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Showing posts with the label Sima Kausal

उम्रदराज लोग

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कैसे होते हैं ना यह उम्र बिताए हुए उम्रदराज लोग । कुछ हसंते से कुछ रोते से  कुछ पाते से कुछ खोते से , कुछ अपनों से बतियाते हैं  कुछ अपनों से ही दूर नजर आते हैं।  कैसे होते हैं ना यह उम्र बिताए हुए उम्र दराज लोग। कुछ मोह माया में हर पल है मगन  कुछ प्रभु का करते हैं सिमरन,  कुछ घर में पड़े रहते बेकार  कुछ के हिस्से में नहीं है प्यार। कैसे होते हैं ना यह उम्र बिताए हुए उम्र दराज लोग। कुछ सब कुछ दे बैठे अपनों को  कुछ ढूंढते टूटे सपनों को,  कुछ पेंशन का करते इंतजार  कुछ के जीवन में छाई बहार। कैसे होते हैं ना यह उम्र बिताए हुए उम्रदराज लोग। कुछ रिश्तो से छल पाते हैं  कुछ ना आते हैं ना जाते हैं  जिनको माना जीवन अपना  वही नजरें अब चुराते हैं । कैसे होते हैं ना यह उम्र बिताए हुए उम्र दराज लोग। जीवन में संध्या आएगी  शायद रंगना बिखेर पाएगी , खुद को कर लो तुम खुद तैयार  किसी का क्यों देखो इंतजार।  कैसे होते हैं ना यह उम्रबिताए हुए उम्र दराज लोग। खुद ही जीवन बिताना है अंत का नहीं ठिकाना है , बस जेब सेहत ना खाली हो  किसी ...

इश्क

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वह चांद में बैठी बूढ़ी अम्मा  एक दिन हंसकर मुझसे बोली,  सुन ओ भोली , रोज चांद, सूरज को तू टेके माथा  घर गृहस्थी, औलाद का मोह तेरा बढ़ता जाता।  तू मांगे भरे दिल से उनके लिए दुआएं , देती रहती सदा तू उन्हें शुभकामनाएं।  पर पगली तेरी जैसी न जाने कितनी सीमाएं  यहां चांद पर करती है इंतजार,  उनके मरने के बाद  कोई तो हो जो उन्हें मनाए , कोई तो हो जो उन्हें याद कर पाए।  पर यह कमबख्त ,खुदगर्ज ,रिश्ते नाते  सब बस मतलब को साथ निभाते,  अपने मतलब को पूछते  ना हो मतलब  तो जीते जी ही भूल जाते, हां जो खुद पर रखते स्वाभिमान ,, देते हैं बस उन्हें ही लोग सम्मान।  हमारी सीख , मत मांग प्यार की भीख , कर तू पूजा ,जप ,तप ,नेम अचारा,  पर खुद से सबसे पहले इश्क कर मेरे यारा। स्वरचित सीमा कौशल यमुना नगर हरियाण

एक सीख

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तुम लगते हो क्यों मुझे बहुत  ही निरीह  जाने असहाय से लगते हो क्यों कभी कभी मैं अबला, निसहाय, बेचारी होकर भी  शायद कर लूं गुजारा बिना सहारा,  पर तुम पुरुष बलशाली ,शासक ,अहमी ,सर्वशक्तिमान  होकर भी शायद रह जाओ बेसहारा। नहीं कर पाओगे गुजारा , शायद सामंजस्य बिठाना तुम्हें नहीं आता  और बिना मेरे शायद जीवन तुम्हें नहीं सुहाता। तुम्हारा बात बेबात झल्लाना  मुझे पल-पल जतलाना  पैसा कैसे हैं कमाना ? पर नहीं कहा कभी मैंने कि गृहस्थी का बोझ  कैसे पड़ता है उठाना  कैसे पड़ता है इच्छाओं को पल-पल मारना  अनचाहे मेहमानों का बोझ पड़ता है उठाना? क्योंकि तुम्हें नहीं है एहसास  कि आज महंगाई ,ग्रहणी और रसोई  एक साथ एक दूसरे से रहे हैं जूझ, एक एक वस्तु का पता वस्तुत: रहे हैं पूछ उस पर तुम्हारे बिन बुलाए मेहमान , बजट को गड़बड़ाते हैं और सच में  ना चाहते हुए भी रिश्तो में कड़वाहट लाते हैं। जरा सोचो  क्या अकेले तुम इन सब को संभाल पाओगे  या फिर इन सब में ही उलझ कर रह जाओगे पर फिर भी जिंदगी का नहीं पता  सांसे कब दे जाए दगा  ...

