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Showing posts with the label रीमा ठाकुर

मै आऊंगी "

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ढोलक की आवाज,  ऋतिक के कानों में गूंज रही थी!  रात का तीसरा पहर करीबन रात दो बजे के आसपास का समय होगा "" उसकी नींद उचट गयी " शोर बढता जा रहा था " जैसे उसके घर मे ही कोई ढोल पीट रहा हो " उसका कान सुन्न हो रहा था!  वो बडबडाया, हद हो गयी यार,  उस आवाज के आगे उसे खुद की आवाज़ भी न सुनायी दी" अब शोर इतना बढ गया था  की वो गुस्से से बालकनी की ओर बढ गया जिधर से आवाज आने का अनुमान लगाया था उसने " पर बालकनी मे आते ही, वो आवाज चारों तरफ से आने लगी,  वो जोर से चीखा"""" कौन है यहाँ, इतनी रात में भी कोई भला ढोल बजाता है" उसकी चीख इतनी तेज थी की आवाज आनी बंद हो गयी!  ऋतिक ने इधरउधर झांक कर देखा कोई नजर न आया!  अभी वो वापस मुडा ही था की मांदल की हल्की आवाज उसके कानों में पडी वो वापस पलटा, पर इस बार उसे जो नजर आया      "उसके मन में कौतूहल पैदा कर गया!  क्वार्टर से करीब सौ फीट की दूरी से ही जंगल की शुरुआत हो जाती है!  जहाँ से घुमावदार रास्ता जाकर चौरास्ता बन जाता है" वही पर कुछ लोग नजर आ रहे थे!  वही आलावा जल रहा था, जिसकी रोशनी में स...

शिव

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हर नाद समाहित शिवम् शिवम्!  हर शब्द प्रवाहित शिवम् शिवम्!!  सिर पर पावन गंगाधारी है!!  न  मन मे कोई अहम्अहम्!!  हर नाद समाहित शिवम् शिवम्!  हर शब्द प्रवाहित शिवम् शिवम्!!  प्रभु अपरजित चंद्रधारी!  कण कण मे समाहित त्रिपुरारी! न मन मे कोई भरम् भरम्!!  हे सत्य सुंदरम् शिवम् शिवम्!!  हर नाद समाहित शिवम् शिवम्!  हर शब्द प्रवाहित शिवम् शिवम्!!  नागो की माला विषधारी!  कानों में कुंडल त्रिपुरारी!!  त्रिनेत्र खुले, प्रलयंकारी!  अब न है, कोई वहम वहम!!  हर नाद समाहित शिवम् शिवम्!  हर शब्द प्रवाहित शिवम् शिवम्!!  नंदी है  प्रतिक्षित द्धार खडे!  शिव, असुरों का संहार करे!!  तन पर भस्म राख मले!!  है   मशान रमे अलंकारी!!  हर नाद समाहित शिवम् शिवम्!  हर शब्द प्रवाहित शिवम् शिवम्!!  है  डम डम डमरू नाद करे!!  है त्रिशूल पे काशी हृदय बसे!!  कैलाश पति,  हे महादेव भोले!  है आदिशक्ति  प्रिये हृदयश्वरी!  हर नाद समाहित शिवम् शिवम्!  हर शब्...

मकर संक्रति

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  भोर सुहानी  , नदियाँ निर्मल,  फूलों को मकरंद  छुऐ!  ढूंढ रहे पराग फूलों में, कितने,  सुन्दर रूप लिए!!  उदय, आदित्य, नील गगन में,  ललिमा नभ पर छायी!  स्वर्णिम किरणें "मतवाली बन" धरा स्पर्श करने आयी !!  सुन्दर पुष्प खिले बगिया मे,  महकी यौवन तरुणायी!  गूंजे शंख, मांदल ध्वनि, सब" ऐसी मधुरता है छायी!!  पुष्प सजा चरणों में, प्रभु के,  सुन्दर सा फिर रूप सजा!  मानव मन, मुखरित "हो बोला" भक्ति का, संयोग जगा!!  कांटे चुनकर, फूल बिछाओ, मंगल बेला फिर आयी!,  मकर संक्रांति की बेला है,  पिता पुत्र मिलन की तिथि आयी!!   रीमा महेन्द्र ठाकुर वरिष्ठ लेखिका राणापुर झाबुआ मध्यप्रदेश भारत

