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Showing posts with the label Shalani Agrawal

बदलते रंग

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वो जो नाम जोड़ता था साथ हमारे,  हमारा नाम ज़हन से मिटाने लगा, हम जब से बढ़ने लगे उसकी जानिब,  कदम अपने वो पीछे हटाने लगा!  हम बढे ही थे अपना उसकी ओर  अपना हाल-ए-दिल  बताने, हमने कुछ कहा भी नहीं था और  वो हद हमें हमारी ही दिखाने लगा!  वो कहता रहा ज़िंदगी हमें,  हम झूमकर हर खुशी उसपर लुटाते रहे सांसों  में भरी जो खुशबू उसकी हमने,  वो ज़िंदगी के मायने समझाने लगा।  तोड़ता रहा हर बंदिशें सारी हमें करीब अपने बुलाता रहा, छूट गए हम जब हर बंधन से,  कदम पीछे हटा,  वो दस्तूर ज़माने का बतलाने लगा।  जो कहता था सदा  असूल नहीं होते मुहब्बत में, कि आ मिल जाएँ हम एक हो जाएँ! यकीन किया इसपर, मिटा कर वजूद अपना सोचा ही था कि मिल जाएँ उसमें, कि-   वो रस्मों-रिवाज़ दुनिया के सिखाने लगा।  हम जो उलझे से जाते थे बातों में उसकी, उसकी आंखों के भंवर में डूबे जाते थे, फेर ली नज़रें हमसे उसने,  हो कर मौन वो,हर उलझन हमारी सुलझाने लगा!. कहा था रंग धनक के नज़र आते हैं हमें मुहब्बत के उसकी असमानी आंखों में,  फेर क...

पर्यावरण और हम!

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पर्यावरण का अर्थ है प्रकृति का आवरण- यानि, प्रकृति का हरा-भरा रूप, जहाँ प्रकृति के हर जीव को बराबर का महत्व रखता है-चाहे वह पेड़-पौधे हों, या पशु-पक्षी या फिर मानव!  मगर, मानव ने हर काल में थोड़ा थोड़ा विकास कर, प्रकृति में बाकी जीवों के बजाय अच्छा और सुविधाजनक जीवन जीने की चाह को पूरा किया है! बदलते परिवेश के साथ मनुष्य की ज़रूरत, लालच और अहंकार, सब बढता गया और अब मनुष्य ने विकास का नाम ले कर प्रकृति पर अपना पूर्ण अधिकार करना शुरू कर दिया है, जिसके कारण प्रकृति का अपना संतुलन बिगड़ गया है।  आज, 5 जून को गर्म लू के थपेडे खाते हुए शायद हमे पेडों की ठंडी छ्या आ रही होगी; शायद हर दिन कटते- घटते वृक्षों से होने वाली हानि का आभास हो रहा होगा।  आखिर, यह हमारी प्रगति का परिणाम ही तो है!  इसका एहसास तो होना ही चाहिए! अपने लालच की पूर्ति के लिए हमने हमारे पर्यावरण का इतना शोषण जो किया है!  वैज्ञानिकों के अनेक अनुसंधानों में पर्यावरण की अनदेखी हुई और फिर हर कदम पर, ज़रूरत के नाम पर प्रकृति पर निर्भर रहा और इसी का शोषण भी करता रहा है! गंदगी और प्लास्टिक के अत्याधिक प्रयोग स...

