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Showing posts with the label Sunita Kumari Ahari

महंगाई की चपत

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 बचत पर कैंची चल गई  हाय ! महंगाई देखो बढ़ गई  आलू,प्याज के दाम अब न पूछो  अपनी थाली छोटी करने की सोचो राशन की दुकानें भरी पड़ी है पर मंडी में मंदी बड़ी है  डीज़ल, पेट्रोल मिलकर रुलाये भरी जैबों में सेंध लगाए कहती है सरकार हमने नाममात्र महंगाई बढ़ाई है हमसे से भी तो पूछो हम पर क्या आफत ढ़ाई है बजट में हुआ अब दुगना इज़ाफ़ा  महंगाई छोड़ रही है हाथों में हमारे खाली लिफाफ़ा स्वरचित एवं मौलिक  सुनीता कुमारी अहरी

स्त्री

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देर से ही सही,खुद को दोयम दर्जे का, प्राणी मानने से इंकार कर रही है स्त्री l खामोशी तोड़,समाज निर्मित, बेतुके मूल्यों के प्रति विद्रोह कर रही है स्त्री  पितृसत्तात्मक समाज के दोहरे मापदंडों, पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है स्त्री अपने अस्तित्व,अपनी अस्मिता के प्रति  निरंतर सचेत हो रही है स्त्री रूढ़िग्रस्त, हीन छवि छोड़ते हुए,  नई पहचान बनाती जा रही है स्त्री  शिक्षित हो समस्त जाति के लिए,  उन्नति के द्वार खोल रही है स्त्री  समाज में रहकर अपनी कामयाबी से,  निरंतर समाज के लोगों की सोच बदल रही है स्त्री l केवल स्त्री दिवस को नहीं बल्कि हर क्षण को अपना मान, नित अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर समाज का मान बढ़ा रही है स्त्री   स्वरचित एवं मौलिक सुनीता कुमारी अहरी

मेरा गाँव

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एक अरसा बीत गया अपने गाँव की, गलियों से पहचान किए छूट गई सभी पगडंडियाँ पीछे कहीं,मेरे बचपन के निशान लिए  नक्शा जन्मभूमि का आज भी,ज़हन में ताज़ा है मेरे  डरता हूँ कहीं छूट न जाए यादें पीछे,वो शक्ल पुराने मकान की लिए  छोड़ आया था अपनी धरोहर पीछे , महज़ नौकरी के एवज में क़ामयाबी की राह में निकल पड़ा था, बस आँखों में शहरी होने के अरमान लिए  आज उन्हीं राहों में दम घुटता है,शहर के शोरगुल में दिल अकेला रोता है  फिर भी फिर रहा हूँ आज भी यहाँ, हथेली पर अपनी जान लिए  गाँव की चाँदनी रात में,सूखी रोटी भी मन को बहुत भाती थी  फिर भी भटक रहा हूँ यहाँ,शहरी होने का अभिमान लिए  लौट जाना चाहता हूँ गाँव के, उसी पोखर तालाब के सुकून में वापस   जहाँ निपट जाता था वक्त भी,कभी मासूम-सी मुस्कान लिए  गुज़ार दूँगा जल्द ही,सेवानिवृत्ति तक के चंद व्यस्त लम्हें भी यहाँ  फिर लौट जाऊँगा अपने गाँव में, अपने बचपन की वहीं पहचान लिए  दूर निकल आया था बहुत,अपनी तरक्की की चाह में फिर चलूँगा उसी ज़मी पर,छोड़ा था जिसे मैंने कागज़ी दौलत के सुकून के लिए आज सुकून नहीं ...

शहीद दिवस

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अपनी मिट्टी की खातिर अपना जिन्होंने सर्वस्व लुटा दिया  अमर शहीद होकर भी उन्होंने  नायकत्व निभाना सिखा दिया  आज़ादी के सपने को दे कुर्बानी जिन्होंने एक दिन साकार किया  आज़ादी को सही अर्थ दे आज़ादी को देश में अाकार किया  हो अमर, देश की गौरव गाथाओं में तिरंगे को उच्च मान दिया  शिथिल पड़े भारत को जीवित कर स्वयं का बलिदान दिया  अपना लहू दे गुलामी की बेड़ी तोड़ फिर स्वतंत्र आकाश दिया  परतंत्र भारत देख एक क्षण भी जिन्होंने ना अवकाश लिया   काँटो के पथ पर चलकर भी अपनी मिट्टी का गुणगान किया  हो शहीद,भावी पीढ़ी को आज़ाद देश में रहने का जीवनदान दिया  शहीद दिवस उन्हीं वीरों याद है जिन्होंने स्वयं को कुर्बान किया  अपने लहू की हर एक बूंद को सिर झुकाकर देश के नाम किया स्वरचित व मौलिक सुनीता कुमारी अहरी

