पूर्णिमा

चांद  गोल है वह पूनम का,
सदा  गोल ही वह  रहता है।
जब धरती की पड़ती  छाया,
घटता हुआ  नजर आता है।।

सोलह कलाओं से  युक्त  चंदा,
हरदिन  कला  का ह्रास  होता ।
जब  छाया  पूरा   ढंक    लेता,
तब  मृगांक ओझल हो  जाता ।।

शुक्लपक्ष में  वही चंदा बढ़ता,
छाया     धीरे  - धीरे     हटता ।
वह  सुंदर  गोल- सा  हो जाता ,
शुभ्र  धवल  चांदनी   बिखेरता  ।।

अमावस को जो चंदा न  दिखा,
मन  सबका  उदास  हो  जाता ।
वहीं   पूनम  का   शीतल  चंदा,
सबको    ही   शीतलता    देता।।

पूर्णिमा का चंद्रमा  वही है,
अमावस में चंद्रमा  वहीं है।
खेल यह उसी छाया का है,
कुदरत की यह माया ही  है ।।

वही  चांद  है , वही   चांदनी ,
क्रम है यह घटना -बढ़ना भी।
चंद्रमा  सा है  यह जीवन भी,
ह्रास वृद्धि यहाँ चलती रहती।।

-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर"

(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित।)
(मुखचित्र गूगल से साभार)

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