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तितली का जीवन चक्र

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★★★★★★★★★★★★★ उस बाग में..., हरे पत्तों के ऊपर.. वह चिपचिपा..सा..नन्हे नन्हे अंड समुहों जैसा.. देखकर मैंने सोचा था ..,ये क्या है..., ...फिर उनसे एक रेंगते..से जीव का उदय होना... ...उन हरे पत्तों को ही भोजन बना लेना         ..उन्ही में घर बसा लेना......, ....देखकर मैंने सोचा था..,ये क्या है...., कुछ समय  अंतराल में उस रेंगते जीव का .. बढ़ते रहना...और  कठोर हो जाना... फिर  एक रेशमनुमा खोल  में खुद को परिणत कर लेना.. ..तब भी मैंने सोचाथा..,ये क्या है... कुछ हफ्तों में अपनी आँखों के सामने.. उस बदरंग से खोल को फटते देख.. और उसमें से रँगबिरँगी तितली को उदित होता  देख मैं चौंक गया...था...क्या ये तपस्या है... उस ककून का..खुद को बदल लेने की जिद.. ..मैंने पूछा था..,कुदरत से..आखिर तुम क्या हो!! ***** स्वरचित.... सीमा प्रियदर्शिनी सहाय ©®

सैनिक

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आज फिर सरहदों पर गोलियां चलीं हैं देश का एक सपूत आज फिर शहीद हो गया है उसका भी अपना एक घर संसार है  फिर भी देश के लिए आज वह कुर्बान हो गया है वह देश का सैनिक है देश का अभिमान है  वह देश के लिए गोलियां खाता अपने सीने में है । *** स्वरचित सीमा प्रियदर्शिनी सहाय ©®

एक जासूस

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अंतरिक्ष में बैठा वह जासूस पलपल की खबरों से अवगत कराता किधर से बादल उठ रहे हैं किधर से है तूफानों का अंदेशा वह जासूस न तो सजीव है न ही निर्जीव हमारे विज्ञान का महज एक कार्यरूप है। *** स्वरचित सीमा..✍️ ©®

साधना

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थाम कर हौसला  बुलंद कर मन को उतरता है वीर पिता  लेकर निर्बीज बीज  आशाओं और उम्मीद लिए मिट्टी में डालकर बीज जतन से सींचता है अपने स्नेह और जल से जब धरती की कोख से फूटतीं हैं नवपल्लवित पादपें सफल हो जातीं हैं साधना उस पिता कृषक की ।। **** स्वरचित सीमा प्रियदर्शिनी सहाय ©®