महिला दिवस
औरत को आइने मे यू उलझा दिया
बखान कर के हुस्न का यू बहला दिया
न हक दिया जमीन नही घर दिया गया
गृह स्वामिनी के नाम का रूतबा दिया गया
छूती रही जब पांव परमेश्वर पती को कह
फिर कैसे गृह लक्ष्मी का दर्जा दिया गया
चलती रही चक्की और जलता रहे चुल्हा
क्या खूब लिखा और अन्नपूर्णा बना दिया
ये डाक्टर इंजीनियर सैनिक भी बन गई
फिर घर के जलते चूल्हे ने औरत बना दिया
ब्यभिचार वार आदमी जब रोक न सका
सिंगार साज वस्त्र पर तोहमत लगा दिया
खुद घुमते है लोग शौक से खुले खिले
औरत की टांग क्या दिखा नंगा बता दिया
नारी ने जो ललकारा इस दानव प्रवृत्ति को
जिह्वा निकाल रक्त प्रिय काली बना दिया
रक्त से सीच अपने बचपन जवा किया
पिता का नाम हर जगह चिपका दिया गया ।
उर्मिला तिवारी
देवरिया
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