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Showing posts with the label सूर्य नारायण मूर्ती

रुकने का मतलब नहीं

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रुकने  का  मतलब  नहीं, रुकना भी कहीं जीवन है? क्या  समय रुका है कभी, नदिया रुकी या धरती ही? कभी   ग्रहों  का चाल रुका है? सूरज  का   उगना भी रुका है? आना बसंत का कभी रुका है? पंछी का कलरव कभी रुका है? दिन- रात  का  चक्र चलता रहता, ऋतुओं का यह  चक्र सदा चलता। नव पल्लव  का सृजन  तब होता, नवजीवन  का  संचार   है  होता।।       जल  रुकता तो काई हो जाती, पल  रुकता  तो प्रलय हो जाती। जीवन रुकता तो मृत्यु हो जाती, पथिक रुके मंजिल न रह जाती।। चलते    रहना    ही    जीवन   है, रुकना  तो   जीवन   का   अंत है। तुम रुकोगे जग आगे बढ़ जायेगा, फिर  वह तेरा ही उपहास करेगा।। तुम  रुकोगे  तो  जग रुकेगी नहीं, तेरे  लिये  भी कोई  रुकेगा   नहीं। सृष्टि  में  अब तक कुछ रुका नहीं, फिर तेरे  रुकने का मतलब नहीं।। -पेरी सूर्यनारायण मूर्ती " दिवाकर"...

पूर्णिमा

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चांद  गोल है वह पूनम का, सदा  गोल ही वह  रहता है। जब धरती की पड़ती  छाया, घटता हुआ  नजर आता है।। सोलह कलाओं से  युक्त  चंदा, हरदिन  कला  का ह्रास  होता । जब  छाया  पूरा   ढंक    लेता, तब  मृगांक ओझल हो  जाता ।। शुक्लपक्ष में  वही चंदा बढ़ता, छाया     धीरे  - धीरे     हटता । वह  सुंदर  गोल- सा  हो जाता , शुभ्र  धवल  चांदनी   बिखेरता  ।। अमावस को जो चंदा न  दिखा, मन  सबका  उदास  हो  जाता । वहीं   पूनम  का   शीतल  चंदा, सबको    ही   शीतलता    देता।। पूर्णिमा का चंद्रमा  वही है, अमावस में चंद्रमा  वहीं है। खेल यह उसी छाया का है, कुदरत की यह माया ही  है ।। वही  चांद  है , वही   चांदनी , क्रम है यह घटना -बढ़ना भी। चंद्रमा  सा है  यह जीवन भी, ह्रास वृद्धि यहाँ चलती रहती।। -पेरी सूर्यनारायण मूर्...

खेल क्रिकेट का

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खेल  यह बल्ले और गेंद का, हमको कितना है सिखलाता। बल्ले   से  गेंद  तुझे   खेलना, और  गेंद  बल्ले  पर  फेंकना।। दूर  फेंक  गेंद  को बल्ले से, तुझे अपना बल दिखाना है। गेंद  फेंककर   ठीक निशाने, कौशल भी तुम्हें  दिखाना है।। रहकर  बल्लेबाज  के पीछे, सीमा  में  उसको रखना है। कभी क्षेत्ररक्षण तुझे करके, अतिक्रम से उसे रोकना है।। क्रिकेट  के इस खेल में  तुझे, बल्ले से शौर्य दिखाना होता। गेंद  फेंक  सीमारक्षण करके, सव्यसाची- सा  बनना होता ।। जिंदगी एक खेल क्रिकेट का, तुमको संभलकर खेलना  है । अति  तेज  तुमको है दौड़ना, गलत  नहीं पकड़ा  जाना है।। जीवन  के इस क्रिकेट खेल में , तुझको  सव्यसाची  है  बनना। बल, बुद्धि और कौशल से तुझे, विजयश्री  का  वरण  है  करना ।।     -पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर " (यह मेरी मौलिक रचना है सर्वाधिकार सुरक्षित) (मुखचित्र गूगल से साभार)