मिट्टी सा मन

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गीली मिट्टी सा मन था मेरा  तुम्हारे इंतज़ार मे रहा, कि एक बार-  कभी तुम आ जाते-  मुझे छू कर ढूंढ लेते मुझमें  कई संभावनाएं; कर लेते जो ज़रा सा मंथन, मिटा देते मेरे विकार अपनी भावनाएं मिला कर  गूँथ लेते मुझे!  कुछ और कोमल हो जाती मैं,  कुछ और मुलायम-  हो जाते मेरे एहसास...!  चढ़ा देते मुझे,  अपने मन के चाक पर अपनी उंगलियों के  स्पर्श से ढाल देते मुझे अपने मनचाहे आकार में,  बन जाती मैं तुम्हारी कल्पना सी जैसा तुम चाहते, बस वैसी बन जाती मैं तुम सी....;  जो यह भी जो, तुम्हें स्वीकार नही था बस इतना ही कर देते- अपना न बना सकते थे अगर, छोड़ तो न देते.... भर लेते मेरे वजूद को  अपने मन के उपवन में,  कभी रोप देते कोई बीज  कहे अनकहे विचारों का मैं कल्पनाओं के फूल खिला देती  बन कर सावन प्रेम का पल भर को भी जो कभी बरस जाते जो तुम सोंधी सी खुशबू से सांसें तुम्हारी महका देती मगर, तुमसे यह हो न पाया  शायद!  मैं प्रतीक्षा में रही कि झोंका बन तुम आओगे, तुम आए भी तो गर्म हवा से,  मुझसे मेरी नमी चुरा...

जय श्रीराम

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चैत्र नवरात्रि तिथि नवमी और काल मध्याह्न  धन्य हुई गोदी कौशल्या की,  सूर्यवंशी राजा दशरथ के घर जब जन्मे राम  पवित्र हुई भारत भूमि, हुआ परम प्रतापी अयोध्या धाम.. भरत-शत्रुघ्न, लक्ष्मण के अग्रज सबके राजदुलारे राम.. मध्यान्ह के सूर्य की भांति संयम की परिभाषा राम लक्ष्मी स्वरूपा सीता के पति, पुरुषों में सर्वोत्तम राम  अति विनीत वीर रघुनन्दन परम तपस्वी धीर रघुनन्दन  मंगलमूर्ति बजरंगी के प्रभु मंगल सदा करते श्रीराम                                                                          धरतीधर के स्वामी प्रभु,                   हमारे राजा-नारायण अवतारी राम कण कण में राम, जन जन में राम  हर मुख में राम, हर मन में राम दो आक्षरी इक सुंदर नाम.. बिगड़े बनाए सारे काम..                  ...

आंधिया

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उतरीं हैं आंधियां आंगन में इक इरादे से ,  उतारू कि हर दीप आज बुझाया जाए, कर के अंधेरा, फिर,  बल अपना बतलाया जाए! वो जो ह॔सते हैं मुस्कुराते हैं दौर-ए-गम में भी,  कि उजाले कम हैं तो क्या, हैं तो..... हिम्मत तोड़कर उन्हें थोडा सा डराया जाए!  आंधियां ज़िद पर हैं अगर,  तो जिद मेरी भी है, ठान लिया है  वो जो लड़ता है हर तिमिर से अकेला,  न डरता है न डरने देता है कभी, यूँ टिमटिमाता है आंगन में मेरे, कि ध्रुव भी न चमके अंबर में भी! वो दीप नहीं उजाला है मेरे हिस्से का, अब, जल भी जाएँ तो गम नहीं,  कर के ओट हथेलियों की, उम्मीद के इस दीपक को बचाया जाए!  तोड सकती हैं घोंसले मगर,  क्या बिसात है आंधियों की  कि तोड दे हौसले किसी के, वो आई तोड़ने फूलों को शाखों  से,  फूलों ने ठानी है-बिखर कर किसी की राहों को सजाया जाए,   बह कर इनके संग संग, इन हवाओं को भी महकाया जाए!   शालिनी अग्रवाल  जलंधर

