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ये बारिश की बूँदे

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ये बारिश की बूँदे लिख रही थी एक अनोखी दास्तां हो रहे थे एक हम ज़ब मिलती हो बूँदे जमीँ से  खोकर अपना अस्तित्व जैसे सहरा सहरा हो रहे थे हम तुम्हारे रूह तुझमें समाती जा रही थी बिजली की कड़कती आवाज़ से तुझमें सिमटती जा रही थी, ये बारिश की बूंदें तन मन बहका रही थी  बादलो की गर्दिश आसमान में गहरा रही थी, मोहब्बत की अनोखी दास्तां ये रात लिख रही थी  हुई सुबह, हुआ नया सवेरा खामोश था समॉ सुहाना ना तुम थे ना वो रात थी, सोचा तो बस वो एक ख्वाब था ख्वाब भी कितना हसीन था जिसमें तू मेरे करीब था सूरज की रौशनी नई कहानी लिख रही थी जम के बरसा था बादल रात इंद्रधनुष की जुबानी बयां हो रही थी आये थे तुम या था ख्वाब सवाल यही रूह कर रही थी....... 🌹 निकेता पाहुजा ✍️

मुसाफिर तुम मेरे शहर के

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 ये मेरा शहर, तुम बिन मुझे वीरान सा लगता है, कि जैसे ये चाँद बिना चांदनी के कुछ अकेला सा लगता है। काफिला तारों का कितना ही क्यों ना हो आसपास मुझे तो इस चाँद की बेबसी का आलम कुछ मुझ सा लगता है कि यह शहर तुम बिन मुझे वीरान सा लगता है। याद है ना तुम्हें वो दिन वो तारीख वो साल, ज़ब तुम मुझसे मिलने मेरे शहर आये थे एक अरसा बीता है तुमसे मिले, तुम्हारा आना मुझे आज भी रूमानियत सा भर जाता है। अनदेखी मोहब्बत हो तुम मेरी, अधूरी सी,अनोखी सी  मेरे शहर की आबो हवा आज भी इस बात की गवाह है  ये नूर ये रौनके फीकी सी है मेरे शहर की,  वो जो कुछ कदम चले थे तुम साथ मेरे, वो एहसास आज भी ज़िंदा है ज़हन में मेरे कि आज भी मेरे शहर की राहें मुझे तुम बिन अनजानी सी लगती है।  सहरा सहरा क़र ज़िन्दगी की शाम ढलने सी लगी है  मेरे शहर की हर रौशनी मुझे फीकी सी लगने लगी है  कभी तो फिर से वो शाम दे जाओ मुझे, कि ये जिंदगी भी मुझे तेरे एहसास बिन अधूरी सी लगती है। कि ज़ब तुम आओ शहर मेरे तो लेते आना वो मुस्कान मेरी जो तुम बिन मुझसे रूठ सी गयी है। ज़ब तुम आओगे शहर मेरे मुझसे तुम्हारे कांधे सिर ...

बीता हुआ कल

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 ये बीता हुआ कल लौटकर कभी नहीं आता, जो आ जाये लौटकर तो मैं लौटाना चाहूँ वो मासूम सा बचपन,वो अल्हड़पन, फ़िक्र नहीं ज़माने की, होती थी फ़िक्र तो बस पढ़ने पढ़ाने की, वो गुड्डे गुड़ियों के खेल अनुठे वो मेले में लगते झूले अलबेले, काश कि होता कोई यंत्र जो लौटा पाती मैं वो बीता हुआ कल, पापा की डांट और डांट से बचाता माँ का आंचल, सूने सी हो गयी है गलियां जो खेलते थे हम खेल अनोखे, काश लौट आता वो बीता हुआ कल  समय की कैसी ये चाल बीत रहा पल पल हर क्षण ये बचपन ये रौनक़े सदा बरकरार नहीं रहती बीत रहे हर पल में कोई ना कोई भविष्य की कहानी है बुनती, ढल जाती है जिंदगी की हर शाम, फिर लौटकर वो शाम सुहानी नहीं आती बीत रहे हर कल में बसी अनकही है कोई कहानी बीते हुए समय में खोकर कभी लौटकर नहीं आती, जिंदगी बीत जाती है पर वो रवानी फिर नहीं आती, निकेता पाहुजा रुद्रपुर उत्तराखंड

