Posts

Showing posts with the label Pinki Mishra

सुना है तुम्हारा शहर आज कल

Image
सुना है तुम्हारा शहर आज कल ,हर दिन थोड़ा संवरने लगा है। झिलमिल सितारों की  झालर लगी है, चांद ज़मीं पर उतरने लगा है। नये बाग,उद्यान कुछ पंछी नए हैं, क्या गुलमोहर के वह पेड़ लगे हैं ? उकेरा था कभी जिसपर नाम मेरा, क्या नाम मेरा अब भरने लगा है । सुना है............ आ ही जाऊंगी शहर में कभी बनकर मुसाफिर , क्या तू मुझे पहचान लेगा  या मेरे आने खबर सुनकर , जमाने भर की रूस्वाई से डरने लगा है । सुना है......….. मेरी यादों को कहीं दफनाया तो होगा, गैरों में मुझे भी बताया तो होगा। मैं न जी पा रहीं हूं तेरी याद में, तू किसी और पर अब तो मरने लगा है। सुना है........ ‌ तुझे छू कर आई पुरवइया ने चुमा, गुजरे जमाने में फिर  दिल ये झूमा । एक सिहरन उठी है मेरे तन बदन में,गजरा जुड़े का मेरे बिखरने लगा है। सुना है........ आसान नहीं होता है जिस्म ढोना,जान किसी और के पास होना सोचती हूं कभी मैं भुला दूं जमाना ,मन मेरा बगावत करने लगा है। सुना है......... स्वरचित ; पिंकी मिश्रा...✍️ भागलपुर बिहार।

हे भरत वंश के कुलदीपक

Image
पथ  के  पत्थर  फूल  बनेंगे, तू न डर पांव  के  छालों  से काली   रातों   में  चलना  सीख, तपना  सीख  उजालों से  जीवन  समर  में  मंजिल  तक  ,बिना  थके  चलना  होगा हे भरत वंश के कुलदीपक,तिमिर मिटाने को जलना होगा। फूटे  तो  वंश - बेल  कई ,  सब  कुलभूषण  न  बन  पाए  मातृभूमि  की  रज  के खातिर, दुश्मन के आगे न तन पाए बेच  दिया  ईमान को कुछ ने , कुछ  घर के  भेदी  बने  रहे  जब चक्रव्यूह रचा हो अपनों ने ,षड्यंत्रों से संभलना होगा हे भरत वंश.......... कितने जयचंद , विभीषण  को  घर  में  हमने  पाला  है उग्रवादी,नक्सलवादी, आतंकवादियों से  देश संभाला है  बहुत सह चुके खून-खराबा,पत्थरबाजी,मनमानी सबकी शस्त्र उठाकर ऐसे दुश्मन पर, तुम्हें इतिहास बदलना होगा हे भरत वंश............ शितलता तुझ में चांद सी हो , सौर्य सूर्य सा मिले तुझे ह्रदय  तेरा  अंब...

मां तेरा न होना बहुत अखरता है

Image
जीवन के किरदार है जितने हंस कर उन्हें निभाती हूं, मुझ में मेरा जरा सा होना , बहुत अखरता है । जब्त कभी कर जाती थी बहते आंसू, सिसकी को , फफक-फफक कर मेरा रोना , बहुत अखरता है । देख रही थी दर्पण में,बाहर कुछ खास नहीं बदला  भीतर भीतर कुछ टूट गया लाख संभाले नहीं संभला जब तीर चुभे विष वाणों के, घाव बहुत गहरे देते हैं धीरे धीरे खुद को खोना, बहुत अखरता है । बदला मैंने खुद को इतना ,मैं मेरे जैसी न रह पाई बंधे बांध कुछ ऐसे रिश्तों के,सरिता बन न बह पाई दफन किए अरमान सभी ,दम तोड़ रहे मेरे संग में कांधे पर अपना शव ढोना , बहुत अखरता है। तुम जैसा इस  धरती  पर,  मां  अब कौन  दुलारेगा कौन पढ़ेगा आंखों की उदासी, नजर कौन उतारेगा मतलब के सब रिश्ते नाते , मतलब की दुनियादारी जीवन के पतझड़ में तेरा न होना, बहुत अखरता है। स्वरचित : पिंकी मिश्रा भागलपुर बिहार।

