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Showing posts with the label Avnesh Kumar Goswami

वो घूरती आँखें

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रात के लगभग ८ बज चुके थे, ऑटो में बैठी प्रीती के चेहरे पर चिंता और बेचैनी साफ झलक रही थी। शाम ७ बजे की अमृतसर एक्सप्रेस देहरादून से निकल चुकी थी, अब अगली ट्रेन काठगोदाम एक्सप्रेस रात में साढ़े ग्यारह बजे  थी। वो सुबह ५ बजे घर से निकली थी, माँ के हाथ से बने हुए पराठे उसने दोपहर में खा लिए थे। अंजान शहर में उसे दुकान से पानी खरीदने में भी डर लग रहा था। वो घर से पानी की बोतल बैग में डाल कर चली थी, उसी से थोड़ा-थोड़ा पानी पी कर काम चला रही थी। "मैडम जी, रेलवे स्टेशन आ गया" "लीजिए भैया" प्रीती ने अपने पर्स से पैसे निकाल कर ऑटो वाले को किराया दे दिया। स्टेशन पर रात के लगभग ८:१५ पर एक अकेली लड़की को ऑटो से उतरते देख, स्टेशन के बाहर खड़े कुछ मनचलों, अराजक तत्वों की बाछें खिल गयी, वो सब प्रीती को खा जाने वाली नज़रों से देखने लगे। स्टेशन के बाहर का ये माहौल देखकर प्रीती के हाथ-पैर कांपने लगे, उसे स्टेशन के अन्दर जाने में डर सा लगने लगा लेकिन इतनी रात को स्टेशन के बाहर रुकना भी सुरक्षित नहीं था। प्रीती डरते-डरते स्टेशन की तरफ बढ़ने लगी, जैसे ही वो उन दुकानों के पास से गुज़री, ...

आँधियाँ

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तेरी जफ़ाओं को क्यूँ ना, मैं आज हाँ कह दूँ  क़ुबूल है मुझे दर्द-ए-जिगर, मैं आज हाँ कह दूँ ✍️ मेरे हौसलों को क्या तोडेंगी ये आँधियाँ टकराना है मुझे इन तूफानों से, मैं आज हाँ कह दूँ ✍️ रोशनी के लिए बस एक चराग़ है काफी मिटाना है ज़ुल्मतों का वजूद, मैं आज हाँ कह दूँ ✍️ मुश्क़िलों को शौक़ में शामिल सा कर लिया मुझे लड़नी है जिंदगी से जंग, मैं आज हाँ कह दूँ ✍️ देर से ही सही देखना पीछे एक काफ़िला होगा मुझे थकना है बस मंजिलें पाके, मैं आज हाँ कह दूँ ✍️ रचनाकार - अवनेश कुमार गोस्वामी

साज़िशें

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तुझमें और मुझमें फ़कत ये फर्क है काफ़ी हम सिर्फ़ शिकायत, तुम रोज़ साजिशें करते हो सुना है आजमाने से भरोसा टूट जाता है हम यकीं हर बार, तुम रोज़ अजमाइशें करते हो ख़्वाहिशों को किसी की कहाँ सुकूँ आया है संभालें कैसे मुफ़लिसी, तुम रोज फ़रमाइशें करते हो दिल के जज़्बातों को छुपा के रखना है बेहतर हमें है डर तेरी रुसबाई का, तुम रोज़ नुमाइशें करते हो रचनाकार - अवनेश कुमार गोस्वामी

इश्क़ या अखाड़ा

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लफ़्ज मिलते ही नहीं कैसे मैं बयाँ करूँ तेरी बेरुखी इस कदर उतरी ज़ेहन में मेरे ✍️ कभी तू सोचना हया की पाकीज़गी को कितनी बेहयाई छुपी है पाक़ दामन में तेरे ✍️ महफ़िल में तुम्हारी नज़रें रोज चार होती हैं नुमाईश हो रही है हुस्न की चिलमन से तेरे ✍️ कुछ तो कहो तुम आके अपनी सफाई में कटते ही नहीं दिन-रात इसी उलझन में मेरे ✍️ अखाड़े के जैसी हो गयी ये इश्क़ की बाज़ी सब देखते हैं तन कोई पढ़ता नहीं मन को मेरे✍️ रचनाकार - अवनेश कुमार गोस्वामी

