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"रिश्तों की रेशमी डोर"

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रिश्तों की रेशमी डोर इक ऐसा रोचक फलसफा है, जिसको सम्हाले रखना हर वक्त इक नया तजुर्बा है। 1•रिश्तों की डोर बहुत नाज़ुक होती है, ज़रा-सी असावधानी से बहक जाती है, रिश्तों की डोर बहुत मज़बूत भी होती है, एक पल की सावधानी से चहक जाती है। 2•मुसीबत में काम आएं जो, वो रिश्ते सच्चे होते हैं, जो देखें तोल कर रिश्ते, अक्ल के कच्चे होते हैं, जो पैसे पास हों अपने, तो रिश्ते खास हो जाएं, प्रेम की बात मत पूछो, ये धागे कच्चे होते हैं। 3•रिश्तों कि ही दुनिया में अक्सर ऐसा होता हैं, दिल से इन्हें निभाने वाला ही रोता हैं, झुकना परे तो झुक जाना अपनो के लिए, क्योंकि हर रिश्ता एक नाजुक समझोता होता हैं। 4•रिश्तों की डोर बहुत कमजोर होती है, ज़रा-सी असावधानी से तोड़ मरोड़ जाती है, रिश्तों की डोर बहुत मज़बूत भी होती है, एक पल की सावधानी से चहक जाती है। मुस्कराहट का कोई मोल नहीं होता, कुछ रिश्तो का कोई तोल नहीं होता, वैसे लोग तो मिल जाते है हर मोड़ पर, पर कोई आप की तरह अनमोल नहीं होता। 5•दिल से बने जो रिश्ते उनका नाम नही होता, इनका कभी भी बर्बाद अंजाम नही होता। अगर निभाने का जज्बा दोनों तरफ से हो, तो कभी कोई पवित्र रिश्त...

"अग्निवीर"

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अग्निपथ पर चलकर आओ, अग्निवीर बन जाओ।  कर्म को पूजा मानने वाले,  सब कर्मवीर बन जाओ। राष्ट्रप्रेम की भावना भरी हो कूट-कूट कर तुममें,  ऐसे राष्ट्र प्रेमी सब राष्ट्रवीर बन जाओ। नहीं होगी युवदल में कल की कोई फिक्र,  चलो मुक्त भाव से सब राष्ट्र सबल बनाओ। न किसी की ताबेदारी, न करनी है चाकरी, आत्मनिर्भरता के भाव को लेकर चलो उन्मुक्त हो जाओ  अन्य राष्ट्र हो गए सैन्य बल सुसज्जित,  भारतवासी सैनिक वेश में अनुपम अलख जगाओ। भारत माता रही पुकार,  सुनो नहीं कोई भ्रमित चीत्कार।  आओ,नवयुवकों तुम आगे आओ, तुम स्वदेश के अग्निवीर कहलाओ।। रचयिता  - सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक कृति,सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड। 

"छू लो आसमाँ"

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धरती कहे पुकार के आसमाँ को छू लो। खड़े हो जिस धरा पर उसकी छत्रछाया आसमाँ है। बड़ों का मान रखना, छोटों का ख्याल रखना, संग चलने वालों का साथ संजोए रखना। हौसले बुलंद रखना,आज सम्हाले रखना, कल सजाते चलना। जिसने यहाँ है भेजा, उससे नाता बनाए रखना। हर पल को जीते चलना, अगला स्वयं मिलेगा, जानकर दुःख न देना,गर त्रुटि हो गई, क्षमा ज़रूर लेना। चढ़ते चलो सोपान, दूर नहीं वो दिन है, इक दिन⭐आसमान⭐छू ही लेना। सीखने-सिखाने के क्रम में पीछे कभी न रहना। कुछ पाकर ही रहोगे,देते हुए ही चलना।  भरपूर मूंठ जो दोगे गर ज़िन्दगी में, आगार भरा रहेगा,खाली कभी न होगा। मुट्ठी बाँधे आए हो,खुले हाँथ ही जाना। बस सुकर्म करते रहना, दूर कुछ नहीं है। इक उछाल मार कर देखो, आसमाँ छू ही लोगे।            रचयिता --             सुषमा श्रीवास्तव                 मौलिक कृति सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड। 

"सफलता के सूत्र"