मातृ दिवस की शुभकामनायें

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माँ तेरी ममता अनमोल, माँ तेरी छाँव का सुःख अनमोल, माँ मेरा वर्चस्व तू, माँ मेरा सर्वस्व तू,तू ही जननी तू ही शक्ति स्वरूप माँ, रेगिस्तान की तिलमिलाती धूप में, तू बारिश की ठंडी फुहार माँ, नदी सी शीतलता भी तुझमें, मंद मंद पवन की ठंडक भी तू, हर स्वार्थ से विमुख, तू जीवन का संचार माँ, तेरी एक मुस्कुराहट में, जीवन की हर मुश्किल का हल है माँ, तेरी हर सीख जीवन के पायदान का साखी है सुःख दुःख से परिचय करवाती, ऐसी अद्भुत अनमोल शक्ति है माँ, खुद गीले में सोकर बच्चे को सूखे में सुलाती है माँ, भूखी रह स्वयं, बच्चों के पालन पोषण में कसर ना छोड़े, आँचल में जिसके स्वर्ग की अनुभूति, माँ होती है सच्ची सहेली, हर दर्द को सहकर जो माँ बनती है, ऐसी जगत जननी स्वरुपा होती है माँ, स्वंय में परिपूर्ण स्वरुप होती है माँ  जिसके जैसा कोई और नहीं वो होती है माँ... निकेता पाहुजा रुद्रपुर उत्तराखंड

जय जय श्री परशुराम भगवान

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जय जय श्री परशुराम भगवान, त्रेता में जन्मे अदम्य महाबलवान, भगवान विष्णु के आवेशावतार जमद्गनी -रेणुका अनमोल सुत, मात पिता के आज्ञावान, अक्षय तृतीया को थे जन्मे, तेज और ओज से परिपूर्ण, भगवान शिव के भक्त अटूट, परशु पाकर परशुराम बने वीरता की थे अलग पहचान, इक्कीस बार किया संहार क्षत्रिय का, भीष्म, कर्ण को दिया शास्त्र ज्ञान, माता का वध क़र एक क्षण में, पिता की आज्ञा का किया सम्मान, प्रसन्न पिता ने ज़ब पूछा वरदान मांग लिया क़र दो पुनर्जीवित माँ को दे दो फिर अजेय वरदान, रुष्ट हुए ज़ब अवरोध बने गजानन  चला फरसा किया प्रहार, एकदन्त कहलाये गजानन, कठिन तपी कहलाये चिरंजीवी, मिला भूलोक वास का वरदान, हर युगवासी नमन है आपको  हे प्रभु परशुराम वंदन आपको निकेता पाहुजा रुद्रपुर उत्तराखंड

गुमनाम हूं मैं

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क्या कहूँ, क्या लिखूं निःशब्द हूँ, मौन हूँ लाखों तूफ़ान उमड़ रहे है, कुछ दिल में कुछ मस्तिष्क में आखिर क्या है अस्तित्व मेरा क्या हूँ अस्तित्वहीन मैं  कभी बेबस सा महसूस होता है कभी बेहद विचलित सा, क्या भोग विलास की वस्तु मात्र हूँ मैं, क्या है उद्देश्य मेरा, कोई तो सुलझती राह मिले, क्या मात्र पोषक हूँ मैं क्या दूसरों का खुश रखने का सामान हूँ मैं कौन हूँ मैं, क्या है अस्तित्व मेरा या बस यूँ ही निरर्थक हूँ मैं, पहचान है फिर भी बेनाम हूँ मैं, स्वंय की इच्छाएं क्या, बस कहने भर को शक्ति हूँ मैं, ग़र परखने जाऊँ जहान में, सबके लिए गुमनाम हूँ मैं....। निकेता पाहुजा रुद्रपुर उत्तराखंड

आपबीती

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ग़र जो सुनाऊ आपबीती कुछ पल मुझे सुनोगे क्या, बड़ा बैचैन सा है मन आजकल इसकी राहत बनोगे क्या, ग़र जो सुनाऊ आपबीती चैन से कुछ पल मुझे सुनोगे क्या,, समंदर सी मोहब्बत है मुझमें, इसका साहिल बनोगे क्या, बेज़ार सा वक़्त बीत रहा मेरा, अपना साथ देकर इसको सुनहरा करोगे क्या ये जुगनूओं सी झिलमिल चांदनी रातें मेरी तन्हाईयों का परिहास बनाती है, अपना साथ देकर मेरी तन्हाईयों को कुछ पल आबाद करोगे क्या, बिखरे से है ज़ज़्बात मेरे इन दिनों, अपने आगोश में लेकर समेट लोगे क्या, ये ज़िन्दगी का सफ़र अकेले नामुमकिन सा है मेरा, मेरे साथ चलकर ये सफ़र आसान करोगे क्या कभी बैठो कुछ पल संग एहसास ए दरखत तले इश्क ए छाँव मेरे एहसासों की महसूस करोगे क्या.. आज सुनाऊ तुम्हें अपनी आपबीती, कुछ पल बैठकर सुनोगे क्या.... निकेता पाहुजा रुद्रपुर उत्तराखंड

