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तस्करी

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वो ज़माने लद गए, जब मानवता ज़िन्दा थी। अब जीते जी इंसान, किसी काम का नहीं।। बैठें हैं कई आदमख़ोर, तस्करी की कश्ती में। बेच खाते है अंगों को, अमीरी की बस्ती में।। इनको फ़र्क़ नही जीने, या जीते जी मारने वाले से। ये बस दाम लगते है, महँगे खरीदने वाले से।। अस्पतालों के आड़ में, ये व्यापार चलते हैं। किसी की किडनी, लिवर, तो किसी का दिल बेच खाते है।। हज़ारो की कीमत को, ये करोड़ो तक ले जाते हैं। गरीब को हो ज़रूरत, तो खाली हाथ दिखाते हैं।। फ़रेब और चोरो की दुनिया के, ये बादशाह कहलाते है। ऑपरेशन की आड़ में, ये ऑर्गन फेल बताते हैं।। हेरा फ़ेरी अंगों की करते, पैसा खूब कमाते है। बड़े बड़े हस्तियों से मिलकर, ये तस्करी की दुनिया चलाते है।। ~राधिका सोलंकी (गाज़ियाबाद)

समाज के पिशाच

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इंसान के भेश में, हैं ये पिशाच। न करते दया किसी पर, न है करते विश्वास।। देखो ज़रा संभल जाओ, कही हो न तुम्हारे आस पास। पहचान नही सकते इनको, ये हो सकते है तुम्हारे खास।। मानवता की कब्र खोदे, ये कातिल कसाई हैं। हो सकते है ये कोई ग्राहक, जिसने प्यास खून से बुझाई है।। ये नही छोड़ते किसी कीमत पर, ये तो अंधे व्यापारी हैं। ये मांस नोचते फिरते है, इन्होंने कसम शैतान की खाई है।। ये बन के रिश्तेदार, पड़ोसी, तुमसे जोल बढ़ाते हैं। फिर नफरत के खंजर लेकर, तुम्हारी बली चढ़ाते हैं।। ये किसी की टांग चीरते, अंगों की करते कटाई हैं। रोज़ी रोटी फूँक डालते, दंगो की करते अगुवाई हैं।। ये झट से गायब हो जाते, न खोज इनकी हो पाई है। आंख मूंदे कानून है बैठा, तो सबकी शामत आई है।। सारेआम ये बंदूक उठाते, पत्थरों की बारिश आई है। नही बख्शते बच्चे बूढे, औरत की इज़्ज़त लुटाई है।। ~राधिका सोलंकी (गाज़ियाबाद)

बारिश की बूंदें

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बारिश की वो पहली फुहार, लायी है सावन की बहार। हर कली खिल आई है, डाल डाल मुस्काई है।। बागों में रौनक लाई है, खेतों की फसल लहराई है। हर दिल बच्चा बन के झूमे, देखो बारिश आई है।। बारिश की इन बूंदों से, अंग अंग खिल जाए है। मोर नाचे पंख फैलाये, मोरनी गीत सुनाय है।। इन्द्रधनुष चमके गगन में, धरती की प्यास बुझाय है। ये बचपन लेकर आई है, कागज़ की नाव बनाई है।। पीपल पे झूले है पड़ गए, ऐसी मस्ती छाई है। अमीया जामुन रसभरी, वो बूढ़ी अम्मा लाई है।। देखो बारिश आई है! सबका मन हरषाई है!! ~राधिका सोलंकी (गाज़ियाबाद)

रिश्तों की डोर

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ना रेशम ना सूत, ना जूट की है। रिश्तों की ये डोर, बस वजूद की है।। मेरे होने से, मुझको खोने तक। पहली साँस लेने से, अर्थी को ढोने तक।। ना सोने ना चांदी, ना पीतल की है। रिश्तों की ये डोर, बस मतलब की है।। कही दिलो से, तो कही दिमाग से बुनते है। रिश्तेदार हैं जो कभी, औकात से चुनते हैं।।  ना इज़्ज़त ना प्यार ना नफरत की है। रिश्तों की ये डोर, बस किस्मत की है।।  मेरे असफल होने से, मुझको मज़बूत पाने तक। सबके काम आने से, मेरे मुकर जाने तक।।  ना मुलाकात ना जज़्बात ना चेहरों की है। रिश्तों की ये डोर, बस मोहरों की है। ~राधिका सोलंकी (गाज़ियाबाद)

अग्निवीर

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धरो धीर, पग पग है तीर, साधो शरीर, ओ अग्निवीर; ओ अग्निवीर, गड़ दे लकीर, दे शंखनाद, शत्रु को चीर; अग्निपथ और अग्निवीर.... माटी से खिल, माटी में मिल, बन के थिरक, भारत का दिल; ओ अग्निवीर, न हो अधीर, तू कर्ण वीर, तू रक्त शीर; अग्निपथ और अग्निवीर.... एक लक्ष्य ले, बढ़ता तू चल, न संशय कर, चलता तू चल; ओ अग्निवीर, विधा गम्भीर, तुम लौह पाद, हो लौह मिहिर; अग्नि पथ और अग्निवीर..... सैनिक नही तुम दूत हो, माँ भारती के पूत हो; ओ अग्निवीर, तोड़ दे जंज़ीर, तुम रक्तधर, तुम ही रण धीर, अग्निपथ और अग्निवीर.... ~राधिका सोलंकी (ग़ाज़ियाबाद)