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जीवन में प्रत्येक व्यक्ति सफल होना चाहता है, लेकिन सफलता का मार्ग आसान नहीं है तो असंभव भी नहीं है। देखने में  आता है कि कठिन परिश्रम के पश्चात भी कई बार लोग सफलता हासिल नहीं कर पाते हैं। सफल जीवन हर व्यक्ति का पहला सपना होता है। यह सपना आसानी से पूरा नहीं किया जा सकता। इसे हासिल करने के लिए व्यक्ति को एक मूल्य चुकाना पड़ता है। जी हां ,सफलता हासिल करने के लिए व्यक्ति को कुछ विशेष सूत्र अपनाने होते हैं। जीवन में सफल होने के लिए प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमतानुसार  प्रयास करता ही है।फिर भी कई लोग अपने प्रयासों में विफल हो जाते हैं। ऐसे में मैं यहाँ पर अपने अनुभव एवं विचाराधारा कुछ ऐसे सूत्र बता रही हूँ ।संभव है कि सफलता मार्ग के लिए कारगर साबित हो सकें।  1. हमेशा खुश रहें दूसरों को भी खुश रखें- जीवन में सफलता हासिल करने के लिए दूसरों को खुश रखना जरूरी होता है। चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति खुद भी खुश रहता है और दूसरों को भी खुश रखता है, वह जीवन में जल्दी सफलता हासिल करता है। 2. कार्य पूरे उत्साह और लग्न से करें- कहते हैं कि इंसान को जीवन में सफलता हासिल करने के लिए काम को पूर...

पर्यावरण-संरक्षण में आवश्यक है साझेदारी"

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समाज में रहने वालों की पर्यावरण के प्रति सभी की साझा जिम्मेदारी होती है। जब हम लाभ लेने में कभी पीछे नहीं रहना चाहते तो फिर उसी के प्रति अपने उत्तरदायित्व उठाने में ही क्यों और कैसे पीछे रहते हैं? यह अत्यंत ध्यातव्य और विचारणीय विषय है। सब जानते हैं कि वृक्ष हमारे पर्यावरण सी सर्वोत्तम ईकाई है। केवल उसका रोपण कर तस्वीर खिंचवा लेना पर्याप्त नहीं है ,तो आइए जानते हैं कि क्या और कब करना चाहिए  -:     जुलाई माह पौधारोपण/ वृक्षारोपण की दृष्टि से सर्वोत्तम माना जाता है।सभी स्कूलों,कॉलेजों,संस्थाओं और सार्वजनिक स्थानों पर बड़े जोर शोर से वृक्षारोपण होता दिखाई भी देता है पर उनकी बढ़वार मुश्किल से दस प्रतिशत ही मिलती है।कारण स्पष्ट है - सही प्रकार से देखभाल न होना। अतः पौध लगाने के साथ साथ उनकी समुचित देखभाल परमावश्यक है। आइए इसी विषय में कुछ ख़ास जानकारी प्राप्त करते हैं।  • कौन सी नई पौध लगाने का समय? 1. जुलाई महीने की शुरुआत में गुलदाउदी की कटिंग लगा सकते हैं। इसकी तीन से चार इंच लंबी कटिंग पानी में भिगोकर विशेष रूप से तैयार की गई मिट्‌टी में लगाएं। 2. इसी मौसम में डहेलिया...

"नया अवसर"

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'विचार'         कहते ही नहीं अपितु अकाट्य सत्य हैे कि गया वक्त वापस नहीं मिलता किंतु प्रत्येक मंजिल के लिए एक नया अवसर अवश्य मिलता है।उसका भरपूर लाभ उठाइये। निष्ठा, विश्वास एवं अनवरत बिना परिणाम की फिक्र किए लगे रहिए एक न एक दिन मंजिल आपके कदमों तले होगी। यह भी पूर्णतः निश्चित है। धन्यवाद! राम राम जय श्रीराम! द्वारा - सुषमा श्रीवास्तव,मौलिक विचार, सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड।

