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"नया अवसर"

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'विचार'         कहते ही नहीं अपितु अकाट्य सत्य हैे कि गया वक्त वापस नहीं मिलता किंतु प्रत्येक मंजिल के लिए एक नया अवसर अवश्य मिलता है।उसका भरपूर लाभ उठाइये। निष्ठा, विश्वास एवं अनवरत बिना परिणाम की फिक्र किए लगे रहिए एक न एक दिन मंजिल आपके कदमों तले होगी। यह भी पूर्णतः निश्चित है। धन्यवाद! राम राम जय श्रीराम! द्वारा - सुषमा श्रीवास्तव,मौलिक विचार, सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड।

विचार

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जब आपको लगे की आप अकेले पढ़ गये हो, आपके पक्ष में कोई भी नहीं है तो तब समझ जाना की जिन्दगी आपको जीना सिखा रही है। और जिन्दगी से सिखने का यह अवसर कभी नज़रंदाज़ न करना। जिन्दगी कभी न कभी तो इंसान को इस मोड़ पर लातीं ही है। इन हालातो का डट कर सामना करे। इन हालातो में आपको बहुत कुछ सिखने को मिलेगा। और सारी दुनिया आपके विरुद्ध होगी। तभी तो आपको अपनी जीत का असली आनंद प्राप्त होगा।                 आरती सिरसाट

घमंड पर अनमोल विचार

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1. घमंड न करना जिंदगी में तक़दीर बदलती रहती है, शीशा वही रहता है बस तस्वीर बदलती रहती है। 2. अपनी उम्र और पैसों पर कभी घमंड मत करना क्योंकि जो चीजें गिनी जा सके वो यकीनन खत्म हो जाती है। 3. घमंड शराब जैसा होता है, खुद को छोड़कर सबको पता चलता है की इसको चढ़ गयी है। 4. जन्म दुसरे ने दिया, नाम दुसरे ने दिया, शिक्षा दुसरे ने दी, रिश्ता भी दुसरे से जुड़ा, काम करना भी दुसरे ने सिखाया, अंत में शमशान भी दुसरे ले जायेंगे। तुम्हारा इस संसार में है क्या जिसका तुम घमंड करते हो। 5. दो तरह से देखने से चीजें छोटी नजर आती है, एक दूर से और एक गुरूर से। 6. आपको जो कुछ मिला है उसका घमंड मत करो, घमंड और ईर्ष्या करने वाले लोगों को कभी मन की शांति नहीं मिलती। 7. घमंड आपको यह महसूस नहीं होने देता की आप गलत हो। 8. जिंदगी में कभी भी अपने किसी हुनर पर घमंड मत करना क्योंकि पत्थर जब पानी में गिरता है तो अपने ही वजन से डूब जाता है। 9. घमंड और अहंकार की वजह से इन्सान खुद ही अपने रिश्तों को बिगाड़ लेता है। 10. हाथ ठण्ड में और दिमाग धमंड में काम नहीं करते। 11. कभी भी अपनी शोहरत पर घमंड मत करना, जीतने वाला भी अपना ...

कर्म -फल

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कर्म  पुण्यफल के रूप में भी संचित होता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं।  "या कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन " यानि हमें अपना कर्म करना चाहिए फल की चिंता त्याग देनी चाहिए। लेकिन कर्म फल भी संचित होता है, इसका एक उद्धरण महाभारत की कथा में मिलती है। जब अश्वत्थामा अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर देता है फलस्वरूप एक मृत शिशु का जन्म होता है। श्रीकृष्ण को जब इस बात का पता चलता है तो अपने सभी पुण्यकर्म का फल  उस मृत शिशु को दे देते हैं, फलस्वरुप वह शिशु  जीवित हो जाता है। यानि कर्म के फल संचित होते है। तब से आज तक माताएं अपने बच्चों के लम्बी उम्र के लिए जीवितपुत्रिका व्रत करती हैँ। यह व्रत बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश में माएं अपने बच्चों के लिए अन्न और जल का त्याग करके करती हैं।अश्वत्थामा को आज तक अपने बुरे कर्म का फल मिल रहा है।                                                   ...