तुम डरते हो मुझसे

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तुम डरते हो मुझसे हां ,डरते हो तुम मुझसे अक्सर  पर तुम्हारा अहम तुम्हें मानने नहीं देता , मेरा आगे बढ़ना पंख फैलाना  तुम्हें कुंठित है कर देता, तुम्हारा कुत्सित मन स्वीकार नहीं कर पाता  मेरी तरक्की मेरी सफलता । बस घुंघट ,पर्दा , चूड़ी, कंगन में चाहते हो  मुझे उलझाए रखना, बच्चे पैदा करना  उन्हें पालना ,खाना बनाना घर संभालना, और चाहे अनचाहे तुम्हारी हवस को मिटाना। उसके बाद भी अगर मैं करती हूं  हिम्मत अपनी पहचान बनाने की तो  तिलमिला जाते हो , एक हलचल होती है तुम में  और आदिमानव के इस समाज में  क्या करना है घर के बाहर  कौन से है तेरे यार , बात बात पर ताना ,बात बात पर मार कभी शारीरिक ,कभी मानसिक तौर पर  तुम हर पल करते हो प्रताड़ित  ताकि ना मैं घर से बाहर जाऊं  ना मैं कभी खुद को साबित कर पाऊं। और इसी डर पर मुझे आती है हंसी  वर्जनाओं के घेरे में मैं रहती हूं फंसी  पर ,पर फिर भी मैं उड़ती हूं उड़ान बना पाती हूं अपनी पहचान  और तुम नक्कारखाने में तूती की तरह  बजते जाते हो क्योंकि सच में तुम मुझसे  डरते जाते ...

बोनसाई

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हो तुम मोहताज हर पल  मेरी दुआओं के,  मेरे माने हुए रीति-रिवाजों के  मेरे श्रृंगार के, मेरे हार परिहार के। गर्भ में हलचल होते ही  दुआएं मांगी जाती हैं तुम्हारे लिए  पर आ जाती है फिर भी हम उसके बाद भी कोशिशें होती हैं हमें नेस्तनाबूद करने की। सगी मां के द्वारा अक्सर खाने में ,घूमने में, पढ़ने में  किए गए भेदभाव भी नहीं रोक पाते हमें आगे बढ़ने से।  एक दिन मांग ना भरने पर सासू मां का तिलमिलाना उनके बेटे की उम्र कम ना हो जाए  पर मेरी मां  तो कभी नहीं तिलमिलाती  तुम्हारे करवा चौथ ना रखने पर । क्योंकि सबको पता है कि हम औरतें पनप जाती हैं जंगल में फैली बेतरतीब बेल की तरह,  और तुम्हें बोनसाई की तरह जरूरत है  हमेशा छांव की देखभाल की । अनंत काल से आधीन हो  हमारे सोलह सोमवार के व्रतों के   पर हम बिना किसी दुआ के,  बिना किसी व्रत के, बिना किसी बात के  यूं ही तो हो जी लेती है । दफ्तर से आते ही तुम्हें एसी और गर्म चाय  की जरूरत होती है  और हम दफ्तर से लौटते  सब्जी भाजी खरीदते  पसीने से तरबतर  फिर स...

कुदरत

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आसमां की देखो व्यथा  पल में नक्षत्रों से वह सजा,  पल में होती रात अंधेरी   पल में होती रात रूपहली ।  सूरज का देखो प्रकाश  खिलते देखो नित नए पलाश , पल में होता है वह भी खत्म  पल में फैला जाता है तम। बड़े-बड़े पर्वत पहाड़  छूते नित नवीन आकाश , पल में झर झर नीचे आते  मिट्टी से मिट्टी मिल जाते । तुम और हम तो आम ही प्राणी  मिलती देखो लाभ और हानि,  हानि से बस मत घबराओ  लाभ मिले तो मत इतराओ। यश अपयश सब उसके हाथ  हमरी तुमरी क्या है बिसात, सीता पर लांछन था लगाया  द्रोपदी को बीच सभा नचाया। कितने बड़े ही ज्ञानी ध्यानी  कितने बड़े-बड़े अवतार,  निर्मम नियति नाच नचाए  बड़ा छोटा यह देख ना पाए। रहे खुशहाल समय के सदके ' सीमा' ने यह सीखा भाई , यश ,अपयश, लाभ ,हानि  जीवन ,मृत्यु कुदरत की कहानी। स्वरचित सीमा कौशल यमुनानगर हरियाणा