देर रात

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" नित्य ही देर रात सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां और पुलिस की चौकसी तभी तो हम घरों में चैन से सोते हैं।  देर रात हर परिस्थिति और मौसम में अपना कर्त्तव्य निभाते हैं सैनिक सुरक्षा बल और सीमा सुरक्षा बल अपने घर-परिवार का साथ छोड़कर तभी तो हम सुकून से घरों में सुख-चैन से करते हैं विश्राम, लेते हैें आनन्द उत्सवों और समारोहों का इतना ही नहीं जीवन के पल पल के साक्षी बन पाते हैं। अपने बच्चों की किलकारियाँ नित नई सुन पाते हैं। क्या कहूँ कितना कहूँ? फिर भी रह जाएगा कुछ न कुछ अछूता, कलम भी रह जाएगी भूखी प्यासी और अंतस्तल के भाव भी रह जायेंगे अधूरे के अधूरे। हे मेरे आराध्य! बस इतना करना इन कर्मशीलों की ज़िन्दगी में कभी भी धुंध न आने देना,मेरे विश्वास को बल देना।सारे जग में खुशियों की ऐसी जगमग ज्योति जला देना कि रात की छाया भी न पड़ सके। धन्यवाद! राम राम जय श्रीराम! लेखिका - सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक विचार, सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड।

"आयुर्वेद बनाम ऐलोपैथी"

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चिरकाल से चिकित्सा के क्षेत्र में अनन्य मार्ग देखने में आते रहे हैं जैसे कि-: ऐलोपैथी,आयुर्वेद  यूनानी पद्धति, होम्योपैथिक पद्धति तथा।प्राकृतिक।चिकित्सा पद्धति। जिसमे सबसे प्राचीन आयुर्वेद ही माना जाता है। वेदों,पुराणों और प्राचीन ग्रन्थों में इसी की चर्चा मिलती है।जिसमें जड़ी- बूटियों के माध्यम से ही किसी न किसी तरह इलाज किया जाता है।      यहाँ पर हम बहुप्रचिलित आयुर्वेद बनाम ऐलोपैथी पर चर्चा करने जा रहे हैं।  आयुर्वेद किसी बीमारी की उत्पत्ति का पता लगाता है और फिर इसे रोगी से पूरी तरह से समाप्त कर देता है जबकि एलोपैथी रोगी को रोग के कारकों को समाप्त करके तत्काल राहत देता है।         हम सभी जानते हैं जिस चीज़ में जल्दी होती है आगे चलकर वह मुसीबत बनती है।कहा भी गया है जल्दी का काम मुसीबत की जड़ है ठीक इसी तरह एलोपैथी कम समय में इलाज तो कर देती है लेकिन आगे के लिए यह और रोग पैदा कर देती है। जबकि इसके मुकाबले आयुर्वेद बीमारी का इलाज करने में वक़्त तो लेता है लेकिन बीमारी का इलाज परमानेंट कर देता है। भविष्य में फिर किसी भी रोग की आशंका नही...

"असंभव को संभव बनाना"

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आज रश्मिरथी पर दैनिक लेखन- विषय "असंभव" दिया गया है पर मेरा मंतव्य है कि इस संसार में कुछ भी असंभव नहीं है।यहाँ मैं उसी को अपने तर्कों से साबित करना चाहती हूँ। मुझे तो मेरे पिता जी ने बहुत बचपन में ही इस बात की घुट्टी पिला  दी थी जो मेरे अंतर्मन में स्थायित्व ले चुकी है। अगर दिल में तमन्ना है,मनोबल है पुरजोर, बाजुओं में है जोर, अधीरता का है टोटा एवं अनवरत प्रयास है जारी तो चलता चल राही कुछ नहीं कभी असंभव- मंजिल तेरे कदमों में है।आँखों की चमक हमेशा बरकरार रख,आशा का दीप न बुझने देना,विश्वास की ज्योति न झुकने देना निश्चित ही हर असंभव संभव में साकार हो जाता है यह अकाट्य सत्य है। मनुष्य इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली और बुद्धिमान प्राणी है, अगर मनुष्य चाहे तो असंभव को संभव बना सकता है। मनुष्य के लिए इस संसार के अंदर कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो कि असंभव हो क्योंकि भगवान ने मनुष्य को कुछ ऐसी शक्तियाँ दी हैं, जिनकी सहायता से कोई भी इंसान अपने जीवन में असंभव को संभव बना सकता है और बड़ी से बड़ी असफलता को सफलता में बदल सकता है। मनुष्य की जो सबसे बड़ी शक्ति है वह है  ”सोचने की शक्ति"  ...

