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आम कितना ख़ास

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आम कितना ख़ास बन जाए, दिल में उसकी जब ठन जाए, अलग पहचान बन जाता है, सितारा सा चमक जाता है। कहने को वह आम है रहता, साधारण सा एक नाम है रहता, पर ख़ास बनते ही देर ना लगती, दुनिया फिर केवल उसे ही तकती। किसी को आम भले ही मानों, पर सम्मान उसके लिए भी जानों, क्या पता कब चमक सा उठे, साथ से तुम्हारे कदम ना रुके। पूजा पीहू दिल्ली

अब है ज़माना आग पानी का

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अब है ज़माना आग पानी का, विरोधाभास भरी ज़िंदगानी का, स्वार्थ से लिप्त ह्रदय हुए सबके, वर्चस्व हुआ काम में बेईमानी का। इस तरह ही चल रहा अब संसार, कहीं जीत अपनी तो कहीं है हार, विरोध से पार फिर भी है जीना, कहाँ भरोसा क्षणभंगुर ज़िन्दगानी का। अब है ज़माना आग पानी का। ईर्ष्या, द्वेष, कलह से दूर सदा रहकर, अपने भावों को सदा अपनों से कहकर, बीज प्रेम का हमेशा बढ़ाते जाना है, नायक बनना सदा अच्छी कहानी का। अब है ज़माना आग पानी का। पल-पल यह भी बीत जाएगा, ना फ़िर लौट कभी यह आएगा, सुख, दुःख भरे जीवन में मेहकों तुम, मज़ा लो जीवन की हर रवानी का, अब है ज़माना आग पानी का। पूजा पीहू दिल्ली

प्रेम की निशानी

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हृदय में मेरे हैं इतने प्रेम उदगार, तेरे लिए मेरे प्रियतम हर बार, पर कैसे अपनी कहानी बताऊं, काश! कोई प्रेम की निशानी सजाऊं। दुनियादारी के इतने लगे हैं पहरे, दिल में प्यार फिर भी हैं गहरे, कैसे तुमसे अपनी ये पीड़ा छुपाऊं, काश! कोई प्रेम की निशानी सजाऊं। माना तन से तुम मेरे पास नहीं, तुमको ऐसे पाने की आस नहीं, बिछुड़न को कैसे अब सह पाऊं, काश! कोई प्रेम की निशानी सजाऊं। रहना चाहे तुम कितनी भी दूर, परिस्थितियों में बेशक मजबूर, दिल की बात फिर कैसे पहुचाऊं, काश! कोई प्रेम की निशानी सजाऊं। पूजा पीहू

भेदभाव

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मानों सबको सदा ही समान, रहे सदा इस बात का ध्यान, भूले से भी ना भेदभाव हो, तभी बन सकोगे अच्छे इंसान। भेदभाव में आख़िर रखा क्या, बन जाता है यह अक्सर सजा, भावों को सर्वोपरि रखना ही, ज्ञानी की होती है अहम पहचान, तभी बन सकोगे अच्छे इंसान। सपने अपने चाहे बड़े रखना तुम, पर चकाचौंध में ना हो जाना गुम, कि दुःख सुख ना दिखे किसी का, या व्यक्तित्व का ना रहे कभी भान, तभी बन सकोगे अच्छे इंसान। जीवन सबका ही होता है एक, फिर क्यूं ना जी सके बनकर नेक, भेदनाव को त्याग कर बढ़ो आगे, व्यक्ति को ना समझो कभी सामान, तभी बन सकोगे अच्छे इंसान। पूजा पीहू

तेरे जाने के बाद

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तेरे जाने के बाद भी, खुशबू तेरी रह जाती है, सिमट सिमट कर सांसों में, बीती कहानी कह जाती है। रोम रोम सा निखर उठता है, काया मोम बन ढह जाती है, तेरे संग जाती हैं हसरतें मेरी, आंखे कहानी सब कह जाती हैं। कहने वाले क्या क्या ना कहते, बातें हवा सी बन बह जाती हैं, मीरा सी बनी अडिग वही पर, हर बात को फिर सह जाती है। पूजा पीहू

