद ही अलग होती है।  चूल्हे की फूली- फूली रोटियांँ खाकर पेट भर जाता मगर मन नहीं भरता  सांझा चूल्हा की बात ही अलग होती है घर की आर्थिक स्थिति चाहें जैसी भी हों  एकसाथ मिल बांँटकर खाकर मन को तृप्ति मिलती थी छोटी -छोटी खुशियां भी बहुत बड़ी लगती थी  एक साथ रहने से  मेला जैसा लगता था त्योहारों में पकवान से घर खुशबू से महक जाता  हम बच्चों की तो हर दिन मौज रहती घर में अचार,पापड़,बड़ी,मंगोड़ी मिलकर बनाया करती थीं वो वक्त भी क्या वक्त था  जब सांझा चूल्हा जला करता था। शिल्पा मोदी

नशे से बढ़ते युवाओं के कदम

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तिनका - तिनका जोड़ कर घर बनाते हो तुम जीवन में आई आंधियों से घबराकर  शराब की बोतल को अपना गम का साथी मानकर मित्र बना लेते हो तुम बिना माचिस की तीली जलाए ही  अपने घर की खुशियों को आग लगा देते हो तुम नचाती है बोतल नाचते हो तुम  बूंद-बूंद हलक में जाते ही होश गवां देते हो तुम तिनका - तिनका जोड़कर घर बनाते हो तुम जीवन में आई आंधियों से घबराकर  शराब की बोतल को होठो से लगा लेते हो बहक जाते है कदम बहक जाते हो तुम अपना समझकर कोई तुम्हें राह दिखाएं  उस पर भी भड़क जाते हो तुम दवा मानकर जाम पर जाम पीते हो असल मे दवा नहीं जहर पीते हो तुम जानते हो वो मित्र नहीं शत्रु है तुम्हारा क्यो विष पीकर लीवर को सड़ाते हो तुम ऐसा क्यो करते हो तुम ? अपने आप को शराब का अधीन बना लेते हो तुम कभी नशेड़ी कभी शराबी कहलाते हो  अपने आप को और लोगो की नजरों मे खुद को कितना गिराओगे तुम अरे! अब तो संभल जाओ  खुद को नशे से मुक्त करो तुम तिनका - तिनका जोड़कर घर बनाया जीवन मे आई आँधियों से घबराकर नही नशे से वशीभूत होकर नहीं  अपनी खूबसूरत सी जिंदगी को हिम्मत से सशक्त होकर सँवारो तुम शिल...

बीता हुआ कल

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जो लोग बीते हुए कल के साथ अंतस् में कड़वाहट भरकर जिंदगी जीतें हैं न तो वो खुद ही खुश रहतें हैं न हीं ओंरों को खुश रहने देंतें हैं। जो लोग बीतें हुए कल को  अपने ऊपर पर हावी रखते हैं वो एक ही बात को चिव्ंगम के सम चबातें रहतें हैं अपनी बात को सही साबित करने के लिए दूसरों के दिमाग का दही कर देते हैं। जो लोग बीतें हुए कल के साथ जीतें हैं बीतीं बातों को गलें से लगाकर जब भी बोलने के लिए मुंह खोलतें हैं; जहर ही उगलतें हैं वो खुशनुमा माहौल को भी गमगीन में बदल देते हैं। जो लोग बीतें हुए कल के साथ जीतें हैं न खुद सुकुन से जीतें हैं  न ओंरों को सूकून सें जीने देते  हैं बीतें कल में जो भी उनके साथ बीता उसका दोष दूसरों पर मढ़ने का हर संभव प्रयत्न करतें हैं। शिल्पा मोदी✍️✍️

रक्तदान होता हैं महादान

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जब भी लगे रक्तदान शिविर  तो जरूर करें रक्तदान रक्तदान होता हैं महादान  रक्तदान करने से स्वयं के शरीर में होता लाभ,  नहीं होता कोई नुक्सान न ही आती शरीर में कोई कमजोरी डाक्टर के संरक्षण में दिया जाता रक्तदान रक्तदान करके किसी की जान बचाकर  मिलती आंतरिक खुशी और संतुष्टि रक्तदान करना होता पुण्य का काम  जात पात का नहीं है काम रक्तदान करने से मिलें किसी को जीवन दान नि: स्वार्थ भाव से अपना रक्त दे देना आओ हम सभी को मिलकर आगे आना हैं रक्तदान होता हैं महादान ये सभी को बताना हैं  रक्तदान के प्रति आमजन में व्याप्त  गलत धारणाओं को जड़ से मिटा देना हैं शिल्पा मोदी