छू लो आसमाँ

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नंन्हे पँखो को खोले, हवा का रुख ये बोले; सीख मेरे संग उड़ना, पंजो से धरातल को जकड़ना; भर उड़ान ऊँची, पूरी कर हर रुचि; डाल डाल पत्थर पहाड़, थोड़ा ठहर फिर से दहाड़; मंज़िल अपनी खोज के, साध लक्ष्य रोज़ के; पग पग आगे बढ़ता जा, आकाश में ऊंचा उड़ता जा; कठिनाई कई आएंगी, तुझको बहुत डराएगी; बस याद रख मंज़िल तेरी, सब मुमकिन है मत कर देरी; फिर ठहर ज़रा और सांस ले, अपना लक्ष्य फिर साध ले; अब उड़ जैसे आकाश चीरना, बादलो के परे देखना; तेरी मंज़िल नज़र आएगी, छू लो आसमाँ चिल्लाएगी; गुरुर न उचाई पे करना, लौट तुझे है ज़मी पे उतारना; ~राधिका सोलंकी (गाज़ियाबाद)

सड़क सुरक्षा

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सड़क सुरक्षा ध्यान रख चलो। यातायात नियमो का पालन करो।। लाल बत्ती न पर करो। पीली पर गति को हल्का करो।। हरी बत्ती पर निकल चलो। सड़क चिह्नों का ध्यान धरो।। कहाँ मुड़ना है, कहाँ नहीं। गति कितनी हो, देखो तो सही। फुटपात है पैदल के लिये। यातायात है सभी के लिये।। मत बजाओ हॉर्न, न करो ध्वनि प्रदूषण। लाल बत्ती पे गाड़ी बन्द, कम होगा वातावरण दूषण।। घर से समय पर निकलो, ना गाड़ी को तेज भगाओ। अपनी और औरों की करो सुरक्षा, न मौत को गले लगाओ।। ~राधिका सोलंकी (ग़ाज़ियाबाद)

दिग्भ्रमित युवा

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आलीशान दोगे ज़िन्दगी , तो संघर्ष कैसे जानेगा! ये आज का युवा है, बिना बात एक कंकड़ भी न बिनेगा!! तुम कहते हो दिग्भ्रमित है, कर्तव्यों से पथ भ्रमित है! क्या लालन पालन किया था वैसा? जो बोयेगा वही तो कटेगा!! आलीशान दोगे ज़िन्दगी...... न अपनो का सम्मान है करता, न बड़ो की बात पे चलता! प्रणाम करने का चलन तो खो गया, अब हाय बाय है करता!! तुम कहते हो संस्कार रहित है, पश्चिमी शैली से बंधित है! क्या जीवन ज्ञान दिया था वैसा?जो देखेगा वही तो दोहरायेगा!! आलीशान दोगे ज़िन्दगी.... न दिल मे अब देशप्रेम है, नशे के पथ पर सिर्फ युवा खेल है! राष्ट्रहित की अब कौन सोचता, परवरिश का ही तो सारा खेल है!! तुम कहते हो ये सब षड्यंत है? क्या जीवन का मूल मंत्र है? क्या संस्कारो से रंगा था वैसा? कैसे निखरेगा गर ठोकर न खायेगा!! आलीशन दोगे ज़िन्दगी...          ~ राधिका सोलंकी

पापा~सम्पूर्ण संसार

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पापा... तुम्हारे जाने के बाद मैंने काफी कुछ सीखा! जिन्हें हम अपना समझते थे, उन्होंने ही पीछे खींचा!! मगर तुम सीखा गए थे हमें, ज़िन्दगी जीने के सलीक़े! हर ओर से बस आ रहे थे, शब्द लोगो के कटीले!! हर मुश्किल को हम सबने, बस तेरे नाम से जीता! पापा... तुम्हारे जाने के बाद मैंने काफ़ी कुछ सीखा!! ~~~~~~~~~~ मुझे कई मुक़ाम याद हैं, जहाँ मैं तुम्हे याद करती थी! की बस तुम एक पल के लिये आ जाओ, बस यही फरियाद करती थी!! मेरे कदम कभी न डगमगाए, न पीछे हटे! तेरी बगिया के हम चार फूल, न कभी मुरझाये न कभी टूटे!! क्योंकि तुमने ही तो हमे अपने पसीने से सींचा! पापा... तुम्हारे जाने के बाद मैंने काफी कुछ सीखा!! ~~~~~~~~~ मैं एक एक करके कई मुक़ाम पाती गई! लोगो ने तो बहुत सराहा, लेकिन तुम्हारी कमी खलती गयी!! मैंने खुद को मजबूत, इतना मज़बूत बना लिया था! की हर चट्टान भी, मेरे रास्ते से खुद ब खुद हटती गयी!! क्योंकि, तुमने सारे बुरे सायो को हटा दिया था! पापा.... तुम्हारे जाने के बाद ज़िन्दगी ने जीना सीखा दिया था!! ~~~~~~~~ आज तुम्हे गुज़रे यही कोई 6 साल बीत गए! मगर ऐसा लगता है, की अभी तुम साईकल पर आओगे और बोलोगे चुमम...

मेले में अकेला

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इस जग में, मैं पग पग खेला। पर रहा मेले में अकेला।। खूब मिले भटकाने वाले, कोई गुरु तो कोई चेला। मेरा कोई संगी न हुआ, चलता रहा मैं हर दम अकेला।। इस जग में, मैं पग पग खेला... मुफ्त की राय देते रहे सब, ब्याज में मुझको साथ मिला। मित्र पड़ोसी सब व्यापारी थे, न कोई हाथो में हाथ मिला।।   इस जग में, मैं पग पग खेला... करता कर्म चला रहा मैं, होती गयी समय की बेला। बाँध पोटली पगडंडी पे, लक्ष्य भेदने चला अकेला।। इस जग में, मैं पग पग खेला...            ~राधिका सोलंकी