खो गए हम कहां

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कभी उदरपूर्ति, धनार्जन हेतु कभी, तो कभी विलासी जीवन हेतु ही! अपना घर और गाँव छोड़कर, इस अनजान शहर में आ गये कहाँ!                     आकर  खो गए हम कहाँ! कभी गाँव छोड़ शहर चले, कभी शहर छोड़ हम नगर चले! कभी मातृभूमि को छोड़कर , हम विदेश में  ही रहने चले!            आकर खो गए  हम कहाँ ! जन्मभूमि, घर, मात-पिता को, सखा सहोदर मित्रजनों को! अपनी माटी की खुशबू को, छोड़े अपना स्थान और बल को !           आकर खो गए  हम कहाँ! छूटी अपनी जन्मस्थली, बंधु-बांधव भी पीछे छूटे! नहीं ठौर अपना यहाँ कोई, कभी न कोई पूछे यहाँ  हमें !        आकर खो गए हम कहाँ! शहर, नगर या देश हो कोई, पराया तो पराया ही होता ! गाड़ी, बंगला, दौलत होती, पर अपनापन कभी न होता !          आकर खो गए हम कहाँ ! आओ फिर हम लौट चलें, अपनी माटी पुकार रही है! तन,मन, धन हम वहाँ लगायें, पोषण करने में वह सक्षम है!      अब न सोचें खो गए हम कहाँ! -पेरी सूर्यना...

पानी खजाना

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प्रभु  तेरी  दया  का क्या कहना पानी   का   खजाना   दिया  है। सागर,  सरोवर   और    सरिता, बादल में जल निक्षिप्त किया है।। सप्तसिंधु, मानसरोवर, जैसे, पुण्यप्रद जलराशि  तुमने दी। सुरसरिता  गंगा  दिया  तुमने, यमुना ,  गोदावरी , सरस्वती।। नर्मदा , सिंधु, कावेरी, भीमा, कितनी  ही  देवनदी  बहती। पंपा, पुष्कर,ब्रह्मसरोवर- सा, पुण्यसरोवर   भी  विराजती।। मनुज पर तुमने कृपादृष्टि की, शुद्ध अपार जलराशि उसे दी। पर  स्वार्थी  नर  करे  भूल ही, दूषित कर जलस्त्रोतों को  ही।। मानव जल का अपचय करता, बाँध  बना  जलमार्ग   रोकता। तिरस्कार  और  दोहन   करता, जलखंडों का प्रदूषण  करता।। पवित्र जल अपार  दिया प्रभु ने, संचित, पूजित करो तुम इसको। अपचय,  प्रदूषण,  यदि  न रोके, बूंद -बूंद   जल   को    तरसोगे ।। -पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर " (यह मेरी मौलिक रचना ...

तुमसे मिलना अच्छा लगता है!

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तुमसे मिलना अच्छा लगता है!            हे प्रकृति! विधाता की तुम सुंदर कृति हो! यह धरती,यह आकाश, यह  पर्वत और यह  सागर! यह वन- उपवन , यह जीव-जंतु और कलकल बहती यह सरिता! तुझे विधाता ने कितना विलक्षण बनाया है !    तुमसे मिलना अच्छा लगता है!      हे धरती! तुम कितनी प्यारी हो! सबकी जननी तुम, सबका पोषण करती हो! अपने अंक से लगाकर सबकी रक्षा करती हो! धन-धान्य, कनक,गृह देती; तुम सबकी ही माता हो!       तुमसे मिलना अच्छा लगता है! हे आकाश!  तुम अनंत हो ! निस्सीम व्योम हो तुम; तुझमें ही, बादल ,पवन , इन्द्रधनु ,सुमेरु ज्योति, सूरज,चंदा , ग्रह- नक्षत्र ; हैं  निक्षिप्त सभी!    तुमसे मिलना अच्छा लगता है! हे पर्वत! तुम कितने ऊँचे, कितने महान हो! सुमेरु, हिमालय और कैलाश कितने रूप तुम धरते हो! कैलाश तुम शिव के धाम हो, हिमालय तुम गिरिजा के पिता! गोवर्धन गिरि तुम कान्हा के प्यारे, तुझको कृष्ण ने तर्जनी पर धारा!      तुमसे मिलना अच्छा लगता है!   हे सागर ! गहरे अनंत ;अनगिनत रहस्यों क...