मैं- नारी हूँ

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हाँ- नारी हूँ मैं!!  मीनाक्षी हूँ, मेनका, या कहो रंभा हूँ-  हाँ सौंदर्या हूँ मैं- लज्जा हूँ मैं!  मैं दिति-अदिति,सौभाग्या हूँ मैं- इंद्राणी भी हूँ मैं!  यति, योगिनी, माया, दुर्गा निर्भया--  सब ही तो हूँ मैं!  मोहन की मोहिनी,  नारायण की नारायणी हूँ मैं!  शिव का आधा भाग- शिवा हूँ मैं!  वेदों की वाणी हूँ गायत्री हूँ-  ब्रह्म की ब्रह्माणी-वीणावाहिनी हूँ मैं ज्ञानियों में सरस्वती  इस जगत् में चलायमान लक्ष्मी हूँ मैं मैं तारिणी- भागीरथी,  बद्री विशाल की भव्यता को  दिव्यता प्रदान करती जो करती,  सूर्य की अल्का हूँ- अलकनंदा हूँ मैं, मैं पापमोचिनी गंगा हूँ,  करुणामयी कालिंदी हूँ-  ममतामयी नर्मदा भी हूँ मैं....! कृष्ण की बंसी में बसती है धुन बन कर  वो राधा हूँ  हूँ मैं...!  राजा हैं राम भूमि के,  उनके हृदय में बसने वाली- भूमिजा हूँ मैं- मैं सृष्टि हूँ- जीवनदायिनी प्रकृति हूँ मैं!  मैं भक्तों में मीरा हूँ,  वीरांगना मणिकर्णिका हूँ मैं! मैं तपस्विनी अनुसूया हूँ,  अहिल्या सम पवित...

ध्रुवतारा

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तुम्हारी खुशियों के उजाले मेरे लिए न भी सही...  मैं रात अंधेरी में भी तुम्हारे लिए मैं जलती रहूँगी!  जब कोई न होगा साथ तुम्हारे... मैं तब भी तुम्हें तकती रहूंगी.  जब  तुम  याद  करो  मुझको प्रिय ...  नज़र भर देख लेना नज़र उठा कर  ढूंढ लेना मुझ तक अपना रस्ता... बांध  लेना अपने मन को मुझ से...  मेरे प्रेम की चमक से  रोशन  करना अपना जहान्... सूरज न सही... मैं हूँ तुम्हारी दुनिया का  आशा भरा ध्रुवतारा। शालिनी अग्रवाल  जलंधर

तुम मेरे आराध्य हो शिव

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तुम मेरे आराध्य हो शिव,  तुम मेरे भगवान करती हूँ विश्वास मैं,  मन से करती हूँ आराधना!  सच है कि दुनिया को  तुम नजर नहीं आते हो मगर सच यह भी है कि  सब साथ छोड़ देते हैं जब, कुल दुनिया में बस- एक तुम ही नज़र आते हो!  तुम भूल जाओ मुझे कभी,  हर पल तुम्हें पुकारती हूँ मैं किसी पल में तुम्हें मैं भूल न जाऊँ,  मन में मूरत सजा कर करती हूँ मैं तेरे नाम की साधना!  चाहत नहीं कि दुनिया हो कदमों में!  हे शिव! सुन लेना मेरी प्रार्थना,  जन्म-जन्म रखना मुझे अपने चरणों में! हे शिव! तुम करना कृपा, मेरे शीश पर हाथ धरना रहना सदा मेरे सहाय,  सफल करना मेरी साधना!   सारा जग जब हो विरुद्ध,  बेटी तुम्हारी अकेली है जग में, याद इतनी सी बात तुम रखना, कठिन डगर हो, दुर्गम सफर हो,  साथ मेरे बस एक तुम चलना,  हर पीडा सह लूंगी, हर कष्ट पर चुप रह लूंगी, मेरे शीश पर हाथ तुम रखना!