बुढ़ापा

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अशक्त तन अशक्त मन  करता है बस करुण क्रंदन , मुक्ति की है अभिलाषा  इच्छाओं में फिर भी वासा। कैसा होता है ना यह बुढ़ापा??? ना सुने कोई ना कहे कोई  करे कोई सहे कोई , वेदना से ग्रसित मन  शिथिल होता तन बदन।  कैसा होता है ना यह बुढ़ापा??? लालसा बढ़ी रहे  बीमारियां जकड़ी रहे,  ना मान ना सम्मान है  एक अनचाहा मेहमान है । कैसा होता है ना ये बुढ़ापा??? पीछे देखे तो दुखित मन  भविष्य का अभी भी चिंतन,  मोह ममता में फंसा यह मन दे चुका अपना सब यह धन। कैसा होता है यह बुढ़ापा??? सभी पर है इसने आना  क्यों रह-रहकर है पछताना , जीवटता से इसे निभाना  जीवन का है अंतिम चलन  ।।। इसी का नाम है बुढ़ापा । सब पर आना है बुढ़ापा। स्वरचित सीमा कौशल यमुनानगर हरियाणा

महिला दिवस

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खुद को अत्यधिक व्यस्त पा रहे थे  क्योंकि हम महिला दिवस मना रहे थे।  सुबह-सुबह काम वाली को  जो कि पति से रात मार खाकर आई थी,  यूं ही कोसे जा रहे थे । क्योंकि हम महिला दिवस मना रहे थे। पतिका नाश्ता, बच्चों का बैग सब आज के दिन  भुलाए जा रहे थे , क्योंकि हम महिला दिवस मना रहे थे।। सास ससुर रात की दाल से रोटी और बच्चे  ऑर्डर का बर्गर खा रहे थे,  क्योंकि हम महिला दिवस मना रहे थे। शाम की चाय, रात का डिनर बनाने की  हम जहमत नहीं उठा रहे थे। क्योंकि हम महिला दिवस मना रहे थे। कीमती साड़ी, डायमंड नेकलेस, नई सैंडल्स  की नुमाइश लगा रहे थे, क्योंकि हम महिला दिवस मना रहे थे। और हम में से कुछ बीती रात ,बीती , शारीरिक ,मानसिक प्रताड़ना से खुद को उबार रहे थे। क्योंकि हम महिला दिवस मना रहे थे। केवल एक दिन महिला दिवस ना मनाएं  खुद को स्वावलंबी ,आत्मनिर्भर, परिपक्व बनाए  न जुल्म करे ,न जुल्म सहें, न जुल्म का साथ दें  और आओ खुद पर करें गर्व करतल ध्वनि से 'सीमा कौशल' का थोड़ा सा साथ दें। देखती हूं दोस्तों कौन-कौन मेरे साथ है। स्वरचित सीमा कौशल...

नफरत के कीड़े

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जिंदगी में यह नहीं करती वादा  कि मैं ही वह आखरी शख्स हूं  जिससे लोग बेपनाह मोहब्बत करेंगे  पर हां यह जरूर है कि लोगों के दिल पर कब्जा है मेरा  पर ऐसा भी नहीं कि नफरत के कीड़े नहीं है मेरे पीछे  पर उनकी तादाद थोड़ी है  पर यह भी सही है कि फसल को सड़ाने के लिए  दिलों को जलाने के लिए थोड़ी सी चिंगारी  काफी होती है किसी का आशियाना जलाने के लिए, लेकिन उन नफरत के कीड़ों को सीने से लगाकर  चलती रहूंगी तो कहीं ना कहीं बाहर आ जाएगी  वह जहर में लिपटी चाशनी मुझ में ,मेरे अल्फाजों में, मेरी तबीयत में  और जो मीठापन, जो खूबसूरती जो दिलकशी छुपी है मेरे अल्फाजों में शायद बिगड़ जाए उसका स्वाद इसलिए रहना दूर नफरत के कीड़ों से   जो  रखेंगे नीयत करने की तुम्हें बर्बाद  वह लहूलुहान करेंगे, पीठ पीछे तुम्हें बदनाम करेंगे  और सामने तुम्हारे दोस्त होने का नाम करेंगे  सलाम ऐसे दो मुंहे दोस्तों को ।  स्वरचित सीमा कौशल यमुनानगर हरियाणा