बागों में बहार है

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बागों में बहार है, रंगबिरंगे फूल खिले हैं, फूलों पर तितली मंडराते, भौंरे मधु का पान हैं करते, लोग सभी खुशियों से झूमे।। तरह तरह के वृक्ष खड़े हैं, वृक्षों पर फल फूल लदे हैं, पंछी कलरव करते रहते, डाल डाल पर बसेरा करते, दूर गगन में उड़ उड़  कर फिर वे, अपने नीड़ को फिर कर आते।। कहीं  प्रफुल्लित बच्चों की , किलकारियां हैं गूंज रही। कहीं प्रेमी युगल अपने ही, सपनों की दुनियां मैंं है खोये, दूर तरु की छाया में बैठे, वृद्धजन अपनी बातों में खोये, एक अकेला व्यथित हृदय कहीं, बहारों में मन की शांति को खोजे।। बागों में बहार ऐसी है, जो सबको खुशियाँ देती है, सबके दुख को हर लेती है, और खुशियां दे जाती है। पर इस बाग के बहार के पीछे, हाथ है किसका कोई सोचा है? सींचकर अपने श्रम के पसीने से, वह निर्विकार बागवान बैठा है! यह ब्रह्मांड इक बगिया ही है, अनगिनत तारे,ग्रह , फूल हैं इसके, आकाशगंगा अनगिनत सरिता इसके। यह अद्भुत बाग बनाया किसने? देख जिसे हम अंगुली दबाते दातों तले, कौन है जो इसका पालन करता ? कौन है बागवान इस बाग का, जो निर्विकार छुपकर बैठा है? बागों की बहार सब देखते, पर बागवान को बिरले ही...

सुनहरे सपने

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बड़े   सुनहरे  दिन  बचपन  के, सदा   याद   आते  जीवन   में। वह  खुशी  वह  लड़कपन  मेरा, फिर मिल सकता क्या जीवन में? उछलकूद कर दिन भर खेलूँ माँ   के   हाथों  खाना  खाऊँ। आँखमिचौनी   माँ   से  खेलूँ, चंदा  देख  मैं  खुश  हो जाऊँ।। सांझ ढले घर मैं जब आता , दूधभात  वह मुझे खिलाती। माँ का सुखद स्पर्श मैं पाता, लोरी  गाकर  मुझे   सुलाती।। पिता का लाड़ला होता मैं, घोड़ा बनकर  मुझे घुमाते। चांद  तारे  तोड़कर   लाते, हर  फरमाइश   पूरी करते।। चंद खिलौने कभी  ले आते, पेड़ा    रेवड़ियां   भी   लाते । देख  मुझे  खुश वे खुश होते, मुझे   देख   फूले  न  समाते।। जीवन सुख और संतोष भरा , दुख और  दर्द की नहीं छाया। सरल, स्नेहमय जीवन वह था, सुनहरे  दिन  रहे  बचपन  का।। -पेरी सूर्यनारायण मूर्ती...

आसमान की ख्वाहिश

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आसमान की ख्वाहिश इक है, वह इस  धरती से आन  मिले। दूर  क्षितिज पर झुककर नीचे, धरती  को   बाहों  में   ले  ले।। लोगों  के   भीड़  से  दूर  वे, चाहें  एकांत  में  मिलन  हो । धरती  भी चाहती वह  मिले, नभ से मन की कुछ बातें हो।। पर आसमान को फुर्सत कहाँ? सारा   ब्रह्मांड    देखना  उसे। धरती  को  भी  है   चैन कहाँ? अधोलोक   उसे   हैं    देखने।। यह आसमान औ' धरती की, ख्वाहिश  कभी  न  पूरी होती। ऊर्ध्वलोक  औ' अधोलोक की, देखभाल   जो   करनी   होती।। दूर  क्षितिज  में लगता मानों , धरती  पर आकाश झुका है। आलिंगन कर धरती को ज्यों, प्रेमपाश   में   बाँध   रहा  है।। पर  विधि  का  विधान है ऐसा, मिल  नहीं  सकते  दोनों कभी। हो अगर  मिलन नभ धरती का , वह  समय   प्रलयकार...