सरहदों पर सिसकती जिंदगी

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"रोटी, कपड़ा और मकान" एक आदमी की पूरी ज़िंदगी इन तीन चीजों को हासिल करने में निकल जाती है, चाहे वो जरूरत से जुड़ी हो या शानोशौकत से। वो दिन-रात आने वाले भविष्य को लेकर सुन्दर सपने संजो कर रखता है फिर एक दिन अचानक उसके घर, उसके परिवार, उसके शहर, उसके सपनों पर गोलियां, बम बरसने शुरू हो जाते हैं। सदियों से मानवता युद्ध पर आँसू बहाती आ रही है, हर युद्ध में ये तो तय है कि मरना तो सिर्फ मानवता को ही है। आज का स्वार्थी, धूर्त मनुष्य, मनुष्यों को स्वयं की सुरक्षा के नाम पर मार रहा है, धिक्कार है ऐसी सुरक्षात्मक सोच का जो इतनी वीभत्स है। आज जेहन में बस एक ही सवाल आज रहा है कि स्वयं को मजबूत करने के लिए दूसरे को कमजोर कर देना, दूसरे के अस्तित्व को मिटा देना कहाँ तक उचित है। आखिर युद्ध क्यों ? तूने फिर से इस जंग को जायज़ बता दिया    पर उनका क्या जो सोते ही नहीं मरने के डर से। जला के हस्ती उसकी उसे लावारिस बता दिया    पर उसका क्या जो धुँआ निकला जलते हुए घर से।। "सभी लोगों को चेतावनी दी जाती है, सभी लोग अपनी-अपनी जरूरतों का सामान लेकर २ घण्टे में शहर को खाली कर दें, दुश्मन से...

नारी लाचार क्यों है

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स्वेत वर्ण में लिपटी खामोश सी जिंदगी अबला, नारी, स्त्री सदा से ही हाशिये पर क्यूँ है ? अस्तित्व पर इसके होते हैं रोज ही हमले शक्ति का प्रतीक जो वो इतनी लाचार पर क्यूँ है ? कोई वस्तु, वो नहीं कोई भोज की थाली काम से भीगी नज़र नियत इतनी बीमार पर क्यूँ है ? ख़ुद की हदों को नित् लांगते समाज के सेवक परदों इसको रखने की कोशिश हर बार पर क्यूँ है ? खोखले रिवाज़ों ने छीन ली कोयल सी सदा इस दहलीज की चौखट एक क़ैदखाने सी पर क्यूँ है ? तुम सोच बदलो, फिर बदलाव हो संसार में जगत-जननी हृदय में इतनी कुंठा निराधार पर क्यूँ है ? रचनाकार - अवनेश कुमार गोस्वामी

ग़मों से समझौता कर लेते हैं

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चलो आज दुश्मनों से दोस्ताना कर लेते हैं छोड़ ख़ुशियों की ख्वाहिशें ग़मों से समझौता कर लेते हैं उड़ने दो आज हर आँचल इन हवाओं में  आंधियों से कैसा डर चलो तूफां से समझौता कर लेते हैं गलियों में सिसकते हैं कई बच्चे भूख से देखो चलो तक़दीर को छोड़ो अब रोटी से समझौता कर लेते हैं कई दिनों से उंसने भेजी नहीं खबर भी अपनी इन हदों सरहदों की खातिर इक माँ से समझौता कर लेते हैं कई शिकायतें लिख रखी हैं मैंने तेरी अब तक मैं ग़ैर मुस्तहक़ ही सही आज हक़ से समझौता कर लेते हैं क्या-क्या साथ जाएगा सामां तुम जरा चुन लो चन्द लम्हों का सफ़र चलो मंज़िल से समझौता कर लेते हैं रचनाकार - अवनेश कुमार गोस्वामी

