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Showing posts with the label कीर्ति प्रदीप वर्मा

सैनिक

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वीर सैनिक थे बड़े मातृभूमि पर चढ़े, घर में सभी के ऐसा  लाल होना चाहिये।  पीठ पीछे वार करें  धोखा देकर जो लड़े  प्रतिकार का अब तो नाद होना चाहिये। ये मेरा है अंतर्नाद कैसा है यह जेहाद गीदड़ नही इंसा को फौलाद होना चाहिये। धरा करे हाहाकार नभ रोए  जार जार,  वंदे मातरम का अब निनाद होना चाहिये।           -कीर्ती प्रदीप वर्मा

बधाई-मेरीकॉम

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निरंतर छठवी जीत की बहुत बहुत बधाई और क्यों न हो!! तुमने वो कर दिखाया जो कोई न कर सका, परंतु तुम इस *भ्रम* में मत रहना !! कि यह जीत  सिर्फ तुम्हारी है, यह जीत है आन्लर की  जिसने बोये थे बीज  तुम्हारी मन की बगिया में कुछ कर दिखाने के,  जिसे शर्म नहीं घर के सभी काम करने में,  जो बना  तुम्हारे जुड़वाँ बच्चों की माँ  जिसे कभी ऐतराज नहीं  तुम्हारे इन कपड़ों पर, जिसे तकलीफ नहीं  तुम्हारे कोच से, जिसने कभी परवाह नही की  दुनिया की, जो सदैव जीता है सिर्फ तुम्हारे सपनों को,  जब जब तुम टूटीं सम्हाला उसने, सचमुच वही हकदार हैं  इस बधाई का और यही राज है  तुम्हारी कामयाबी का बहुत-बहुत बधाई आन्लर  बहुत-बहुत बधाई💐              (मैरीकॉम के पति आन्लर को समर्पित)          -कीर्ति प्रदीप वर्मा

दीप देहलीज़ का

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जन्मते ही बेटा  बढ़ जाती है "देहरी" सवा हाथ !! सुना था ,दादी नानी से  होती है लक्ष्मणरेखा  बेटियों के लिए !! जो पार करती हैं  यौवन की दहलीज! तभी तो बो जाती हैं धान  पिता के आंगन में  विदाई के वक्त!!  ताकि धन-धान्य से  परिपूर्ण रहे मायका !! जाने के बाद भी!! गृहलक्ष्मी बन  पदार्पण करती हैं  ससुराल में! गिराती है धान  प्रवेश से पहले, और लगा देती मोहर  महावर रचे पांव की!!  एक भरोसा  कभी न लांघने की  वह देहरी!! जो होती है,  "लक्ष्मणरेखा"  सच ही तो है !! बचाती है वह रावणों से। तभी तो सजती है रंगोली और जलाए जाते हैं  दीप  देहरी पर।               -कीर्ति प्रदीप वर्मा

आँगन बाल कविता

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बच्चों सुन लो एक कहानी कहती थी जो मेरी नानी बाग बगीचे वृक्ष घने थे आंगन ही उपवन बने थे निर्मल था नदियों का पानी बच्चों सुन लो एक कहानी। हम सब पर फिर स्वारथ छाया कांक्रीट का जंगल बनाया दूषित किया नदियों का पानी वच्चो सुन लो एक कहानी । बच्चों अब तुम पेड़ लगाओ वसुधा को फिर हरी बनाओ व्यर्थ बहे न नलों का पानी। बच्चों सुन लो एक कहानी।             कीर्ति वर्मा

कभी कभी

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बचपन में मां कभी-कभी रहती थी मैं डरी डरी!! कभी अंधेरे में डर जाती  या परछाई सी दिख जाती, पेड़ों के पत्ते हिलते थे,  चूहा या बिल्ली मिलते थे !! अंधियारे में न जाती!!  तेरे पल्लू में छुप जाती।  बचपन में मां कभी-कभी  रहती थी मैं डरी डरी!!  तब तू ने ही मंत्र बतलाया डर से लड़ना सिखलाया। अब भी तो बहुत सताते हैं !! बहुत मुझे डराते हैं!! कभी टैक्सी ड्राइवर या कंडक्टर बन जाते हैं  कभी अकेले में ट्रेनर या क्लीनिक में हो डॉक्टर भीड़ में चलते चलते ही अंकल धक्का दे जाते  या फिर  बस में पीछे से  दादा कोहनी से सताते है !! कभी शाला में टीचर जो मेरी कापी जांचते है, और आंखों ही आंखों में  मेरा भूगोल नापते हैं!! अब तो मैं  हर पल माँ!! बस रहती हूँ डरी-डरी सोचती हूं इतने जल्दी क्यों हो गई माँ में बड़ी इससे तो बचपन अच्छा था भूतों का संग ही सच्चा था। अब मंत्र काम न आते है मां जिंदा भूत सताते हैं!!! माँ जिंदा भूत सताते हैं!!!          -कीर्ति प्रदीप वर्मा