पेंशन

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पेंशन के लिए खड़ी बूढ़ी दादी को देख  बित बित कर हंसते कर्मचारी।  नहीं जानते उस बूढ़ी की लाचारी  नहीं जानते जिंदगी की रफ्तार में , घर के बूढ़े कितने अकेले हो जाते हैं  और पेंशन के सहारे शायद थोड़ा सा सुकून पाते हैं। पेंशन मानोमरूभूमि मैं मिलता पानी  पेंशन मानो जिंदगी के दरिया की रवानी,  पेंशन मानो जिंदगी की प्यास बुझाती है  और शायद बहू बेटियों की जुबान पर ताला भी लगाती है ।यह पेंशन का दिन दादी की दीवाली  यह पेंशन का दिन लेकर आता खुशियां जाली , दादी के अंगूठे से आते हैं जब पैसे  घर की इच्छाओं का मुंह खुलता सुरसा के जैसे। बड़े छोटों को नहीं जरूरत दादी की दुआओं की  वह सब तो इंतजार में है कड़क पत्ती की हवाओं की दो रोटी को मोहताज दादी  पेंशन के दम पर रोटी, दवा दारू पाती है , नहीं तो उस जैसों की जगह, घर में नहीं कहीं और है  यह वह अच्छी तरह जानती है। ताउम्र निकाल बेटे बहु पोते पालती दादी  काश की होती समझदार  और उसे भी आता व्यवहार में व्यापार,  तो आज भी पेंशन की यूं बंदरबांट ना करती  और पोपले मुंह से रब का फिर भी शुक...

सोशल मीडिया

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सड़क पर गिरा वो नौजवान गबरु    फेंक कर जिसको एक ट्रकभागा जा रहा था  खून से लहूलुहान दर्द से कराहते छटपटाते  और मन ही मन बड़बड़ा रहा था। मां नौकरी मिल गई  मां अब हम भी अच्छे से जियेंगे,  मां अब हम भी रोज रोटी खाएंगे  मां तुम्हारी तपस्या रंग लाई   मेरी मेहनत की कभी तो होगी कमाई  मां खाओ मिठाई। झर झर बहता खून सड़क को रंगता जा रहा था  भीड़ का एक रेला आ रहा था दूसरा जा रहा था  लोग लगातार फोटो ले रहे थे  और आगे सोशल मीडिया पर भेज रहे थे  हजारों लाइक कमेंट आ रहे थे  आंसू भरी आंखें जुड़े हाथों की इमोजी  लगातार भेजे जा रहे थे  और कुछ महान लोगों ने तो उसकी आत्मा की शांति के लिए रेस्ट इन पीस के मैसेज भी भेज दिए थे। पर हाय शुष्क संवेदना हीन  बगैर आत्मा के जीते लोग  दया करुणा सोशल मीडिया पर भेजकर महान बन रहे थे पर उस मां के लाल की मदद नहीं कर रहे थे। और वो मां जिसका जीवन, जिसकी तपस्या, जिसका दूध   सड़क पर बह रहा था  मुझे लग रहा था कि मेरा हिंदुस्तान कहीं ढह रहा था।  किसी असहाय को जरूरत है गर...