नारी तेरे रुप अनेक

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हाँ! है गर्व तुम्हें हो पुरुष तुम, नर हो- सृष्टि के रक्षक हो- मेरे गर्भ से उत्पन्न हुए हो- नारी हूँ मैं!!  एक हूँ मैं और अनेक भी  हूँ मैं-  जिसकी रक्षा करने का दम भरते हो-जिसका अंश भर हो तुम- वह  सम्पूर्ण सृष्टि हूँ मैं!  मेनका हूं- रंभा हूँ- हाँ सौंदर्या हूँ मैं- लज्जा हूँ-  सौभाग्या हूँ मैं- इंद्राणी भी हूँ मैं!  यति, योगिनी, माया, दुर्गा निर्भया-- सब ही तो हूँ मैं!  मोहन की मोहिनी, नारायण की नारायणी हूँ मैं  कृष्ण की बंसी में जो धुन बन कर बस्ती हूं वो राधा हूँ मैं मैं तारिणी- भागीरथी,  बद्री विशाल की भव्यता को  दिव्यता प्रदान करती जो करती,  सूर्य की अल्का हूँ- अलकनंदा हूँ मैं मैं पापमोचिनी गंगा हूँ,  करुणामयी कालिंदी हूँ-  ममतामयी नर्मदा भी मैं...  राजा हैं राम जिस भूमि के,  उनके हृदय में बसने वाली- भूमिजा हूँ मैं- मैं सृष्टि हूँ- जीवनदायिनी प्रकृति हूँ मैं  हाँ- स्त्री हूँ मैं!! सौंदर्या हूँ- लज्जा हूँ- सौभाग्या हूँ मैं!  मोहन की मोहिनी, नारायण की नारायणी हूँ मैं!  कृष्ण की बंसी मे...

किस्मत के खेल निराले हैं!

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कभी कभी वक्त यूँ निकल जाता है- हम पकड़ नहीं पाते हैं-  गम में भी मुस्कुराना आता किसी को, कहीं खुशी में भी आंसू बहते हैं! दुनिया के अजब नज़ारे हैं! अक्सर आसपास ही होती हैं मंज़िलें,  कभी नज़र नहीं आती,  तो कभी नज़रअंदाज कर जाते हैं!,  कभी रेत की तरह फिसल जाता है वक्त हाथों से बंद मुट्ठियों में भी थाम नहीं पाते हैं!  हर पल में अलग उमंग है यहाँ,  हर जीवन का जुदा रंग है यहाँ- कभी खो जाते हैं सुहाने मंज़र तम के सायों में कभी स्याह आसमानों में भी कई धनक खिल जाते हैं!  कभी यूँ होता है- मिल जाते हैं हमसफर राहों में, कभी तन्हा ही राहों में भटकते हैं!  कौनसी राह चुनेगा कोई,कौन हमसफर पाएगा,  मिल जाता हैं अनचाहे, बिन मांगे भी किसी को जो हर दुआ में हम अपना बनाना चाहते हैं! किसको कितना मिलना है, किसने कितना खोना है, किस्मत के लिखे बही-खाते हैं !!  भीगी आंखे, रोते चेहरे,  लेने-देने, रिश्ते-नाते,  रंगमंच सी दुनिया में रचने वाले ने जो रचे हम खेल-तमाशे सारे हैं! कितना भी चाहो, कितना ही सोचो,  उसकी रज़ा हम कब समझ पाते हैं!  हर पल पर है ...