डाकिया डाक लाया

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एक खाकी टोपी है सिर पर"एक  कंधे पर खाकी थैला" कितने सपनो की गठरी, ले घर घर भटके डाक वाला "!  कुछ चिट्ठी लिऐ, कुशलता की, कुछ बच्चों की किलकारी की" कुछ माँ बापू की कुशलक्षेम, कुछ बातें खेत खलिहानों की!!  कुछ सरहद पर है शूरवीर, लिखते यादों और सपनो को" माँ की ममता के आंचल को, धरती माँ से तुलना करते!  कही नवयौवना  प्रेयसी को, अपने सपनो मे बुनते " कही हरी चूडियाँ सुहागन की, अपने शब्दों में सुनते!!  कही परदेशी का विरह प्रेम, कही मिलन जुदाई की बातें " उस एक पन्ने की चिट्ठी मे, कितनी होती थी भरपाई!  महिनों इंतजार करके, आंखे जब थक जाती " तब एक सुहागन की चिट्ठी, डकिया बाबू से मिल पाती!!  रीमा ठाकुर लेखिका  राणापुर झाबुआ मध्यप्रदेश

टूटते शाख

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सुबह की धूप मखमली सी है " तेरी यादों की कमी सी है!  टूटते शाख के पत्ते से तुम " लौट आओ, आंखों में नमी सी है!!  इंतज़ार के दिन गुजरे, महिनो में " धडकने मध्यम सी है, सीने में!  कुछ बचा है, ही नही, तुमबिन यहाँ " सांसे अब तो अनकही सी है!!  शब्द अब मौन से है, मेरे "  सब पूछते हैं, कौन हैं तेरे!  सवाल खुद जबाब बन ही गये,  ये बात और है, जिंदगी नयी सी है!!  प्रेम सच्चा है,  हर बार तोडते क्यूँ हो" मूर्ति को पाषाण समझते क्यूँ हो!  बंदिशे की बड़ी दीवार, पता था तुमको" तुम बिन कैसे जियें,आंखे भरी सी है!!  कर लिया सौदा "क्यूँ जमाने से" अब तो डर लगता है, फसांने से!  अपने ही, बन जाते है, क्यूँ अजनबी " किसे बताऊँ, तुम जिदंगी, खत्म सी है!!   श्रीमती रीमा महेंद्र ठाकुर "वरिष्ठ लेखक" राणापुर झाबुआ मध्यप्रदेश भारत

दोहन

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प्रभु लाज रखो मेरी,  हाथ जोडे निरीह आंखे बंद आंसुओं की धार  एक अबला,   कृष्ण भक्ति में लीन,  विश्वास की परकाष्ठा,, पंचाली कृष्णा, कृष्ण है, न तुम्हारा सखा " धीरे से नयन खोलकर देखती है, अद्भुत, सामने केशव खड़े, बस उन्माद, कुछ खबर नही "!  हडबडा उठ बैठी नित्या, कुछ पल इधरउधर देखती रही, अखिर ये कैसा दुर्लभ स्वप्न था!  हा स्वप्न ही तो था! पर इस स्वप्न का आना" कोई संदेश तो नही " सोच में पड गयी नित्या, सुबह का स्वप्न कुछ अनमना सा हो गया मन,!  मैडम नौ बज चुके है, अभी बैड पर हो, पास आकर माथे पर हाथ रखते हुए बोले, विवेक जी, फीवर तो है नही " मै सुबह छह बजे का गया हुआ, आधे काम निपटा कर आ गया, और आप भी नित्या जी कमाल करती है! चलिए ऊठिऐ" विवेक आज न मैंने सपने में, पंचाली, वस्त्र,,,  उफ आपके सपने, धरातल पर आईऐ "नित्या जी,विवेक जी वाशरूम की ओर बढ गये! आगे नित्या कुछ न बोली, बालों को समेट, किचन की ओर बढ गयी!  ये काम वाली रोज देर से आती है, अकेले ही बडबडाने लगी!  मैम साहब, चलो अच्छा है तुम   आ गयी, फीकी मुस्कान से बोली नित्या" मैम साहब आपकी...