भाग्य - चक्र

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उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात में बसा एक छोटा सा गांव गोविंदपुर, गांव की आबादी लगभग २००० -२२०० लोगों के आसपास की होगी। यूँ तो गोविंदपुर में कई सारी जाति के लोग रहते हैं, पुराने लोग बताते चले आये हैं कि गोविंदपुर को गोविंद पाण्डेय नाम के एक पंडित ने लगभग ३५० -४०० साल पहले बसाया था, गोविंद पाण्डेय उस समय के बहुत ही प्रकांड और प्रसिद्ध ब्राह्मण थे, उनके पास वेदों और शास्त्रों का असीमित ज्ञान था, उनके ही नाम पर इस गांव का नाम गोविंदपुर पड़ गया। कई साल हो गए गोविंदपुर गांव ने कई पीढ़ियों को उठते, गिरते, संभलते और गाँव से निर्वासित हुए देखा है। जिन पाण्डेय ब्राह्मणों ने गोविंदपुर गाँव की नींव रखी थी, उनमें से ज्यादातर गांव से निर्वासित होकर कानपुर या लखनऊ में जाकर बस गए, अब मुश्किल से एक या दो पाण्डेय परिवार ही गोविंदपुर गाँव में बचे हैं, जिनकी भी माली हालत बहुत अच्छी नहीं है। इसी प्राचीन पाण्डेय परिवार से संबंध रखने वाले गांव में बेहद गरीब ब्राह्मण गोविंद भी रहते हैं, जिनके पिता ने अपने पूर्वजों की याद में इनका नाम भी गोविंद पाण्डेय रख दिया था, समय कैसे कैसे रंग दिखाता है इसका बहुत ब...

सहजीवन - बेहतर विकल्प

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इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, चाहे वह वानप्रस्थ जीवन जिये या गृहस्थ जीवन जिये। मनुष्य हमेशा समाज में सम्मान, प्रतिष्ठा और पद के स्वार्थ के वशीभूत रहता है, जिसको पाने लिए वो दिन रात मेहनत करता रहता है। आज का युवा वर्ग चाहे वो लड़का हो या लड़की, वो बन्धनों से मुक्त जीवन जीना चाहते हैं, वो खुद को किसी भी सामाजिक दायरे में बाँध कर रखना नहीं चाहते हैं। आज का युवा, विशेषतया जो महानगरों में जॉब कर रहे हैं, उनका रिश्तों के ऊपर से विश्वास धीरे-धीरे खत्म हो रहा है इसलिए लिए उनके आसपास घटित होने वाली घटनाएं और बदलती हुई जीवनशैली जिम्मेदार है। आज का युवा वर्ग सहजीवन को वरीयता दे, शादी जैसे पवित्र बन्धन में खुद को बाँधना नहीं चाह रहा, जिसके पीछे कई सामाजिक और मानसिक कारण हैं; भारतीय जीवन शैली पर पाश्चात्य सभ्यता का बढ़ता हुआ प्रभाव, सामाजिक रिश्तों में खत्म होता विश्वास और अपनत्व, निजता को वरीयता, सामाजिक रूढ़िवादिता, जातिवाद और दहेज़ रूपी कुप्रथा, खुद को आधुनिक दिखाने की चाह, मात्र शारीरिक संतुष्टि के लिए, उन्मुक्त जीवन शैली, जबावदेही और समर्पण का अभाव, युवाओं में खत्म...