कहीं दूर चलते है

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सुनो,    चलो ना कहीं दूर चलते हैं जहाँ बस तेरा मेरा आशियाँ बने, दुनिया की चकाचौंध से परे, तारों की छाँव तले, बहारों से सजी हो गलियां स्वागत में, चंचल किरणेँ भास्कर की, सुंदर कलियों की खिलखिलाहट में नया सवेरा चुनते हैं, चलो ना, कहीं दूर चलते हैं, तितलियों के गुंजर को, मधुर संगीत सा सुनते हैं, हाथों में हाथ ले एक दूजे का, कभी ना अलग होने का वादा करते हैं, चलो ना, कहीं दूर चलते है  सुनहरे दरखतो की छाँव में, इक दूजे के सिरहाने लेटकर, ख्वाबों का नया आशियाँ बुनते है, नहीं ख्वाहिश मुझे हीरोँ मोतियों के हार की, ख्वाईश है मुझे तो बस, तेरे प्यार के श्रृंगार की, ख्वाईश है मुझे तो बस, तेरी बांहों के हार की, चलो ना, आज हर ख्वाईश ए आलम को मुक़्क़मल करते है, कहीं दूर चलकर, एक दूजे को मुक़म्मल करते है निकेता पाहुजा रुद्रपुर उत्तराखंड

कब होगा महिला दिवस

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किसलिए कमजोर पड़ जाते है हम, बस इसलिए कि क्या कहेगा ज़माना, चुप हो कर सब सहते हैं आखिर किसलिए? यूँ चुप रहकर उन दरिंदो की हिम्मत ना बढ़ाना, धर कर रूप चंडी सा संहार हैवानियत का कर जाना, कर प्रतिज्ञा,अब डरना नहीं, डटकर सामना कर जाना, अस्त्र उठाकर तू भेड़ियों को भेद जाना, अब एक नई उम्मीद,एक नई राह, एक नया मुकाम पाना है हमें, छू लेना है अब एक नया आसमां झुकना नहीं,डरना नहीं अब आवाज़ कर लो बुलंद अपनी, ज़ब भी कोई देखे, बदनजरों से तुम्हें बनकर चंडी संहार करो स्त्री शक्ति हो तुम शारीरिक भूख मिटाने का कोई सामान नहीं.. उठो नारी शक्ति मज़बूत बनो, ये लड़ाई तुम्हें खुद ही लड़नी होगी। मोमबत्तियों की लौ से ये राह नहीं आसान होगी भर लो ज्वाला अपने मन में, ठान लो अपने मन में अत्याचार से भरी ना कोई ज़ब रात और सुबह होगी, महिला दिवस की असली कहानी तब ही सार्थक होगी। स्वरचित व मौलिक रचना निकेता पाहुजा रुद्रपुर उत्तराखंड

रंग बिरंगा मौसम

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लो फिर आया मौसम     रंग बिरंगे त्योहारों का, नववर्ष के उत्साह सा    लोहड़ी की अग्नि ज्वाला सा, संक्रांति के अनुपम सौंदर्य सा,   तिल, गुड़ और खिचड़ी जैसे भिन्न भिन्न पकवानो सा,    लो फिर आया मौसम देशभक्ति में झूमने का,   फहरा क़र तिरंगा प्यारा वन्देमातरम बोल, गर्व से जीने का, आया मौसम देशभक्ति में रम जाने का,  आया ऋतुराज बसंत, समां माँ शारदे के पूजन का,    धूप दीप बाती संग ज्ञान अर्जित क़र, माँ सरस्वती को ध्याने का,     देखो ना, आया है मौसम भिन्न भिन्न त्योहारों का,     महादेव की आराधना का आदि अंन्नत अलौकिक शक्ति का    बेल पत्र और बेर, धतूरा अर्पित क़र, शिव की भक्ति में खोने का,    देखो आया फागन मास झूम घूम के गाने का,   रंग बिरंगे रंगो से एकता और समभाव   समर्पित होने का, आया मौसम होली का, पिचकारी और ग़ुलाल में रंग क़र   भेदभाव और द्वेष मिटाने का रंग जाओ बस एक ही रंग...    गुझिया और मीठे पकवानो सा, मीठे बोल की सीख पाने का देखो आया अनुपम मौसम   झूम झूम गाने का, कोयल...