राष्ट्र सुरक्षा या मनभेद एनएसए"

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राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980" रासुका, देश की सुरक्षा के लिए सरकार को   अधिक शक्ति प्रदान संबंधित कानून है!  यह कानून केद्र,  और राज्य सरकार को गिरफ्तारी का संदेश देता है!  जब 1980 में लागू हुआ तो उस समय इसकी अवश्यकता देशद्रोहीयो के लिए कारगार सबित हुई, पर समय के साथ इसमें कुछ बदलाव हुए " आज के समय में इसे कानून के कुछ राजनितिज्ञ जो की खुद कानून की धज्जियां उडाते है! हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं!  हलाकिं इसे राष्ट्र की सुरक्षा के उद्देश्य से प्रस्तावित किया गया था!  इसे कानून के तहत गिरफ्तार किसी व्यक्ति कोतीन सप्ताह के अंदर, सलाहकार समिति के  सामने उपस्थित करना होता है!  साथ ही सरकार  या गिरफ्तार करने वाले अधिकारी को, यह भी बताना पडता है, की उसे क्यूँ गिरफ्तार किया! सलाहकार समिति उपलब्ध कराऐ,गये तथ्यों के आधार पर विचार करती है!  या नये तथ्य पेश करने की पेशकश करती है!  सुनवाई के बाद समिति को सात सप्ताह के भीतर सरकार के समक्ष रिपोर्ट पेश करना होता है!  सलाह बोर्ड को अपनी रिपोर्ट में साफ शब्दों में लिखना होता है! गिर...

सेलफोन आधुनिकता की परकाष्ठा

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आधुनिक समय की नयी पहचान है मोबाइल, जो आज कम उम्र के बच्चों से लेकर, प्रोढ तक की जरूरत और पसंद बन गया है" आज के समय में ऐसा कोई शायद ही घर हो, जहाँ मोबाइल  न् हो"हम बात कर रहे हैं, क्या मोबाइल की इतनी जरूरत है, हमारे समाज मे'  शायद है भी और नही भी, इसके अच्छे और बुरे दुष्परिणाम अक्सर देखने को मिलते है!  मोबाइल का निर्माण उद्योगिक दुनिया के लिए क्रांति है! उद्योग में, वही अर्थव्यवस्था के लिए वरदान भी है!  आज के समय में मोबाइल से शेयर मार्केट की सारी गतिविधियों की जानकारी कुछ ही मिनटों में देश के हर कोने में पहुँच जाती हैं! और आसानी से दूर दराज के सारे कार्य आसानी से पूर्ण कर लिए जाते है!  बैकिंग सुविधा, ऑनलाइन सुविधाओं "के जरिए आसान हो गयी है! जिस कार्य को पूर्ण करने में महिनो लग जाते थे, अब मात्र घंटो में पूर्ण कर लिए जाते, मोबाइल क्रांति समाज को आधुनिक जीवन शैली प्रदान करने में अहम् भूमिका निभाती हैं!  मोबाइल ने सहित्य दुनिया में भी, क्रांति स्थापित की है! ऑनलाइन गोष्ठी के जरिये, हिंदी प्रचार प्रसार बहुत तेजी से हुआ, जो की सरकार के अथक प्रयास के बाव...

बचपन

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वो कागज की नैया, वो बारिश की नदियाँ!  वो छोटी सी, जलधारा, बचपन खैवाईया" वो सिक्को का अरमान, माटी में बोना " कहाँ खो गया, वो बचपन का भैया!!  कभी कंधे पर बैठा, नग्में सुनाता " गोदी मे लेकर, लोरी सुनाता!  वो खूटें मे, बंधी गोरी सी गईयां!  कहाँ खो गया, वो बचपन का भैया!!  वो बचपन के मेले, वो ऊंगली पकडना ,  बिछडने का डर, और आंखों का भरना,  वो मासूम बातें, वो परवाह करना,  कहाँ खो गया, वो बचपन का भैया!!  वो दादा, दादी की लाठी पकडना " सुबह शाम खेत खलिहान चलना!  पिता जी की डांट, से मुस्कुराना,  कहाँ खो गया वो, बचपन का भैया!!  वो माँ का पीछे से,ऑचल पकडना,  वो दीदी से हरपल लडना झगडना!  हर हालात से बचकर, निकलना,  कहाँ खो गया, वो बचपन का भैया!!  श्रीमती रीमा महेंद्र ठाकुर " राणापुर झाबुआ मध्यप्रदेश भारत