"मेरा शहर"

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जहाँ हमने आँखे खोलीं, हँसना- रोना, खेलना-कूदना, पढ़ना-लिखना और जीवन जीने का सलीका सीखा वह घर-परिवार, पास-पड़ोस शहर बाजार सब अपना ही तो होता है। बढ़ती उम्र के साथ-साथ  समयानुकूल अवसर आने पर किसी न किसी कारण उस अपने शहर को एक दिन छोड़कर जाना ही होता है।कारण कुछ भी हो सकता है जैसे कि रोज़ी-रोटी के फेर में, वैवाहिक गठबंधन हो या फिर पढ़ाई-लिखाई (उच्च शिक्षा) और कैरियर अंततः स्थानांतरण भी नौकरी में शहर बदलने का बहुत बड़ा कारण होता है।स्वाभाविक सी बात है कि इंसान जब कहीं कुछ समय तक रह लेता है और व्यवस्थित हो जाता है तो वहाँ से एक अपनत्व की भावना हो जाती है।एक लगाव हो जाता है। उस स्थान/ शहर या लोगों को छोड़कर जाने की इच्छा नहीं होती परन्तु मनुष्य परिस्थितियों का दास है, उसे जाना ही होता है और वह जाता है। तदनंतर कुछ समय बाद वह नई जगह,लोग, पास-पड़ोस और बाजार-हाट सब अपने हो जाते हैं। यही परिवर्तन एवं सामंजस्य ही तो जीवन की असली कला है। धन्यवाद! राम राम जय श्रीराम! लेखिका - सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक विचार  सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड।

"निःस्वार्थ सेवा"

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निःस्वार्थ सेवा करने का तात्पर्य है प्रभु की मेवा इकट्ठी करना वही तो आजीवन पोषण देती है।कभी किसी दूसरे के सामने हाँथ फैलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। न किसी कल की ही फिक्र करनी होती है।यही तो है सच्ची आराधना और पूजा!            भलाई यानि परहित अथवा दूसरों की सहायता करना अच्छा होता है। भलाई मनुष्य को देवताओं का दर्जा प्रदान करती है और इसके प्रभाव से शत्रु भी मित्र बन जाते हैं। निस्वार्थ सेवा का भाव भी भलाई का एक रूप है भलाई के समान कोई दूसरा धर्म नहीं होता। श्री रामचरितमानस में तुलसीदासजी ने भी लिखा है -: परहित सरिस धर्म नहि भाई।  पर पीड़ा सम नहि अधमाई।। अर्थात दूसरे का कल्याण करने के समान कोई अन्य धर्म (पुण्य) नहीं है मतलब कि सुन्दर फलदायी कार्य नहीं है,तथा दूसरों को दुःख (पीड़ा/व्यथा) देने के समान पाप (बुरा कार्य) नहीं है। कभी किसी बेबस की ख़ातिर, अपनी नींद उड़ा करके तो देखिए, कभी कड़कती धूप में तप कर, निर्बल को बल दे कर तो  देखिए, निराशा भरी निगाहों में, उम्मीद जगा करके  तो देखिए और उन उम्मीदों की खातिर अपना, हर दर्द भुला कर तो देखिए किस परमान...

"बुद्धम् शरणम् गच्छामि(बुद्ध पुर्णिमा)"

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आज सन 2022 की 16 मई है और आज ही इस वर्ष का बैसाख मास अपने अंतिम पड़ाव पर आ गया है।जिसे पूर्णिमा कहते हैं। इसी पूर्णिमा को बुद्ध जयंती/ बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। अतः सर्वप्रथम आप सभी को इस पर्व की भावभरी हार्दिक शुभकामनाएँ!🙏🌹🌹🌹🌹🌹🙏 वैशाख महीने की पूर्णिमा को भगवान बुद्ध की जयंती मनाई जाती है। इसलिए इस पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा कहते हैं। भगवान बुद्ध ने ही बौद्ध धर्म की स्‍थापना की और पूरी दुनिया को सत्‍य, शांति, मानवता की सेवा करने का संदेश दिया।  उन्‍होंने दुनिया को पंचशील उपदेश दिए। ये पंचशील हैं -हिंसा न करना, चोरी न करना, व्यभिचार न करना, झूठ न बोलना और नशा न करना।      बुद्ध जयंती का उत्सव भारत ही नहीं अपितु कई अन्य देशों में मनाया जाता है।महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का अनुसरण और पालन अत्युत्तम होता है। प्रयास करना चाहिए कि हम उस मार्ग पर ही चलते रहें।  धन्यवाद! राम राम जय श्रीराम! लेखिका - सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक विचार, सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड।

