चाहत का चांद
अमावस्या आज फिर से आकर चली गयी, फिर वही इंतजार पूर्णिमा के चांद का, दूधिया बादल की ओट में लुकाछिपी खेलता हुआ, बिल्कुल उसके जैसा, बहुत कुछ मिलता है, इस चांद और उस चांद में, दोनों मे दाग, पर दोनों पवित्र निर्मल, दोनों की प्रकृति , लोगो को शीतलता बांटना,
मै धारा जो उससे विपरीत बहती हुई, पर मुझमें भी वही सब जो उसमें, वो गहरा अथाह सागर, बिल्कुल शांत, पर कहना गलत होगा, मै जितना जानती हूँ उसे, बहुत गहराई छुपा कर बैठा है अपने दिल मै, मै उसके विपरीत इसलिए, मै उच्छखल अवेग धारा हूँ, तो निश्चित ही तय है, उसकी गहराई में समा जाना!!
दिनो को क्या वनपंखी की तरह उड जाते"
चलो समय को थोडा पीछे मोड देते है, हम एक दूसरे से जनमो जनमो से जुड़े है, फिर भी महसूस हुआ अचानक, पहली बार वो जब महसूस हुआ तो, कुछ समझ नही आया, एक दूसरे को समझने में ही समय निकल गया, वैसे मैंने नाम रखा है, !
धारा के विपरीत राधा, तो उसको वैसा ही कुछ नाम देना चाहिए, कृष्णा, न न सभी कृष्णा तो अपने प्यार को बोलते है!
हा याद आया मिट्टी के माधव "
माधव को पहली बार जब देखा था! मसूमियत के आलावा कुछ नजर न आया, प्रेम में रिश्ते नातो को कौन देखता है, मेरा मानना है यदि प्रेम सच में सच्चा निश्चछल है तो, एक बार मिलता जरूर है, फिर आजीवन कारावास, न सुकून से जीने देता है, न मरने, पर वो टूटता नही, प्रेम बस देता ही है, लेता कुछ नही, फिर वो आंसू हो या दुआ"
हाँ तो अचानक से नजर पडी, माधव पर, वो उसे ही देख रहा था अपलक, """ वो झेप सी गई, आजू बाजू काफी लोग बैठे थे!
कही दिल में चहलकदमी शुरू हो गयी, वो क्या था समझ न पायी, उसकी ओर नजरें भी न उठ सकी, उसकी , पलकें भारी हो गयी, जब भी कभी वो मिलता, उसे छेडने के आलावा कोई काम न करता, धारा को कोफ्त होती उससे, जाने कितने विचार आते उसके मन में, की उसे डांट दे पर ऐसा कभी न कर पायी!
उसे उसकी अंर्त आत्मा रोक लेती, पहले से ज्यादा वो लुभाता उसे, बस धारा के मन मे आता उसे देखती रहे!
समय के साथ लगाव बढता जा रहा था, और दूरियाँ घटती जा रही थी! एक दिन वो भी आया ,जब धारा जो चाहती थी, वो उसने बोला, धारा सहम गयी, वो बेखौफ हो जोर जोर से हंसता रहा, धारा की आंखे भर आयी, वो कुछ न बोला, बस धारा की ओर से मुहं फेर लिया!
पर धारा ने महसूस किया की उसकी आंखे भी भर आयी थी!
वो मर्द था, वो अपनी कमजोरी कैसे बताता, धारा को भी तैश आ गया, मै जाऊँ, आपको बडी हंसी आ रही है!
हा तो जाओ न ,किसने रोका,,, माधव बोला,
कितने अजीब हो तुम,
हा मै तो ऐसा ही हूँ!
हा तुम हो क्या, किस बात का गुरुर है तुम्है,
वो कुछ न बोला, कुछ देर चुप रहा "
तुम मेरे पास हो, बस वही गुरूर है! धारा निशब्द हो गयी!
उसकी आंखो से झर झर आंसू बहने लगे"
माधव नजदीक आ गया, मुझे माफ कर दो, मै तुम्है बहुत परेशान करता हूँ!
और धारा के माथे पर """"
ये गलत है, धारा दबी जबान से बोली, वो खीझ गया जाओ अब आना मत वापस, वो जाने के लिए, मुडा, धारा पलटी, बेतहाश सी उससे लिपट गयी, वो पल वो क्षण, जैसे सब कुछ थम गया हो, ! उन कुछ पलों में सारा जीवन जी लिया!
वो दोनों जब अलग हुए, तो उनकी आंखो मे खुशी के आंसू थे!
तालियों की गडगडाहट गूंज रही थी!
आस पास काफी लोग इकट्ठा हो गये थे, सबको धन्यवाद देते हुए, उस छोर पर आ गये, जहाँ से दोनों की राहें अलग थी,
समय बीतता गया, पर उस प्यार ने उनके अंदर जीवन का संचार कर दिया!
कभी मिलते तो बेबस होते, बस बेबसी में आंखे भर आती, वो बंधन अलौकिक था, वो वही प्रेम था, जो सबके नसीब में नहीं होता! जिसे समाज पूजता तो है, पर अपनाता नही,
निस्वार्थ, निश्छल पवित्र, एक की तकलीफ दूसरे को तकलीफ दे जाती, धारा और माधव, दोनों एक दूसरे का वो चांद है, जिसे वो पाना नही चाहते हैं, न खोना चाहते हैं!
पर एकदूसरे को देखने का मौका, भी नही गंवाना चाहते है!
बस महसूस करना चाहते, बस एक चांद की चाहत"ड
समाप्त,,
श्रीमती रीमा महेंद्र ठाकुर सहित्य संपादक "
राणापुर झाबुआ मध्यप्रदेश भारत
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