मन सरोवर

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तेजस्विनी, जल्दी जल्दी बैग पैक कर रही थी!  उसके दोनों बच्चे, आपस में मस्ती कर रहे थे! चट की आवाज,  क्या हुआ, तेजस्विनी ने आवाज की ओर मुहं करके पूछा,  सन्नाटा,      बाहर जाकर देखने को उद्दत हुई, तभी बडी बेटी भागती हुई उसके पास आयी, और अलमारी के कोने में छुपकर बैठ गयी, घुटने में मुहं छुपाकर, क्या हुआ,तेजस्विनी ने पूछा,,भाई को थप्पड़ जोर, डरते डरते अधूरा सा वाक्य, तो उसमें छुपने जैसा क्या,  वो ढूँढ लेगा, तेजस्विनी हंसते हुए बोली,  पुलिस वाली का बेटा है, और मै,,,  अधूरा सवाल,  तेजस्विनी को सिहरन हो गयी,  वो वही धम से बैठ गयी, क्या समय आ गया उसके सवालों के जबाब देने का,  शायद, बेटी की तरफ देखा वो अब भी वैसे ही बैठी है, जैसे बचपन में उससे छुपती थी!  अठारह की होने आ गयी बचपना अभी भी है,  उसे हंसी आ गयी!  माँ दीदी है क्या, वहाँ " अंदर आओ ,थोड़ा सख्ती से बोली, तेजस्विनी,  बेटा अंदर आ गया, बहन पर नजर पडते ही, उसकी तरफ लपका, वैदांत स्टाप, ये सब क्या है,  अपनी बडी बहन पर हाथ उठाते हो,  माँ पहले दीदी ने...

छठ पर्व आस्था विश्वास का पर्व

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छठ पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाने वाला हिन्दुओं का धार्मिक पर्व है, जिसमें मूर्ति पूजा नही बल्कि प्रत्यक्ष रूप में  दिखाई देने देवता सूर्यदेव की पूजा विधि विधान से की जाती है!  सूर्य उपासना का पावन पर्व भक्तों की आस्था एवं विश्वास का पर्व है!  मुख्य रूप से ये पर्व  बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, एंव नेपाल के तराई क्षेत्र मे हर्षोल्लास से मनाया जाता है!  भारत मे ये पर्व वैदिक काल से मानाया जाता रहा है, खासकर यह पर्व बिहार  की वैदिक संस्कृति माना जाता है!  मुख्य रूप से ॠषियों द्धारा रचित, ऋग्वेद , में सूर्य पूजन,   उषा पूजन, और आर्य पंरपरा के अनुसार  यह पर्व बिहार की तपोभूमि  में अशीर्वाद एंव सौभाग्य माना जाता है!  इस पर्व के संदर्भ में बहुत सारी कथायें है!  प्रथम देव संग्राम  में देवो, असुरों की लडाई मे, देव माता अदिति ने, तेजस्वी पुत्र की कामना हेतु, जगतजननी माँ जगदम्बा शक्ति स्वरूपा, छठ माता का आवाहन किया किया,  माँ छठी के अशीर्वाद से भगवान अदित्य को पुत्र रूप में प्राप्त किया था!  जिन्...

चाहत का चांद

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अमावस्या आज फिर से आकर चली गयी, फिर वही इंतजार पूर्णिमा के चांद का, दूधिया बादल की ओट में लुकाछिपी खेलता हुआ, बिल्कुल उसके जैसा, बहुत कुछ मिलता है, इस चांद और उस चांद में, दोनों मे दाग, पर दोनों पवित्र निर्मल, दोनों की प्रकृति , लोगो को शीतलता बांटना,  मै धारा जो उससे विपरीत बहती हुई, पर मुझमें भी वही सब जो उसमें, वो गहरा अथाह सागर, बिल्कुल शांत, पर कहना गलत होगा, मै जितना जानती हूँ उसे, बहुत गहराई छुपा कर बैठा है अपने दिल मै, मै उसके विपरीत इसलिए, मै उच्छखल अवेग धारा हूँ, तो निश्चित ही तय है, उसकी गहराई में समा जाना!!  दिनो को क्या वनपंखी की तरह उड जाते" चलो समय को थोडा पीछे मोड देते है, हम एक दूसरे से जनमो जनमो से जुड़े है, फिर भी महसूस हुआ अचानक, पहली बार वो जब महसूस हुआ तो, कुछ समझ नही आया, एक दूसरे को समझने में ही समय निकल गया, वैसे मैंने नाम रखा है, !  धारा के विपरीत राधा, तो उसको वैसा ही कुछ नाम देना चाहिए, कृष्णा, न न सभी कृष्णा तो अपने प्यार को बोलते है!  हा याद आया मिट्टी के माधव " माधव को पहली बार जब देखा था! मसूमियत के आलावा कुछ नजर न आया, प्रेम में रिश्त...

