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Showing posts with the label डॉ कंचन शुक्ला

गांव की गलियां

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मेरा गांव मुझको, बहुत याद आता , आंखों को दिखता सुहाना सा मंज़र, बैलों की जोड़ी, जब खेतों में जाती, पनघट पर गोरी, जब बातें बनाती, खेतों में फूलीं, पीली सरसों सुहानी, डोली में जाती थी, दूल्हे की रानी, मिट्टी की सौंधी, सुहानी सी खुशबू, कच्चे सभी घर, पर पक्के बहुत थे, रहंठों का पानी,जब खेतों में जाता, पानी में चलते,वो गांव के बच्चे, खेतों में पकती,जब गेंहू की बाली, सोने की चादर सी, लगती थी प्यारी, आमों के बागों में,कोयल का आना, बरसा के पानी में, नैय्या चलाना, ढलता जब सूरज, हुई शाम गहरी, खेतों से आते सभी, अपने घर को, आंगन की खटिया पर,सब का बैठना, वो मीठी सी बातें, चहकते थे बच्चे, अब रहे न वो गांव,न पहले सी बातें, गांवों का आंगन,हुआ जब से पक्का, जो पक्के थे रिश्ते, वो कच्चे हुए सब, न होती कहानी, न पड़ते हैं झूलें, न चौरे की पूजा, न गईया की सेवा, अब गांवों में जाना, न अच्छा लगे है, न पहले सी बातें, न पहले सी रौनक , शहर जैसा लागे है, गांवों का मंज़र। डॉ कंचन शुक्ला स्वरचित मौलिक

तुम्हारा आखिरी खत़

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तुम्हारा ख़त जब मिला मैं देखती रह गई, क्या न आओगे तुम जो ख़त तुमने लिखा? धड़कने मेरे दिल की बढ़ने लगी, क्या लिखा होगा ख़त में, सोचने मैं लगी, तुम गए जब थे मुझको, छोड़कर यूं अकेली, जाते जाते ये वादा किया था सनम, जल्दी आओगे तुम लौटकर मेरे पास, फिर ये ख़त क्यों लिखा? क्या न आओगे अब?  मैं रस्ता तकती रही, सोलह श्रृंगार कर, होली आई-गई रंग फीके पड़े, सावन आया मगर वह सुहाना न था, मैं सुहागिन रहूं व्रत मैंने किया, अब दिवाली पर भी क्या न आओगे तुम? ख़त लिखा है मुझे, ख़त कैसे पढूं दिल डरा डरा है, देश की आन प्यारी तुम्हारे लिए, यह पता है मुझे तुम बताओ नहीं, साथ हरदम तुम्हारे रहती हूं मैं, तुमने ही तो कहा था मुझसे सनम, तुम धड़कन मेरी सांसे मेरी हो तुम, पर देखे बिना चैन आता नहीं, ख़त देखकर डर गई हूं बहुत, कहीं ऐसा न हो, यह ख़त आखिरी हो सनम, ऐसा करना नहीं तुमको मेरी कसम, दीप जलाए रहूंगी दिवाली पर मैं, उसको बुझने न दूंगी, तेरे आने तक मैं, मेरा विश्वास तू,मेरा अभिमान तू, मेरा विश्वास खंडित न कर देना तुम, मेरे माथे की बिंदिया न धूमिल पड़े, जो ख़त तूने लिखा, वह आखिरी न बने, आ भी जाओ सनम, इक ख़त ऐसा मै...