आँखे

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ख्वाइशें कहाँ पूरी होती हैं ? झोपड़ी मे फली फूली महलों में अधूरी होती हैं ख्वाहिशें कहाँ पूरी होती है? मुख मोड़ लेता है सहारा  बूढ़ी आँखे बेज़ार रोती है  ख्वाहिशें कहाँ पूरी होती है? आसमाँ छूने की चाहत में धरती पैरों की छूटी है ख्वाहिशें कहाँ पूरी होती हैं? मशहूर होने की तमन्ना बहुत कुछ खोती है !! ख्वाहिशें कहाँ पूरी होती है? समुंदर सी बन अय कीर्ति जिसकी लहरें सबको समोती हैं  ख्वाहिशें कहाँ पूरी होती है?             -कीर्ति प्रदीप वर्मा

इंद्रधनुष

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मैंने अपने आँगन में  कुछ विरवे रोपे थे  खाद पानी से सींचा  और बहुत दुलराया और एक  दिन चटकी कलियां फूल और फल भी आये  संग साथ में  तितली लाये रंग कई बिखराये। गौरैया और छोटी चिड़िया  नृत्य गान करती है, और गिलहरी आंगन में  झूम झूम नचती है, सूने निर्जन आँगन में  रंग समाए सातों ऐसे आसमान का इंद्रधनुष  घर मेरे आया हो जैसे!! क्यों कहते रहते हो ? अब समय है बदला और नीरस है जीवन तुम भी तो कुछ विरवे रोपो अपने मन के आँगन।               - कीर्ति प्रदीप वर्मा

हाथों में थामे हाथ

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हाथों में थामे हाथ   मुझे ले चला कहाँ         हाथों में थामे हाथ- -  मैं हो गई हूँ तेरी तू हो गया है मेरा ले चल मुझे वहीं पर बस प्यार हो जहाँ         हाथों में थामे हाँथ- -  सपने हुये वो पूरे जो थे कभी अधूरे मैं हूँ धरा तुम्हारी तू मेरा आसमाँ          हाथों में थामे हाथ- -  आँखों में तेरी सूरत ज्यों देवता की मूरत बंधन न देह का हो बस रूह हो फ़ना       हाथों में थामे हाथ- -             -कीर्ति प्रदीप वर्मा

भूख

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सभी महिला मजदूरों को सादर समर्पित🙏            माथे तगाड़ी फटी साड़ी, फावड़े से भरती गिट्टी कभी रेत कभी मिट्टी, गेंती और सब्बल सम्हाले खोदती सड़क किनारे, भरने पेट का कुँआ ठंडे चूल्हे का धुआँ, हँड़िया रीति पड़ीं आँसुओ से है भरी!! धोतियों के झूला डारे झूलता मुन्ना किनारे, भूखे लाल का रुदन!! भटकता है उसका मन, लाल आँचल से लगा ले या फ़िर तगाड़ी सम्हाले, ठेकेदार भी बुलाये भूख अब, किसकी मिटाये !! रोज की उसकी कहानी मजदूर हो या नौकरानी।               -कीर्ति प्रदीप वर्मा

दिल ही तो है

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हर पल तेरा नाम रटे बिल्कुल रट्टू तोता है               दिल ही तो है...  आँखों आँखों में रात कटे  जगता है न सोता है                दिल ही तो है...  याद में तेरी तड़प तड़प  भीतर भीतर  रोता है                दिल ही तो है... मधुर मिलन की आस में  एक एक लड़ी  पिरोता है                दिल ही तो है ...  देख पिया धक धक धड़के  क्या ऐसा ही होता है                 दिल ही तो है..             -कीर्ति प्रदीप वर्मा