पंचदिवसीय दीपोत्सव

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सुखमय जीवन समृद्धि से भरा घर संसार,  पूर्ण भव्यता की चरमता, से रोशन हो रहा है, पंचदिवसीय दिपावली का त्यौहार,  इस बार करोना की गति भी काफी धूमिल पड गयी, और धार्मिक अनुष्ठानों में लोगों का विश्वास फिर से जाग्रत हो गया!  माँ लक्ष्मी के आगामन से, सब ओर खुशियाँ ने दस्तक दी,  अयोध्या मे भी, दीपोत्सव की तैयारी में, उमड़ा जनसैलाब,  सब ओर मनोरम दृश्य, भव्यता देखते ही बनती है!  इस  बार जनसम्पर्क, में आने से पूजन विधि जानने का मौका मिला, कितनो ही ग्रंथों में, माँ लक्ष्मी जो की समुद्र की पुत्री है,अजन्मा, विशेष श्री हरि की पत्नी है,  भाग्य दायिनी, उनको प्रसन्न करने के सटीक  मंत्र की जानकारी दी गयी, जो पहले आदि अनादि काल से, ऋषि मुनियों द्धारा, राजा महाराज करवाते थे! ताकि उनका राज्य सुखी सम्पन्न रहे, कुछ मंत्र है जो दिपावली पर यदि विधि विधान से जाग्रत करे, तो सुखी जीवन हर प्राणी को मिल सकता है, नीचे कुछ मंत्रों की जानकारी दी जा रही है! जो जनमानस के कल्याण के लिए है!  *दीपावली के अचूक मन्त्र* ==================== दीपावली कि रात्रि जागरण कि रात्रि होती...

एकांशी भाग २

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किसी की गहरी सांसो की आवाज सुनाई दे रही थी!  एकांशी उसी दिशा में बढ  गयी, जिधर से कुछ हलचल महसूस हो रही थी!  दीवार का टेका लिए हुए एक परछाई नजर आ रही थी!  अब धूप भी कुछ चमकीली हो गयी थी!  कौन है उधर ठिठक गयी एकांशी, फिर अहिस्ता अहिस्ता आगे बढ़ गयी, ताकि उसके पैरों की धमक उसे सुनाई न दे " कुछ ही पलो में उसके ठीक सामने पहुँच गयी!  वो एक नवयुवक था! एकांशी की नजर उसकी नजरों से मिली,  वो झेप गयी, पलकें खुद बाद खुद नीचे झुक गयी!  अब वो क्या बोले उसे समझ न आया, उसे लगा उसकी जुबान तालू में चिपक गयी!  वो नवयुवक भी कुछ अचकचा गया, अखिर इतनी खूबसूरत बला उसके सामने कहाँ से अचानक आ गयी!  वो एकांशी को, बिना पलकें झपकाये, बस निशब्द सा देखे जा रहा था! जो समाने पलकें झुकाये, पैर के अगूंठे से छत को कुरेदे जा रही थी!  अभि, भैया चलो, एक बच्ची उस नवयुवक के हाथों को खीचकर बोली, नीचे सारी रस्में हो रही  है काकी सा ,ने बुलाया है!  हा चलो, उस बच्चों के साथ वो नवयुवक सीढियों की ओर बढ़ गया, एकांशी ने चैन की सांस ली, जैसे मुडी,, वो नवयुवक सामन...

