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सागर सा बना देता हैं।

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अथाह वारि का स्वामित्व पाकर भी, हे वारिधि तू तनिक नही अकड़ता हैं। दूर से आती सरिताओं को सहर्ष शरण में लेता हैं। सुदामा सी चलकर आती हैं वो तेरे पास कृष्ण बन तू भी इनको गले लगाता हैं। भेद मिटाकर छोटे-बड़े का, तू इन्हें भी सागर बना देता हैं। तभी तो छोड़ अपने पिता का घर ये तेरा सहारा ढूँढती हैं। मिलाकर तू इन्हें अपने में अपना सा बना देता हैं। गरिमा राकेश गौत्तम कोटा राजस्थान

ये जीवन

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ये जीवन कभी -कभी दो बिंदुओं के बीच में झूल जाता हैं। उत्तरित, अनुउत्तरित के बीच में रह जाता हैं। इच्छा, अनिच्छा की भेंट चढ़ जाता हैं। ये जीवन कभी- कभी दो बिंदुओं के बीच झूल जाता हैं। झूठ व सत्य के विवाद में रह जाता हैं। वरदान व शाप के मध्य वर-शापित सा रह जाता हैं। ये जीवन कभी -कभी दो बिंदुओं के बीच में झूल जाता हैं। आदर्श व यथार्थ के मध्य भटकता सा रहता हैं। कस्तूरी मृग की भांति वीथी में भटकता रह जाता हैं। ये जीवन कभी -कभी दो बिंदुओं के बीच में झूल जाता हैं। गरिमा राकेश 'गर्विता' कोटा राजस्थान

उबटन की तरह उतार दिया

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पीड़ाओं के मैल को मैंने उबटन की तरह उतार दिया। दुश्चिंताओं के घेरे को कपूर की तरह उड़ा दिया। विश्वास की बाती रख मैंने उम्मीदों का दीया जला लिया। हर्षित सफर की राह पर अपने कदमों को बढ़ा दिया। छलनी हुआ था हृदय मेरा जिनसे उन यादों को मन देहरी से उतार दिया। अवहेलनाओं के जालों को मैंने झाड़न फेरकर साफ कर दिया। उदित अरुण संग मन में भी रश्मियों का प्रकाश भर लिया। पीड़ाओं के मैल को मैंने उबटन की तरह उतार दिया। गरिमा राकेश 'गर्विता' कोटा राजस्थान

कुछ यूँही....

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कुछ यूँही बेवजह तुमसे बात करना चाहती हूँ। यूँही बस बेवजह तुम्हें देर तक देखना चाहती हूँ। सुनना ज्यादा, और कहना कम चाहती हूँ। कुछ तुम्हारें छिपे, कुछ मेरे छिपे आँसू बहते देखना चाहती हूँ। जो कह ना सकें तुम आज तक किसी से, बस तुम्हारी वही बातें अपलक निहारते हुए बस यूँही बेवजह सुनना चाहती हूँ। सुन मेरे चाँद मैं चाँदनी नही तेरी जिस रात चाँद आता हैं बस मैं तेरे जीवन की वो रात बनना चाहती हूँ। तेरे उजालों की चाहत नही मुझे मैं सिर्फ तेरे अंधेरो की साथी बनना चाहती हूँ। बस यूँही बेवजह मैं तेरी..... गरिमा राकेश 'गर्विता' कोटा राजस्थान

पापा

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जेठ के ताप में आप शरद सा आभास हो। संघर्षों के काँटो में गुलाब के पुष्प हो। अजनबियों की भीड़ में हृदय के तार हो। जेठ के...... जीवन के पतझड़ में मधुमास की बहार हो। शिशिर की ठिठुरन में रवि का ताप हो। जेठ के..... सपनों का आधार हो आप आशीषों का उद्गार हो। वसुंधरा पर आप मेरे लिए ईश्वरीय अवतार हो। जेठ के... गरिमा राकेश 'गर्विता' कोटा, राजस्थान