मै माँ के लिए क्या लिखूँ

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मै माँ के लिए क्या लिखूँ जो स्वयं ही सृष्टि की रचनाकार है जिसके आगे तीन लोक के देवता भी नतमस्तक करते है उस जननी को नित्य, मै बारम्बार करती प्रणाम हूँ। मै माँ के लिए क्या लिखूँ जिन्होंने मुझे अपने रक्त से सींचा मुझे जीवन दान दिया खुद तकलीफ में रहकर, मुझे ममता की छाँव दिया मैं माँ के लिए क्या लिखूँ ममता की मूरत,स्नेहमयी सूरत माँ ने आरंभ से लेकर अंत तक  अपना सर्वस्व मुझपर न्यौछावर किया मै माँ के लिए क्या लिखूँ अब दूर नभ में रहती हैं जब - जब  तुम्हें पुकारा माँ बनकर मेरी शक्ति आपने मुझे राह दिखाया। मैं माँ के लिए क्या लिखूँ जितना भी लिखूँ कम ही होगा मेरी अल्फाजों और स्याह में भी न इतना दम होगा माँ का प्यार, स्नेह, दुलार, आशीष  सदैव अपने बच्चों के प्रति अतुलनीय, अवर्णनीय, अनंत और असीम होता है जिसका आभास हर बच्चें को जीवन के हर मोड़ पर होता है शिल्पा मोदी✍️✍️

प्यासे पंक्षी

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चिलचिलाती धूप में तालाब पोखर सब सूख गए। बूँद -बूँद पानी के लिए व्याकुल पंक्षी प्यासे मरे जाए।  पानी की तलाश मे पिपासु पंक्षी इतउत चक्षु दौड़ाए। कहीं एक बूँद पानी टपकता  देख चेहरे पर खुशी छा जाए। प्यासे पंक्षी पानी की लालियत में हर संभव जतन करते जाए। नल पर चोंच लगाकर प्यास बुझाने के लिए फड़फड़ाए। चीं -चीं करके, अपने प्यासे साथियों को आवाज लगाए। संघर्ष करके एक बूँद पानी पीकर खुद को ढाढस बंधाएँ। हे मानव तुम्हें मानुष जीवन मिला थोड़ा सत्कर्म भी करते जाए। भूखे प्यासे पंक्षियों के लिए दाना पानी का इंतजाम कर मानवता निभाए। शिल्पा मोदी

मै मजदूर हूँ

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मै मजदूर हूँ , मैं मजदूरी कर के खाता हूँ मेहनत करके दो वक्त की रोटी कमाता हूँ। छोटी सी टूटी- फूटी झोंपड़े मे रहकर गुजर बसर करता हूँ। फट्टे-पुराने या उतरन पहनकर तन ढकता हूँ। मै मजदूर हूँ, मै मजदूरी करके खाता हूँ,,,,,,,, मुझे अपनी जिम्मेदारियों का अहसास है   इसलिए जी तोड़ मेहनत करता हूँ। अपने बच्चों को अच्छी परवरिश और उच्च शिक्षा देने के लिए अपनी पीड़ा को अनदेखा करता हूँ। मै मजदूर हूँ ; मै मजदूरी करके खाता हूँ,,,, जीवन में कर्म प्रधान है   जो नव निर्माण करता हैं नहीं डरता हूँ; मैं आँधी तूफानों से अपनें बाजुओं पर भरोसा करता हूँ मुश्किलों से भरी राह  हैं मेरी  बिना घबराए; खुद अपनी राह  बनाता हूँ। मै मजदूर हूँ ; मैं मजदूरी करके खाता हूँ,,,,,,,,,, मै मेहनतकश इंँसान हूँ अपनी मेहनत पर नाज करता हूँ अपनी मेहनत से ही बढना और  अपने परिवार के उज्जवल भविष्य के लिए मैं हर दिन मजदूरी करने निकल पड़ता हूँ। मै मजदूर हूँ; मै मजदूरी करके खाता हूँ।,,,,,,, शिल्पा मोदी✍️✍️

