"प्यारी माँ "

सुप्रभात साथियों!
माँ शब्द तो कितना प्यारा है! क्या कोई शब्द उसे बयां करने में समर्थ है? नहीं न वह तो अकथनीय है क्या कहूँ कैसे उसका सीमांकन किया जा सकता है यह तो मन- मस्तिष्क के परे है
      आज अर्थात मई माह का प्रथम रविवार यूरोपियन संस्कृति से खिसकते हुए भारतीय संस्कृति में समाहित "मातृत्व-दिवस" के रूप में मनाया जा रहा है,पर क्या यह एक दिन का मुहताज है? नहीं ना,फिर भी परम्परा चल निकली है और चलती जा रही है। तो आज सकल विश्व को, इस महिमामयी "माँ" शब्द को निःसृत करने वाले को अनेकानेक हार्दिक शुभकामनाएँ!
      माँ तो माँ होती है, उसका नहीं है कोई सानी। वह तो एक अनुभूति है,हरदम उर में बसी रहती है, जो बन गया वही है जाने, जिसने बनाया वही है मानी। इस एक वर्ण के शब्द में समाहित हो जाती सारी दुनिया। ममत्व और वात्सल्य से आभूषित हैं सारे चर जीव जगत। कितनी भाव संवेदना से लबालब भरा हुआ है कितना निःस्वार्थ और निश्छल। पावनता की डोर है ऐसी जिसकी कहीं नहीं है तुलना।
धन्यवाद! 
राम राम जय श्रीराम!
लेखिका- सुषमा श्रीवास्तव,रुद्रपुर, उत्तराखंड।
मौलिक रचना,सर्वाधिकार सुरक्षित

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