युद्ध का माहौल

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करूँ इबादत या करूँ प्रार्थना, मतलब दोनों के एक, बुद्धि दे सबको और इरादे नेक, ईश्वर की कृपा से मिली है हम सबको जीने की आज़ादी, रोक लो ये युद्ध का माहौल, बच्चे डर रहें, खौफ का समां है कैसे करेंगे जीवन यापन ग़र युद्ध जो छिड़ गया, क्या होगा अंजाम, क्या निकलेगा निष्कर्ष, अस्त व्यस्त हो जायेगा धरतीवासियों का जनजीवन, वीरानियों का होगा समां, छिन जायेगा अमन और चैन, फूटेगा ना अंकुर फिर जल्द, कैसे बसेगा खुशहाल जहान अनाथ बच्चों के माँ बाप की लाशों पर, कैसे चहकेगा फिर से अमन और शांति का चमन, आओ मिलकर क़र ले प्रण, नहीं छिड़ेगा फिर से रण। निकेता पाहुजा रुद्रपुर उत्तराखंड

नारी तेरे रूप अनेक

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हे नारी, तेरे रूप अनेक, कभी बेटी, कभी बहन कभी माँ, कभी बहु, सब किरदारों में अनुपम स्वरुप, बेटी बन मात पिता का नाम रोशन क़र जाये  बहन बन अनुज को राखी का बंधन निभाए, पत्नी बन सात जन्म के वादे निभाने का सामर्थ्य रख पाए एक जान होकर, किरदार अनेक निभाने का अटूट साहस ना जाने तुझमें कहाँ से आये? क़र देती है रोशन तुम्हारे दो जहान को, नारी, दोनों घर का आँगन महका जाये। कभी आँखों में ममता का सागर उमड़े  तो कभी चंद्र छटा पर निश्छल सी मुस्कान बिखरे। कभी ग़म का सागर भी, पलक झपकते सुलझाए कभी मीठे बोल की आस में, निश्छल ममता रस लुटाये नारी, तेरे अनुपम रूप का सम्पूर्ण वर्णन आखिर कैसे मुमकिन हो पाए, आखिर कौन है यहां तेरे जैसा जो जान की बाज़ी लगा संतान को जन्म दे पाए। निकेता पाहुजा रुद्रपुर उत्तराखंड

"विधवा पुनर्विवाह है जरूरी"

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हक़ है उन्हें भी जीने का,    अरमानो को सँवार क़र खुल के मुस्कुराने का,   सतरंगी रंगो में ढल क़र, जीवन की धूप छाँव में जीने का, अभिशाप नहीं है,   बस किस्मत की अपनी करनी है, विधवा है तो क्या कोई अछूत नहीं,  परछाई से भी दूर भागती, देखो दुनिया सारी है,    क्या कसूर है मासूम का , जो देखती दुनिया हैवानियत से, सशक्त और सम्पूर्ण है नारी, मत समझो इसे अबला सी  क्या जीवन खत्म हो गया,    यूँ ही किसी के जाने से, उनके संग क्यों इनका जीवन भी   मृत भांति ही समझा गया, जीवन जीने का हक़ है इन्हे, श्वेत रंग में भरक़र रंगों की सौगात, जीवन के पथ पर हक़ है मुस्कुराने का, सोलह श्रृंगार बिना नारी है अधूरी इनको भी हक़ है अपना जीवन जीने का।   निकेता पाहुजा रुद्रपुर उत्तराखंड