टिपिकल सास

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नीरजा को आज फिर अपने पुराने दिनों की याद आ गई l उसने घर से बाहर जाने के लिए चौखट की ओर कदम बढ़ाया ही था कि पीछे से उसकी सास ने आवाज़ दी -" सिर पर पल्ला रख, नीरजा l" उसने मुड़कर देखा और गर्दन झुकाते हुए,लम्बा पल्ला निकाल कर सिर ढक लिया  और सास से बाहर जाने की अनुमति माँगी  पर जब देखा कि वे फ़ोन पर बात कर रही हैं तो वहीं पर खड़ी हो l उनकी बात खत्म होने की प्रतीक्षा करने लगी l  उसे आज भी याद है, दीपक से वह पहली मुलाक़ात जिसने उसके दिल पर पहली बार दस्तक़ दी थी l दीपक का व्यक्तित्व उसे उसके खुले विचारों के कारण ही तो पसंद आया था l विवाह उपरांत उसे आगे पढ़ने की स्वीकृति दी गई थी जिसके कारण  ही उसने दीपक से शादी करने का फैसला लिया था l परंतु तब वह यह नहीं जानती थी कि परिवार के सदस्यों द्वारा हर दिन अकारण छोटी-छोटी बातों पर संस्कारों की परीक्षा, धैर्य की परीक्षा, इच्छाओं की परीक्षा, मान-सम्मान की परीक्षाओं में  वह उलझ कर रह जाएगी और अपने पढ़ने की बात को भूलाकर कब आगे बढ़ जाएगी l इसकी भनक भी उसे नहीं लगी l इस बात का अहसास उसे तब हुआ जब उसने अपनी सास को अपनी बहन से कहते...

अन्नदाता

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  मिट्टी से जिसका जीवन भर का नाता है वहीं ही माता का लाल सच्चा अन्नदाता कहलाता है  आलस ना देह में, जो परिश्रम से ना घबराता है माटी को चीर कर, निरंतर कर्म कर अनाज उपजाता है  मिट्टी से जिसका जीवन भर....... ओले, सूखे,बारिश में भी, जिसे अपना खेत ही सुहाता है मिट्टी के कण-कण में जिसका पसीना, फ़सल बन लहलहाता है मिट्टी से जिसका जीवन भर........ छोटा बड़ा जैसा भी हो खेत, संतान-सा पालन पोषण वो किसान से पाता है किसान रुपी पिता की छाँव में, अनाज से परिपूर्ण हो औरों के काम वो आता है  मिट्टी से जिसका जीवन भर ........ है महान, वो जो छोटे-छोटे बीजों से भी, पूरे देश का पेट भर जाता है स्वयं की परवाह ना किए, इस माटी को अपने जीवन के अमूल्य समय दे जाता है मिट्टी से जिसका जीवन भर........ कड़ी धूप हो या शीतल छाँव, जो एक क्षण के लिए भी माटी से दूर नहीं हो पाता है कैसे आभार व्यक्त करें उस महान आत्मा का, जो मिट्टी से जुड़कर भी उचित सम्मान नहीं पाता है  मिट्टी से जिसका जीवन भर....... ना सम्मान चाहता,न धन, केवल मिट्टी से जुड़कर ही अपनी अस्मिता देखता है जो मिट्टी में रहकर ही, माता का स...

मानो या न मानो

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छोटी-सी ज़िन्दगी में जीता है, हर कोई हालातों से लड़कर करता है जी तोड़ कोशिशें, बनाता है ज़िन्दगी को बेहतर  उसके मेहनत के पसीने से ही, निखरती है ज़िन्दगी अकसर पाता नहीं मंजिल वरना, कोई यूँही अनजान राहों में चलकर गुज़रता है हर इंसान कभी ना कभी, दुखों के साये से होकर पा लेता है सबकुछ एक दिन, अपना सबकुछ खोकर ठोकर खाकर गिरता है, फिर चलता है संभलकर आसान नहीं आगे बढ़ना, हर बार हौसला यूँ बांधकर मानो तो सब कुछ मिलता है,  ज़िन्दगी में सही वक़्त आने पर न मानो तो गुज़र जाता है वक़्त भी दबे पाँव सबक ज़िन्दगी का देकर

