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Showing posts with the label Madhulika Sinha

अग्निपथ -अग्निपथ !!

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       वृक्ष हों भले खड़े,           हों घने हों बड़े,         एक पत्र छाँह भी,    माँग मत, माँग मत, माँग मत,     अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ। वैसे तो डॉ हरिवंश राय बच्चन जी की लिखी इन पंक्तियोन की तर्ज़ पर अग्निपथ फ़िल्म में महानायक अमिताभ बच्चन ने जब कहा तो इसकी गहराई सौ गुना बढ़ गई और यह जन- जन में लोकप्रिय हो गया। इतनी लोकप्रियता पाई की आज भारत सरकार की सैनिकों के लिए एक योजना को नाम मिला अग्निपथ और इस अग्निपथ पर जो चलेगा वह अग्निवीर कहलाएगा। जरा ठहरिए पहले जान तो लें कि लयह अग्निपथ योजना है क्या? भारत सरकार ने तीनों सेवाओं थल सेना, नौसेना और वायु सेना में सैनिकों की भर्ती के लिये अग्निपथ योजना का प्रस्ताव शुरू की है। इस योजना के अंतर्गत देशभक्त और देशभक्ति की कामना रखने वाले युवाओं को चार साल की अवधि के लिये सशस्त्र बलों में सेवा करने की अनुमति दी जाती है।इस योजना के तहत सेना में शामिल होने वाले युवाओं को अग्निवीर कहा जाएगा। इस नई योजना के तहत लगभग 45,000 से 50,000 सैनिकों की सालाना भर्ती की जाएगी...

जासूस मन

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आंखों की चंचलता के पीछे गम के आँसू जो देख लेता है, होठों की मुस्कुराहट में दबी कुंठा जो भाँप लेता है। चेहरे की रौनक भी छुपा सकती नहीं वेदना, ऐसा जासूस है मन जो हर तिरोहित को उजागर कर देता है। मधुलिका सिन्हा कोलकाता

स्त्री

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स्त्री हूँ मैं हाँ एक स्त्री हूँ मैं ! नहीं हूँ मैं किसी कवि की कविता न ही किसी शायर की शायरी हूँ बस एक ओजस्वी शब्द हूँ मैं स्त्री हूँ मैं हाँ एक स्त्री हूँ मैं ! न ही मैं चाँद हूँ, न ही चाँदनी न नदी हूँ, न ही निर्झर रागिनी न ही सुघडता की मूरत हूँ न  मधुरता की हूँ चाशनी एक स्त्री हूँ मैं हाँ बस एक स्त्री हूँ मैं  !! न रूप रंग का संगम हूँ न कद-काठी का उपहार मृगनयनी सी हूँ नहीं मैं न पंखुरियों सी कोमलता का कलश आँचल में मेरे  केवल शीतलता नहीं न चरणों में है स्वर्ग बस अदम्य साहस का परिचय हूँ एक स्त्री हूँ मैं हाँ बस एक स्त्री हूँ मैं !! न दो अलंकारों का उपहार मुझे न ही मुझे महिमामंडित करो न दुर्गा  न काली न लक्ष्मी न ही सरस्वती कहो पहाड़ों सी पदवी दे कर अहल्या बनाने पर न विवश करो मानव जन्म लिया है जग में उसे मानव सा सम्मान ही दो करने दो ज़िद थोड़ी सी पंखों को थोड़ा उड़ान दो लक्ष्मण रेखा के बाहर बैठा रावण  इसकी  पहचान तो करने दो स्वप्न देखे इतना हक़ तो दे दो स्वच्छन्दता से कदमताल तो करने दो जीवन के हर क्षण को बोती काटती सन्तुष्टि का अभिमान तो दो एक स्त्री हूँ  ...