प्राथमिक शिक्षा की स्मृति

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स्कूल के पहले दिन की स्मृति तो मष्तिष्क पटल पर अब शेष नहीं है लेकिन प्राथमिक विद्यालय के शुरूआती माहौल की कुछ धुँधली सी यादें अभी भी बची हुईं। ना जाने कितने सालों से इस विषय पर कभी विचार ही नहीं किया, आज फ़ुरसत में जिंदगी के उन गुज़रे लम्हों को फिर से जी लेने की ख्वाहिश जाग उठी। गाँव का वो प्राथमिक विद्यालय, जिस भवन को प्राथमिक विद्यालय में रूपांतरित कर दिया गया था, वो वास्तव में गांव के पंचायत घर की इमारत थी, अब ना तो कोई पंच परमेश्वर थे गाँव में और अब ना ही गाँव में कोई पंचायत होती थी, अब मामला या तो सीधा थाने में जाता था या अदालत में। प्राथमिक विद्यालय की ये पुरानी इमारत गाँव से थोड़ा सा बाहर की तरफ थी, चौकोर आकार का बड़ा सा खेलकूद का मैदान, जिसमें सबसे पहले सरकारी हैंडपंप लगा हुआ था, वैसे तो ये हैंडपंप स्कूल के बच्चों को पानी पीने के लिए लगा हुआ था लेकिन इसका मूलरुप उपयोग पड़ोस के घरों के पुरुषों के नहाने और उनके जानवरों को पानी पिलाने के लिए किया जाता था। विद्यालय का खेलकूद मैदान जो बच्चों के खेलने के लिए था, उस पर लगभग ८०℅ गाँव के लोगों ने अवैध कब्जा कर रखा था, जिसका उपयोग उन्...

मृत्युभोज - महापाप

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पण्डित रामप्रसाद खेत के किनारे पड़े हुए छप्पर में बहुत उदास बैठे हुए थे, बुढ़ापे में एक तरह का आघात किसी भी जीवित व्यक्ति को मृत्यु समान पीड़ा देता है। उत्तर प्रदेश के मथुरा के पास के एक छोटे से गाँव के ७२ वर्षीय पण्डित रामप्रसाद से अब बिना सहारे के ज्यादा दूर तक चला भी नहीं जाता है, उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन पंडिताई करने में गुजारा था, पंडिताई कई पीढ़ियों से उनके परिवार की आजीविका का साधन है। २ लड़कियों और १ लड़के के पिता रामप्रसाद ने अपनी पंडिताई के बल पर ही सबको अच्छे से पढ़ाया लिखाया और दोनों बेटियों की शादी अच्छे घर में कर दी। उनके एकलौते बेटे राहुल के दो बच्चे हैं, एक बेटा और एक बेटी, भगवान की कृपा से सब कुछ बहुत सुखमय ढंग से बीत रहा था, पता नहीं उनके घर पर किस की कुदृष्टि पड़ गयी, हँसता-खेलता परिवार दुःखों की गहरी खाई में जा गिरा। पण्डित रामप्रसाद ने अपनी पंडिताई के दौरान सैकड़ों विवाह पढ़े, कथाएँ की, मृत्युभोज करवाये। यद्यपि उन्हें पता था कि मृत्युभोज एक महापाप है, फ़िर भी इसे उनका लालच कहें या पारिवारिक जिम्मेदारी जिसके चलते वो किसी भी यजमान को बस ग्राहक के रुप में ही देखते थे।...

तुम्हारा शहर 🌃

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तेरे शहर में मुझे मिलती कभी राहत नहीं   इतनी मतलबपरस्ती की मुझे आदत नहीं 🌃 छपते हैं रोज अखबार कई ज़ुबानों में   छपती है देह यहाँ अब कोई रिवायत नहीं 🌃 बजते घण्टों का ये अज़ानों का शोर     बस भीड़ है भरी यहाँ कोई भी इबादत नहीं 🌃 अलग है दुनियाँ यहाँ अलग हैं दस्तूर     दौड़ है दिन रात की यहाँ कोई थकावट नहीं 🌃 ना ख़ुदा का खौफ ना भगवान का डर     सब कुछ मिलता है यहाँ बस इक शराफत नहीं 🌃 मैखानों में यहाँ इक अलग सी है रौनक़     दवा में हो शायद दारू में यहाँ कोई मिटावट नहीं 🌃 रचनाकार - अवनेश कुमार गोस्वामी