दीप देहरी का

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जन्मते ही बेटा  बढ़ जाती है "देहरी" सवा हाथ !! सुना था ,दादी नानी से  होती है लक्ष्मणरेखा  बेटियों के लिए !! जो पार करती हैं  यौवन की दहलीज! तभी तो बो जाती हैं धान  पिता के आंगन में  विदाई के वक्त!!  ताकि धन-धान्य से  परिपूर्ण रहे *मायका* !! जाने के बाद भी!! गृहलक्ष्मी बन  पदार्पण करती हैं  ससुराल में! गिराती है धान  प्रवेश से पहले, और लगा देती मोहर  महावर रचे पांव की!!  एक भरोसा  कभी न लांघने की  वह देहरी!! जो होती है,  "लक्ष्मणरेखा"  सच ही तो है !! बचाती है वह रावणों से। तभी तो सजती है रंगोली और जलाए जाते हैं  दीप  देहरी पर।               -कीर्ति प्रदीप वर्मा

यूँ ही कह दिया

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मैने तो यूँ ही कह दिया वो दिल से लगा बैठे  ख़्वावों ख्यालों में अपना बना बैठे... लकीरें कहाँ थीं  हाथों में मेरी मैं तो बसी थी  बातों में तेरी किनारे नदी के  मिलते नही है फिर भी मिलन की  आस लगा बैठे मैने तो यूँ ही कह दिया वो दिल से लगा बैठे  ख़्वावों ख्यालों में अपना बना बैठे... मिले भी तो ऐसे  जब उजड़ा चमन था जुदा मेरी धरती  जुदा तेरा गगन था बीते दिनों की बारात सजा बैठे मैंने तो यूँ ही कह दिया वो दिल से लगा बैठे ख़्वावों ख्यालों में  अपना बना बैठे...               -कीर्ति प्रदीप वर्मा

सावन हो जाये

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धरती पे छाया राग अंबुआ रये बौराये कुहू कुहू कोयल कूके मन मोरा हर्षाये याद तिहारी आये, धरती पर छाई हरयाली जामुन लदीं डाली डाली तेरी याद में भयी मतवाली बदरा बन आ जाओ प्रियतम मन मयूर हो जाये, अधर धरो अधरों पे  सजना तो सावन हो जाये।                 -कीर्ति प्रदीप वर्मा

जिन्दा भूत

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बचपन में मां कभी-कभी रहती थी मैं डरी डरी!! कभी अंधेरे में डर जाती  या परछाई सी दिख जाती, पेड़ों के पत्ते हिलते थे,  चूहा या बिल्ली मिलते थे !! अंधियारे में न जाती!!  तेरे पल्लू में छुप जाती।  बचपन में मां कभी-कभी  रहती थी मैं डरी डरी!!  तब तू ने ही मंत्र बतलाया डर से लड़ना सिखलाया। अब भी तो बहुत सताते हैं !! बहुत मुझे डराते हैं!! कभी टैक्सी ड्राइवर या कंडक्टर बन जाते हैं  कभी अकेले में ट्रेनर या क्लीनिक में हो डॉक्टर भीड़ में चलते चलते ही अंकल धक्का दे जाते  या फिर  बस में पीछे से  दादा कोहनी से सताते है !! कभी शाला में टीचर जो मेरी कापी जांचते है, और आंखों ही आंखों में  मेरा भूगोल नापते हैं!! अब तो मैं  हर पल माँ!! बस रहती हूँ डरी-डरी सोचती हूं इतने जल्दी क्यों हो गई माँ में बड़ी इससे तो बचपन अच्छा था भूतों का संग ही सच्चा था। अब मंत्र काम न आते है मां जिंदा भूत सताते हैं!!! माँ जिंदा भूत सताते हैं!!!          -कीर्ति प्रदीप वर्मा

मनुहार घनाक्षरी

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गिद्ध भोज का रिवाज खूब चल गया आज  कलेऊ ओ गारी गीत  जेवनार कहाँ गये। पंगत में बैठकर बूंदी सेव दाल भात एक और खाओ साब मनुहार  कहाँ गये?  कच्ची माटी ठोक कर  तराजू में तोल कर  भावी पीढ़ी हो तैयार  कुम्हार कहाँ गये? हेलो हाय बाय बाय  घुटने से पड़ें पाँव चरणों को छूने वाले  संस्कार कहाँ  गये?              -कीर्ति प्रदीप वर्मा

फरमान

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कभी न था ऐसा अनुमान! सुनाएगी प्रकृति फरमान  यूँ ही छोड़ते हैं वृक्ष  जिस प्राणवायु को.. मारा मारा फिर रहा इंसान अंधाधुंध काटा.. नरवाई में जलाया.. आज उसी के लिए  पड रहे हैं लाले.. समय रहते चेत पाँच पेड़ लगा ले। मालिक समझ बैठा  तू तो एक कठपुतली है।  एक झटके में सबक सिखाया  फिर भी रहा नादान.. अब तो संभल इंसान!! अब तो संभल इंसान!!               -कीर्ति प्रदीप वर्मा