मेरे जीवनसाथी

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 मेरे जीवनसाथी...... दिल तुम्हे देखकर धड़कना भूल जाता है.... नजरें तुम्हे देख कर मदहोश हो जाती हैं... ये जीवन तुम्हारे नाम किया है साथ रहना हरदम, हर पल मेरे हमदम तेरे सिवा इस दिल को किसी की जरूरत नहीं हैं... मोहब्बत है तुमसे मेरे हमनंवा मेरा जीवन तुमसे तुमसे मै, मुझसे तुम बस तुझे छोड़कर इस दिल की किसी की इबादत नहीं हैं... तुम्ही तो माझी हो, मेरे जीवन के सागर के, दरिया ए सुकूँ तुझमें ही पाया है मैंने, मेरे जीवनसाथी, तुझमें मिलकर, जीवन के रंग और इंद्रधनुषी हो गए है, तुम्हारे होने से ही तो मेरे जीवन में रौनक़ ए बहार है, तुमसे ही तो मेरे ये सोलह श्रृंगार है, तुमसे बँधी अनमोल डोर, मेरे जीवन का आधार है, तुम ही तो हो मेरे जीवन के नायाब कोहिनूर.... निकेता पाहुजा रुद्रपुर उत्तराखंड

मतदान..

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लोकतंत्र का आधार.. मतदान  लोकतंत्र का स्तम्भ है.. मतदान सही व्यक्ति का चयन है मतदान इसे व्यर्थ ना जाने दीजिये, एक एक मत है बहुत जरूरी  अपने मत का प्रयोग जरूर कीजिये शक्तिशाली बनाने क़ो देश क़ो  मतदान है बहुत जरूरी, विकसित करने क़ो देश क़ो, मतदान है जरूरी 18 साल हो या 80 साल मतदान से जरूरी, नहीं कोई काम जनता का है ये अधिकार चुनने क़ो अपनी सरकार, मतदान है देश का आधार, है ये हर व्यक्ति का अधिकार, करने क़ो लोकतंत्र की रक्षा, व्यर्थ ना जाने दे अपना मताधिकार, वोट देने अवश्य जाये, अपनी तार्किक क्षमतानुसार मतदान करने अवश्य जाएँ। चाहे आये आंधी तूफ़ान सबसे जरूरी है मतदान यही होगा सबसे बड़ा योगदान, सबसे अहम् है मतदान। निकेता पाहुजा रुद्रपुर उत्तराखंड

वो बंद खिड़की

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वो जो खिड़की बंद रहती है तेरे दिल की वो कभी तो खोल दो ना दफन कर रखे है जिसमें मोहब्बत ए एहसास बेशुमार उनकी खुशबू आज बह जाने दो ना रोको ना कदम आज, खुद क़ो मुझमें बस घुल जाने दो ना पत्थर सा हो चुका जो अक्स मेरा अपने रूह ए एहसास से मोम सा पिघला जाओ ना जो बंद किये हुए हो खिड़की मन की कभी तो सूरज की चमक उस तक पहुंचने दो, मोहब्बत का गुलाब आज उसमें भी खिलने दो ना, अमावस भरी रातों सी स्याह कालिमा छायी है, मोहब्बत के चाँद क़ो पुकारकर चांदनी सी छटा बिखरने दो ना, ये जो बंद रखी है खिड़की जज्बातों की, रूहानी एहसास पाकर अश्कों में बह जाने दो ना... निकेता पाहुजा रुद्रपुर उत्तराखंड

सपने

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बुने है कुछ सपने कुछ बड़े कुछ छोटे कुछ आसान से कुछ कठिन से, किन्तु हर सपना जरूरी है, पूरा हो ना हो, पूरा करने का भरसक प्रयास करना कुछ सपने करने है पूरे जो रह गए राहों में अधूरे, छू लूँ आसमान सफलता का, ठहराव लिए मन में, शांत चित्त और सब्र से, हर सपने क़ो आयाम है देना हर सपना अलग महत्त्व लिए, पूरा करने की अलग राह लिए, हर सपना कुछ कहता है, जीवन के अग्रिम कदमों क़ो, चुनने की राह लिए, कुछ सपने होते है अनुठे कोशिश करनी है बस जीवन में, कोई ख्वाब अधूरा ना छूटे, करनी है भरपूर कोशिश, कोई सपना शीशे सा ना टूटे..... निकेता पाहुजा रुद्रपुर उत्तराखंड