नया अवसर

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गुज़र गया कोई पल बुरा तो, कभी भी ये सोच घबराना ना, आएगा फिर नया अवसर कल, हौंसला बस अपना गंवाना ना। बदल जाती हैं कभी तकदीरे भी, हाथों में छुपी गहरी लकीरें भी, बस ये सोच काम करते जाना तुम, टूटन को मन में कभी बसाना ना। गुज़र गया कोई पल बुरा तो, कभी भी ये सोच घबराना ना। शाश्वत नहीं कुछ भी दुनिया में, बदलाव से कभी ढह जाना ना, ऐसे ही चलती ही ये सृष्टि सदा, भ्रम से अपना दिल बहलाना ना। गुज़र गया कोई पल बुरा तो, कभी भी ये सोच घबराना ना। पूजा पीहू

असंभव

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असंभव नहीं कुछ दुनिया में, बस मन करने से कभी डरता है, ठान ले जो एक बार कुछ भी, फिर कहां किसी से कभी डरता है। सोच से ही हर कार्य हैं होते, सोच से ही हर कोई आगे बढ़ता है, सोच होगी सही दिशा में अगर, फिर कहां किसी से भी डरता है। मजबूत होगा मन यदि किसी का, तन भी सब बाधाएं फिर हरता है, विकट हो चाहे समय कभी भी, फिर कहां किसी से डरता है। पूजा पीहू

अनुभव

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अनुभव बहुत ही बड़ा ज्ञान, समय के साथ पकता जाता, कर्म इसमें रहता सदा प्रधान, खाली बैठे बैठे कभी ना आता। कभी ये बनता विरासत समान, एक दूजे को दे बढ़ता ही जाता, विशालता से भरी सी दुकान, ख़तम होने का अवसर ना आता। बड़ों की जागीर बने कभी, कभी बचपन भी सिखा जाता, हर उम्र में यह अर्जित होता, हर समय चालू रहता है खाता। बस ध्यान रहे की सही दिशा हो, सफलता को तब हर कोई पाता, गलत दिशा में जाकर सभी का, कर्म मिट्टी में  है मिल जाता। अनुभव बहुत ही बड़ा ज्ञान, समय के साथ पकता जाता। पूजा पीहू

अंतिम दौर

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आ रहा है अंतिम दौर, कर लो जरा अब गौर, ना फिर वापस आयेंगे, हम यादें ही कहलायेंगे। पूरे कर दिए सारे काज, कभी तो देदो अपना आज, कल कहां हम रह जाएंगे, हम यादें ही कहलायेंगे। पाल पोस तुम्हें बड़ा किया, धरोहर देकर खड़ा किया, इतना अधिकार तो जताएंगे, हम यादें ही कहलायेंगे। पूजा पीहू

अंधा कानून है

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अंधा कानून है यहां, रुतबे का बोलबाला है, पूछता नहीं कोई यहां, किसने किया घोटाला है। चंद सिक्कों की खातिर यहां, इज्ज़त नीलाम हो जाती है, पूछता नहीं कोई यहां, हुनर मंद का मुंह काला है। अरसा लगता हैं इंसाफ में, टूट जाता पाने इसे पाने वाला है, पूछता नहीं कोई यहां, सबके मुंह पर लगा ताला है। अंधा कानून है यहां, रुतबे का बोलबाला है। पूजा पीहू

बाबुल का आंगन

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बाबुल का आंगन जब से छूटा है, बचपना दिल का भी जैसे टूटा है, अब बस जिम्मेदारियों का बोझ है, ना वो प्यार दुलार अब अनूठा है, बाबुल का आंगन जब से छूटा है। जब तक उनकी छांव में पली थी, मर्जी मानों बस मेरी ही चली थी, कभी बगिया थी मैं भी किसी की, अब बांध दिया जैसे कोई खूंटा है। बाबुल का आंगन जबसे छूटा है। चाह कर भी अब मैं आ नहीं पाती, फर्ज़ अपना कभी निभा नहीं पाती, बेचैन से दोनो ओर बैठे हम तुम, जैसे किसी ने अपना कुछ लूटा है। जबसे बाबुल का आंगन छूटा है। पूजा पीहू

भागदौड़ की ज़िंदगी

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भागदौड़ की ज़िंदगी है, जीना इतना आसान नहीं, सुबह से शाम तक देखो, किसी को आराम नहीं। कहीं कमाने की होड़ लगी, कहीं मजबूरी की दौड़ लगी, हर पहर हर घड़ी बस सबको, खाने का भी अब ध्यान नहीं, भागदौड़ की ज़िंदगी है, जीना इतना आसान नहीं। जाने कब संतुष्टि आएगी, जाने कब चिंता हट पाएगी, जाने कब सब मिल बैठेंगे, किस दिन होगा कोई काम नहीं, भागदौड़ की ज़िंदगी है, जीना इतना आसान नहीं। पूजा पीहू