वैलेंटाइन डे जरूर मनाओ

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 पर पहले, पहले के रिश्तो को तो निभाओ।  एक वैलेंटाइन अपनी मां को बनाओ  उसके खुरदरे हाथों को चूमों रोटियों से पड़े फफोलों को सहलाओ , आज के दिन उसकी ममता के लिए कृतज्ञ हो जाओ।  तब वैलेंटाइन डे जरूर मनाओ । ।एक वैलेंटाइनअपने बूढ़े पिता को बनाओ  पहनता रहा घिसे हुए कपड़े तुम्हारी खातिर   उसे एक नया उपहार तो दिलाओ।  उसके झुके हुए कंधों को शान से ऊपर उठाओ।  तब वैलेंटाइन डे जरूर मनाओ । एक वैलेंटाइन अपनी बहन को बनाओ  एक गुलाब उसे प्यार से दे आओ  उसके राखी वाले हाथों से ढेरों दुआएं पाओ रहूंगाहमेशा साथ तेरे यह एहसास उसे पल-पल कराओ  तब वैलेंटाइन डे जरूर मनाओ । एक वैलेंटाइन अपनी पत्नी को बनाओ  जो सब कुछ छोड़ तुम्हारी खातिर तुम्हारे पास आई  उसके किए की जिंदगी में नहीं है कोई भरपाई  सुख-दुख, गम खुशी सब साथ निभाएंगे ,उसे यह तो बताओ  तब वैलेंटाइन डे जरूर मनाओ । रखो संस्कारों की धरोहर को अपने पास  इनकी अहमियत है जिंदगी में बहुत खास  प्रेम ,इश्क, लव खुदा की नेमत है  इसके नाम पर गंदगी मत फैलाओ  तब वैलेंटाइन डे...

सपने और मंजिल

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क्यों तोड़ दिए जाते हैं सपने एक अल्हड़ लड़की के  नन्हे नन्हे तोहफे इकट्ठे होते हैं  पर बड़े-बड़े सपने पीछे कहीं छूट जाते हैं । कढ़ाई वाले रुमाल ,क्रोशिए की चादर ,बढ़िया सा डिनर सेट मामा जी के द्वारा दिए गए चांदी का सैट, ताऊजी का दिवाली गिफ्ट  पापा के ऑफिस से मिले कीमती  सिक्के। जब मां उसे दिखाती है गले से लगाती है  और बड़े लाडो से कहती है लाडो यह सब तुझे ही दूंगी , पर भूल जाती है लाडो के सपनों को, जो वह  उड़कर, आसमां में जाकर ,नई मंजिलें पाकर  पूरी दुनिया में नाम कमा कर पाना चाहती हैं। बस बावरी सी हो जाती है मांजब कोई अजनबी प्रस्ताव लेकर आता है लाडो के रिश्ते का  नासमझो की तरह फिसल जाती है,  उसकी तनख्वाह पर ,उसके रुपए पर ,उसकी कोठी ,कार नौकर और ना जाने क्या-क्या उसे दिखने लगता है।   विश्वास रखती है कि हां मेरी लाडो को पढ़ाएंगे  नौकरी कराएंगे बड़े खुले दिलवाले हैं  बड़े भले लोग हैं बस एक दो बार में ही  उन अनजानो के ऊपर विश्वास हो जाता है।  पर नहीं कर पाती विश्वास अपनी लाडो पर  कि क्या वह खुद अपनी पढ़ाई पूरी कर...

सोने की चिड़िया

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गणतंत्र तो है पर स्वतंत्र नहीं  क्या देश आज भी परतंत्र नहीं।।?? की उन्नति की तरक्की आगे आगे बढ़ता जाए  इच्छा सब की  देश फिर से सोने की चिड़िया कहलाएं। नई मंजिले नए हौसले नई राह संभाली है नई दिशाएं नई हवाएं खुशहाली खुशहाली है। पर हावी है आज भी हम पर बहुत सी अलग बेड़ियां आज हवा में उड़ नहीं सकते हमारी नन्ही गुड़िया। भ्रष्टाचार ,बेरोजगारी ,बाल श्रम मुस्कुराता है आज भी देश मेरा राम राज्य कहां बन पाता है? आओ मिलकर हाथ मिलाए कदम से कदम मिलाए दलित ,शोषित और नारी को उसकी असली जगह दिखाएं। तब मिलकर गणतंत्र मनाए सब मिलकर गणतंत्र मनाएं। सब मिलकर झूमे सब मिलकर गाएं कोशिशहो फिर से यही देश सोने की चिड़िया कहलाएं। स्वरचित सीमा कौशल यमुनानगर हरियाणा

