का बा एक पत्र
आदरणीय लोक गायिका जी, आपने जब कभी"का बा" गाया, अनायास ही मुझे वर्षा कालीन असंख्य पीले टर्राते हुए उन मेंढकों का स्मरण हो आया जो सुना है मादा मेंढ़की को रिझाने,लुभाने अपना रंग रूप बदलते फिरते हैं l तर्कसंगत तथ्यों, पंक्तियों के लिए सराहना करती हूँ परंतु इन्हें गाने और बनाने के पीछे जो भी आपने तर्क दिए उन से पूर्णतः असहमत हूं, यूं मानिए बिल्कुल असंगत से लगते है l इन गीतों में जिन घटनाओं का जिक्र है,वह जब घटित हो रही थी तब काश ! आपने इससे संबंधित एक भी गीत गाया होता तो शायद परिस्थितियां कुछ अलग सी, कुछ संतोषप्रद सी होती जब आपके गीतों से लोग जागृत हो लोग एकजुट हो जाते, पीड़ित मरहम और न्याय दोनों समय पर पाते और तब हुक्मरानों के कानों पर जूं नहीं बिच्छु रेंगता "बिच्छु"l पर अफसोस कि तब यह आपके लिए यह जन चेतना का विषय नहीं था, इनसे पीड़ितों की पीड़ा की तड़प आपको झकझोरना तो दूर , छू कर भी न जा सकी और तब आप सिर्फ ननद-भोजाई और देवरा- पियवा के गीत गाने में इस क...