मिट्टी की मूरत

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मै कोई मिट्टी की मूरत नहीं न हीं तुम कोई कुम्हार हों। जो मुझे अपने मनचाहें आकार कें अनुरूप मुझें ढालोगें और मै ढल जाऊँगी मै कोई मिट्टी की मूरत नहीं मै जीती जागती इंसान हूँ मै अशक्त नहीं; मै सशक्त हूँ जो तुम्हारे द्वारा किए हुए जुल्मों सित्तम कों चुपचाप सह जाऊँगी। मै कोई मिट्टी की मूरत नहीं जो तुम्हारे तोड़ने से टूट जाऊँगी आदर दोगे तो आदर पाओगे वरना जैसे दुराचार करोगें ब्याज समेत वापस लौटाऊंगी हाथ उठाने का दुस्साहस किया तो हाथ तोड़कर तुम्हारे हाथ में दे जाऊँगी मै कोई मिट्टी की मूरत नहीं जो तुम्हारें तोड़ने से टूट जाऊँगी मै अपराजिता हूँ ,,,,,,,,,,, मैं तुम्हें नाकों चने चबवा दूँगी,,,,,,,,,, शिल्पा मोदी✍️✍️

दुरदर्शन

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भारत में दूरदर्शन की स्थापना 15 सितंबर 1959 को दिल्ली में हुई थी। शुरुआत में टेलीविजन पर प्रसारण आधे -आधे घंटे के लिए किया जाता था। दूरदर्शन पहले टेलीविजन इंडिया के रूप मे जाना जाता था , बाद मे 1975 में दूरदर्शन का नाम दे दिया गया। प्रारंभ में दूरदर्शन की विकास यात्रा काफी धीमी थी। पहले ब्लैक एंड वाइट प्रसारण किया जाता था। 1982 में रंगीन टेलीविजन आने से लोगों का रुझान काफी बढ़ गया। दूरदर्शन मात्र मनोरंजन का ही चैनल नहीं था अपितु राष्ट्रीय चैनल होने के साथ-साथ सांस्कृतिक भारतीय ऐतिहासिक का चैनल हुआ करता था आज के युग में सौ चैनल निकल गए मगर  दूरदर्शन की बराबरी आज भी कोई नहीं कर सकता है। दूरदर्शन का दौर भी क्या दौर था। दूरदर्शन के सीरियल को याद आज भी दर्शक करते है। रविवार का इंतजार सभी लोग किया करते थे और सुबह पहले उठते ही सबसे पहले रंगोली देखा करते थे। इसका इंतजार लगभग सभी को रहा करता था और बच्चों की वह कार्टूंस "डोनाल्ड डक" ,"अंकल स्क्रूज" , "अप्पू राजा" , "मोगली जंगल जंगल बात चली है पता चला है" उस युग के बच्चों को आज भी याद है। सुबह. 9:00...

डिप्रेशन

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जब कोई बात दिल में घर बना लेती है दिमाग में जाकर ताण्डव मचाती है। तब दिल और दिमाग में द्वंद छिड़ जाती है तनाव और चिंतन से इंसान उलझकर रह जाता है। मानसिक और भावनात्मक रुप से हारने लगता है उसे अपने चारों ओर तमस ही तमस नजर आता है। मन और तन में निराशा ही निराशा छाने लगता है स्वभाव में आक्रोश छलकनें लगता है मष्तिष्क में नकरात्मक ख्यालों का भाव बहने लगता हैं इंसान हिम्मत करके उठना चाहता हैं मगर स्वयं का शरीर साथ देंनें सें इंकार कर देता हैं। दर्द ही दर्द पूरे शरीर में महसूस होने लगता है चिड़चिड़ापन मन मस्तिष्क में हावी होंनें लग जाता हैं वो अपनी सुध् बुध् सब खो बैठता है सोंचनें समझनें की शक्ति क्षीण होंनें लगती हैं न ही अपनें, न ही ये दुनिया अच्छी लगती हैं अपने आप में घुटन महसूस होने लगती हैं खुद से ही विरक्ति होने लगती है नजर आता है मौत को गले लगाना  नहीं, मत धकेलो उसे, बचा लो डिप्रेशन से बहुत नाजुक और कोमल होता हैं मानव मन  अपने व्यस्त जिंदगी से थोड़ा समय निकाल कर समझो उन्हें।  थोड़ा प्यार, थोड़ा देखभाल, थोड़ा साथ देकर डिप्रेशन से बचा सकते हो तो बचा लो उन्हें। शिल्पा मोदी✍️✍...