नमन तुम्हें वीरांगना

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है नमन तुम्हें वीरांगना, है प्रणाम तुम्हें वीरांगना, खो देता है देश ज़ब एक फ़ौजी, लौट कर आता है ज़ब वो तिरंगे में शान से, खोया तो तुमने भी होता है, सुकून अपने घर आंगन का, सिन्दूर मिट गया सुहागन का, फिर भी लुटा देती हो तुम सर्वस्व देश पर, फिर भी कभी हार नहीं मानती, फिर से हो जाती हो तैयार वही अदम्य साहस लिए वीर से शक्ति लिए, अटूट देशभक्ति का भाव लिए, नमन तुम्हें वीरांगना बहते तो होंगे आँसू तुम्हारे क्यों छोड़ गए अधर में, तुम थे खेवनहार, आधे राह छूटी नैया, चाहे आये कितनी मुश्किल लेकिन रोना नहीं है हल, लहराया परचम शौर्य की गाथा लिख तिरंगे का मान बढ़ाया, हे वीरांगना तुम्हें शत शत नमन देश ने खोया एक सैनिक तुमने तो अपना सर्वस्व खोया, फिर भी आह नहीं मुख पर, नमन तुम्हें हे वीरांगना  डट कर ख़डी हो फिर से देशभक्ति की राह में...। निकेता पाहुजा रुद्रपुर उत्तराखंड

कम करना होगा मोबाइल से याराना

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जाने कहाँ गुम है वो कलम का ज़माना रबर पेंसिल किताब कॉपीयां कितना अनमोल था इनसे याराना ब्लैकबोर्ड की जगह ले ली है आज आई पैड ने, लिंक पर क्लिक करते ही स्कूल का घर आने लगा है, क्या वाकई पढ़ाई का अर्थ बच्चों को समझ आने लगा है...? दबी सी रह गयी है मासूमियत मोबाइल रुपी डब्बे में, वो फुटबॉल, लंगड़ी टांग और पतंग उड़ाना  कैद है मोबाइल के बटनों में हंसी और ग़म का फ़साना जाने कहाँ गुम है वो गली क्रिकेट का ज़माना ले ली है आज जगह इनकी कैंडी क्रश और पबजी जैसे खेलो ने, लग गया है मासूम आँखों पर दोहरी आँखों का ताना बाना, जाने कहाँ गुम है वो अनमोल खज़ाना मानसिक अवसाद और चिड़चिड़ापन घेर लिया है अनेक विचारों ने, क्या वाकई हो रहा मानसिक विकास या हो रहा मानसिक और शारीरिक ह्यास... रुक रहा शारीरिक विकास, विचारणीय तथ्य है ये.. आसान लगता है माता पिता को हाथ में उनके स्मार्टफोन थमाना, पर उन्हें नहीं ज्ञात नष्ट हो रहा, बाल विकास का ताना बाना, लाना होगा वापस हमें फिर से खेल कूद का तराना बैडमिंटन, टेनिस और क्रिकेट  आज से ही कम करना होगा मोबाइल खेलो का याराना .. निकेता पाहुजा रुद्रपुर उत्तराखंड

कैसे लिख दूँ आखिरी खत

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लिख दूँ खत तुम्हारे नाम का आखिरी पैगाम हो तुम्हारे ख़्यालात का, लाख चाहूँ फिर भी रुक जाती है कलम कैसे लिख सकती हो तुम आखिरी पैगाम मोहब्बत का, रुस्वाईया चाहे लाख हो तेरे मेरे बीच मोहब्बत का बवंडर मन में थमता ही नहीं, रह रह कर उठ जाता है इश्क ए सैलाब कैसे लिख दूँ तुम्हें आखिरी पैगाम मोहब्बत का, गुफ़्तगू का सिलसिला हौले हौले ठहर रहा कैसे कह दूँ दिल में नहीं हो तुम, कैसे कह दूँ मैं संग नहीं तुम्हारे, कैसे कह दूँ इश्क ए बरसात मुझपर बरसी नहीं, होना चाहता है सराबोर ये दिल फिर से  तेरी मोहब्बत की बरसात में रात भर गुज़रती है वीरान सी काश लिख पाऊं तुम्हें कभी इश्क से एहसास मेरे ताउम्र रोशन रहेगा तेरे इश्क़ का चराग मुझमें, ताउम्र सराबोर रहेगा मेरा अक्स तेरे इश्क की खुशबू से, ताउम्र बरकरार रहेंगे मेरे अनकहे से एहसास तुम्हारे लिए, कैसे लिख दूँ खत आखिरी तुम्हारे नाम हो ग़र जो बस में मेरे, मैं तो अपनी ज़िंदगानी तेरे नाम लिख दूँ लिख दूँ अपने दिन और रात तुम्हारे नाम लिख दूँ मेरी रूह, मेरी सांसे तुम्हारे नाम नामुमकिन है मेरे लिए लिखना आखिरी खत तुम्हारे नाम......   निकेता पाहुजा रुद्रपुर, उत्त...