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Showing posts with the label सुशील पांडेय

वो खिलाड़ी है

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................... वो खिलाड़ी है,खेलते रहते है, मैं दर्शक हूँ,देखता रहता हूँ, अटूट संबंध है दोनो का, एक दूजे के बिना,दोनो अधूरे है, वो हर दाव पेंच में माहिर है, मैं उनके दाव पेंच के अंदाज पर फिदा हूँ, वो चाल चलते है,मैं जिज्ञासु बनता हूँ, वो मात देते है,मैं खुश हूँ जाता हूँ, उनके इस हुनर पा फिदा रहता हूँ, मैं दर्शक हूँ,देखता रहता हूँ। न जाने कितने दर्शक, मेरी तरह ही,खेल में मशगूल है, खेलते तो कुछ ही,  बाकी दर्शक बन,नशे में चूर है, जब तक समझ आता है, काफी वक्त बीत चुका रहता है। वो खिलाड़ी है..................          (सुशील कुमार पांडेय)

धुंआ हर तरफ है

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धुंआ हर तरफ है, लेकिन आग कही -कही, जिधर देखो उधर जलन, मगर बाते बेमतलब की। ......................... लोग बोलने को खाली है, लोग सुनने को खाली है, मैं 'हा' तो दूसरा ' न', कुछ ऐसी 'राय' बना ली है। .................... न निष्पक्ष बोलना है, न निष्पक्ष सुनना है, बस अपने को ही, अच्छा साबित करना है, निगाहें कही है तो निशाना कही, धुंआ हर तरफ लेकिन आग..........

आईना पूछता है

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आईना पूछता है, कि हे इंसान, किस मिट्टी का बना है तू? केवल वही आईना बनाया, जिसमे केवल चेहरा दिख सके, वह आईना क्यो नही बनाया? जिसमे मन का मैल भी दिखे। आईना पूछता................ अनेक मशीनों के आविष्कार हुए, एक्सरे, सी टी स्कैन, एम आर आई...... शरीर के हर अंग के ,हर मर्ज की खोजबीन हो पाई, जो मशीन चरित्र दिखा दे, वह क्यो न ईजाद  हो पाई? आईना पूछता...................

सब कुछ खुला सा है,

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सब कुछ खुला सा है, मगर उन्हें राज नजर आता है, मेरी हर खामोशी में, उन्हें अलग अंदाज नजर आता है। हम चाह कर भी, दूर ही रहे उनसे, इन दूरियों में भी , उन्हें प्यार नजर आता है। मंजिल की चाह में,मुसाफिर बना रहा, मेरे इन रास्तों में, उन्हें संसार नजर आता है। चेहरे की मासूमियत,  आज भी वही है, लेकिन उन्हें तो बस,किरदार नजर आता है। खेलते भी वही है, जीतते भी वही, जिंदगी के हर मोड़ पर, उन्हें बस 'चाल' नजर आता है। जिद्द उनकी है,मुझे अपना बनाने की, इस जिद में मुझे, गैरत का इंसान नजर आता है, वो मुझे समझते है,मैं उन्हें समझता हूँ, फिर भी सब कुछ अनजान नजर आता है। सब कुछ खुला सा है....................               सुशील पांडेय 

आइये कभी

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चाय हो जाय एक साथ, दो गज की दूरी पर बैठकर, समझा जाए कि,        गुनगुना पानी पीकर        शरीर मे ठंडक है या नही? समझा जाए कि,       चेहरा छिपाकर रखने से,       आत्मीयता कम तो नही? समझा जाए कि,       जिंदगी के लिए,       कड़वा काढ़ा पी सकते है,       लेकिन क्या संबंध निभाने में,       कड़वी बाते बर्दास्त है कि नही? समझा जाए कि,      सामाजिक दूरी से,      संबंध वही है या बदल गए?      यदि वही है तो,      हकीकत में अपनापन गायब क्यो? आइये कभी चाय हो जाय...............

कोरोना

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............. सब कुछ थम सा गया है, बहुतो का, घर से निकलना, कुछ का, अपने घर जाना, वक्त ठहर से गया है। सब कुछ.......... 'कोरोना' का कहर, न दिखने वाला जहर, घोषित भगवान बेबस दिख रहे, बस डॉक्टर, भगवान सा हुआ है। सब कुछ ........... सच्चाई पता चली कि, कितने दिन का स्टॉक घर मे, रख सकता है मानव, पता चला कि , बस दो चार दिन ही, बाकी बेबस सा हुआ है। सब कुछ .......... मंदिर, मस्जिद,गुरुद्वारे... हर जगह बंद से दरवाजे, ठेकेदारों की दुकान दिख रही बंद सी, बस निगाह ऊपर वाले की ओर, बिना परीक्षा के ही परिणाम, क्या से क्या हो गया है। सब कुछ........