अपना एक घर हो

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अपना एक घर हो कहीं भी, दूर प्रकृति की गोद में  बसा। वन, पर्वत हों, बहती हो नदी, पंछी के  कलरव  गूँजे जहां।। मेरी इक  छोटी कुटिया हो, जहां शांति और संतोष रहे। वहाँ एक  छोटी  बगिया हो, साथ जीवन संगिनि हो मेरे ।। चाह नहीं मुझको महलों की, गज अश्व धेनु  या सेवकों की। चाह  नहीं  है धन -दौलत की, या   झूठे  शानोशौकत  की ।। मेरी   कुटिया  में  बना   रहे, सुख शांति और चैन सदा ही। वहाँ  अशांति  या चिंता न रहे, न  आशा आकांक्षा  ही  कोई ।। मेरी  कुटिया  प्रभु  ऐसा   हो स्वच्छंद सदा पवमान वहाँ हो। पुष्प  सुगंधित  उपवन भी  हो,  उन  फूलों  से  प्रभु  पूजन हो ।। प्रभु तुम मुझको इतना कर दे, तेरी   सदा   हमें   याद   रहे। जितने  भी  हो स्थान तुम्हारे, अपना  घर  एक  रहे   उनमें।। -पेरी सूर्यनारायण मूर्ती   "दिवाकर " 

मासूम

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कितने  मासूम  होते  बच्चे, होती नहीं छल कपट उनमें, होते हैं  सभी मन के  सच्चे। भगवान  का  रूप वे  होते ।। मैं  भी  था  इक  मासूम बच्चा , निर्मल और निष्कपट मन मेरा। प्रेम  और  शांति  से  भरा  था, मेरा  जगत  कितना सुंदर  था।। होकर  बड़ा  जगत  मैं   देखा, कितने  जंजालों  से  है  भरा। नहीं शांति , प्रेम  का  ठिकाना , तांडव  यहाँ   ईर्ष्या   द्वेष  का  ।। होकर  बड़ा  मैं  यही चाहा, रहूं  भोला  इक बच्चे जैसा। जग इसको कमजोरी माना, और मुझे इक अनाड़ी कहा।। मासूमियत  बचपन  में जहाँ, दुनियां  को प्यारा  है  लगता । बड़े होकर  निर्मल मन रखना, जगत को मूर्खता  ही  लगता ।। जग चाहे प्रभु, कुछ भी कह ले, बच्चे    जैसा   ही  मुझे  रखना । चाह   नहीं   चतुरता   की  मुझे,  मासूम  ब...

हमारी प्रेम कहानी

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कालेज के  दिनों  में  मैंने, देखे  अनेक  रंगीन सपने। प्रेम कहानियों की किताबें, रट  डाली  मैंने तब कितने! शेक्सपियर का रोमियो बनूं, फिर जूलियट को मैं रिझाऊँ। बसानियो  बन  वेनिस  घूमूँ, अपनी  पोर्शिया को रिझाऊँ।। पढ़ा  था उपन्यास प्रेम -भरी, गुलशन  नंदा  की  कई  मैंने । प्रेम  बाजपेई    की   कितनी, पढ़ी उपन्यास  प्रेम कथा की ।। कालिदास  की   मेघदूत  भी, कुमारसंभव  भी    पढी़  मैंने। समझा स्वयं को यक्ष सा प्रेमी, देखा  हसीन   सपने   कितने! वक्त  बीतता  ही  चला  गया, अपने  सपनों  में   मैं   खोया। प्रेम    कहानी    पढ़ते   रहता, नायक स्वयं को समझा करता।। आया  एक  दिन  रिश्ता  मेरा, हो गया पक्का यंत्रवत- सा ही। धर्मपत्नी  का तबसे गले पड़ना, घोंट  दी   गला  अरमानों   की।। देखा  ...