जीवन की चुनौतियांँ

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जीवन में जब भी चुनौतियाँ ललकारती  है उसे खुले दिल से स्वीकार करो। तब तक हार न मानो  जब तक जीत हासिल न कर लो। कमर कसकर हर चुनौतियों  का डटकर मुकाबला करो। दुनिया में कोई भी काम असंभव नहीं होता है थोड़ा सा हौंसला,परिश्रम, ढृढनिश्चय का संकल्प लेना होता है। चुनौतियों ही इंसान को  उसके सामर्थ्य से अवगत कराती है। आलसी लोग दूसरों पर दोष मढ़ते है कर्मठ लोग चुनौतियों को स्वीकार करते है। सोना की तरह तपकर अपने सर्वांग व्यक्तितत्व को निखारते है। शिल्पा मोदी✍️✍️

एक ही दिन क्यों मनाए

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एक ही दिन क्यों मनाए हम ,महिला दिवस जबकि हर दिन महिलाओं का होता है दिन की शुरुआत होती है महिला सुबह की आरती ,शंखनाद होती है महिला संध्या कि संझाबाती ,तुलसी का पौधा होती है महिला हर रंग रूप ,हर किरदार मे अपना फर्ज निभाती है महिला सुख -दुख मे साथ निभाती है महिला नदियांँ की बहती धारा होती है महिला अपने अस्तित्व को भूलाकर हर रिश्तों मे हिल मिल जाती है महिला झरनों की ध्वनि होती  है महिला धरती का साज श्रृंँगार होती है महिला अपने घर ,अपने संसार की रौनक होती है महिला अरमानो से सुंदर ,सलोना ,आशियाना सजातीं सँवारती है महिला अपने बच्चों की निःस्वार्थ पालनहारी होती है महिला हर गम और हर खुशी मे  साथ निभातीं है महिला कितनी अनकही बातें मन मे भुलाकर सबके मन की बात को समझती आई है महिला फुलों की क्यारी ,बागों की बहार होती है महिला फाल्गुन की फुहार , दीपावली की रोशनी होती है महिला हर क्षेत्र मे अपना लोहा मनवातीं है महिला समस्त श्रृष्टि की जन्मदात्री , जगद्धात्री होती है महिला सर्वशक्तिमान , आत्मनिर्भर , प्रतिभावान , होती है महिला हो सके तो शब्दों से ही नहीं , विचारों से ही नहीं अपितु दिल...

साहित्य और साहित्यिकार

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साहित्य और साहित्यिकार का आपस मे गहरा नाता है साहित्यिकार व़ो ही रचता जो समाज उसे दिखाता है साहित्यिकार पारदर्शी , दूरदर्शी , निर्भीक होकर बेधड़क, बेबाक होकर अपनी कलम चलाता है  वो सत्य लिखने से कभी नहीं घबराता है अपनी दमदार लेखनी से सबकी पोलपट्टी सरेआम खोलता है साहित्यकार  हर दिन एक नया इतिहास रचता है समाज मे हो रहे कुकृत्यो , बर्बरता, असभ्यता ,नृशंसता पर आवाज उठाता है महसूस कर भावनाओं को इस कद्र हुबहू कागज पर उतार देता है साहित्य समाज को एक नई दिशा देता है साहित्यकार अथक , अविराम , अनवरत अपनी लेखनी से नये आयाम रचता है। साहित्य के माध्यम से हमेशा नयी चेतना जगाता है । शिल्पा मोदी✍️✍️

मानो या ना मानो

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मानो या ना मानो  किंतु ये सच है इंसान स्वार्थी हो गया है  भूल गया अपनी संस्कार और संस्कृति को इस कदर लालच के अंधी दौड़ मे शामिल हो गया है मानो या ना मानो  किंतु ये सच है इंसान स्वार्थी हो गया है खुशियों और गम को  नफा और नुकसान मे तौलने लगा है मानो या ना मानो किंतु ये सच है  इंसान स्वार्थवश रिश्तों की  मर्यादा भूल गया है गहन अपराध को जन्म दे रहा है मानो या ना मानो  किंतु ये सच है स्वार्थी इंसान शिक्षित होकर भी  अशिक्षित जैसा व्यवहार कर रहा है क्रोध , लोभ , अहंकार वश दूसरों के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहा है शिल्पा मोदी✍️✍️