उतरकर हिमालय की गोदी से

Image
उतरकर हिमालय की गोदी से ,जब धरती पर आती हूं गले लगा कर सभी बाधाओं को , स्वयं रास्ता बनाती हूं  ऐसे  तो  रूप  हैं  कितने   मेरे  , इस  सृष्टि  में   वर्णित जीवन संघर्ष के इस रूप में ,बहती सरिता कहलाती हूं । वनवास के  चौदह  वर्ष ही  तो , रघुनंदन  ने  है  देखा उर्मिला -लक्ष्मण के हिस्से में यही , विरह  की है  रेखा रघुवंश के सिंहासन को मिल गया, राजा राम सा सेवक ताउम्र  वन में  सहती  हुई  पीड़ा , मैं सीता कहलाती हूं । रहती हूं पाषाण हृदय में भी , बहुत कोमल हृदय लेकर सिंचित करती आई हूं सृष्टि को,  दृग् झरते मोती  देकर छली भी जाती हूं  मैं  ही , होती  शापित शीला  बनती नारायण मोक्ष देते  हैं तब ही तो अमिता कहलाती हूं । जब भटकता है मनुज जग में,बहुत विचलित हृदय लेकर किया है शांत मैंने ही , प्रेम,  स्नेह सुधा , संजीवनी देकर कभी बनी काली  , कभी दुर्गा ,  कभी है रूप लक्ष्मी का  समर्पित है जीवन कर्तव्य पथ मेरा,मैं उपकारि...

गज़ल

Image
हर शब के हिस्से  सहर  नहीं  होता घुट जाता दम जो शजर नहीं  होता  पाक दिल  की  दुआ कबूल होती  है कातिलों की दुआ में असर नहीं होता बेचकर  वो  ईमान  रईस  हो  गया  है अब अपनों में उसका बसर नहीं होता दीवारों  दरख़्त  को  सब घर  कह रहे लगता  है  गांव जैसा शहर नहीं  होता नजर  लग  जाती  है  जमाने  की   उसे जिसके हिस्से प्यार भरा पहर नहीं होता दुश्मन  यूं  ही  नहीं   जीत   पाता   उसे अगर अपनों के हाथ खंजर नहीं होता युद्ध  होता  कभी  कलम का कलम  से तब तो ऐसा  भयावह मंजर  नहीं  होता स्वरचित : पिंकी मिश्रा भागलपुर बिहार ।

भगवान परशुराम

Image
ऋषि जमदग्नि की कुटिया में बजी बधाई धन्य भाग्य नारायण की नजर उतारे  रेणुका माई सुशोभित है भृगु वंश के कुलदीपक बन  स्वस्ति वाचन करें सब ऋषि गण दश दिगपाल स्वागत में खड़े हैं चौंसठ योगिनी गाए मंगल गान छठे अवतार हैं नारायण के धरा पर देख बाल रूप में अति मन भाए ॠषि................. एक हस्त में शास्त्र को धारा दूजे हस्त में शस्त्र संभाला शस्त्र,शास्त्र की दीक्षा लेकर शिव धनुष  परशु धारण कर परशुराम कहलाए ! ॠषि.............   धरकर रूप काल भैरव का जब बाह्मण ने हुंकार भरा धर्म की रक्षा के खातिर सहस्त्रबाहु  का संहार करा त्रेता युग से द्वापर युग तक राम कृष्ण का साथ निभाए ! ॠषि.............. स्वरचित : पिंकी मिश्रा भागलपुर बिहार

मजदूर

Image
पेट की आग बुझाने की खातिर हम बहुत मजबूर हैं हमारा भी आत्मसम्मान है साहब ! क्या हुआ जो हम मजदूर हैं । हमारी फटी साड़ी से झांकते यौवन पर फब्तियां कसने वालों पीठ पर बंधे बच्चे की चीख पर हंसने वालो यह न भूलो कि हमारी मेहनत से कितने शहर मशहूर हैं हमारा भी आत्मसम्मान है साहब! क्या हुआ जो हम मजदूर हैं! दो कौड़ी फेंककर हमारी आबरू खरीदना चाहते हो करके गंदे इशारे हमारे सब्र को थाहते  हो जैसी होती हैं तुम्हारे महल में रानियां हम भी अपनी झोपड़ी का गुरूर हैं हमारा भी आत्मसम्मान है साहब क्या हुआ जो हम मजदूर हैं व। तुम जला देते हो झोपड़िया अपनी रोटी सेकने के लिए हम तुम्हारे महल में काम करके अपना चूल्हा जलाते हैं लगाए गए हैं कुछ इल्जाम हम पर, कैसे बताएं कि हम बेकसूर हैं हमारा भी आत्मसम्मान है साहब! क्या हुआ जो हम मजदूर हैं। स्वरचित : पिंकी मिश्रा भागलपुर बिहार ।