भीगी सड़क भीगी पलकें

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वह बरसात की, इक काली थी, भीगी सड़क, सुनसान थी, दामिनी, चमक चमक कर, रास्ता दिखा रही थी, बिजली की कड़क, मन में दहशत, भर रही थी, भीगा बदन, कंपकंपा रहा था, कदम मंजिल,  की ओर बढ़ रहे थे, सन्नाटे को चीरती, एक आवाज आई, भीगी हुई वह कली, दहशत से भरी, दौड़ने लगी, भीगी सड़क पर, लड़खड़ाते हुए गिरी, आंखों से आंसूओं, का सैलाब फूटा, मन कृष्णा को, पुकार उठा, हे कान्हा मुझे बचाओ, मेरे वज़ूद को, बिखरने न दो, इस अंधेरी रात का, कलंक मेरे माथे पर न लगे, मेरी अस्मत तार-तार न हो जाए, तभी एक साया, वहां आया, जिसे देखकर, मन घबराया, दो हाथ बढ़े, मन चित्कार उठा, तभी स्नेह में डूबा, एक स्वर सुनाई दिया, बहन घबराओ नहीं, हाथ थाम लो, उठ जाओ, अपने इस अंजान, भाई के साथ, भीगी सड़क पर, चलते हुए अपने घर, अपनों के बीच पहुंच जाओ, मैं हर उस लड़की का, भाई हूं जो सुनसान, सड़कों पर निकलती है, अपने परिवार की खातिर, उसके वज़ूद का रक्षक बन, मैं छाए की तरह साथ, चलता हूं, हर बहन बेटियों की, दुआएं बटोरता हूं, क्योंकि कभी, इसी सुनसान भीगी सड़क पर, कोई रूसवा हुआ, दरिंदों की दरिंदगी से, फिर कभी नहीं लौटा, वह हम साया, अपनी चौखट पर ।। ...

रोटी कपड़ा और मकान

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  मानव जीवन की मूलभूत महत्वपूर्ण तीन आवश्यकताएं हैं रोटी, कपड़ा और मकान आदि काल से ही मानव अपनी इन तीनों आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास करता है। पाषाण युग से लेकर आधुनिक युग तक के मानव ने अपनी तीनों मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए निरंतर कर्म करता रहा है। पहले मनुष्य की आवश्यकताएं सीमित थीं और वह ईश्वरीय शक्ति में विश्वास रखता था इसलिए अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ग़लत मार्ग को नहीं अपनाता था उसे ईश्वर का डर था सामाजिक प्रतिष्ठा के खंडित होने का डर था इसलिए वह सच्चाई और ईमानदारी से कार्य करते हुए अपनी जरूरतों को पूरा करता और उसी में संतुष्ट रहता था पहले का मनुष्य  अपने भाग्य पर भी भरोसा करता था उसका मानना था कि, जिसके भाग्य में जितना है उसे उतना ही मिलेगा उससे ज्यादा पाने की चेष्टा व्यर्थ है। यह भावना मानव को बुरे कर्म करने से रोकती थी पहले मनुष्य प्रकृति के साथ चलते हुए अपने जीवन को जीतने का प्रयास करता था। पर जैसे जैसे मनुष्य विकास के पथ पर अग्रसर होने लगा उसकी इच्छाओं ने भी विस्तार करना प्रारंभ किया और मानव की आवश्यकताएं बढ़ने लगी मानव के अंदर की...

अपने देश और अपनो की यादें

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  मिहिर की नींद आज जल्दी ही खुल गई उसे लगा बाहर बारिश हो रही है कमरे की खिड़कियां बंद थीं इसलिए दिखाई नहीं दे रहा था उसने बगल में सो रही अपनी पत्नी जेनिफर की ओर देखा तो वह गहरी नींद में सो रही थी वैसे भी आज छुट्टी का दिन था इसलिए वह निश्चित होकर सो रही थी जेनिफर को देखकर मिहिर के चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कान फ़ैल गई। उसने अपने सिर को झटका और बिस्तर से उठ गया रजाई से बाहर निकलते ही उसे ठंड का अहसास हुआ मिहिर ने जल्दी से अपना गरम हाऊस गाउन पहन लिया और आगे बढ़कर खिड़की खो दी पानी की बौछार के साथ ठंडी-ठंडी हवाओं ने मिहिर का स्वागत किया बाहर सभी पेड़-पौधे बारिश का आनंद लें रहे थे। तभी जेनिफर की गुस्से से भरी आवाज सुनाई दी  "मेहल तुमने खिड़की क्यों खोल दी मुझे ठंड लग रही है खिड़की बंद करो कितनी बार कहा है कि, बारिश में खिड़कियों को न खोला करो मुझे बारिश पसंद नहीं है" जेनिफर मिहिर को मेहल ही कहती थी उसने गुस्से में चिल्लाकर कहा। " जेनी डार्लिंग तुम सुबह-सुबह नाराज़ क्यों हो रही हो मैं खिड़की बंद कर देता हूं" इतना कहकर मिहिर ने खिड़की बंद की और कमरे से बाहर निकल गया। थोड़ी ...