हां, हूं, मैं दादी भी नानी भी

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पूछा किसी ने हंसकर कितने बरस की हो  दादी ,नानी जैसी तो नहीं लगती।   लगता नहीं कि तुम पर हावी हुई हो उम्र  बालों में हल्की सी चांदी है कोई ज्यादा तो नहीं  माथे पर सिलवटें है पर ज्यादा तो नहीं, और त्वचा, त्वचा से तो तुम्हारी उम्र का पता ही नहीं चलता कितने बरस की हो, बस बता दो यार। पर मैं सोच रही थी , जीवन के कितने बसंत गंवा कर  खुद को आग में तपा कर, बहुत से गमों को दिल से लगाकर,  अपनी कश्ती  को बीच सागर मैं चला कर अपनी गृहस्थी की नींव जमा कर,  ये दादी नानी की कीमती जगह मिल पाई है मुझे। और जब अपने हाथों से यह नन्हे परिंदे मुझे छूते हैं  जब तोतली जुबान में मुझे बुलाते हैं  जब डगमगाते हुए लड़खड़ाते हैं  जब मम्मी पापा से बचकर मेरे आंचल में छुप जाते हैं  तब जाने कौन से लोक में में घूम आती हूं  और इस अविस्मरणीय सुख को केवल  अपनें यौवन को नव रूप देने के लिए  गवां दूं ये कीमती ओहदा,,  ना  ना,, मैं लगती हूं पक्की दादी नानी जैसी ही  बिल्कुल वैसी ही कसम से,  हां हूं  मैं दादी भी नानी भी। स्वरच...

वह लंबे बालों वाली लड़की

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वह लंबे बालों वाली लड़की हाथ से लपेटे लंबे घने उलझे बालों का  यूं ही बना कर जूड़ा,  कितने ख्वाब लपेट जाती है एक औरत।  जिन बालों को मां तेल में डुबो,  रिबन से मरोड़ कसकस कर गूंथती थी  कि किसी की नजर ना लगे।  जिन बालों को आईने में देख  खुद से ही नजर ना हटती थी कभी।  जब सुनती थी अपने ही लिए उपाधि  वह लंबे बालों वाली लड़की कभी तो गुरूर से आसमान में उड़ जाती थी । उन्हीं बालों को अक्सर लपेट लेती है , लापरवाही से और लिपट जाते हैं  ना जाने कितने कीमती एहसास उसकी अपनी जिंदगी के उलझते से बालों में । जो बचा कर रखी है उसने केवल  एक परिवार को खुश करने के लिए , पति की नई तरक्की के लिए,  बच्चों की नई मंजिलों के लिए,  सबकी एक मुस्कुराहट के लिए,  केवल कुछ अल्फाजों को सुनने के लिए , कि तुम बहुत जरूरी हो हमारे लिए , पर अकाल पड़ा रहता है  ताउम्र उन्हीं दो शब्दों का  जो उसकी खासियत को बताते हैं  हां कमियां गिनते गिनते सब की उम्र निकल जाती है।  उस लंबे बालों वाली लड़की की  ना जाने क्यों न जाने क्यों????? स्...

क्योंकि मैं औरत हूं

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क्योंकि मैं औरत हूं जब-जब आगे बढ़ी इबारतें खिंच गई  जुल्म की सब नुमाइशें भिंच गई, धूप में जल कर बहाया पसीना  पर मेरी तरक्की की कदर करी ना।  क्योंकि मैं औरत हूं गमें दिल पर पड़ गए छाले  पर दिल जमाने के फिर भी रहे काले , क्यों खुशहाली से जलता है जमाना  गमों को कदम दर कदम पड़ता है निभाना । क्योंकि मैं औरत हूं मेरी मोहब्बत को क्यों छीना जमाने  ना बनने दिए गमें दिल के अफसाने , कभी लैला कभी हीर को पड़ा मरना  दुनिया कौम मजहब से पड़ा था डरना। क्योंकि मैं औरत हूं आगे बढ़ती हूं तो मुझे बढ़ने दो  चाहती हूं कुछ करना तो मुझे करने दो,  मत बांधो मुझे बेड़ियों के बंधन में  नया इतिहास रच सकती हूं मैं तन मन से । जी हां ,मैं औरत हूं  जी हां, मैं औरत हूं। स्वरचित सीमा कौशल यमुनानगर