वाचाल प्रकृति

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हवा की सरसराहट कानों में रस घोलती है, मानो प्रकृति हौले से हमसे कुछ कहती है। जैसे कह रही हो, कर विश्वास मेरा.. अमृत कलश से भरी,वात्सल्य से भीगी ममता का आँचल पसारती माता हूँ मैं। स्निग्ध रश्मियाँ हाथ बढ़ा रक्षा सूत्र पहनाए, ऐसी निर्मल सहोदरा हूँ मैं। सुगढ़ सलोनी रुनझुन सी वल्लरी लुकछिप अंको में भरती,प्रनयनी प्रेयसी हूँ मैं।       या........ कहे दिवाकर चमको, दमको, करो तमस का तुम नाश। मृगांक कहे गुमसुम होकर, क्षय-अक्षय सहना तुम पर करना अमावस को भी पूनम समान। कहे धरा मुखड़े को चूम कर, धीरज धरना अनगित भी हो जो भार, नभ कहता विस्तार लो इतना, ढंक लो सारा संसार। धरणीधर कहे शीश उठा कर शिखर बनो पर पाँव टिके धरातल पर ही जलधि कहे गहराई को छूना, करना राज सीप मोती पर। बोलें नदियाँ कल-कल, कानों में,झरने देते झकझोर रुकना नहीं,थमना नहीं, बढ़ना है गन्तव्य की ओर। कहे वृक्ष झूम-झूम कर, डाले गलबहियाँ मदमस्त फलो, फूलों,खूब बढ़ो तुम,पर देना शीतल सी ओट पथिक जो बैठे थककर,विनय ही हो आधार। भौरों की गुनगुन कानों में राग सुनाती है,    जैसे वाचाल प्रकृति हमें विश्वास दिलाती है। गुपचुप हमसे सबकुछ क...

खुली आँखो का सपना

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सपने देखना हमारे बस में नहीं होता।चाहें या न चाहें ,आँखो में आ ही जाता है।फिर ये तो मेरा ऐसा सपना था जो अनायास ही मेरी आँखों में आ बसा था।कब और कैसे ठीक से याद भी नहीं।उम्र कच्ची और कल्पनाओं के दायरे बढ़ने लगे थे।फिर क्या था ,मैं------कृतिका----अपने सपने के पीछे बस भागती रहती थी। तब न दिन में चैन था न रात की सुध रहती थी मुझे।नई- नई पहचान जो हुई थी।बस दिमाग में सिर्फ वही घूमता रहता था।कैसे उसकी विवेचना करूँ।कैसे सपने का विस्तार करूँ।कहाँ से शुरुआत करूँ।हाथों से उसके मीठे,कोमल पंखों को सहलाऊँ या फिर यथार्थ की कठोर धरती पर तिलमिलाता छोड़ दूं।अतीत के पन्ने उधेड़ उसे दिखलाऊँ या भविष्य के सुनहरे सपनों की झलक दिखला दूँ।  किसी तरह उसे मुकम्मल करने की कोशिश में जुटी रहती थी।पर महीनों की मेहनत के बाद भी जब सपनों को हकीकत से कोसों दूर पाती तो मैं निराश -हताश हो जाती थी।कभी खीझ कभी गुस्सा सबकुछ आने लगता था। लेकिन नियति तो कुछ और ही थी।उन दिनों मेरे स्वभाव में भी खासा बदलाव आ गया था।हमेशा उधम मचाने वाली मैं थोड़ी चुप सी हो गई थी।बस खयालों में गुम रहती,हमेशा कुछ सोचती रहती थी।माँ ने सबसे पहले इन बात...