बुद्धि बनाम सुन्दरता

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तन कितना भी सुन्दर हो, यदि बुद्धि विवेक का साथ नहीं, तन की सुन्दरता व्यर्थ लगे, जब-तक मन सुन्दर न होगा, तन की सुन्दरता का मोल नहीं, मन निर्मल बुद्धि तीक्ष्ण हो, सुन्दर तन में निवास करे, सुन्दर तन, सुन्दर मन, जब एक साथ मिल जाए, ऐसा व्यक्तित्व बनकर मिसाल, इतिहास रचे पथ प्रवर्तक बन जाए। डॉ कंचन शुक्ला स्वरचित मौलिक

फौजी का ख़त

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पत्र लिखा एक फौजी ने, अपने घर को भेज दिया, ख़त मिलने से पहले, तिरंगे में लिपटा वह खुद पहुंचा,   तिरंगे में लिपटे बेटे को, मां देख रही स्तब्ध खड़ी,   तभी डाकिया आ पहुंचा, ख़त लेकर उसके बेटे का, डाकिया देख घर का मंज़र, सोच रहा मन ही मन में, उस ख़त को कैसे दूं अब मैं, इस फौजी की माता को,   फिर आंखों में आसूं भरकर, ख़त उसने लिया निकाल,    नतमस्तक हो माता के सम्मुख, फौजी का ख़त दिया पकड़ा,   मां ने ख़त को हाथ में लेकर, जब देखा बेटे की ओर,    आंखों में आसूं भरे हुए थे, चेहरे पर थी गर्विली मुस्कान, ख़त खोला और लगी बांचने,     बेटे ने जो भेजा था पैगाम, मां मैं ख़त लिख रहा हूं तुमको,   तुम सब इसको पढ़ लेना,   मां जब मैंने वर्दी पहनी, तब तुमने मुझसे कहा था कुछ, वह सब मैं फिर दोहराता हूं,     यह मातृभूमि भी मां जैसी, इस पर आंच ना आने पाए, मां का उज्जवल यह आंचल, दुश्मन के हाथों लगकर मैला न होने पाएं,   मां मैं तेरे वचनों को कभी भूल न पाऊंगा,        मां की रक्षा करते, हुए उसके आंचल में छुप जाऊंगा,   ...

मौन प्रार्थना

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हे आदि शक्ति, हे दिव्य पुंज, मैं मौन प्रार्थना करती हूं, मानव,मानव से प्रेम करे, मन की बर्बरता का दमन करो, हृदय प्रेम का मंदिर हो, मन की ईर्ष्या का नाश करो, सबके हृदय में त्याग भरो, सबका मन तुम निर्मल कर दो, फिर से गीता का ज्ञान बांट कर, सबको सदमार्ग दिखा दो तुम, मानवता का धर्म बता दो, प्रेम उसे करना सिखला दो, जिस पल हृदय कलुषित भावों का, मन से त्याग की सोचेगा, उस पल पशुता छोड़कर, मानव फिर से मानव बन जाएगा, है ईश्वर!! मेरी मौन प्रार्थना , बस इतना कर दो तुम, इस राम कृष्ण की पावन भूमि को, फिर से सुन्दर उपवन कर दो तुम,। डॉ कंचन शुक्ला स्वरचित मौलिक

एका प्याला काफी (पुरानी यादें)

