दहलीज



  मन के आंगन की दहलीज पार करना
 औरत के लिए आसान नहीं होती
मन की पीड़ा मन में छुपा,
झूंठी मुस्कान लिए फिरती हैं,
दिल की चुभन हर पल दर्द देती है
फिर भी मुस्कान होंठों पर होती है,
जो मन के दर्द को छुपाकर
घर आंगन संवारती हैं,
मन की पीड़ा किसी से नहीं बताती हैं,
वही तो संस्कारी और आदर्श नारी का सम्मान पाती हैं,
जिस दिन कोई औरत मन की दहलीज पार कर,
अपने मनोभावों को व्यक्त करती है,
ख़ुद के लिए थोड़ा सुकून थोड़ी खुशी मांगती है,
प्रश्नचिन्ह उठते हैं उनकी परवरिश पर,
मन या घर की दहलीज लांघने  की इजाजत,
,औरत को न थी न है और न कभी होगी,
जो दहलीज लांघने की जुर्रत करतीं हैं,
प्रश्नों के घेरे से बाहर नहीं निकलती हैं।
डॉ कंचन शुक्ला

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