बीता हुआ कल"

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• जो आज बीत गया,वही तो होगा बीता कल,  आज का आधार भी तो है बीता हुआ कल। •इस प्रकार हो गए अन्योन्याश्रित सारे  दिन , चाहे हों वे आज या कल।  •एक दूजे में समाए हैं सब जीवन के कंगूरे , बस समझ-समझ का फेर है, जरा ठहर कर देख एक दूजे बगैर सब हैं अधूरे। •इनसे ही तो हो जाती संरचना आगत कल की, ऐ मनुज! कितना सच है यह कहना, अतीत सुहाना,भविष्य अनजाना, औ वर्तमान है मन को बहलाना। •क्यों फेर में पड़ता है कल-कल  जीवन तो है आज में,जिससे बनेगा कल। जी जी कर आगे बढ़ता चल, कर्म-पथ का राही तू,कर्म अपने करता चल। रचयिता- सुषमा श्रीवास्तव  मौलिक कृति,सर्वाधिकार सुरक्षित ,रुद्रपुर, उत्तराखंड।

"रक्तदान महाकल्याण"

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'रक्तदान' से बढ़कर संसार में कोई भी दान नहीं है।ऐसा ही है एक और महान दान 'अंगदान'। जिसने भी यह महान दान किए समझिए उसने सबसे अधिक पुण्य का कार्य सम्पन्न कर अपना जन्म सफल कर लिया। अपने जीवन के साथ साथ और बाद भी दूसरों को नया 'जीवन- दान' दिया है। जीवन देने वालों में ईश्वर के बाद उसी का नाम आता है।मेरे विचार से मां का नाम भी उससे पीछे रह जाता है क्योंकि ग्रुप न मिलने या आयु अधिक होने के कारण इच्छुक होते हुए वह अपनी ममता का कुछ नहीं कर सकती। ऐसा महान दान करने वाला आवश्यक नहीं कि व्यक्ति विशेष का रक्त संबंधी भी हो। उसके अंदर तो बस ऐसे महान कार्य के लिए उत्कट अभिलाषा और भावना होनी चाहिए।  • ऐ मनुज! करो रक्तदान, जो है महादान, जिसकी नहीं कोई तुलना न ही आन। टूटते जीवन को नवजीवन का उपहार, ऐसे दानी का आभार करना है नहीं आसान।  आशा-तृष्णा कभी नहीं सताते, उपजते जिसके अंतः में भाव अनोखे, रक्त की हर एक बूंद है तुम्हारी। पर हर जनजीवन को देना हैं संदेश,  रक्तदान है महादान,इससे करो जग का कल्याण, परम पुण्य के भागी बनो  देकर किसी को जीवनदान।  •पहचाने दर्द जो औरों का वही तो है...

"हार में भी जीत है"

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साथियों!      हार को हार मत मानिए और दुःखी होकर मन छोटा न करिए, क्योंकि प्रत्येक हार में भी शिक्षा रूपी जीत का रसाप्लावन है।आइए देखते हैं कैसे -: हार में जीत है पाई,एक ऐसी सम्पदा आई। बिन जानी- पहचानी 'सीख' की हुई अगुवाई।  कभी हार के भय से ना लौटे कर्म-पथ से, मंजिल पर जाकर तो,कुछ न कुछ मिला लक्ष्य से। झोली खाली कभी न आई, होती रहती हरदम भरपाई।  सोच सोच की बात है प्यारे, कदम कदम पर वारे - न्यारे। प्रयास कभी न निष्फल जाए, कोई तो फल टपका ही जाए।  नई राह संबंध मिलेंगे, साथी- संगी द्वार खुलेंगे,  भाषा का संस्पर्श बढेगा, माधुर्य भरे व्यापार बनेंगे।  अनुभव की गठरी बड़ी निराली, आजीवन घूँट पिलाती है प्याली। सच कहती है 'सुषमा' सबसे  कभी कदम न लौटाना अबसे।  खाली हाँथ न आना होगा,  यही विचार हरदम है रखना। हार में भी जीत मिलती है, जीत नहीं तो सीख मिलती है।। धन्यवाद! मौलिक कृति,सद्यः निःसृत,  सुषमा श्रीवास्तव, रुद्रपुर, उत्तराखंड।