मेरी कविताएं पढ़कर

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मेरी कविताएं पढ़कर कुछ लोग पूछते हैं। कौन है जिसे याद कर यूँ शब्दों को गढ़ती हो। जलती हो किसकी याद में नयन भिगोने वाले विरह गीत रचती हो। कोई तो होगा कही जिसकी चाहत में कविताएँ लिखती हो। मैं हँसी मुस्कराई फिर मुस्कराई और बोली कि काश कोई तो होता.......।  गरिमा राकेश 'गर्विता'

चहुँओर उसका बसेरा

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कभी खुशियों के दिन. कभी गमों की रात। कभी चाँद की चाँदनी कभी अमावस की रात। कभी धूप की तपिश कभी सावन की बरसात कभी काँटो से भरा दिन कभी गुलाबों से सजी रात। कभी अधरों पे मुस्कान कभी दर्द भीगी आये रात। जीवन की इस पटरी पर पतझड़ बसंत है चलते साथ। प्रभु का फैसला है सब सब उनकी दी सौगात। सबको अपनाना सहर्ष जीवन में यही है पते की बात। मोक्ष द्वार खुल जायेगा तेरा बस मान चहुँओर उसका बसेरा। गरिमा राकेश गौत्तम 'गर्विता' कोटा, राजस्थान

कल कान्हा ने राधा से कहा

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कल कान्हा ने राधा से कहा मैं तन्हाई में तुझे खोजता हूँ होता हूँ अकेला तुझे याद करता हूँ। काम नहीं होने पर तुझसे ही बात करता हूँ। देख मैं तुझें कितना प्यार करता हूँ। राधा ने कहा ये यकी है मुझे कि कान्हा तुझे मुझसे  प्यार बहुत हैं लुटा दो सारा जहाँ इतनी मोहब्बत हैं।                  पर कान्हा मैं तुझे तन्हाई में खोजती नही हूँ आँखे बंद करती हूँ और तुझे पा जाती हूँ। मैं  याद नहीं करती हूँ तुझे क्योंकि खुद को कहाँ तुझसे जुदा पाती हूँ। तू पास हो या ना हो, बातें तो तुझसे  ही करती हूँ। इसलिए सुन कान्हा मैं भी तुझसे  प्यार करती हूँ। आज से नही उस पल से करती हूँ जब  मैं तुझकों पहली बार देखती हूँ। चूम लेती हूँ मैं तेरे  कदमों के निशान पर तेरी बाँसुरी से चिढ़ती हूँ। मैं  हर उस पल को भी प्यार करती लेती हूँ सूरत जिस पल में मैं तेरी देख लेती हूँ।          इसलिए कान्हा  मैं भी तुझे बहुत प्यार करती हूँ। उस दीवानी की दीवानगी की हद तो देखों चूम लिया उसने वो जर्रा-जर्रा जहाँ से उसका प्रियतम गुजरा। ...

लगता है मैं बड़ी हो गई।

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आलू भिंडी की सब्जी संग, दो पराठें ही खाने वाली मैं, लौकी की सब्जी के साथ ठंडी रोटी भी खाने लगी। लगता है मैं बड़ी हो गई। अपनी जिद को करवाने के लिए सड़क पर ही लौटने वाली मैं अब इच्छाएं मन में समेटने लगी लगता है मैं बड़ी हो गई। झूले वाली चोटियों में पूरे गाँव में फुदकने वाली मैं जूड़े में समेट बालों को चार दीवारी में रहने लगी। लगता है मैं बड़ी हो गई। अपने भाइयों संग रूठने वाली हर खिलौने पर हक जताने वाली मैं बच्चों के कहने भर पर अपना हिस्सा भी उन्हें खिलाने लगी। लगता है मैं बड़ी हो गई। फटाखों के डर से बचपन में माँ ,पापा ,दादी की गोद में ही रहने वाली मैं अब फटाखों की आवाज सुनकर रोते हुए खुद ही खुद को समेटने लगी। लगता हैं मैं...... गरिमा राकेश 'गर्विता, कोटा राजस्थान

बस एक......

