आप ही विचारिये
1 आप ही विचाइये हर ओर बढ़ी भीड़, तोड़ रही जग रीढ़, सुविधाएँ घट रहीं, आप ही विचारिये। कारण जनसंख्या के, प्रतिदिन बढ़ रही, रोटी की किल्लत पर, बवाल मिटाइये। 2 रोजगार घट रहे, अपराध बढ़ रहे, कारण है जनसंख्या, भूखे मुस्कुराइए। रोको जनसंख्या बम, सुखी बनाओ आगम, अब ना बढ़े आबादी, नीति यों बनाइये । 3 एक पुत्र की आस में, बढ़े आबादी पास में, पुत्र पुत्री लिंग भेद, विकार मिटाइये। दो तुम संतान पालो, सौगंध सभी ये खा लो, सुखी होगा जीवन ये, वादा तो निभाइये। 4 सबको भोजन मिले, खुशियों के पुष्प खिले, सीमित आबादी होगी, मधु गीत गाइये। उचित शिक्षा मिलेगी, रंगत तभी खिलेगी, यथोचित उपचार, चिकित्सा में पाइए। ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम तिलसहरी,कानपुर नगर