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आज जब भी मैं काॅफी का प्याला हाथ में लेती हूं। पुरानी यादों के बवंडर घेर लेते हैं, वो कालेज का जमाना याद आता है, एक बार सखियों संग काॅफी पीने गए थे, तब जन्मदिन मनाने का सबसे आसान तरीका था, सखियों को काॅफी पिलाओ मस्ती कर जन्मदिन मनाओ!! कालेज के पास इक छोटी सी चाय की दुकान थी, हमने वहां जाकर उससे कहा काॅफी पिलाओ!? वह मासूम सा लड़का पहले देखता रहा, फिर बहुत अदब से बोला बैठिए हम लाते हैं। थोड़ी देर में ही काॅपी का प्याला हमारी मेज पर था। आप पीकर बताइए पहली बार काॅफी बनाई है। काॅफी का प्याला हमनें होंठों से लगाया। उस काॅफी में एक अनोखा स्वाद आया। हमने पूछा यह काॅफी कैसे बनाई है? इस काॅफी में तुमने क्या डाला? इस काॅफी का स्वाद है निराला!! वह हौले से मुस्कुराया, फिर धीरे से बताया। ग्राहक हमारे लिए भगवान है, मैंने श्रद्धा इसमें मिलाई तब यह काॅफी है बनाई। फिर हम हर रोज वहां जाने लगे। कालेज का जमाना बीत गया। फिर वहां जाना छूट गया, फिर वर्षों बाद एक बार वहां से गुज़रे। अब वहां वह छोटी सी दुकान नहीं, बड़ा भव्य काॅफी हाउस था, नज़रें उधर उठीं क़दम उधर बढ़े। अंदर जाकर जब वहां देखा!! चारों ओर खुशियों ...

उर्मिला लक्ष्मण संवाद

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उर्मिला का प्रश्न, हे शक्ति पुंज दशरथ नंदन ? उर्मि का बंदन स्वीकार करो , तुम रघुकुल की कीर्ति पताका हो, भातृ प्रेम की परिभाषा, मां के नयनों की ज्योति हो, मेरे मन की अभिलाषा, मैं प्रश्न पूछती हूं तुम से? उसका उत्तर दे दो तुम, तुम को तो वन जाना ही था ? यह मुझको था ज्ञात प्रिय ? दुःख में भाई,भाई का साथ न दे ? रघुकुल की ऐसी रीत कहां? तुम साथ मुझे लेकर न गए ? इसका मुझे मलाल नहीं, जो अश्रु मेरे मन की पीड़ा हरता ?  उसको क्यों मुझसे मांग लिया ? वह मेरे साथ अगर होता, मेरी पीड़ा कुछ कम हो जाती, जब बीते पल विचलित करते, तब अश्रु बहाकर मन को समझाती, मैं भी चेतन हूं? इसका रहता अहसास मुझे, तुमने मेरे अश्रु को छिन लिया, मुझको पाषाण बना डाला, इन चौदह वर्षों में मैंने, शिला बन पीड़ा झेली, अश्रु अगर होते मेरे ? मैं भी मानव सा जी लेती ? प्रेम त्याग लेता है सबसे, यह मुझको है ज्ञात प्रिय, पर अश्रु मुझे देना होगा ? मैंने ऐसा न सोचा था ? अश्रु बहाकर हर नारी, अपनी व्यथा बताती है, मैं अपनी व्यथा सुनाऊं कैसे? अश्रु बहाना मुझे मना है, अश्रु बहाना कहां मना है ? इसका उत्तर दे दो तुम ? लक्ष्मण का उत्तर मैंने तुम...