बूढ़ी दादी

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दूध के भगोनें को अपनी उंगलियों से चाटती  नई बहू से छुप-छुपकर बूढ़ी दादी  ना जाने कौनसी तृप्ति पाती थी, जो शायद कभी भरी कटोरी खीर में भी ना  मिल पाती थी ।कभी खा लेती थी हाथ में ही रोटी रख,  कढ़ाई से चिपकी खुरचन खाकर  और फिर भरी आंखों से देखती आसमां को  और करती शुकराना, 'रब बहुत दिया तूने'। कभी शायद 6 महीने बाद दादाजी के पीछे साइकिल पर बैठ मेला देख  बच्चों के लिए जलेबी बंधवा  यूं खुश होती ना जाने कौन सी दुनिया घूम आई। चंद साड़ियां जो खुद के ब्याह से शुरू होकर  छुटके के फेरे तक चलती रही  और गर्व से कहती है अक्सर  6 ,6 साड़ियों से संदूक भरे हैं मेरे। पर माथे की सलवटे बढ़ती रहती  इस चिंता में घुलती जाती है बूढ़ी दादी, कि टू बीएचके फ्लैट में अकेले रहकर  12 लाख की गाड़ी में घूम कर  25000 का मोबाइल लेकर  ₹800 का पिज्जा खाकर  ₹300 की कॉफी पीकर  ₹600 की पिक्चर देखकर भी , उनकी नई पीढ़ी अक्सर  खुद को कमतर समझती है औरों से   और अक्सर खुद को घुनती रहती है,  यह पीढ़ी कि हमारे पास है ही क्या...

विश्व हिंदी दिवस की हार्दिक बधाई ।

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क्या कहते हैं हमें यह वर्ण , क कम बोलो  ख खराब मत करो जिंदगी ग गमों को मात दो  घ घरेलू हिंसा मत सहो  च चमकेगी किस्मत मेहनत करो  छ छल से कभी ना जीतोगे  ज जल के महत्व को समझो  झ झड़ जाएंगे दुख सारे ट टंकार की तरह गूंजे देशभक्ति ठ ठहरो अगर जरूरत हो देश को ड डालो बसेरा लोगों के दिलों में ढ ढक दो सब अवगुण  त तकदीर के भरोसे मत रहो  थ थमी हुई जिंदगी में उमंग पैदा करें   द दलित कोई जाति नहीं हमारी सोच है    ध धीरे-धीरे पर चलते रहो  न नमक से जिंदगी में ना अति अच्छी ना कमी प पाक  रखो दिल को अपने फ फल मिलेगा जरूर मेहनत से मत घबरा  ब बातें कम काम ज्यादा  भ भलाई रंग लाती है  म मेहनत का फल मीठा है  य याद उन्हें करो जो तुम्हारी कदर करें र रचदो नया इतिहास  ल लालच बुरी बला व वीरतासे करो मुकाबला हर दुख का  श शर्म आंखों में हो तो पर्दा कैसा स सहमति सबसे काम अपनी मति से   ह हानि लाभ जीवन के दो भाग क्ष क्षमादान सर्वश्रेष्ठ त्राहि-त्राहि मत करो ज्ञ ज्ञानी बनो। स्वरचित सीमा कौशल यमुनानगर हरियाणा

अन्नदाता

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कुदरत के बाद आता है ज़ुबांपर जिसका नाम , हेअन्नदाता हे किसान हे अन्नदाता हे किसान। सुबह सवेरे खेतों को जाता  जीवन मिट्टी में मिल जाता,  तब जाकर है अन्न उपजाता  पेट भर फिर भी ना खा पाता । कैसा भारत देश महान ? हे अन्नदाता हे किसान। हिसाब महाजन का गिन ना पाता  ब्याज जीवन भर चुकाता,  फिर भी मूल चुका ना पाता।  कैसा गणित मेरे भगवान ? हे अन्नदाता हे किसान। करोना काल ने और सताया  ना बोया ना काट पाया,  क्या है भविष्य जानना पाया  कैसे चलेगा कुल जहान?  हेअन्नदाता हे किसान। सोई सरकार अब तो जागो  कुर्सी का तुम मोह त्यागो, मिट्टी की तरफ अब तुम भागो  तभी बनेगा देश कृषि प्रधान।  हे अन्नदाता हे किसान। स्वरचित सीमा कौशल यमुनानगर हरियाणा