चटपटी दोस्ती

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इसे कहानी न समझिएगा ।सच है ये मेरे जीवन का बहुत ही मीठा ,मधुर ,सुंदर और जितनी अलंकारों से अलंकृत कर सकूँ वैसा सच । मेरे मायके में बच्चों की बड़ी कमी थी ,ऐसे में जब भी कोई रिश्तेदार  अपने बच्चे को ले कर आते तो हम सभी जी जान से उसकी ख़ातिर तवज्जो में लग जाते थे ।दादी से लेकर पोते पोतियों तक सबको उसी की चिंता होती ।उसने क्या खाया ,क्यों रोया उसका खाना उसके खिलौने  बड़ी ततपरता से दिया जाता ।ऐसे ही हँसते खेलते मैं बड़ी हो गई और इतनी बड़ी की मेरा ब्याह हो गया । अपनी तकदीर कहूँ या ईश्वर की असीम कृपा की तुरत फुरत मेरे दोनों बच्चे भी हो गए । खुशी तो जैसे आसमान के तारे बन मुझ पर बरस रही थी और मैं उन तारों को अपने आँचल में समेट उनकी परवरिश के कठिन कर्तव्य की छतरी ओढ़  ली ,ठान जो लिया था कि जिसे जन्म दिया उसे उच्चतम परवरिश देना मेरी प्राथमिकता होगी । देखते - देखते बच्चे बड़े होने लगे ।आज भी याद है उनके स्कूल का पहला दिन ।स्कूल के गेट से अंदर जाते उनकी गीली ऑंखे और बिचकते होंठ मानो कह रहे हों  मुझे छोड़ कर न जाओ माँ न जाओ ।इधर मेरा कलेजा भी पानी -पानी हुआ जा रहा था ।लगा दौड़ कर रोक लूँ ,ब...

विडम्बना

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आज ऋचा बहुत खुश थी। रात जैसे आँखों में ही बीत गई और क्यो न हो, सालों बाद वह अपने मायके जा रही थी। उसे तनिक भी इच्छा नहीं थी कि उसकी शादी विदेश में रहने वाले लड़के से हो लेकिन जब विशेष को पापा ने पसन्द किया और जब ऋचा ने उसे देखा तो कोई कमी न निकाल सकी।नतीजतन चट मंगनी और पट व्याह हो गया। विशेष बस एक महीने की छुट्टी पर घर यानी कानपुर आया था।और मिस्टरऔर मिसेज़ अविनाश, विशेष के माँ-पापा उसकी शादी कर ही वापस भेजना चाहते थे। देर करने की बात ही न रह गई थी। अगले बीस दिनों के अंदर ही ऋचा दुल्हन बन कर कानपुर आ गई। छुट्टियाँ खत्म होते ही विशेष वापस कैनेडा चला गया और अगले दो महीनों के भीतर सारा पेपर वर्क कर उसने ऋचा को भी वहाँ बुला लिया। ऋचा के माँ पापा या कहूँ तो खुद ऋचा के दिल से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया। विदेश के लड़के को लेकर जितनी शंकाए घर-परिवार वालों के मन में उठ रही थी वो सब धराशाई हो गए। वह दिन है और आज का दिन,पूरे दस साल बीत गए उसे यहाँ आए। हर सुख-सुविधा विशेष ने उसे दी। इस बीच दो बच्चे भी उसके घर में किलकारियाँ भरने लगे।ऋचा बहुत खुश थी। कभी तिनके भर भी अफ़सोस न करती थी। बस एक बात जो उसके मन म...

झांकती आँखे

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बात उन दिनों की है जब मैं स्कूल में पढ़ा करती थी ।शायद दसवीं या ग्यारहवीं क्लास में थी ।स्कूल आते -जाते बस दो ही चीजों को देखने का शौक था।एक दुकानों के होर्डिंग्स और दूसरा पास से गुजरते लोगों को ।माँ हमेशा डांटती रहती ।कहती थीं - लोगों को क्या देखती रहती है,कभी किसी ने इस घूरन कार्यक्रम के लिये झगड़ा किया तो ? और मैं हँस कर कह देती -कुछ नही होगा माँ बस मुझे अच्छा लगता है।हर डांट फ़टकार के बावज़ूद ये मुझसे छूटता ही नहीं था ।ऐसे ही घूरते ,देखते अचानक उनको देखा ।एक औरत लबादा ओढ़े चली जा रही थी।भीड़ से अलग ।बड़ी उत्सुकता हुई ।सिर से पाँव तक ढकी सिर्फ आँखें ही दिख रही थी ।ऐसी ड्रेस ।अचानक याद आया ,जानती थी मुस्लिम औरतें घर से बाहर निकलते वक्त बुर्क़ा पहनती हैं । यह सिर्फ एक ड्रेस ही नहीं था मेरे लिए ,एक रहस्यमयी सी चीज थी ।हर रोज उन्हें रास्ते मे देखती और सोचती ,क्यों पहनती है ऐसे कपड़े कितनी चीजें छुपाई होंगी उसके अंदर।तब इतना नहीं सोच पाई थी कि चीजें नहीं खुद को छुपाना उनका मक़सद था । अचानक एक दिन वो ठीक सामने आ गईं ।चेहरा तो छुपा हुआ था ही बस कपड़े की जाली से दो आँखें झांक रही थीं ।मन हुआ उन्हें छू...