तुम्हारा आखिरी ख़त

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तुम्हारा ख़त जब मिला मैं देखती रह गई, क्या न आओगे तुम जो ख़त तुमने लिखा? धड़कने मेरे दिल की बढ़ने लगी, क्या लिखा होगा ख़त में, सोचने मैं लगी, तुम गए जब थे मुझको, छोड़कर यूं अकेली, जाते जाते ये वादा किया था सनम, जल्दी आओगे तुम लौटकर मेरे पास, फिर ये ख़त क्यों लिखा? क्या न आओगे अब?  मैं रस्ता तकती रही, सोलह श्रृंगार कर, होली आई-गई रंग फीके पड़े, सावन आया मगर वह सुहाना न था, मैं सुहागिन रहूं व्रत मैंने किया, अब दिवाली पर भी क्या न आओगे तुम? ख़त लिखा है मुझे, ख़त कैसे पढूं दिल डरा डरा है, देश की आन प्यारी तुम्हारे लिए, यह पता है मुझे तुम बताओ नहीं, साथ हरदम तुम्हारे रहती हूं मैं, तुमने ही तो कहा था मुझसे सनम, तुम धड़कन मेरी सांसे मेरी हो तुम, पर देखे बिना चैन आता नहीं, ख़त देखकर डर गई हूं बहुत, कहीं ऐसा न हो, यह ख़त आखिरी हो सनम, ऐसा करना नहीं तुमको मेरी कसम, दीप जलाए रहूंगी दिवाली पर मैं, उसको बुझने न दूंगी, तेरे आने तक मैं, मेरा विश्वास तू,मेरा अभिमान तू, मेरा विश्वास खंडित न कर देना तुम, मेरे माथे की बिंदिया न धूमिल पड़े, जो ख़त तूने लिखा, वह आखिरी न बने, आ भी जाओ सनम, इक ख़त ऐसा मै...

बावरे मन की पुकार

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पंथ निहारत थक गई अंखियां, आए न सांवरिया, रस्ता देखत बरस बीत गए, न थकीं मोरी अंखियां, सखियां मोहे कहें बावरी, सुन उनकी बतियां मैं मुसकाऊं, मन में आस लिए बैठी हूं, इक दिन आएंगे मेरे सांवरिया, ग्रीष्म ऋतु भी बीत गई, सावन की ऋतु आई, तन मन भीगे भीगे चुनर, सखियां कजरी गाएं, पी के संग सब झूला झूलें, उनका मन हर्षा जाएं रिमझिम सावन मुझे रूलाए, मैं तड़प रही दिन रतिया, मन की अगन बुझे नहीं मोरी, मैं हो गई बावरिया, दिन बीते बीता चौमासा, शरद ऋतु फिर आई, मन सोचे अब आएगे प्रियतम, तन मन अंखियां शीतल होंगी, अब बांहों का हार मिलेगा, पर मन की बातें मन में रह गई, आस न फिर भी टूटी, द्वार खड़ी रह गई अकेली, अंखियां पंथ निहारें, सखियां मोहे ताना मारें, अब छोड़ आस पी आवन की, न आएंगे अब तेरे सांवरिया, क्यों हो रही है तू बावरिया, संखियो के ताने सुन मन में हूक उठे, पर आस न मन की छूटे, सखियां बोले भूल जा उनको, जो तोहे बिसरा बैठा, हो सकता है आ जाए वो, आस न तेरी टूटे, आया भी तो उसके संग, पद्मावती भी आएगी, तू नागमती बन जाएगी, तेरा प्रियतम तेरा न होगा, दूजे संग प्रीत बढ़ाएगा, तू बनी बावरी रस्ता देखे, सुध बुध सब कुछ भूल...

रेत का घरौंदा (झूंठे रिश्तों से मुक्ति)

