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छुट्टी की सुबह

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आँखें भरमाई सी,नींदे अलसाईं सी! जाग उठती है हर छुट्टी की सुबह!!   अरमान कसमसाये से, जहन में कुम्हलाये रे! पालें मंजिल जो मिल जाए, छुट्टी की सुबह!! लम्हे तन्हा से, जज्बात संकुचाये से! हो जाएँ उन्मुक्त जो मिल जाए, छुट्टी की सुबह!! बारिश अम्ल सी, रातें जहर सी! खुशगवार हो जाएं, जो मिल जाए छुट्टी की सुबह!! बचपना दबा सा, इच्छाएं रुसवा सी! मदहोश हो जाए, जो मिल जाए, छुट्टी की सुबह!!

तितली पर छाई रंगों की बहार

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अलसाई सी इक सुबह में.. खो गयीं थी मैं नींद के आगोश में.. तन मेरा था सोया.. मन रहा था जाग.. भीतर मचा था एक द्वन्द... रंगों का एक इंद्रधनुष सा.... कर रहा था मन को मेरे प्रफुल्लित... जागे जब अरमान तो... पिघला मन का मायाजाल.. स्पष्ट हुआ नज़रों का दर्पण.. दिखे बिखरे हुए रंग हज़ार.. निखर  गया जब सुबह का  प्रकाश... आंतरिक मन ने पूछा मेरे बाहरी मन से... कौन हो तुम??? जो फैला रही हो रंगों का समुन्दर?.. क़्या छुपा हैं आखिर तुम्हारे अंदर?... जो मन को कर रहा इतना प्रफुल्लित??.. क़्या तुम खुद भी हो इतनी ही आनंदित??.. तितली हो तुम तो... अवश्य ही होंगी अपने रंगों में खोयी??... होकर उदास बोली तितली.... मैं कोई और नहीं... तुम ही तो मैं हूँ... रंग मेरे ये.. मुझसे भी रहे अछूते... साल दर साल बीत गए...रंगों में उलझे... सच ही तो था ये सपना... रंग मेरा ना था खुद अपना... हक़ इस पर तो जताया सभी ने... जो थी पहचान तितली की...

सपनों के घर

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बाहर तपती धूप है... शीतल बयार मिलती है तो बस... मेरे सपनों के घर में ... बाहर दो आंसू भी विचलित कर देते है.... सागर की लहरें भी सुकून देती है... मेरे सपनों के घर में... बाहर तो बारिश की बूंदें भी.... ज़हर का असर करती है... तूफ़ाँ भी झूला सा लगता है... मेरे सपनों के घर में...

पिता से तो मैं हूं ना

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पिता ने सिखाया ऊँगली पकड़कर चलना.. पिता से ही सीखा जीवन के सांचे मे ढलना... पिता से ही सीखा जीवन क़ी सच्चाई से गुजरना. पहले तो लगते कठोर सभी शब्द पिता के  बाद मे होता सच्चा ज्ञान, पिता ने ही सिखाया समाज मे विचरना, पिता शब्द मे छिपा गूढ रहस्य. ना समझ पाया जिसे कोई आज तक.. पिता का योगदान जीवन मे कोई ना समझ पाया है.. जिसने चाहा समझना वह और ही उलझता गया है.. पिता जैसे गुफा मे छिपा ज्ञान है.. पिता से तो धड़कन का अभिमान है. पिता से ही तो जीवन मे एक पहचान है.. पिता को समर्पित मेरा यह नाम है.. नहीं लगाया मैंने पति का नाम... "ज्योतिका ऋतु प्रकाश " मे आता प्रकाश  तो.. मेरे पिता का ही नाम है..

वीर जवान की जीवन संगिनी

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कैसे बयाँ करूँ मैं 'जख्म' ए दिल की बेचैनी???? सीने में आग ओ' आँखों में आपकी याद का पानी। बोझिल हूँ भीतर तक परन्तु, अहसासों को गहराई तक छिपाना है..... मालूम है अब कभी लौट कर न वापिस आओगे फिर भी, इस दिल को चाहिए एक बहाना है। खुद ही 'गर' मुरझा गई तो घर, बच्चों, माता- पिता कैसे गम से बचा पाऊँगी मैं...... टूट गई हैं मेरी भी साँसें, चीर गई सिन्दूर की माँग, दिल से खून के आँसू बह गए..... सूनी फूलों की सेज के अरमान इस अल्हड जवानी में ही मुरझा गए ..... पलकों से जिसे न ओझल होने देते थे इक पल के लिए भी, आज मुझे इस हाल में किसके सहारे छोड गए हो???? चाहे निर्जीव बन रहते हमेशा आँखों में काजल बनकर, जीवन भर आपकी सेवा कर धन्य पाती खुद को.....   आपके साथ के सहारे यह जिन्दगी तमाम गुजर जाती, काश यह सच न होकर सपना ही हो , यही खैर मैं नित दिन मनाती। शहीद की पत्नी बन अब भी मैं कृतज्ञ हो, उस ईश्वर के चरणों में झुक जाती। माँग का सिन्दूर कभी न मिटाऊँगी, शहीदी के सिन्दूर के सहारे ही अब जीवन मैं बिताऊँगी।