परतें

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एक बार चलो, फिर से अजनबी बनकर देखे  !  किये वादे और कस्मों को बदल कर देखे!!  अब न उम्मीद रखो तुम, किसी अपनेपन की!  चलो अपनो के लिए, फिर से लुटाकर देखें!!  चंद सिक्के ही वजह बन गयी, सैलाब आने की!  अगर वो तलब थी, तो  बुझ गयी, उसको बचाने में!!  गया वो वक्त जो दे गया था, दाग मलमल पर!  जो रूठे है, अब नही जरूरत है, मनाने की!!  न आऐगा कोई भी वक्त, वो गर्दिश के तारो का!  है "किरणें अम्बर तक फैली, बचा न कुछ गंवाने का!!  चलो अब बांध ले मुट्ठी, फिर न फिसले तकदीरें!  समंदर बह गया सारा, रहा न कुछ रूलाने को!!  हम वो पाषाण है, जो अब किसी मौसम से न डरते!  कोई आंधी हो तूफां हो, गर आऐ मिटाने को!!    रीमा महेंद्र ठाकुर वरिष्ठ लेखिका,   सहित्य संपादक" रानापुर झाबुआ मध्यप्रदेश भारत"

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र विशेष

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===================== *जीवन में सफलता की कुंजी है "सिद्ध कुंजिका"* ========================== दुर्गा सप्तशती में वर्णित सिद्ध कुंजिका स्तोत्र एक अत्यंत चमत्कारिक और तीव्र प्रभाव दिखाने वाला स्तोत्र है। जो लोग पूरी दुर्गा सप्तशती का पाठ नहीं कर सकते वे केवल कुंजिका स्तोत्र का पाठ करेंगे तो उससे भी संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का फल मिल जाता है। जीवन में किसी भी प्रकार के अभाव, रोग, कष्ट, दुख, दारिद्रय और शत्रुओं का नाश करने वाले सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ नवरात्रि में अवश्य करना चाहिए। लेकिन इस स्तोत्र का पाठ करने में कुछ सावधानियां भी हैं, जिनका ध्यान रखा जाना आवश्यक है। *सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पाठ की विधि* ========================= कुंजिका स्तोत्र का पाठ वैसे तो किसी भी माह, दिन में किया जा सकता है, लेकिन नवरात्रि में यह अधिक प्रभावी होता है। कुंजिका स्तोत्र साधना भी होती है, लेकिन यहां हम इसकी सर्वमान्य विधि का वर्णन कर रहे हैं। नवरात्रि के प्रथम दिन से नवमी तक प्रतिदिन इसका पाठ किया जाता है। इसलिए साधक प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि दैनिक कार्यों से निवृत्त ह...

उसका धैर्य

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"निलिमा, निलिमा देखा न्यूज़ में, कल किसान अंदोलन में दुर्घटना घट गयी, तेरा पति भी तो गया था!  मुन्नी के मुहं में दूध की बाॅटल  देते निलिमा के हाथ कांप गये" कल से माधव आया नही था!  रात भर नींद नही आयी उसे, बुरे बुरे ख्याल, आते रहे, मुन्नी भी जाने क्यू रोती रही, हा काकी आती हूँ,!  कमला काकी अभी भी इंतजार कर रही थी! दरवाजे के बाहर" दरवाजे की कुंडी कुछ टाईट हो गयी थी! बरिश की वजह से " दरवाजा खुलते ही काकी अंदर आ गयी!  टी वी चालू कर, हा जैसे अभी निलिमा को होश आया!  जो कुछ चल रहा था, वो सीन देख निलिमा, के होश उड गये, हर ओर खून ही खून बिखरा था!  चार में एक नाम माधव का भी उसके कानो में गूंज रहा था!  माधव रस्तोगी, जो इस दुर्घटना के शिकार हुए, उन्हें पैतालीस लाख मुवावजा, और परिवार में एक सदस्य की नौकरी,  माधव का चेहरा उसे नजर आ रहा था, बाकी आंखों के सामने धुधंला सा अवरण छा गया!  निलिमा निलिमा """ बस काकी की आवाज हल्की सी सुनाई दे रही थी!  निलिमा ने आंखे खोलो, मुन्नी की जोर जोर से रोने की आवाज आ रही थी! बहुत शोर हो रहा था!  पूरा गाँव इकट्...