सशक्त औरत

Image
जब्त कर जाती थी  वह औरत ! टूटी हुई भावनाओं से  निकली आह को , आंखों से बहते आंसुओं को , न रुकने वाली सिसकियों को, और लग जाती थी  फिर से सब की सेवा में , एक दिन उठाकर पेंसिल उकेर देती है अपनी  टूटी हुई भावनाओं को  कागज पर , भर देती है उसमें अधूरे ख्वाब के रंग, लगा देती है प्राइस टैग, डाल देती है अपने  सोशल मीडिया अकाउंट पर, कुछ ही घंटों में हजारों लाइक कमेंट आते हैं, और कुछ खरीदार भी , बेच देती है वह अपने अंदर के आक्रोश को  मुंह मांगे दाम में और एक दिन बन जाती है  बेचकर अपनी पीड़ा आत्मनिर्भर और सशक्त औरत । स्वरचित : पिंकी मिश्रा भागलपुर बिहार ।

होली गीत

Image
इस वर्ष दिल से होली मनाने का मन है। मन में बैठी होलिका को जलाने मन है ।। इस......... सुना  है  प्रेम  का रंग होता है गहरा प्रीत में पिया के डुब जाने का मन है । इस....... यूं रस्म अदायगी के लिए अब मिलना नहीं  भूल शिकवे गिले गले लगाने का मन है । इस........... छेड़ दो फाग फिर से वही गांव वाली सखियों के संग गुनगुनाने का मन है । इस............ भूल जाना मैं चाहूं दुनिया दारी की बातें मां के आंचल में बचपन बिताने का मन है। इस......... बहुत उलझा हुआ ताना-बाना है मन का मुस्कुराकर खुद को  सुलझाने का मन है । इस.......... स्वरचित: पिंकी मिश्रा भागलपुर बिहार ।

मेरे जीवन साथी

Image
मेरी चूड़ी, बिंदी, सिंदूर में ही बस तुम नजर न आना । मेरे जीवन साथी हर मुश्किल में साथ निभाना । जब माहवारी की पीड़ा में मैं तड़प उठूंगी रात रात भर । मेरी हिम्मत तुम बन जाना ,सहज मुझे महसूस कराना । मेरे जीवनसाथी......... छोड़ के घर अपना आई हूं, तेरे घर को अपनाया है । तुम जैसा बनते बनते थोड़ा वक्त लगे तो, मुझ पर न झुंझलाना । मेरे जीवनसाथी........ स्वप्न बहुत हैं मेरे अधूरे, तुमको खबर मिली होगी । कभी करो जब उनको पूरे, एहसान नहीं जताना । मेरे जीवनसाथी............ मैं तुझमें वह साथी ढूंढ रही हूं ,   भेद जिसे मैं बता सकूं । भेद खोल दूं जब अपने तब, शासक मत बन जाना । मेरे जीवनसाथी.......... नहीं मांगती हीरे मोती, न गहनों का शौक मुझे । बस मान मेरा तुम रख लेना , अपमानित न कर जाना । मेरे जीवनसाथी............... स्वरचित : पिंकी मिश्रा भागलपुर बिहार ।

मैं गांव हूं

Image
जीवन पथ पर थके पथिक की , दुपहरी की ठांव हूं! शोर नहीं हूं शहर का मैं , तो सीधा-साधा गांव हूं !! सतरंगी फूलों की  खुश्बू , भरकर अपनी सांसों में, रजनीगंधा बनके महकता हूं , विरानी सी रातों में  अमलतास के गुण हैं मुझमें, गुलमोहर की छांव हूं । शोर नहीं.............. तूफानों से लड़कर लौटा ,सागर की गहराई नापी है हौसला ही मुश्किलों में , एकलौता हमारा साथी है मैं साध गया बाधाओं को, साहिल पर पहुंची नाव हूं । शोर नहीं .............. मेरी गलियों में बचपन अपना ,अब भी तुम पाओगे पगडंडी पर पदचिन्ह मिलेगा, जब भी वापस आओगे मैं सिर का ताज नहीं हूं तेरे , धरती पर टिकता पाव हूं । शोर नहीं............. स्वरचित : पिंकी मिश्रा भागलपुर बिहार।