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" मैंने तुमसे क्या कहा था ना, मीरा को बेवकूफ़ बनाकर शीशे में उतारना बहुत आसान है।तुम बेवज़ा डर रही थीं,अब मीरा  हमारे बच्चे को पालेगी और हम दोनों जीवन का आनंद उठाते रहेंगे"। मीरा जो पानी पीने के लिए रसोई में आई थी अपने पति की बात सुनकर स्तब्ध रह गई। " हां तुम ठीक कह रहे हो हमने कैसे दीदी को बेवकूफ़ बना दिया की मेरा कुछ लोगों ने बलात्कार किया और अब मैं उन दरिंदों के बच्चे मां बनने वाली हूं डाक्टर के अनुसार मेरा गर्भपात भी नहीं हो सकता क्योंकि डाक्टर के कथनानुसार यदि ऐसा किया गया तो मेरी जान को खतरा है।यह सुनकर दीदी ने आपको मुझसे शादी करने के लिए मज़बूर कर दिया। जबकि उन्हें यह नहीं पता कि,मेरा कभी बलात्कार हुआ ही नहीं मैं तो आपके बच्चे की मां बनने वाली थी। मुझे आपने अपने आफिस में नौकरी दिलाई और आफिस टूर के नाम पर हम लोग हर महीने दस दिनों के लिए हनीमून पर जाते थे और हमारी बेचारी भोली-भाली दीदी यह कभी समझ ही नहीं सकीं की हमारे बीच क्या चल रहा है।" मीरा की छोटी बहन रूपा ने बेशर्मी से हंसते हुए कहा   अपने पति और बहन के विश्वासघात को सुनकर मीरा का पूरा शरीर सुन्न पड़ गया उ...

दहलीज

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  मन के आंगन की दहलीज पार करना  औरत के लिए आसान नहीं होती मन की पीड़ा मन में छुपा, झूंठी मुस्कान लिए फिरती हैं, दिल की चुभन हर पल दर्द देती है फिर भी मुस्कान होंठों पर होती है, जो मन के दर्द को छुपाकर घर आंगन संवारती हैं, मन की पीड़ा किसी से नहीं बताती हैं, वही तो संस्कारी और आदर्श नारी का सम्मान पाती हैं, जिस दिन कोई औरत मन की दहलीज पार कर, अपने मनोभावों को व्यक्त करती है, ख़ुद के लिए थोड़ा सुकून थोड़ी खुशी मांगती है, प्रश्नचिन्ह उठते हैं उनकी परवरिश पर, मन या घर की दहलीज लांघने  की इजाजत, ,औरत को न थी न है और न कभी होगी, जो दहलीज लांघने की जुर्रत करतीं हैं, प्रश्नों के घेरे से बाहर नहीं निकलती हैं। डॉ कंचन शुक्ला

शराबी पति

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    " यह सिलसिला रोज का होने लगा है कोई एक दिन की बात नहीं है अब तुम हर रात शराब के नशे में घर आते हो अब मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकती अब तुम्हें कोई न कोई फ़ैसला लेना ही होगा तुम्हें पत्नी और बच्चे प्यारे हैं या शराब यह निर्णय तुम्हारा है।अब मेरे बर्दाश्त की सीमा समाप्त हो गई है बच्चे बड़े हो रहें उनके जीवन पर तुम्हारी इस हरकत का क्या असर पड़ेगा तुम्हें इसका अहसास ही नहीं पर मैं अपने बच्चों के भविष्य के साथ कोई खिलवाड़ नहीं कर सकती"सुहाना ने गुस्से में भरकर कठोर शब्दों में अपने पति सुनील से कहा।   सुनील ने गुस्से में सुहाना को देखा और बोला यह मेरा घर है तुम कौन होती हो मुझ पर हुक्म चलाने वाली मैं शराब नहीं छोडूंगा रहना है तो रहो वरना जहां चाहो चली जाओ तुम्हारे जैसी औरत की मुझे जरूरत नहीं है जो अपने पति को अपने इशारों पर नचाने की कोशिश करे" इतना कहकर सुनील अपने कमरे में चला गया सुहाना आश्चर्यचकित होकर अपने पति के इस रूप को देखती रह गई उसे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि, सुनील ऐसा भी कह सकता है तभी वहां उसकी सास आ गई और सुहाना को गुस्से में देखते हुए बो...