"बाबुल का घर आँगन"

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एक बेटी जबसे होश सम्हालती है उसे अपने मायके यानि कि माँ- पिता के घर से अद्भुत लगाव होता है। उसके छूट जाने की कल्पना भी व्यथित कर देती है। पर उसका छूटना अवश्यंभावी होता है और बेटी को जीवन के नवल मोड़ पर सामंजस्य बिठाते हुए अपने अंतर्मन में अपने मायके को भी मर्यादित तौर पर सहेजना ही होता है।यद्यपि समय के साथ-साथ समाज में बहुत बदलाव आ रहे हैं। ज़्यादातर सकारात्मक हैं पर नकारात्मकता भी देखने को मिल ही जाती है।       जहाँ ससुराल या मायके अथवा पति के ही एकल परिवार की एक सी तालमेल बिठाने की आती है तो मजबूरन मायका ही पीछे करना पड़ता है और बेटी किसी भी प्रकार से ऐसा कर भी लेती है पर उसके अंतस्तल में बाबुल के आँगन के लिए जो पीड़ा होती है उसे और कोई तो छोड़िए, उसको अतिशय प्यार करने वाला, अपनी ज़िन्दगी मानने वाला भी क्या समझ पाता है? या फिर जिस तरह वह आधी ज़िन्दगी को बिसरा कर उसके लिए या ससुराल के लिए समर्पित होती है एक बहू/ पत्नी बनकर क्या उसी तरह उसका पति उसके मायके को स्वीकृत करता है?अपने सास ससुर के लिए एक बेटे का कर्त्तव्य निभाने वाला बेटा बन पाता है? नहीं ना। आखिर क्यों? निश्चि...

"ज़िन्दगी की दौड़"

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वक्त के पहिए पर है ये ज़िन्दगी  दौड़ती भागती सी ये ज़िन्दगी , थकी-थकी सी किंतु बेपरवाह अबाध बढ़ी जा रही। बेखटके क्षितिज के पार जाने को है विकल, काल को भी धकेल कभी थमी- थमी सी ज़िन्दगी,  अनकहे बोझिल बोझ को ढोती हुई, जाने क्यूँ कभी दबी-दबी सी है ज़िन्दगी।  अंतर ध्वनि को महसूस करती हुई खुद से ही करती जंग। अपने आप से ही लड़े जा रही है ये ज़िन्दगी।  जाने कब से पता ही न चला स्वयं को   न भूख न प्यास बाकी है न कोई ख्वाब,  फिर भी उलझी सुलझी सी डोर को थामें, भोर की लाली में चल देने को तैयार,  कभी तो सकूँ के पल निकाल लो जीने के, कभी तो मुस्कराहटों का आदान प्रदान कर लो,  जिसने धरा पर भेजा उसके भी काम कर लो, कर्म यज्ञ करते-करते उसका भी नाम ले लो। आजीवन कल को भागे अब आज को तो जी लो। जीवन में भागना नहीं, कुछ पल ठहर कर देखो, आज का रसानन्द आज लेकर तो देखो, भागते-दौड़ते नहीं चलते-चलते जीकर देखो, इस ज़िन्दगी के प्रयोग को जिन्दादिली से जीना, खुद खुलकर हँसना और सबको है हँसाना , जीवन के भाग-दौड़ को रस ले लेकर है जीना। यही तो है आज के भागदौड़ की ज़िन्दगी, मस्त खिलख...

"प्यारी माँ "

