वो घूरती आँखें
रात के लगभग ८ बज चुके थे, ऑटो में बैठी प्रीती के चेहरे पर चिंता और बेचैनी साफ झलक रही थी। शाम ७ बजे की अमृतसर एक्सप्रेस देहरादून से निकल चुकी थी, अब अगली ट्रेन काठगोदाम एक्सप्रेस रात में साढ़े ग्यारह बजे थी। वो सुबह ५ बजे घर से निकली थी, माँ के हाथ से बने हुए पराठे उसने दोपहर में खा लिए थे। अंजान शहर में उसे दुकान से पानी खरीदने में भी डर लग रहा था। वो घर से पानी की बोतल बैग में डाल कर चली थी, उसी से थोड़ा-थोड़ा पानी पी कर काम चला रही थी। "मैडम जी, रेलवे स्टेशन आ गया" "लीजिए भैया" प्रीती ने अपने पर्स से पैसे निकाल कर ऑटो वाले को किराया दे दिया। स्टेशन पर रात के लगभग ८:१५ पर एक अकेली लड़की को ऑटो से उतरते देख, स्टेशन के बाहर खड़े कुछ मनचलों, अराजक तत्वों की बाछें खिल गयी, वो सब प्रीती को खा जाने वाली नज़रों से देखने लगे। स्टेशन के बाहर का ये माहौल देखकर प्रीती के हाथ-पैर कांपने लगे, उसे स्टेशन के अन्दर जाने में डर सा लगने लगा लेकिन इतनी रात को स्टेशन के बाहर रुकना भी सुरक्षित नहीं था। प्रीती डरते-डरते स्टेशन की तरफ बढ़ने लगी, जैसे ही वो उन दुकानों के पास से गुज़री, ...