डाकिया डाक लाया

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वह दौर था जब लिखना-लिखाना पढ़ना-पढ़ाना बहुत खास होता था डाकिया आया शब्द कानों में पड़ते ही बदला हर घर का माहौल होता था ख़ाकी वर्दी में साइकिल पर शहर-शहर  डाकिए और डाक का भी अपना ज़माना होता था अपनों से होती थी अनूठी मुलाकात अकसर  चिट्ठियों से सबका हाल पलभर में बताना होता था लंबे इंतजार के बाद आती थी चिट्ठियाँ  उनसे ही सबको अजब-सा इश्क या याराना होता था  डाकिए के थैले में सिमटे रहते थे कई जज़्बात जहाँ गम और ख़ुशी का भी अपना ही तराना होता था भले ही किश्तों में मिलती थी ख़बरें  फिर भी उनका इंतज़ार कभी न पुराना होता था पल में होती थी सैर सरहदों की लिखावटों से ही कभी यूँ सफ़र सुहाना होता था  कभी रंगीन कभी बेरंग होती थी दुनिया बताती हर हाल हरेक अक्षर का अपना एक फ़साना होता था बदलतें इस दौर में अब कैसे लौटा लाए वो पुरानी यादें  कि अब अपने ही शहर में  मुश्किल डाकिया देखना-दिखाना  होता है

सफलता

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छोड़ दे उन राहों को  जो तुझे भरमाती है  तू मेहनत कर फिर देख  सफलता कैसे पीछे आती है l बढ़ चल शनै : शनै : तू अपनी श्रम की राहों पर  कर हिम्मत  आगे बढ़   देख कैसे  अथक परिश्रम करते करते  चींटी चलती जाती है  बार बार हार कर भी  हार नहीं वो मानती है  राह जैसी भी हो  पूरी ताकत और हिम्मत से  सफलतापूर्वक बढ़ती जाती है l मत डर  मत हार  कर हर चुनौती तू स्वीकार  कि  सच्ची कोशिश ही  एक दिन रंग लाती है  देख कैसे  पत्थर की मज़बूत जगत पर  बार बार आती जाती रस्सी  सफलता के प्रेरक निशान छोड़ जाती है l निराश न हो  न हो उदास  भाग मत  सोच  विचार कर  कि कमी कहाँ रह जाती है  भगवान भरोसे मत बैठ  आलस छोड़  उठ खड़ा हो  कर सुधार  देख कैसे तूफ़ान के बाद  घरौंदा टूट के बिखर जाने पर भी  तिनका तिनका जोड़ कर  नए सिरे से  पक्षी भी तो आशियाना फिर  बसाते है l छोड़ दे उन राहों को.........   स्वरचित एवं मौलिक सुनीता कुमारी अहरी

सपनों का घर

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सपनों के घर में मेरे,ना कोई कमी हो बस प्यार ही प्यार हो,कभी आँखों में ना नमी हो हो चाहे कैसा भी दिन, हर कोई संग हो अपना एक आसमाँ,अपनी एक ऐसी जमीं हो  मुस्कुराकर मिले हर कोई,न रखे कोई बैर  गमों के बीच भी जहाँ,खुशियों की हो जाए सैर  हो जाए हर समस्या हल, न रहे कोई मुश्किल  जब भी लगे दुखों का ताँता, पूछे सब सबकी ख़ैर बंध जाए बातों-बातों में ही, अनोखा संबंध अपनेपन का  न रहे कोई दूरी,न पहरा हो किसी बंधन का  जुड़ा हो जहाँ रिश्ता बस दिल का दिल से ही  न रहे विष की बूँद मात्र भी,चाहे हो कितना भी रिश्तों का मंथन  स्वरचित एवं मौलिक सुनीता कुमारी अहरी

दुनिया का मेला

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दुनिया के मेले में आज सकून हर इंसान का कुछ खोया-सा दर-ब-दर भटक रही ज़िन्दगी उलझनों में घिरा बैठा खामोश-सा  ज़िन्दगी की हकीकत में खो जाती है जाने कब ख़्वाइशें हालातों से समझौता करता रह जाता इंसान रोया-सा सुकून की तलाश में जाने कब खो बैठता है इंसान खुद को भीड़ में भी तन्हाई चुभती है दामन रहता है आँसुओं से भीगोया-सा ये जीतने की चाह भी जानलेवा हो जाती है उम्र के हर पड़ाव के साथ सब कुछ हार कर भी बिखरता नहीं जीत का नशा धुएँ-सा   स्वरचित एवं मौलिक  सुनीता कुमारी अहरी