आखरी खत

Image
एक आखरी खत मैं तुम्हारे नाम लिखती हूं । दिल के अधूरे सभी अरमान लिखती हूं । लिखती हूं दो दशक की वीरान काली रातें । दिन के उजाले को बहुत सुनसान लिखती हूं।। एक........ समझ आया नहीं अब तक मोहब्बत हो गई कैसे । उस पल को जिंदगी का तूफान लिखती हूं ।। एक................ इबादत में तुम ही तुम हो तुम्हारे बिन कहां सांसे । जाने क्यों मैं तुमको ही चारों धाम लिखती हूं ।। एक.............. स्वरचित : पिंकी मिश्रा भागलपुर बिहार।

गूं आवाज देकर बुलाया न कर

Image
इस तरह खयालों में आया न कर करवटों में रात भर जगाया न कर जिस्म  उतार  कर  चली  आऊंगी यूं आवाज  देकर  बुलाया  न  कर । अलसाइ सुबह  सवाल  करती है ख्वाब  न आए मलाल  करती  है भूलकर जमाना  नाम  तेरा  लूंगी यूं  मेरे  सब्र  आजमाया  न कर । जिस्म.......…...... उतना ही तूफान समेटे हूं दामन में जितना सुकून दिखता है जीवन में टूट  जाए  न  बांध  पलकों  का  यूं याद मांजी कि दिलाया न कर । जिस्म.....…........ क्या  होता  है  टूट  कर  बिखरना कतरा - कतरा  खुदकुशी  करना तुम्हें  खोकर  जाना  है  मैंने  भी यूं  दास्तां अपनी  सुनाया न कर । जिस्म............. स्वरचित : पिंकी मिश्रा भागलपुर बिहार ।

इम्तिहान

Image
कुछ  इम्तिहान  देकर  ही  थक  गए तुम, अभी तो जिंदगी के कई इंतिहान बाकी है । कट भी जाए तुम्हारे पंख तो गम न करना, अभी   हौसलों   की   उड़ान   बाकी   है । तुम्हें जानते हैं लोग यह बात कम नहीं है, अभी तो कुछ अपनों की पहचान बाकी है। बदलते वक्त ने उतार दिया अपनो के मुखौटे, अभी   दिल  में   कुछ   मेहमान   बाकी   है। सांसों से जंग जारी है बस इतनी सी बात पर, अभी   उतारना   कुछ   एहसान   बाकी   है । करना है सफर तय जिंदगी का कुछ और दिन अभी   तो  मौत   का   फरमान   बाकी   है। स्वरचित: पिंकी मिश्रा भागलपुर बिहार ।

आशा के दीप जलाएंगे

Image
धैर्य,संयम रूपि हथियार से महामारी को हराएंगे। हर  घर  के  आंगन  में  आशा  के  दीप जलाएंगे।। दो गज दूरी, मास्क जरूरी सारे नियम को जानेंगे  फिर  भी गैरों  को  विपदा  में  हम अपना  मानेंगे स्वयं की रक्षा करते हुए ,सबको  मदद पहुंचाएंगे। हर घर  के  आंगन  में ,आशा  के  दीप जलाएंगे।। हो रोटी घर जिसके ज्यादा, दूजे की मदद कर दे विपदा में मिले मदद  सभी को, ऐसा  अवसर  दे मानव  हैं  हम मानवता  का हर  फर्ज  निभाएंगे। हर घर  के  आंगन  में ,आशा  के  दीप  जलाएंगे।। काली रात लंबी हो कितनी, सूरज को निकलना है अंधियारे पथ पर हम सबको ,जुगनू बन चलना  है मिलकर तूफान से कश्ती को, साहिल पर लाएंगे । हर  घर  के आंगन  में ,आशा  के  दीप  जलाएंगे।। स्वरचित : पिंकी मिश्रा भागलपुर बिहार ।

गजल

Image
आप जब भी कोई फैसला कीजिए आईने   से   पहले  वफा   कीजिए हक जमाने  में कोई  भी  देता  नहीं हक    जिंदगी   का   अदा  कीजिए आप तब तक भले हैं जब तक हैं चुप बोल  कर   कभी   आजमा   लीजिए उंगलियां  भी  थप्पड़  बनकर लगेगी भ्रम  को  हकीकत से  मिला  दीजिए दुश्मन   जमाने  का   बनना  है  तय बस  सोए   हुए   को   जगा   दीजिए स्वरचित : .... पिंकी मिश्रा  भागलपुर बिहार ।