आउट ऑफ साइट- आउट ऑफ माइंड

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बेटा सागर, बहु निशा और उनके दोनों बच्चे लगभग सोलह सालों से लंदन में रह रहे हैं। बच्चों का तो जन्म ही वहीं का है। इसबार बेटे ने हमारी शादी की सालगिरह पर हमें टिकट भेज वहीं बुलवा लिया था।  पूरी इज़्ज़त और प्यार के साथ हमारी एनिवर्सरी मनाई गई। होटल में शानदार पार्टी दी थी बेटे ने। उसके कलीग, दोस्त ,बहु और बच्चों के फ्रेंड्स सभी ने खूब जश्न मनाया। सभी ने गले मिल विश किया। इज़्ज़त और गिफ्ट से लाद दिया हमदोनों को। हँसी खुशी सब सम्पन्न हुआ। पर कुछ था जिसकी कमी मुझे विचलित कर रही थी।  टोकने जैसा तो कुछ न था लेकिन मन अपने संस्कार अपनी परंपरा अपनी रीति रिवाज को ढूंढ रहा था। कैसे करूँ कुलदेवी की पूजा। कैसे घर में पूजा हवन रखूँ। बेटा बहु पोता-पोती कोई आकर मेरे पैर छुए और मैं उसे गले लगाकर आशीर्वादों की झड़ी लगा दूँ। हर पकवानों की खुश्बू से महके खैर ...... पन्द्रह दिन रह कर हम कल वापस दिल्ली पहुंचे और मेरी ही ज़िद से इन्होंने आज की ट्रेन की टिकट करवाई और रात आठ बजे हम ट्रेन में चढ़ गए। एक धचके के साथ गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकी ग मेरी नींद खुली। एकदम शांत और अंधेरा था , जाहिर है आधी रात को स...

झाड़ती पंखुड़ियाँ मीठी खुश्बू

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घर ,शहर बदलना रेवती की मजबूरी थी । कारण उसके पापा का तबादला हर तीसरे वर्ष हो जाया करता था और रेवती अपने माँ- पापा के साथ पैकिंग में जुट जाया करती थी। आज भी कुछ ऐसा ही था ।रेवती आज फिर से एक नए शहर में आ गई थी । ऊँची -ऊँची इमारतों के बीच उनका भी एक फ्लैट था पाँचवी मंजिल पर ।सामानों को पाँचवी मंजिल पर ले जाना भी एक टास्क ही था पर पैकर्स ने बख़ूबी सारे सामानों को बिना किसी टूट - फुट के घर मे ला कर लगा दिया।एक कमरे में दसियों डब्बे पड़े थे।अधिकतर बचपन से ले कर आज तक कि किताबें थी या फिर कुछ छिटपुट सामान। उन काटन्स को खोलने की सोच कर ही रेवती के सर में दर्द होने लगा।उसने सोचा चाय ही बना ली जाए और वह रसोईघर मे चली गई।चाय का पानी गैस पर रख माँ को आवाज़ लगाई ,माँ चाय पियेंगी क्या। माँ का जवाब हां में था सो दो कप चाय बना वह सीधे कमरे में आ गई ।एक कप खुद लिया और दोउसरी माँ को दे वहीं बैठ गई। चाय की चुस्कियों के साथ काटन्स खुलने का सिलसिला चल पड़ा। एक -एक कर चीज़ें निकलने लगीं। बचपन से ले कर अब तक की किताबें ,नोट बुक्स , पेंटिंग बुक्स , प्रश्न पत्र और न जाने क्या - क्या।  स्कूल ,कॉलेज के दिनों की ...