स्त्री : समानता का परिचय

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मुस्कुराकर जिन्होंने हमें दी हमारी पहचान स्त्री हूँ मैं कहकर पाया उन्होंने जग में सम्मान साहस बनकर जिन्होंने नापा पूरा आसमान स्त्री हूँ मैं दिखाकर बढ़ाया उन्होंने दुनिया में हमारा मान बलिदान दे जिन्होंने इतिहास किया गौरवान्वित स्त्री हूँ मैं जताकर उन्होंने स्त्री जाति को किया प्रतिष्ठित सबल बनकर जिन्होंने सृष्टि को दिया आधार स्त्री हूँ मैं ऊर्जितकर दिया उन्होंने नवजीवन का सार अग्नि में तपकर जिन्होंने खुद को किया नित दिन बेहतर स्त्री हूँ मैं कहकर उन्होंने समाज में  समानता का परिचय दे स्वयं अस्मिता बनाई नहीं जो किसी से कमतर  स्वरचित एवं मौलिक  सुनीता कुमारी अहरी

माँ कन्या बन आना हमारे द्वार

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इस नश्वर देह के साथ, माँ करना हमारी आत्मा का श्रृंगार मानव की नित परिवर्तित होती सोच का, माँ करना उद्धार आदर, प्रेम,सद्भाव, सच्चरित्र जैसे मूल्यों का,  माँ देना उपहार कलयुग का हर प्राणी, स्वार्थ और लोभ में फँसा, हुआ लाचार चलती माया, खोती मानवता,  होता भावनाओं का नित दिन यहाँ व्यापार इस नवरात्र में प्रभावित करना, माँ प्रत्येक जन के विचार माँ देना आशीष, कि बदले समाज, सुधरे  प्रत्येक प्राणी का व्यवहार मुख पर तेज,अधरों पर मुस्कान लिए, माँ कन्या बन आना हमारे द्वार देना आशीष, सद्बुद्धि हमें, और स्नेह अपार ll  स्वरचित एवं मौलिक  सुनीता कुमारी अहरी  नई दिल्ली

आज भी आँखों से तेरी ज़ुल्फ़ का साया नहीं जाता

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आज भी आँखों से तिरी ज़ुल्फ़ का साया नहीं जाता   गुज़रा जो ज़माना मोहब्बत का लौटाया नहीं जाता  तेरी यादों को सीने से लगाए बैठे हैं शाम-ओ-सहर  धड़कने सदा देती है पर बेमतलब यूँ जिया नहीं जाता  जुदा हो गए ज़िन्दगी के सबसे हसीन मोड़ पर हम  ज़ख्म ऐसा हुआ कि अब मरहम लगाया नहीं जाता   मुलाकातें और भी बहुत हुई कई हसीन चेहरों से   लाख कोशिशों की अब दिल लगाया नहीं जाता एक दौर गुज़र गया दिल-ए-आशिक हुए हमको  मजबूर हूँ  वो पहली-सा इश्क़ भुलाया नहीं जाता  स्वरचित एवं मौलिक  सुनीता कुमारी अहरी नई दिल्ली

तलाश

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रोहन, बड़ा ही समझदार लड़का था l बचपन में अपने माता-पिता को खोने के बाद वह खुद को बहुत अकेला महसूस करने लगा l उसका लालन-पालन उसकी दादी ने किया l दादी ने उसे अपार स्नेह दिया परंतु अपने माता-पिता के स्नेह की तलाश उसे अपने जीवन में हमेशा रही l कुछ समय बाद दादी का भी स्वर्गवास हो गया l रोहन अब इस संसार में अकेला रह गया था l उसकी सुख-दुख के साथी दादी भी आप उसके साथ नहीं थी l धीरे-धीरे समय बिता गया और रोहन  ने अपने आपको काम में इतना उलझा लिया कि अब उसके पास किसी बात के लिए समय नहीं रहा l एक दिन रोहन जब ऑफिस घर से जा रहा था तो उसने देखा एक वृद्धा पार्क के गेट पर बैठी है l उसने वृद्धा को देखा और नज़र हटा ली l शाम को जब वह घर के लिए लौट रहा था तब भी उसकी नज़र पार्क के गेट पर थी l वृद्धा को उसी गेट पर बैठे देख हैरान हो गया l देखने में वह अच्छे भले घर की लग रही थी l रोहन ने ड्राइवर को गाड़ी रोकने के लिए कहा l गाड़ी से उतरकर वृद्धा के पास गया और बोला - आंटी आप यहाँ क्यों बैठे हैं l मैंने सुबह भी आपको यही बैठे देखा और अब भी l क्या आप किसी का इंतजार कर रही हैं l यह सुनकर वृद्धा की आँखों में...