कौम

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सुबह नाश्ते की टेबल पर संदीप चौहान ने मोबाइल खोला और अपने बेटे राहुल को व्हाट्सएप चैट पर आया हुआ एक संदेश पढ़कर सुनाने लगे, "ये शर्मा जी भी कमाल हैं, पता नहीं कहाँ से इतनी महत्वपूर्ण जानकारियां लेकर आते हैं, देख राहुल शर्मा जी ने ताजमहल के बारे में क्या भेजा है, लिखा है कि ताजमहल पहले एक हिन्दू मंदिर था, कमाल है यार" "बिल्कुल ही गलत जानकारी है ये, बिना किसी शोध के आप कैसे किसी तथ्य को गलत ठहरा सकते हो" शालिनी ने उनकी प्लेट में ब्रेड रखते हुए कहा। "संदीप आप कब से इन सब फ़ालतू की इंफोर्मेशन्स को सही मानने लगे?" "शालू माना कि तुम हिस्ट्री की प्रोफेसर हो पर और भी कुछ लोग हैं जो सच्चाई को समाज के सामने लाने के लिए मेहनत कर रहे हैं, अभी दो दिन पहले ग्रुप एडमिन खत्री जी ने चौहानों का इतिहास भेजा था, कुछ चीज़ें तो मुझे आजतक पता ही नहीं थीं" उनका १५ साल का बेटा राहुल जो बिल्कुल भी इन बातों में ध्यान नहीं दे रहा था, वो मोबाइल में गेम खेलने में बिजी था। "राहुल जल्दी नाश्ता करके स्कूल की ऑनलाइन क्लासेस को अटेंड करो और ये मोबाइल में गेम खेलना बन्द क...

शहीद-ए-आजम

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भगत सिंह सच में महान एक क्रांतिकारी थे, जिन्होंने अपना सर्वत्र देश सेवा के लिए, देश की आजादी के लिए कुर्बान कर दिया, भगत सिंह जैसे विरले देशभक्त युवा सदियों में कभी-कभार ही पैदा होते हैं। आज हर युवा भगत सिंह बन सकता है, हर किसी में भगत सिंह बनने जैसी काबिलियत है लेकिन कभी हमने सोचा की जितने भी महान क्रांतिकारी हुए हैं, उनमें क्या खूबी थी, उनमें ऐसा क्या जज्बा था जो वो अपना नाम अमर कर गए। आइए आज हम महान क्रांतिकारी भगत सिंह के बारे में जानने की कोशिश करेंगे, भगत सिंह के चरित्र में बहुत सारी असाधारण खूबियां थी जैसे कि लक्ष्य निर्धारण, भविष्य की चिंता ना करना, लक्ष्य  से भटकाव नहीं होना, जीवन का उद्देश्य हमेशा सबसे ऊपर रहना, डर को जीत लेना। भगत सिंह ने बचपन में ही तय कर लिया था कि उनको क्या करना है, कहते हैं ना पूत के पैर पालने में ही पता चल जाते हैं, यह सच है भगत सिंह के चरित्र का प्रमाण हमें बचपन से ही मिल जाता है। भगत सिंह ने अपने जीवन के उद्देश्य और लक्ष्य का निर्धारण बहुत ही कम उम्र में कर लिया था, जब उनको लगा की शादी उनके देश प्रेम और आजादी के मार्ग में बाधक बन सकती है त...