टिमटिमाते तारे

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    कई   टिमटिमाते  सपने, जीवन   में  उसने  देखे   थे। एक नीड़ हो उसका  जिसमें , स्वच्छ और सुंदर जीवन बीते।। चाहा  वह  इक  घर  हो अपना, जहां   प्रेम   हो  और  शांति हो। देखा  वह  जीवन  का   सपना। जहां सत्य धर्म और अहिंसा हो।। जीवनपथ पर सदा वह चला, नित  इन  मूल्यों को ही थामे। सोचा  इक  दिन  पूरा   होगा , वे  सभी   टिमटिमाते  सपने।। पर यह जग बड़ा ही  निष्ठुर था, धरे   रह   गये   उसके   सपने। जग  को  उसने बहुत दिया था , जग  ने  न  दिया उसको जीने।। इस  जग  में अब ईमान कहाँ? सत्य ,धरम और प्रेम भी कहाँ? कहाँ शांति और कहाँ अहिंसा? सदाचार  का  ठौर   ही  कहाँ? पूरा  न  हुआ  घर का सपना, न  ही  वे  टिमटिमाते   सपने। हर  निस गगन में वह ताकता, टिमटिमाते ...

फूलों की खुशबू

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फूलों की खुशबू क्या देती, क्या  तुमने कभी सोचा है? खुशबू  ऐसी  मन बहलाती , बड़े कार्य वह कर जाती  है।। नारद  पारिजात  दी कृष्ण को, रही अलौकिक खुशबू जिसकी। कृष्ण  ने  दी उसे रुक्मिणी को , क्रोधित हुई सत्या तत्काल  ही।। असहाय कृष्ण तब की चढ़ाई, स्वर्ग  से  पारिजात तरु   लाये। सत्या के  भवन  में  वृक्ष  रोपी, इस  जग  को  पारिजात  दिये।। पाई जब सुगंध दिव्य कमल की , द्रौपदी     कही    उसको   लाने। चले  भीम  दिक्  गंधमादन  की, जहां अग्रज  हनुमान  थे   मिले ।। फूलों  की  सुगंध अति निराली, क्लांत  को  विश्राम  कभी देती। रोगी    को    वह    राहत   देती, अपनों  को  खुशियां  वह   देती।। फूलों की खुशबू अति न्यारी, सदा  खुशी  ही  है वह  देती। कभी कभी  खुशबू  फूलों की , एक   इतिहास  ही...

नई पौध

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कल तक सुप्त पड़े थे  बीज में, नई  पौध  बन  तुम  उग  आये। अंडरूप  बीज   में  तप   करते, ऋषि सा तप में तुम सफल हुये।। धरा  के  गर्भ में  मिला   तुझको, ऊष्मा  और  ममता  माता   का। बादल  बरस  सींच  धरती   को, कियाअंकुरित तुझको पिता-सा।। नन्हें    दोनों    बाँह    फैलाये, मंद   पवन   के   संग    झूमे। सिर  आहिस्ता  उठाया  तुमने, प्रथम रश्मि दिनकर का देखने।। उठ खड़े हुए तुम कुछ दिन में, ज्यों  तुम  छाता ताने  नभ में। वामन -सा  तुम  बढ़े गगन में, परमारथ हित तुम कुछ करने ।। नई पौध तुम अगर शस्य हुये, लोगों को  अन्न तुम देते  हो। अगर फलों के वृक्ष कभी  हुये , तो  मीठा  फल  तुम देते  हो।। अगर औषध वनस्पति तुम हुये, धन्वंतरि- सा  औषधि  देते  हो। अगर इक वन्य वृक्ष  ही तुम हुये, परिशुद्ध    प...