बारहसिंघा

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वो दो बारहसिंघा पानी पीने नदी को जाते देख परछाई पानी मे अपनी अपने सुंदर सिंघों पर रीझे ईश्वर ने कितनी सुंदर सिंघे दी सोच सोच इतराए पर नज़र पड़ी जब पैरों पर वो पतला लम्बा कुरूप नज़र आया हर्षित मन थोड़ा मुरझाया काश!! सिंघों की तरह  पैर भी सुंदर देता तो हे विधाता तेरा क्या जाता इतने में एक आहट से चौंका शेर को खुद की ओर बढ़ता पाया प्राण बचाने को छलांग लगाई लम्बे डग भरता जंगल के भीतर भागा एक घनी झाड़ी में छुपकर कुछ सांसे राहत की ली अचानक फिर इक आहट ने घबराया कदम जो भरना चाहा हवा सी सिंघों ने रोड़ा अटकाया लटका,झटका जोर लगाया झाड़ियों में फँसा सिंघ न निकल पाया शेर को अपने निकट पाया जाते जाते प्राण समझ ये आया जिन पैरो को कोसता रहा वही समय पर काम आया बेकार है खूबसूरती  ऐसी जिसके कारण प्राण गवायाँ बचपन में ये कहानी पढ़ी थी, जिसे काव्य रूप दिया। बचपन मे पढ़ी या सुनी हर कहानी के अंत में उस कहानी से हमें क्या  शिक्षा मिलती है यह ज़रूर बताया जाता था। इस कहानी से भी एक शिक्षा मिलती है। किसी भी वस्तु का महत्त्व उसकी सुंदरता में नहीं, बल्कि उसके गुणों में है। हमें हमेशा याद रखनी चाहिए कि वो ...

एक हाँ की कीमत

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तेज़ बारिश के बाद आसमान निखर गया था । ढलते सूर्य की किरणें जैसे पूरे आसमान को लाल नारंगी किए दे रही है । धरा को लगा की इस निखरी सी उजास के बीच बस कमी है तो सिर्फ एक इंद्र्धनुष की । वैसे भी यह कम ही दिखाई देता है, पर जब देता है तो अपने रंगों की सुंदरता और खुशियाँ चारों ओर बिखेर सा देता है । धरा अपनी बाल्कनी से घंटों आसमान ताकती रहती है । कब बिखरेंगे उसके जीवन में इंद्रधनुषी रंग । कभी बिखरेंगे भी या नहीं, यह सोच-सोच धरा बेचैन सी हो जाती है ।  " धरा कहाँ हो भई ? " ऋषभ ने पुकारा ।  " बाल्कनी में तो आओ, देखो कैसी स्वछ, निखरी हुई सी शाम हो आई है । लाल सुर्ख सूर्य जैसे आग का गोला बना बैठा है । देखो तो सही । " धरा ने कहा ।  " अरे नहीं, तुम ही प्रकृति का आनंद लो, मुझे कुछ काम है । बस एक प्याली चाय की दे दो । " ऋषभ का जवाब आया ।  " ठीक है बनाती हूँ । " , यह कह अनमने भाव से उठ कर धरा किचन की ओर बढ़ चली । चूल्हे पे चाय का पानी चढ़ाया । दूध, शक्कर, चाय पत्ती मिलाया और खौलने का इंतज़ार करने लगी । खौलती चाय के साथ धरा के मन में भी दसियों सवाल हदबदा रहे थे । क्यूँ ऋ...