बचपन की यादें

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मुझे याद आई आज बचपन की रातें, दादी की लोरी नानी के किस्से, रातों में सुनते थे गोदी में छुप के, नानी सुनाती थी जब भी कहानी, कहानी में होती थी परियों की रानी, जादू के घोड़े पर एक आता था राजा, परियों की रानी जब राजा से मिलती, दोनों की बनती थी प्रेम कहानी, तभी एक थी जादूगरनी भी आती, राजा से कहती करो मुझसे शादी, नहीं तो करूंगी जादू से वश में, पर राजा न माने जादूगरनी की बातें, तब जादूगरनी ने अपना जादू चलाया, राजा को उसने किया अपने वश में, तब परियों की रानी ने चक्कर चलाया, जादूगरनी का जादू उसी पर चलाया,, जादूगरनी मरी राजा परी के पास आया, ऐसी कहानी अब होती कहां है, नानी और दादी  के किस्से अब ख्वाबों में होते, अब बच्चों की रातें मोबाइल पर बीतें, न पहले सी बातें न पहले सी रातें, अब बच्चे न सुनते रातों को किस्से, नानी के किस्से हुए अब पुराने, दादी की लोरी अब सुनता कौन है? बचपन की यादें बहुत हैं सताती, कोई फिर से ला दे वो बीता हुआ कल, नानी के किस्से में परियों की रानी।। डॉ कंचन शुक्ला स्वरचित मौलिक

दिल में चुभी किरिंच अंतिम भाग

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   " गार्गी बहू!!! मुझे लगता है कि इस घर में सब पागल हो गए हैं, पार्वती भाभी पागलपन की हरकत कर रही हैं पर तुम्हें क्या हो गया है जो तुम इतने आत्मविश्वास के साथ कह रही हो की तुम इन्हें अभी इस खानदान का वारिस दे दोगी, पार्वती भाभी तुमसे इस खानदान का वारिस मांग रही हैं पेड़ पर लगा कोई फल नहीं जो यहां पेड़ पर लटका हुआ है और तुम तुरंत उन्हें तोड़कर दे दोगी। मज़ाक की भी कोई सीमा होती है। पार्वती भाभी आप उम्र के जिस पड़ाव पर हैं क्या आप को इस तरह की बेतुकी बातें करनी चाहिए?? मुझे तो अपने आप पर गुस्सा आ रहा है कि, मैं यहां आई ही क्यों, और गार्गी बहू मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद बिल्कुल नहीं थी? तुम लोगों ने रायबहादुर प्रताप ठाकुर के खानदान की मान-सम्मान और उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई है मैं तुम दोनों को कभी माफ़ नहीं करूंगी। हमारे खानदान पर आज तक किसी ने आंख उठाकर देखने की कोशिश नहीं की है और तुम दोनों ने इस खानदान पर लोगों को हंसने का मौका दे दिया। ठाकुर रूद्रप्रताप मैं तुमसे प्रश्न करतीं हूं तुम इस खानदान के स्तंभ हो फिर तुमने इस स्तम्भ को खोखला करने की इजाजत अपनी मां और पत्नी को कैसे दी...

दिल में चुभी किरिंच भाग ८

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          " क्या हुआ भाभी आप इतनी परेशान क्यों हैं"? लक्ष्मी ने पार्वती जी से पूछा पर उनके मन में भी यह विचार बार-बार उठ रहे थे कि, गार्गी ऐसा कौन-सा उपहार देना चाहती है अपनी सास को,     " लक्ष्मी मैं बहू के विषय में सोचकर परेशान हूं पता नहीं इसे क्या हो गया है यह पहले ऐसी बिल्कुल भी नहीं थी मेरी हर बात को सिर झुकाकर चुपचाप सुन लेती थी।पर अब यह व्यंग्यात्मकता लहज़े में बोलती है हर बात का जवाब देती है इसकी बातों से लगता है जैसे इसके मन में कोई रहस्य छुपा हुआ है" पार्वती जी ने परेशानी भरे  लहज़े में कहा    " मुझे यहां तो सभी रहस्यमई लगते हैं अब इस घर में पहले जैसा कुछ भी नहीं है मुझे लगता है कि, भैया की मौत के बाद यहां सब कुछ बदल गया आपका व्यक्तित्व भी तो समझ नहीं आया मुझे जो अपनी ही बेटी का जीवन बर्बाद कर दे वह बहू के साथ अच्छा कैसे कर सकती है। आपने गार्गी बहू के साथ कुछ ऐसा पहले किया होगा अब वह भी अपना बदला ले रही होगी यह हवेली तो मुझे घर कम षड़यंत्र का अड्डा ज्यादा लगती है" लक्ष्मी ने गम्भीर लहज़े में जवाब दिया।     " बुआ...