धरती पर स्वर्ग

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श्यामा के जीवन का एक ही सपना था- स्वर्ग सा जीवन! जिसकी परिभाषा थी कि वह खूब अमीर हो, अनंत पैसा हो जो किसी भी चीज़ को खरीदने में सक्षम हो; सारी दुनिया को अपने सामने झुकाने की श्रमता रखता हो। ऐसा जीवन, जैसा उसकी बहन नमिता का था।  वह हर पल सोचती थी, कितना फर्क है दोनों बहनों की किस्मत में! कहाँ नमिता- जिसे इतना साधन-समपन्न ससुराल मिला है कि दोनों हाथों से भी पैसा लुटाए तो खत्म न हो। बच्चे देश के सबसे अच्छे स्कूल में पढते और होस्टल में रहते हैं, जल्द ही आगे की पढाई के लिए विदेश चले जाएंगे; संभवतः वहीं रह जाएं। दोस्तों क साथ छुट्टियाँ मनाने की बात हो तो नमिता भी तो विदेश ही जाती है; भारत से बाहर जाना तो उनके लिए साधारण सी बात है।  जीजा जी भी कितने अच्छे हैं, कितने खुले दिल से नमिता की हर ज़रूरत पूरी करते हैं, कभी पूछते ही नहीं कि वह कहाँ, कितना और क्यों खर्च कर रही है। तभी तो-  वह जब मिलती है,  हर बार एक से एक बढ़कर कपडे, और हर बार नया गहना दिखाती है। जब आती है, मेरे बच्चों के लिए महंगे से महंगे खिलौने, मोबाइल, मेरे लिए उपहार ले कर आती है।  मगर विवेक एक नौकरीपेशा व्य...

खट्टी-मीठी यादें

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दर्द  में भी होंठ मुस्कुरा देते हैं, ज़हन में छा जाता है जब मीठी सी तेरी यादों का मौसम;  वो यादें नदी किनारे के झूलों की वो यादें मेरे बालों में तेरे हाथ से सजे  उन गजरों के फूलों की,  वो कांच की चूड़ियाँ भी कितनी अनमोल थीं कि इनके आगे सस्ते लगते हैं ये भारी से कंगन! वो रेत के घरोंदे महलों से कम न थे, कि सब सुनहरे सपने उनमें रहते थे, यह महल भी सूने से लगते हैं, कि टुकडों में बंट गए है दीवारें ऊंची होने से, अपने अपने दायरों सिमट गए हैं हम! तुम थे तो दुनिया अपनी सी लगती थी, अब तो खुद के भी न रहे हम!  हर ख्वाहिश भी अधूरी लगती है, तेरी बेरुखी का ख्याल आए तो भीग जाते हैं खुशी में भी नयन!  तू ही तो था,सब रंगों से सजा था जिससे जीवन,  एक दीप था जिसका उजियारा कर देता था हर अमावस भी रोशन। सब कुछ सूना सूना है अब बुझे से नयनों के दीपक सूखे अधर, फीकी मुस्कानें,  रंग सारे उड़े-उड़े से,  खुशबुएँ उब हवाओं में बहती नहीं कि सिमट गई हैं अत्तार में, कोंपल अब फूटती नहीं कि  एहसासों का पतझड़ है, सावन भी नित बरसता है,  भर जाता है मन में सीलन,...

मकर संक्रांति

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तिल भर भी चरण शरण से दूरी ना हो,  तिल भर भी प्रभु की विस्मृति ना हो,  तिल भर भी नाम सेवा ना छूटे,  तिल भर भी श्री जी की रूप नेत्र न हटें, गुड सी मीठी वाणी हो, गुड से मीठे सब संबंध, गुड की डली सी मिठास से भर जाए मन डोर प्रभु के हाथ में हो और  पतंग सा नाम आपका अंबर पर छाए; सात घोड़ों के रथ पर सवार  संक्रांति के सूर्य जीवन में सतरंगी खुशियाँ लाए।  मकर संक्रांति की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं !!

युवा

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हो बुद्धि विकसित-विचारशील,  हो मन सदा जो संयम में भुजा में जोश भरा हो ऐसा,  चाहे तो पर्वत चटका दे! नदियों का मुख भी जो मोड़ सके, मरुस्थल को भी उपवन करे! आंखो में भर ले यूँ आकाश,  कि संसार को अपना बना ले पांव मगर टिके धरा पर,  तज अंह, सबको अपना ले! संस्कृति का पालन हो और  नारी को सम्मान जो दे जीवों के प्रति करुणा हो,  प्रकृति का संरक्षण हो, शक्ति जिसमें हो सृजन की,  हो सामर्थ्यवान, धरा हो रक्षण करे  वो युवा जिस देश का हो,  बिन लड़े ही  विश्व विजय कर ले!  शालिनी अग्रवाल  जलंधर

