वृध्दाश्रम भाग-10
"पापा जी अपनी छड़ी संभाले आगे बढते जा रहे थे! गंतव्य का कोई पता नहीं था.. शरीर शिथिल था और चित्त गतिमान था! विचारों की आंधी का प्रबल वेग..जीजिविषा की अकाट्य उत्कंठा..हर कदम को दिशा प्रदान कर रहे थे! एक तरफ इस नश्वर जगत से आरति( विरक्ति) होने लगी थी... वहीं कहीं एक अगोचर शक्ति अंतस को आलोकित कर रही थी.. आसक्ति और विरक्ति से परे उन्मुक्त हो कर अवसान तट पर एक बहुप्रतीक्षित संकल्प दृष्टि गोचर हो रहा था!" इधर अर्जुन ने अपने फोन पर पापा जी का मैसेज पढा और विकल हो गया! पापा जी का फोन नहीं लग रहा था! उसने आस पास ढुंढने की कोशिश की पर पापा जी कहीं नहीं दिखे! तीनों भाई अपने आस पास ढूंढ चुके थे! फिर ख्याल आया कि कहीं पापा जी वृद्धाश्रम में तो नहीं चले गए..? वहाँ भी सबने ढुँढा! फिर अमन ने मैसेज छोडा " कहाँ हैं आप?" "मैं जहाँ भी हूँ..सुरक्षित हूँ.. !" पापा जी ने उत्तर देकर फोन स्वीच आफ कर दिया! कुछ दिन तक खोजने के बाद बहू- बेटे भी निश्चिन्त हो गए! उन्हें पता था कि पापा जी एक विख्यात और लोकप्रिय शिक्षक रह चुके हैं.. उन्हें घर से बाहर भी कोई असुव...