भैरवघाटी का रहस्य अंतिम भाग

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वह शरद ऋतु आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी थी।भैरवघाटी के बाहर लगे शिविरों में काफी हलचल मची हुई थी। सदियों से जिस क्षेत्र की ओर मनुष्य के पदचाप नहीं पड़ते थे, वहाँ आज सैकड़ों लोगों की भीड़ लगी थी। सरकार ने कठोर निगरानी रखी ताकि कोई भैरवघाटी की ओर न जा सके। महायज्ञ की तैयारी पूरी हो चुकी थी।  स्वामी स्वरुपानंद पुजारी गिरिजाशंकर को आवश्यक निर्देश दे रहे थे। कृष्णा, कावेरी , तुंगभद्रा, भीमा,हेमवती, घटप्रभा,वाराही,गंगावली,पेन्ना, सीता,शांभवी,पयस्विनी,चित्रावती, मार्कंडेय, कुमारधारा  और लक्ष्मणधारा आदि सभी पवित्र नदियों से कलशों में जल भरकर लाया गया। तभी एक तेजस्वी साधु का प्रवेश हुआ। वे ऋषिकेश के पहाड़ी गुफा में तपस्या में लीन रहनेवाले स्वामी चिद्घनानंद थे। अनिरुद्घ ने स्वामी चिद्घनानंद को साष्टांग प्रणाम किया। अन्य सभी ने हाथ जोड़कर प्रणाम किये। अब स्वामी चिद्घनानंद निर्देश देने लगे। उन्होंने पवित्र नदियों से लाये जल को एक बड़े पात्र में डलवाकर उसमें हाथ डालकर अभिमंत्रित किया। फिर पुजारियों द्वारा उसे कंटीले तारों से घिरी उस प्रदेश में चारों तरफ छिड़काव करवा दिया। सभी को उ...

भैरवघाटी का रहस्य भाग ७

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  भानुप्रताप और चंद्रभान का परिवार सर्किट हाउस में पहुंचकर दूसरे दिन सुबह की यात्रा की तैयारियां करने लगा। यात्रा के दौरान आवश्यक खाद्य सामग्री  और अन्य दैनिक उपयोग की चीजें खरीदकर पैक कर रहे थे। रात के दस बज रहे थे। तभी जाजपुर मंडल के फॉरेस्ट रेंजर असित त्रिपाठी उनसे मिलने आये। उन्होंने बताया कि भुवनेश्वर से चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स विमल कुमार  के निर्देशानुसार कल सुबह उनके यात्रा के लिये पाँच स्कॉर्पियो गाड़ियों  की व्यवस्था कर दी है। ड्राइवर सहित वे गाड़ियां और अन्य पाँच जीपगाड़ियाँ पंद्रह सिक्योरिटी गार्ड्स के साथ सुबह ठीक छह बजे सर्किट हाउस में खड़ी मिल जायेगी। इतने में ही चीफ कंजर्वेटर विमलकुमार का फोन आ गया। असित त्रिपाठी वह मोबाइल भानुप्रताप को दिया। उन्होंने  अपना मोबाइल नंबर दिया और कहा कि विरजा माता के आज्ञानुसार वे सभी उनके यात्रा की संपूर्ण व्यवस्था  कर दी है तथा कोई समस्या हो तो उन्हें फोन करें।भानुप्रताप के आश्चर्य का ठिकाना न रहा।  दूसरे दिन तड़के ही सभी दल बल सहित यात्रा पर रवाना हो गये। पहले विरजा मंदिर जाकर माता का आशीष लिये और ...

भैरवघाटी का रहस्य भाग ६

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प्रियंवदा के माता पिता काफी चिंतित रहने लगे। उसके अजीब से सपने और भैरवघाटी का वर्णन उनके लिये एक बड़ी समस्या बन चुकी थी। वे सोचने लगे कि यदि उस महान ज्योतिषी माधव  शास्त्री की बात  सच हों तो उनकी फूल जैसी कोमल बेटी  ऐसे भयंकर जगहों में खतरनाक परिस्थितियों का सामना कैसे कर सकेगी?और यह सब उनकी ही बेटी क्यों करे!   उस दिन  प्रियंवदा ने फिर एक.सपना देखा। सपने में माता गौरी कह रही थी- "प्रियंवदा, अब तुम्हारे महान कार्य करने का समय आ गया है। कलिंग देश में  वैतरिणी नदी के तट पर विरजाक्षेत्र है, जहाँ मैं विरजा नाम से विराजमान हूँ । परसों अष्टमी तिथि से वहाँ मेरे मंदिर में शरद् नवरात्रि का उत्सव आरंभ होगा। पुत्री तुम विरजाक्षेत्र आओ, वहाँ तुम्हारे जीवन में एक महत्वपूर्ण  घटना घटेगी। विजयी भव!"  इतना कहकर माँ गौरी अंतर्धान हो गई। प्रियंवदा जगकर आंखें मलकर देख रही थी। सामने उसकी माँ खड़ी थी। उसने बेटी से पूछा -"क्या हुआ ,बेटी,तुम लगातार माँ ,माँ पुकारे जा रही थी!" प्रियंवदा ने सपने की सारी बात माँ को बताई।     प्रियंवदा की माँ मेनका देवी अब प...