आख़िरी अदालत

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आज घर के अंदर कमरे के अंधेरे कोने में दुबके बैठे आदित्य सिंह को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। हाथ में पकड़े उस कागज के टुकड़े को बार-बार कसते जा रहे थे। १९ साल पहले जब उनके घर में उनकी नन्ही सी बेटी के कदम पड़े तो आदित्य सिंह मारे खुशी के फूले नहीं समा रहे थे, सदैव से ही स्त्री-पुरूष समानता के पक्षधर रहे आदित्य सिंह ने ईश्वर से भी पुत्री को ही माँगा था।  इस खुशी के मौके पर उन्होंने बहुत बड़ी मात्रा में पूरे गाँव में मिष्ठान वितरण करवाया और पुत्री का नाम दिव्या रखा लेकिन प्यार से वो उसे हमेशा बेटा ही बुलाते थे। बचपन से लेकर कल तक की ना जाने कितनी ही सुंदर अविस्मरणीय यादें थीं पिता और पुत्री के इस निश्छल प्रेम की। हालांकि बाद में उनके दो पुत्र भी हुए पर उनके हृदय में स्नेह और प्रेम का एक अदृश्य भाग सदैव दिव्या के लिये उमड़ता रहता था। बचपन से लेकर कल तक उन्होंने दिव्या की हर इच्छा का सम्मान किया और यथासम्भव उसको पूर्ण करने का प्रयास भी किया। ईमानदारी और सच को अपना आदर्श मनाने वाले आदित्य सिंह ने हमेशा अपने बच्चों में भी अच्छे संस्कार देने का पूर्ण प्रयास किया, सदैव नई विचारधारा और ...

तेरी बिंदिया कुछ कर जाती है

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तेरी एक छवि को जो देखे अति मनमोहक- मनभावन केश खुलें हों तेरे जिस पल आ जाये जैसे फिर से सावन       तेरी बिंदिया कुछ कर जाती है ❣️ रंग साँवला नैन नशीले नयन बाण से हृदय वेधन  मोती से बरसे बाल हैं गीले  कैसी तृष्णा कैसा सम्मोहन         तेरी बिंदिया कुछ कर जाती है ❣️ अंग अंग में आग भरी है संयम तो जल सा जाता है रूप कमल के दर्शन से  हृदय पुष्प खिल सा जाता है            तेरी बिंदिया कुछ कर जाती है ❣️ आलिंगन की अभिलाषा रोम-रोम को प्रफुल्लित कर जाती है प्रेम संकेतों की ये भाषा तू बनके रति मूरत काम जगाती है               तेरी बिंदिया कुछ कर जाती है ❣️ जीवन का उद्देश्य तू ही नित्य ही पथ दिखलाती है निश्छल प्रेम का संदेश तू ही तू नारी है तू देवी बन जाती है                 तेरी बिंदिया कुछ कर जाती है ❣️ रचनाकार - अवनेश कुमार गोस्वामी

सोशल बनें ना कि सोशल मीडिया के लिए बनें

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महेश शर्मा  बिजली जाने से उठ के बैठ गए, बाहर बारिश शुरू हो गयी थी, बारिश के साथ-साथ हल्की तेज हवा भी चल रही थी। बेड के पास रखे स्टूल से पानी की बोतल उठा कर पानी पिया, मोबाइल उठा के समय देखा तो रात के २:३० बज रहे थे। वो बेडरूम से निकल कर घर के बाहर पड़ी कुर्सी पर आकर बैठ गए, बुढ़ापा सच में जिंदगी की सबसे बड़ी तकलीफ़ है और उसके ऊपर बुढ़ापे में अकेलापन। घर के बाहर हल्की-हल्की सी बरसात और बीच-बीच में बिजली की कड़कड़ाहट के साथ आँखों को चौधियाँ देने वाली चमक। यादों के पलछिन उनकी आँखों के सामने चलचित्र के तरह चलने लगे। गाँव की गलियों में गुजरा खिलखिलाता हुआ बचपन, दोस्तों के मस्ती, वो माँ का लाड़-प्यार, वो पिता की मीठी सी डाँट। किसी रिश्तेदार के घर जाकर ना कोई दिनों का हिसाब और ना कोई नफा-नुकसान, ना कोई भविष्य की फ़िक्र ना कोई अतीत का रोना। जैसे-जैसे उम्र बढ़ने लगी धीरे-धीरे ईश्वरीय चीज़ें खुद से दूर जानी शुरू हो गयीं और मनुष्यों द्वारा निर्मित चीजों ने जिंदगी को सामाजिक और व्यवहारिक बनाने की बजाय व्यवसायिक बना दिया। हम मनुष्य होने की जगह व्यवसायी बनते चले गये, हम जरूरत के घर की दहलीज से निकल...