प्यारी मां

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हर खुशी तुझसे है प्यारी मां, रब सदा तेरी ख़ैर करे, जग से तू कब हारी मां, कोई क्यूं कभी तूझसे बैर करे। हर खुशी मिले तुझे भरपूर, दुःख रहे सदा तुझसे दूर, ईश्वर की तुझ पर मेहर रहे, रब सदा तेरी ख़ैर करे। पूजा पीहू

भूख

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कहीं भूख से बुरा हाल, कहीं अन्न ख़राब हो रहा, देख ए ईश्वर ज़रा तू भी, चैन कहीं अब खो रहा। भूखे को ना पूछे अब कोई, अपने स्वार्थ के बीज बो रहा, जिए या मरे चाहे अब कोई, तू भी कहाँ छुप रो रहा। बिलख रहें हैं कहीं बच्चे, तो पेट बांधे युवक सो रहा, बरसा दे फिर रहमत तू ही, बंद कर दे के जो हो रहा। पूजा पीहू

शिक्षा एक व्यवसाय

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शिक्षा एक व्यवसाय बना, जहाँ ऊंची बोली लगती है, भोली भाली सी जनता को, बहला कर चतुराई से ठगती है। जिसका जितना ऊँचा दाम, उसका उतना ऊँचा है नाम, वक़्त पड़े पर पता चलता है, कितना आता यह दिखावा काम, बाज़ार बना है ठेकेदारों का, जहाँ शिक्षा कोड़ी में बिकती है। शिक्षा एक व्यवसाय बना, जहाँ ऊंची बोली लगती है। हुनर यहाँ है धक्के खाता, धन से सब छुपाया जाता, कहने सुनने वाले यहां बहरे, अंधा बन कोई मार्ग दिखाता, कैसे कोई बढ़ेगा अब आगे, जब आधार बन गया नकदी है शिक्षा एक व्यवसाय बना, जहाँ ऊंची बोली लगती है। पूजा पीहू

जैसे को तैसा

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नियम जीवन का शाश्वत है ऐसा, सदा मिलता है जैसे को तैसा, बिन मतलब के कौन रिश्ता निभाए, जीवन पथ का यह नियम कैसा। अपने पर भी अब पूछे कब है, रिश्ता मतलब से निभता सब है, झूठ फ़रेब चाहे कुछ भी कर लो, मिलेगा वही करोगे तुम जैसा। सदा मिलता है जैसे को तैसा।। पूजा पीहू

संगीत के सात सुर

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संगीत के सात सुर, सबकी अपनी मिठास, हर सरगम की अलग धुन, हर सरगम में कुछ ख़ास। इंद्रधनुष के रंगों सा इनका, बनता अजब ही मेल, संतुलन में बजे अगर ये, बनता अद्भुत खेल। ऐसे ही कुछ भाव मन में, हम सबके सदा ही रहते, सबको थामे रखें अगर हम, जीवन में ना कभी भी ढहते। पूजा पीहू

ध्रुवतारा

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ध्रुवतारा सा बनकर चमकुं मैं सारे आसमानी सितारों में, अलग ही पहचान बने मेरी, जैसे महके फूल बहारों में। बीड़ बड़ी है दुनिया में यूँ तो, पर अलग बनूँ मैं हज़ारों में, बुराइयों से दूर रहूँ सदा बस, निर्मल बनूँ सब सितारों में। पूजा पीहू

रंग

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लाल रंग पहन कर, भाग्य सजाया जाता है, श्वेत रंग वही किसी का, बैरी सा बन जाता है। दोष है दृष्टिकोण का, क्यूँ नारी को ठुकराया जाता है, केवल रंग के भेद मात्र से, व्यक्तित्व बतलाया जाता है। विधवा हो या सधवा हो नारी, नहीं है कभी किसी पर भारी, जननी, देवी तब भी है वह, ना छीनों उसकी खुशियां सारी। पूजा पीहू

हड़ताल

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माँगे पूरी ना हो कभी तो, हड़ताल करनी पड़ती है, हो रही मनमर्ज़ी की फ़िर, पड़ताल करनी पड़ती है। बिन कहे समझ ना आए, सबको जी हजूरी भाए, ऐसे हालातों में लड़कर, मुहाल करनी पड़ती है। माँगे पूरी ना हो कभी तो, हड़ताल करनी पड़ती है। पूजा पीहू