नैतिकता

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पाव पडे की जीत है, अभिमानी की हार!  मात् पिता की शरण में, मिलता है सुखमय संसार!!             🙏 शिव जटा से निकली गंगा, पाप मिटाने आयी!  धरती को पावन करने, दु;खो को हरने आयी!!  ये मानव तन है मिट्टी, माँ सरल सरस जलधारा!  धवल धवल माँ गंगा, तारणहरिनी, संसारा!!  भगीरथी कहलायी, भगीरथ के संग आयी!  जन्मो की कठिन तपस्या, धरती माँ  फिर हर्षायी!!  जब मिली तीन जलधारा, त्रिवेणी बन मुसकायी!  तारे सारे पापी को, माँ पाप मिटाने आयी!!  हर बार करे सब दूषित, फिर भी क्षमा करती है!  माँ जैसा प्यार लुटाकर, जीवन अमृत करती है!!  मन से मानो तो माँ है, अमृतमयी जलधारा!  जीवन को पोषित करती, पूजे जन संसारा!!  माँ, कामधेनु गौ माता, हम सबकी भाग्य विधाता!  तैतिस, कोटि देवता बसते, देवी माँ पोषित दाता!!  कितने उपकार है करती, जीवन में खुशियाँ भरती!  पोषित करती है काया, कष्टों को हरती है!!  चलो गाँव में फिर बस जाये, जीवन स्वर्ग बनाये!  वृक्ष का रोपण करके हरित, प्रकृति महकाये!!  न भेदभाव हो ...

मेरा साया

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वैधवी, मै नही जी पाऊंगा तुम्हारे बगैर, सन्नाटा कोई कुछ न बोला, कुछ देर चुप्पी, मत जाओ, छोड़ कर मुझे, ओजस" कतारभाव से बोला,  वैधवी की आंखे भी आंसुओं से लबरेज हो गयी, वो कुछ न बोली, बोलो कुछ तो बोलो,,,, जाना होगा, वैधवी ने चुप्पी तोडी,  पर क्यू, क्योंकि मेरी दुनिया तुम्हारी दुनिया से बहुत अलग है!  वैधवी "सपाट शब्दों में बोली, वैधवी मै अपनी गलती मानता हूँ, मै सबको छोड़ दूंगा, पर क्यूँ, ओजस, एक के लिए ,सबको छोडना बेवकूफी है, और ये बेवकूफी तुम्है, कैसे करने दूं!  माना तुम मेरी कमजोरी हो, एक सांस में बिना रूके बोल गयी वैधवी, ठीक है, अब मै नही रोकूंगा तुम्है जाओ" मै तुम्हारी कमजोरी भी नही बनूंगा, लाचारी से बोला, ओजस,,,  वैधवी के कदम सडक की ओर मुड गये!  ओजस उसे डबडबाई आंखों से देखता रहा, एक बार पलट जाओ वैधवी, तुम मुझे बहुत प्यार करती हो ये मै, जानता हूँ!  पर ये फासले क्यू बना रही हो!  वैधवी थके कदमों से आगे बढ रही थी, ओजस, केशब्द  उसके कानों में गूंज  रहे थे!  उसे कुछ दिखाई न दे रहा था, बहुत कुछ कहना चाहती थी! पर वो मर्यादा के विपरी...

अद्भुत भक्ति, जन्मष्टमी विशेष

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आज नन्दलाल का जन्मदिन फिर से आ गया, चहुँ ओर खुशियाँ ही खुशियाँ, वातावरण भक्तिमय, सभी अपने कृष्णा को मनाने में मशगूल, नन्हे नन्हे ग्वाल बाल अपनी मस्ती में मस्त, कान्हा की छवि सबमे बस जाती हैं, बाल अवस्था बच्चे में, सारे बच्चे यशोदा मैया के लल्ले जैसे नजर आते है, सारे युवा, राधा के कृष्णा हो जाते है! बस सब ओर खुशियाँ ही खुशियाँ!  नन्दघर आंनद भयौ जैय कन्हैया लाल की,  धुन स्वरलहरिया वातावरण में में गूंजती है तो, ऐसा महसूस होता है! सच में गोकुल वृदांवन बन गया हमारा देश, सभी भक्त चरमपूर्ण भक्ति से ओतप्रोत हो जाते हैं!  उस नंदकिशोर की दीवानी सारी दुनिया है, जाने कितने नाम, सबकी सारी पीर हर लेता है वो एक मुस्कान से, बस एक बार उसे महसूस करो, उसे कही ढूंढने की जरूरत नही, वो खुद आ जाता है ह्दय में, सभी के कष्टों को हरने वाला गिरधारी,  मोहन मुरलीधर,  उसके चाहने वाले, आदि से अंनत तक है! उसकी वजह से संसार रूपी भवसागर पार कराने वाला प्रेम जीवंत है! कितनी ही गोपिया दीवानी थी! पर वो तो राधा के दीवाने थे!  एक अद्भुत अमिट प्रेम, राधाकृष्ण "हर साँस में बसा प्रेम, अनंत ...