भैरवघाटी का रहस्य भाग ५

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   अनिरुद्ध का स्टडी टूर खत्म हुआ। सभी प्रशिक्षणार्थी देहरादून में अपनी अकादमी को लौट आये।दो दिन बाद उनका पासिंग आऊट सेरेमनी और शपथ ग्रहण समारोह  हुआ और सभी प्रशिक्षणार्थियों को सर्टिफिकेट प्रदान किये गये। साथ ही उनका पोस्टिंग ऑर्डर्स भी दे दिया गया और उन्हें निर्देश दिया गया कि वे सभी अपने पोस्टिंग स्टेशन में पंद्रह दिन बाद रिपोर्ट करें। अनिरुद्ध को कर्नाटक  कैडर में  पोस्टिंग मिला और उसे शिवमोगा (शिमोगा) फॉरेस्ट सर्किल में ज्वाइन करने का निर्देश दिया गया।     अकादमी से रिलीज होकर वह  अपने घर दिल्ली आ गया। उसे पंद्रह दिन बाद ड्यूटी ज्वाइन करना था। अनिरुद्ध के पिताजी भानुप्रताप वर्मा  दिल्ली वन विभाग में कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स के पद पर हैं। अनिरुद्घ ने  स्टडी टूर के दौरान उड़ीसा के जाजपुर में और ऋषिकेश में घटित घटनाओं को अपने माता- पिता को बताया। उसके पिता ऐसी बातों में रुचि नहीं रखते थे पर वे भी सोचने को मजबूर हो गये कि यह क्या माजरा है। उसकी माता रामदुलारी देवी शिवजी  की अनन्य भक्त थी। उसे विश्वास था कि कोई महत्वपूर्ण घटना ...

भैरवी घाटी का रहस्य भाग ४

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अनिरुद्घ इन दिनों बड़ी विचित्र मनःस्थिति से गुजर रहा था। रह- रहकर उसके जेहन में उड़ीसा के  जाजपुर शहर का वह विरजा मंदिर परिसर, विरजा माता की वह दिव्य मूर्ति, वह वैतरणी नदी का तट आदि घूम जाता था। उसका अंतर्मन कुछ पुरानी यादों का हल्का अहसास करा रहा था, पर वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रहा था।              एक दिन अनिरुद्ध ने एक स्वप्न देखा। स्वप्न में उसे विरजा माता ने दर्शन दिये और कहा- " अनिरुद्ध , तुम एक महान आत्मा हो। तुम्हारा जन्म एक विशेष कार्य के लिए हुआ है। तुम्हें दक्षिण के कन्नड़ राज्य के बीहड़ जंगलों में एक महत्कार्य करना है।  कुछ  समय बाद तुम्हें हिमालय में एक महात्मा के दर्शन होंगे। वे तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे। अति शीघ्र तुम मेरे दर्शन करोगे।  तब तुम्हें एक साथी मिलेगी। वह इस महत्कार्य में तुम्हारा साथ देगी। तुम्हारा कल्याण हो!"इतना कहकर माता अंतर्धान हो गई। अनिरुद्ध हड़बड़ा कर उठ बैठा। सुबह के चार बज रहे थे। वह समझ नहीं पा रहा था कि यह सत्य है या मात्र सपना है। पर उसने स्पष्ट रूप से माता के दर्शन किये थे और माता ...