ऐ जिंदगी तुमसे निभाना आ गया

Image
पीकर  आंसू  मुस्कुराना  आ गया । ऐ जिंदगी तुमसे निभाना आ गया ।। चुभने लगे थे फूल सारे जिंदगी के होंठ  भी  जलने  लगे  थे  हंसी से कर लिया कांटों  से  हमने  दोस्ती दर्द  अब  सहना  छुपाना  आ गया ।१। ऐ जिन्दगी................... गैरों के सितम का  क्या करूं उनसे  गिला गहरे जख्म का खंजर तो अपनों के हाथ था मौन  रहकर   सह  गई  मैं  वार  सारे हर  वार  से खुद  को  बचाना  आ  गया ।२। ऐ जिंदगी............... मुस्कुरा  कर   दुश्मनों    से   मिलने    लगी जख्म अपने कुछ  इस तरह   सिलने  लगी आजकल देख  कर  मुझे   लोग   हैरान  है अब  चेहरे पर चेहरा  लगाना  आ  गया ।३। ऐ जिंदगी.................. स्वरचित : पिंकी मिश्रा भागलपुर बिहार ।

आत्म सम्मान

Image
संबंधों  के  षडयंत्रों  से  कब  कौन यहां  बचा  है। इतिहास गवाह है चक्रव्यूह अपनों ने सदा रचा है। भरी सभा में कुल वधू तब ही अपमानित होती है। जब भीष्म प्रतिज्ञा लेने वालों ने भी मौन रखा है । बन बैठे अर्जुन के सारथी कुरूक्षेत्र में  नटवर , विचारो क्यों मुरलीधर ने गीता का पाठ पढ़ा है । सूरज की आभा को ,बादल जब भी ढंकना चाहे, बनकर बूंदे आसमान से, धरा पर आकर गिरा है । विनय की भाषा समझने वाले सभी कहां होते हैं , सत्तांध मूढ़ अभिमानी को शास्त्र पढ़ाना विथा है । .…... स्वरचित : पिंकी मिश्रा भागलपुर ( बिहार )

तुम चले आओ

Image
अधूरे हैं तेरे वादे निभाने तुम चले आओ ..... मैं हूं तेरी जमाने को बताने तुम चले आओ..... तुम्हारा नाम ले लेकर जपूं मैं प्रेम की माला..… अंतिम घड़ी मुझको लिवाने तुम चले आओ..... बेसुध पड़ी कब से तेरी चरणों में ओ गिरधर .... हो जाए धन्य जीवन उठाने तुम चले आओ.... नहीं मैं राजरानी हूं मैं तो हूं बस तेरी राधा..... बजाकर बंसी फिर से रिझाने तुम चले आओ..... नयन में नीर भर कर तेरा मैं रास्ता देखूं ...... व्याकुल मन को धीर धराने तुम चले आओ..... स्वरचित : ....... पिंकी मिश्रा भागलपुर बिहार ।

सवाल

Image
मेरी इस कविता में एक छोटी बहन अपने बड़े भाई से प्रश्न कर रही है माता पिता के तलाक के बाद क्या क्या होगा ?   लग गई मोहर अदालत की , क्या सब कुछ दो हिस्सों में बंटना है ? क्यों दिल के दो टुकड़े में भैया, अलग-अलग हमें अंटना है ? न जाने किसके हिस्से में , किसका प्यार आएगा......... आकर गले लगा लो भैया, फिर  यह साथ न मिल पाएगा...... किसी के हिस्से मम्मी की लोरी, कोई पापा का कांधा पाएगा..... क्या हम दोनों का साथ भी भैया,टूटे रिश्ते संग छूट जाएगा ? हम दोनों ने क्या गलती की जिसकी सजा हमें मिलनी है.... जब पापा मम्मी समझ न पाए दूजा हमे कौन समझ पाएगा.... अभी हाथ पकड़ कर चल लो भैया ,फिर  यह हाथ न मिल पाएगा....... आकर गले लगा लो भैया, फिर यह साथ न मिल पाएगा....... अब तुम कभी नहीं रूठना भैया , मम्मी मनाने नहीं जाएगी ...... तेरी छोटी बहना भी , कहां पापा की झप्पी पाएगी ..... होकर बड़े तुम मिलने आना, छोटी बहन को भूल न जाना..... राखी वाले दिन भैया तू कितना ज्यादा याद आएगा ...... आकर गले लगा लो भैया फिर यह साथ न मिल पाएगा...... स्वरचित : पिंकी मिश्रा भागलपुर बिहार ।