शाम मस्तानी

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काश, फिर वही अलसायी भोर वही मस्तानी शाम होती  उस अनदेखे- अनजाने संग  कभी हँसती कभी रोती! पढ़ने के बहाने फिल्मी गीत  और शायरियां लिखती  कभी गुनगुनाती कभी शरमाती घंटों मन ही मन बतियाती सखियां सारी पगली बताती!!  कहां होगा? कैसा होगा? मे ही, रैन बीत जाती पता ही न चलता,  कब चिड़ियाँ चहचहाती? कभी चाय उबल उबल कर  खत्म ही हो जाती... होश आता, जब माँ चिल्लाती! सारी दुनिया दुश्मन नजर आती.... वो पॉकेट ट्रांजिस्टर  जो था सच्चा साथी,  छाया गीत सुनते ही  ज्यों प्राणवायु आती-  सारंगा तेरी याद में  नैन हुए बेचैन....              -कीर्ति प्रदीप वर्मा

दीप जलायें

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आओ हम सब दीप जलायें अंतर तम को दूर भगायें  आओ हम सब दीप जलायें, जीवन की इस कठिन डगर में  प्रकृति के इस महाकहर में  विश्वासों की जोत जलायें, आओ हम सब दीप जलायें। घोर अंधेरा विश्व पर छाया राहु से उजियारा हारा करें जतन बाती सुलगायें, आओ हम सब दीप जलायें। दीप से दीप जलाएं मिलकर महल अटारी झोपड़ी या घर अवलंबों के हाथ बढ़ायें,   आओ हम सब दीप जलायें। राम हमारी आस हैं जन जन का विश्वास है आओ पलक पांवड़े बिछायें आओ मिलकर दीप जलायेँ।               -कीर्ति प्रदीप वर्मा

मर्यादा पुरुषोत्तम राम

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राम तेरी मर्यादा को  आज मैंने है जाना आत्मसात किया  तब मैंने यह माना!   त्रेता से कलजुग तक  सुनते आये गाथा,  लाख मुसीबत आई पर तोड़ी न मर्यादा। कैकई के कठोर वचन  तोड़ सकते थे पल में,  अपने पिता के वचनों की रखी थी मर्यादा तुमने।   सारे जग की नैया के  तुम ही हो खिवैया   मर्यादा की खातिर  चढ़े थे केवट नैया। तुम सर्वज्ञ सर्वव्यापी  तुम थे घट घट के वासी मर्यादा की खातिर साथ लिए वनवासी।   क्षीरसागर के स्वामी  पल में पार किया होता,  आव्हान कर पयोधि का  राम ने की शक्ति पूजा। सीता मैया से मिलते  कोई लीला समझ न पाया,  मर्यादा की खातिर  हनुमत को पहुंचाया।   नीति न्याय और नेतृत्व में  तुम सा जोड़ न पाया  विभीषण और सुग्रीव का  राज, तुमने था लौटाया। नर रूप धर नारायण ने  लीलाएं दिखलायीं,  मतिमंद मानव को  पर वे समझ न आयीं।   और प्रमाण क्या होंगे प्रभु राम के होने के? टेंट में बैठे रामलला के महल बनेंगे सोने के। रामराज फिर आयेगा सजेगा अयोध्या धाम, रखो भरोसा ईश...

रोपो अपने आँगन

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पर्यावरण दिवस पर विशेष मैंने अपने आँगन में  कुछ विरवे रोपे थे  खाद पानी से सींचा  बहुत बहुत दुलराया और एक दिन चटकी कलियां, फूल और फल भी आये  संग साथ में  तितली लाये रंग कई बिखराये। गौरैया और छोटी चिड़िया  नृत्य गान करती है, और गिलहरी आँगन में  झूम झूम नचती है, सूने निर्जन आँगन में  रंग समाए सातों ऐसे आसमान का इंद्रधनुष  घर मेरे आया हो जैसे!! क्यों कहते रहते हो ? अब समय है बदला!! बड़ा नीरस है जीवन! तुम भी तो कुछ विरवे रोपो अपने मन के आँगन। तुम भी मन के कोने में तितलियाँ उड़ाओगे और सतरँगी इंद्रधनुष आँगन में उगाओगे।           कीर्ति प्रदीप वर्मा