आख़िरी ख़त

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खास है तेरी उल्फ़त में लिखा आख़िरी ख़त उस ख़त में तेरी महक अभी भी थोड़ी बाक़ी सी है 🌹 अभी तक गीली है मेरे दिल की जमीं तेरी उल्फ़त की नमी अभी भी थोड़ी बाक़ी सी है 🌹 कोई भरता नहीं तेरी गली का सूनापन कई हैं सनम फिर भी तेरी कमी थोड़ी बाकी सी है 🌹 आँसुओं में भीगे ख़त क्यों जलते ही नहीं स्याही में आँसुओं की मौजूदगी थोड़ी बाक़ी सी है 🌹 मैंने अक्सर देखा है चाँद को तन्हा-तन्हा तेरे ही इंतज़ार की घड़ी अभी भी थोड़ी बाक़ी सी है 🌹 कैसे खो जाऊँ मैं इस दुनियाँ की भीड़ में इस टूटे दिल की ख़लिश अभी भी थोड़ी बाक़ी सी है 🌹 रचनाकार - अवनेश कुमार गोस्वामी

यादें - कुछ खट्टी कुछ मीठी

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ये घटना उस समय की जब मैं डी.ए.वी. इण्टर कॉलेज में १० वीं का छात्र था, ईश्वर की असीम अनुकम्पा से मैं शुरू से ही बैक बेंचर रहा हूँ, सच में जो मजा बैक बेंचर होने में वो शायद किसी चीज़ में नहीं। बैक बेंचर वास्तव में बहुमुखी प्रतिभा के छात्र होते हैं जो विषय ज्ञान के साथ-साथ दूसरी कक्षा का ज्ञान, मोहल्ले के ज्ञान कुछ गुप्त ज्ञान का भी संकलन और वितरण करते रहते हैं। बैक बेंचर की चील जैसी पैनी नजरों से मज़ाल क्या की स्कूल में होने वाली कोई घटना बच जाए। कभी-कभी कुछ सनकी और मार्क्सवादी शिक्षकों की चपेट में आकर बैक बेंचर असमायिक पिटाई के भी शिकार हो जाते हैं लेकिन जो ज़ुल्म और अन्याय के खिलाफ घुटने टेक दे वो कदापि बैक बेंचर नहीं हो सकता। शिक्षकों के कितना भी समझाने और प्रताड़ित करने के बाबजूद भी बैक बेंचर कभी भी प्रथम बेंच पर बैठने जैसा घृणित और अमान्य अपराध कभी नहीं कर सकता है। उस समय S.P. Dubey सर् हमें गणित और सामान्य विज्ञान पढ़ाते थे, ये बात अलग है कि मुझे विज्ञान कभी भी सामान्य नहीं लगा, जब आज तक कोई वैज्ञानिक ही सामान्य नहीं हुआ तो भला विज्ञान कैसे सामान्य हो सकता है। S.P. Dubey सर ने व...

नृत्य सम्राट - बिरजू महाराज

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वो नृत्य को कई आयाम दे गए इक के स्वप्न के लिये सुबहो शाम दे गए🙏 नृत्य के आनन्द में खोते चले गए अनमोल इक चीज़ को वो बेदाम दे गए🙏 नृत्य ही तपस्या नृत्य ही योग हो गया नृत्य की इस विधा वो कथक नाम दे गए🙏 इन्कार कर दिया उस नवाबी शान को जो चाहा दिल ने उसे वो अंजाम दे गए🙏 शिव के एक स्वरूप को प्रसन्न कर गए कितने दिए कृष्ण वो कितने राम दे गए🙏 विश्व में गूँज रही उनके पैरों की उदघोष घुँघरुओं की आवाज में कोहराम दे गए🙏 रचनाकार - अवनेश कुमार गोस्वामी