सिंधू ताई

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छोटे से गाँव की वासी थी,  सोच में मगर बड़ी ऊंचाई थी। छोटी सी दुनिया बसानी थी संग जिसके उसी पति द्वारा वो ठुकराई थी!  देखी थी भूख- गरीबी, और बेबसी  झोली खाली थी लकिन,  मन में ममता समाई थी। कभी थी बेघर खुद,  दर्द दूसरों का देख, आंख मगर भर्राई थी यूँ तो साधारण ही सी थी वो,  मगर अद्भुत नसीब वो लाई थी, एक बच्चे को दूध न सकी जो, फिर हर बच्चे की माँ कहलाई थी। ज्यों थी देवी अनुसूया धरा पर,  आशा की ज्योति पुंज थी,  ममता का सागर सी थी वो, सिंधू सी विशाल थी,  कहते हैं अम्मा सारे जिनको वो दिव्य ज्योति सिंधू ताई थी।

एक कप चाय

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केतली में उफनता पानी साक्षी बनता है  मेरे मन की व्याकुलता का कूटती हूँ अदरक, मानो, मन ही मार रही हूँ!  कूटे से अदरक की खुशबू , फिर भी प्यार निभाती है, मेरे एहसास खुद में समेटे,  संदेसा तुम तक पहुंचाती है,  आ जाओ, कि शक्कर की नहीं,  तेरी मीठी सी मुस्कान की कमी है!  तुम भूले तो भूले, कि ऐसे ही हो तुम!   कोई बात नहीं, हमें तो याद है, वादा हमारा,  रोज़ बनाती हूँ जो तुम्हारे नाम का,  हर शाम मगर चाय का एक कप-  इंतज़ार करता है तुम्हारा।  यह चाय नहीं, लम्हा है ठहरा सा,  वो लम्हा जो समय की चाल के साथ चलना भूल गया वो जो बीतते वक्त के साथ गुज़रना भूल गया,  वो लम्हा जो जीना था तुम संग भाप बन कर उड़ा भी, और, ठंडी सी चाय में ठहरा सा रह गया। ऐसा है-कि चाय का एक कप वह नहीं  जो था आज लग रहा- वह तोमर  तुम संग एक पल बिताने का वादा था हमारा कि, इक पर में जीवन जीने का इरादा था हमारा। शालिनी अग्रवाल  जलंधर

प्रकृति और मानव

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पर्यावरण का अर्थ है प्रकृति का आवरण- यानि, प्रकृति का हरा-भरा रूप, जहाँ प्रकृति के हर जीव को बराबर का महत्व रखता है-चाहे वह पेड़-पौधे हों, या पशु-पक्षी या फिर मानव!  मगर, मानव ने हर काल में थोड़ा थोड़ा विकास कर, प्रकृति में बाकी जीवों के बजाय अच्छा और सुविधाजनक जीवन जीने की चाह को पूरा किया है!  बदलते परिवेश के साथ मनुष्य की ज़रूरत, लालच और अहंकार, सब बढता गया और अब मनुष्य ने विकास का नाम ले कर प्रकृति पर अपना पूर्ण अधिकार करना शुरू कर दिया है, जिसके कारण प्रकृति का अपना संतुलन बिगड़ गया है।  वैज्ञानिकों के अनेक अनुसंधानों में पर्यावरण की अनदेखी हुई और फिर हर कदम पर, ज़रूरत के नाम पर प्रकृति पर निर्भर रहा और इसी का शोषण भी करता रहा है!  गंदगी और प्लास्टिक के अत्याधिक प्रयोग से हर जगह कचरे के ढेर लगा कर इसका निर्मल रूप और भी बिगाड़ दिया है!  कारखानों से निकलते धुएं ने आसमान और कैमिकल वाले कचरे ने जल संसाधनों को भी दूषित कर दिया है!  यूँ तो प्रकृति का बडा सा विस्तार है मगर न जानवर, न खग कोई,  न पेड़ न पौधा, बस इक मानुष ही बीमार है इक छोटा सा कीटाण...