मेरा छाता

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रंग बिरंगा मेरा छाता छाता खुलते ही घेर घुमेरदार हो जाता बंद होकर दादा जी की छड़ी बन जाता बरखा की बूँदै से मुझे भींगने से बचाता तपती किरणो से मुझे झुलसने से बचाता पगली पवन देखकर छाता फुर्र फुर्र उड़ जाता बनकर मेरा आशियाना साथ साथ चलते जाता जो छाता को बोझ  समझता जरूरत पड़ने पर बड़ा पछताता। शिल्पा मोदी

कोशिश

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रोने से क्या होगा क्या रोने से समस्या का समाधान मिल जाएगा एक बार विफल हो गए तो क्या हुआ दुबारा कोशिश करो  तब तक कोशिश करते रहो  जब तक तुम्हें अपने कार्य मे जीत हासिल नहीं हो जाती हिम्मत से , सूझबूझ से ,ढृढ़निश्चय होकर आगे बढो रोकर मन हल्का कर लो मगर खुद को कमजोर ना करो जिस तरह सोए हुए सिंह के मुख मे हिरण  कभी भी अपने आप प्रवेश नहीं करता  वैसे ही जिंदगी मे सफलता अपने आप नहीं मिल जाता उसके लिए निरंतर कोशिश करना पड़ता है शिल्पा मोदी✍️✍️

तितली रानी

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तितली रानी तितली रानी  इंद्रधनुषी रंगो जैसी रंग बिरंगे पंखों वाली बड़ी मनचली बड़ी मतवाली डाल डाल पर जाकर फूलो की रसपान करने वाली  तितली रानी तितली रानी बड़ी सुकोमल बड़ी नाजुक किसी के हाथ नहीं आने वाली सुन नहीं सकती मगर कुशाग्र बुद्धि वाली तितली रानी  तितली रानी उन्मुक्ता से व्योम मे उड़ने वाली नन्ही सी जीव हो मगर हो बड़ी सयानी कभी ऊँचे पेड़ो पर कभी छोटे पौधे पर बैठकर अपने झिलमिलाती पंखो को नचा नचाकर मन को लुभाने वाली। शिल्पा मोदी✍️

सैनिकों की तपस्या

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सैनिकों का जीवन एक तपस्या है कठोर संघर्ष करते है उनके त्याग ,समर्पण और  बलिदान के वजह से  हम देशवासी सुरक्षित रहते है कँपकँपाती ठंड मे  तपती धूप मे  बारिश हो या आँधी तूफान  अपने फर्ज पर अडिग रहते है मोह माया को तज कर  एक अच्छे साधक बनकर अपनी तपोभूमि अपनी कर्मभूमि अपनी धरती माँ के लिए  रज की मिट्टी मे मिलकर  चँदन से महकते है शिल्पा मोदी✍️✍️

एक जासूस

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बात सिर्फ प्यार की नहीं है बात अपनेपन की है विश्वास की है  जज्बात की है यूँ बात बात पर एक जासूस की तरह सवालो की झड़ी ना लगाया करो यूँ अविश्वास करके दिल ना दुखाया करो अगर सच्चा प्यार करते हो  तो मेरी आँखो मे देखो मेरे दिल मे झांँको और क्या कहे तुमसे बात सिर्फ़ प्यार की नहीं जितनी दिल्लगी करना है कर लो  मगर बेबुनियादी जासूसी करना छोड़ दो ये मेरे आत्मसम्मान को चोट पहुँचाता है वक्त है अभी भी चाहो तो खुद को संभाल लो। शिल्पा मोदी✍️✍️

साधना

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मेरी नजर मे स्वयं के मन को एकाग्र करना साधना है मेरी नजर मे मुद्राओ मे बैठकर ध्यानचित्त लगाना साधना है मेरी नजर मे अपनी विशेष  चक्रो पर ध्यान करना साधना है मेरी नजर मे श्वासो की प्रक्रिया को एक ही गति मे नियंत्रण करने का प्रयास साधना है मेरी नजर मे आत्मा और परमात्मा मे खुद को लीन करना साधना है मेरी नजर मे खुद से बाते करना जीवन का मकसद क्या हैं जानना साधना है मेरी नजर मे योगा मेडिटेसन भजन भक्ति मे ईश्वरीय कार्य मेंअपने आप को समर्पित करना अलौकिक अनुभूति महसूस करना  साधना है शिल्पा मोदी....