दिल में चुभी किरिंच भाग 7

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   " या खुदा तुमने यह कैसा मंज़र दिखाया है, अब तक तो हुस्न के कदमों में, इश्क़ ने अपना सिर झुकाया है, पर यहां तो नज़ारा ही कुछ और है, हुस्न यहां इश्क़ के कदमों में झुका है, हुस्न मुस्कुराए तो इश्क़ सज़दे करता है, यहां तो हुस्न के मुस्कान पर, इश्क़ ने पहरे लगाएं हैं।।   " मेरा इज़हारे मोहब्बत कैसा लगा ठाकुर साहब पसंद तो आया होगा मैं जानती हूं" गार्गी ने मुस्कुराते हुए कहा। " तुम्हारा दिमाग ख़राब हो गया है जो ऐसी बातें घर के बड़ों के सामने कर रही हो" रूद्रप्रताप ने गुस्से में दांत पीसते हुए कहा। " शुक्रिया शुक्रिया आप का रूद्र जी आपको मेरा इज़हारे मोहब्बत करने का तरीका पसंद आया पर मैंने सबके सामने अपनी मोहब्बत का इज़हार किया शायद यह आपको पसंद नहीं आया। मैं भी कितनी बेवकूफ हूं मैं तो भूल गई थी कि, आपको तो एकांत में दुनिया वालों से छुपकर इश्क़ करने की आदत है आप अपने इश्क़ मोहब्बत की बातें सिर्फ़ अपनी मां को बतातें हैं। मैंने जो कहा वह सच है ना ठाकुर साहब"??  लेकिन एक बहुत बड़ी गलती मुझसे हो गई मुझे अपनी मोहब्बत का इज़हार नानाजी के सामने नहीं करना चाहिए था...

दिल में चुभी किरिंच भाग 6

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" पिताजी आप अचानक यहां सब कुशल तो है आपकी तो तबीयत ख़राब थी इसलिए आप शादी में नहीं आए थे अब तबीयत कैसी है आपकी"? पार्वती ने घबराते हुए आश्चर्य से पूछा।   " पार्वती मेरे लिए इतना परेशान होने कि ज़रूरत नहीं है मैं 90 साल का हो गया हूं अब तो जब चाहे ईश्वर का बुलावा आ जाए इसलिए ज्यादा दुखी होने की जरूरत नहीं है। अच्छा क्या यहीं दरवाजे पर खड़ी रहकर बात करोगी या अंदर आने के लिए भी कहोगी" भवानी ठाकुर ने हंसते हुए कहा    " आइए आइए पिताजी आपको देखकर मैं सब कुछ भूल गई" पार्वती जी ने हंसते हुए कहा भवानी ठाकुर और कुंदन ठाकुर अंदर आ गए।    " प्रणाम चाचा जी" लक्ष्मी जी ने हाथ जोड़कर भवानी ठाकुर से कहा     लक्ष्मी जी को देखकर भवानी ठाकुर और कुंदन के चेहरे पर घृणा के भाव उभर आए पर तुरंत उन्होंने अपने चेहरे पर बनावटी हंसी लाते हुए कहा " कैसी हो लक्ष्मी बिटिया? वर्षों बाद तुम्हें देख रहा हूं तुम्हें देखकर अपने दोस्त प्रताप की याद ताजा हो गईं"    " मैं ठीक हूं चाचा जी आप लोग कैसे हैं"? लक्ष्मी ने भी मुस्कुराते हुए पूछा    " तुमने हमें ठीक र...