चलचित्र

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जी लिए जाते हैं कुछ पल, और, गुज़र कर भी वो यादों में ज़िंदा रह जाते हैं  ज़िदगी थम जाती है उन लम्हों में,  और पल कभी अंतःकरण में,कभी आंखों के आगे चलचित्र की तरह चलते हैं ।  वो लम्हे कभी बीत कर भी नहीं बीतते, जो वक्त की तरह गुज़ारे नहीं जाते,  जीवन की तरह जिए जाते हैं! शालिनी अग्रवाल  जलंधर

शून्य

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सूख कर गिरते हैं पेंडों से,  पत्ते जब कदमों में बिखर जाते हैं समझो, पतझड़ का मौसम आता है,  नई कोंपल खिलती हैं, फूल हवा महकाते हैं कहते हैं, बसंत तब खिलता है!  दूर मिलने का आभास लिए धरती गगन मिलते हैं जहाँ वो  "क्षितिज" कहलाता हैं पर, तेरा मेरा मिलना क्या है...? यह तो सिर्फ़ एक अहसास है, सूखे से मरुस्थल में किसी शांत से  पोखर पर से गुज़रती सीली सी हवा सा एहसास!  गहरी सी नदी के दो जुदा से तीर,  जिस पर खड़े एक दूजे को ताकते हैं हम, पलकों के बांध इक बाढ को रोके हैं  नज़रों के पुल मन से मन मिलन करवाता है, समय की  धारा बहती है और  इस इस धारा में दूर-दूर बहते हुए भी पास होने का एहसास!  एहसास तुमसे मुझ तक आती हुई, वो एक पगडंडी है, जिस के किनारों पर चल रहे हैं मैं और तुम, तुम और मैं साथ नहीं भी हैं मगर हर कदम पर साथ हैं,  यूं ही साथ-साथ चलते जाना है- क्षितिज के पार तक, उस मोड तक-- जिसके आगे केवल शून्य है . शालिनी अग्रवाल  जलंधर

मैं बचपन हूँ

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मैं बचपन हूँ- हंसता हंसाता खिलखिलाता सा माता की आंखों का तारा हूँ  पिता का मुख पर तेज हूँ जगमगाता सा!  मैं बचपन हूँ बेफिक्र सी दुनिया में जीता हुआ नासमझ ही कह लो मुझे, कि छल फरेब आते नहीं बडे-बडे महलों की परवाह न जिसे  मैं बचपन हूँ- हर फिक्र को कदमों की धूल संग उड़ाता सा!  मैं बचपन हूँ- अब दो पैरों पर चलने लगा हूँ थोडा थोडा अब बडा होने लगा हूँ!  भाषाओं से अवगत होने लगा हूँ, सच के कागज में बांध फरेब, थोडा सीखने लगा हूँ!  पढने लगा हूँ पोथियों, अंको के फेर में पडने लगा लगा हूँ, करने पूरी उम्मीदे सबकी, किताबों के बोझ से दबने लगा हूँ!  मत रखो इतना भी भार मेरे कांधों पर, कि जिनकी खुशबू महका सकती है जीवन उनके होने से अब घुटने लगा हूँ!  हाँ! बहुत ज़रूरी है पढना, बहुत ज़रूरी है कुछ बनना, फिर भी कहता हूँ-  सब कुछ न भी कर सकूँ पर, कुछ न कुछ तो कर ही लूंगा,  अभी तो जीने दो मुझको, कि, करने पूरे अधूरे से सपने मैं थोड़ा थोडा सा मरने लगा हूँ!    मैं बचपन हूँ- बडा होने में खो जाने लगा लूँ !   शालिनी अग्रवाल जलंधर