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सुप्रभात साथियों! माँ शब्द तो कितना प्यारा है! क्या कोई शब्द उसे बयां करने में समर्थ है? नहीं न वह तो अकथनीय है क्या कहूँ कैसे उसका सीमांकन किया जा सकता है यह तो मन- मस्तिष्क के परे है       आज अर्थात मई माह का प्रथम रविवार यूरोपियन संस्कृति से खिसकते हुए भारतीय संस्कृति में समाहित "मातृत्व-दिवस" के रूप में मनाया जा रहा है,पर क्या यह एक दिन का मुहताज है? नहीं ना,फिर भी परम्परा चल निकली है और चलती जा रही है। तो आज सकल विश्व को, इस महिमामयी "माँ" शब्द को निःसृत करने वाले को अनेकानेक हार्दिक शुभकामनाएँ!       माँ तो माँ होती है, उसका नहीं है कोई सानी। वह तो एक अनुभूति है,हरदम उर में बसी रहती है, जो बन गया वही है जाने, जिसने बनाया वही है मानी। इस एक वर्ण के शब्द में समाहित हो जाती सारी दुनिया। ममत्व और वात्सल्य से आभूषित हैं सारे चर जीव जगत। कितनी भाव संवेदना से लबालब भरा हुआ है कितना निःस्वार्थ और निश्छल। पावनता की डोर है ऐसी जिसकी कहीं नहीं है तुलना। धन्यवाद!  राम राम जय श्रीराम! लेखिका- सुषमा श्रीवास्तव,रुद्रपुर, उत्तराखंड। मौलिक रचना,सर्वाधिकार...

"अंधविश्वास"

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कृपया अंधविश्वास धारा को अनदेखा कर आत्मा की ध्वनि पर आश्वस्त रह कर अपने कर्तव्य को परिपूर्ण करें।         अंधविश्वास में से अंध शब्द को काटकर केवल विश्वास के बल पर बढ़ते रहें वह कभी धोखा नहीं देगा परमात्मा पर भरोसा रखकर अंतरात्मा के साथ चलें।  आदिम मनुष्य अनेक क्रियाओं और घटनाओं के कारणों को नहीं जान पाता था। वह अज्ञानवश समझता था कि इनके पीछे कोई अदृश्य शक्ति है। वर्षा, बिजली, रोग, भूकंप, वृक्षपात, विपत्ति आदि अज्ञात तथा अज्ञेय देव, भूत, प्रेत और पिशाचों के प्रकोप के परिणाम माने जाते थे। ज्ञान का प्रकाश हो जाने पर भी ऐसे विचार विलीन नहीं हुए, प्रत्युत ये अंधविश्वास माने जाने लगे। आदिकाल में मनुष्य का क्रिया क्षेत्र संकुचित था इसलिए अंधविश्वासों की संख्या भी अल्प थी। ज्यों ज्यों मनुष्य की क्रियाओं का विस्तार हुआ त्यों-त्यों अंधविश्वासों का जाल भी फैलता गया और इनके अनेक भेद-प्रभेद हो गए। अंधविश्वास सार्वदेशिक और सार्वकालिक हैं। विज्ञान के प्रकाश में भी ये छिपे रहते हैं। अभी तक इनका सर्वथा उच्छेद नहीं हुआ है। मार्क्सवादी दृष्टिकोण में अंधविश्वास वह विचार पद्धत...

"माँ की ममता"

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माँ शब्द अपने आप में सारा जहाँ छुपाए हुए है। माँ का ममत्व अपनी संतान के लिए अच्छे से अच्छा और बुरे से बुरा कार्य करने  को तत्पर हो जाता है।उसका आँचल स्वयं को उघाड़ कर भी संतान को ढक लेना चाहता है।वह भी बिलकुल निःस्वार्थ भाव से। इसी तथ्य को सिद्ध करती कहानी मैं आप सबसे साझा कर रही हूँ।           रागिनी अपने ही धुन में जल्दी- जल्दी काम निपटाती जा रही थी और मन ही मन भविष्य की परिकल्पना में विचरती यूँ ही कुछ गुनगुनाती हुई तल्लीनता से भावनाओं के सागर में डूबती उतराती कब बिस्तर पर निद्रालीन हो गई उसे कुछ एहसास ही नहीं हुआ। अगले दिन रविवार था। सुबह पाँच बजे ही उसके नयन उन्मीलित हुए। उसने देखा- राघवेन्द्र और रौनक बड़े आराम से अभी सो रहे हैं। दोंनो की आज छुट्टी जो है। पर उसकी तो कोई छुट्टी होती नहीं, फिर भी वो इसी में प्रसन्नचित्त हर दिल अजीज है। प्रसन्नता पूर्वक उन चार लोगों का परिवार खुशी-खुशी  जीवन को गतिमान किए हुए था। अचानक रागिनी की सास जो बहू को बेटी का मान देतीं थीं, का देहावसान हो गया।  रागिनी स्वयं को बहुत अकेला महसूस करने लगी। जबकि वह जन्म ...