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मैं बह जाऊँगी सदियों तक, तुम्हारें लिए गंगा की तरह  तुम बस एक बार भागीरथ की तरह लेने तो आओं। बिना सवाल चल दूँगी मैं पीछे पीछे तुम्हारें, तुम बस एक बार भागीरथ की तरह लेने तो आओं। नग, घाटी और मैदान पार कर मिट जाऊँगी सदा के लिए  मैं, बस एक बार भागीरथ की तरह लेने आओं। अपने प्रचंड वेग को त्याग कर ,धार बन तुम्हारें कदमों को चूमती जाऊँगी मैं, बस एक बार भागीरथ की तरह लेने तो आओं। बस एक...... गरिमा राकेश 'गर्विता' कोटा राजस्थान

पा लूँ

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बड़ी फुरसत लिए   तेरी फुरसत के इंतजार में हूँ कान्हा। थोड़ी फुरसत से एक नजर डालना कान्हा मेरी एक उम्र की प्रतीक्षा हैं कान्हा। तू मशरूफ़ है अपनी दुनिया में पर मेरी तो दुनिया भी तू है कान्हा। तेरा नाम लेना तेरे दर्शन पाना तुझे निहारना और अंत में तुझ में ही तो समाना है कान्हा।  तू भगवान नही है मेरा जो तेरी पूजा करूँ रोली, अक्षत, कलावे और भोग से तुझे प्रसन्न करूँ। तू मेरा वो अलौकिक प्रेम है कि बस तेरा नाम लूँ और तुझे हृदय में पा लूँ। गरिमा राकेश गर्विता कोटा राजस्थान

ये दवाइयां भी ना बडे़ नखरें दिखाती हैं।

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इन दवाइयों के भी बड़े गजब नखरे होते हैं। जितनी रंग बिरंगी होती हैं उतने ही ठाठ होते हैं। खाली पेट चाहिए किसी को, किसी को भरा किसी को चाहिए समय सुबह का, किसी को निशा। कोई तो होती है बेचारी सीधी साधी, पानी से भी खाई जा सकती हैं। किसी के तो नखरें बढ़े, गिलास भर दूध से राजी होती हैं। कुछ तो होती है मेहनती   दिन में एक होकर भी काम कर जाती हैं। कुछ होती हैं कामचोर सी, दिन में चार खाने पर असर दिखाती हैं। छोटी छोटी प्यारी गोलियां गले को नही दुखाती हैं। कुछ को देखकर तो बेचारे गले को भी रुआँसी आ जाती हैं। तला-भुना भी बंद करवाती कुछ तो खिचड़ी पर अटका देती हैं। इतने नखरों के बाद भी, कुछ तो उल्टी प्रतिक्रिया(रेक्शन)कर जाती हैं। फिर छोटी सी प्यारी गोली मरीज को बचाती हैं। ये दवाइयां भी ना बढ़े नखरें दिखाती हैं। गरिमा राकेश गौत्तम 'गर्विता' राजस्थान

क्या वर्तमान में शिक्षा व स्वास्थ्य का व्यवसायीकरण हुआ है ?

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संसार में हमें लाने वाले हमारे जनक होते हैं जो हमें दुनिया दिखाते हैं ।लेकिन इस मृत्युलोक में जीवन मिलने के बाद हम आगे बढ़ते हैं। तब शिक्षक हमारे जीवन को बनाते हैं ।और कभी जब जीवन पर संकट आता है तो चिकित्सक हमारे जीवन को बचाते हैं।  अर्थात -शिक्षा से जीवन सुधरता है व चिकित्सा से जीवन बचता हैं। और यह हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है।  वैसे तो वर्तमान में हर व्यवसाय का व्यवसायीकरण हुआ है ।परंतु वर्तमान में हमारे जीवन के अभिन्न अंग शिक्षा व स्वास्थ्य जो व्यक्ति की मूलभूत सुविधाओं में शामिल है क्या इनका भी व्यवसायीकरण हुआ है ।और अगर हुआ है तो किस हद तक । शिक्षा --शिक्षा जिसकी शुरुआत परिवार से प्रारंभ हो जाती है और मां को जीवन का पहला गुरु माना गया है। पहले गुरु से प्रारंभ होने वाली हमारी शिक्षा विद्यालयों से कॉलेज तक का सफर करते हुए आगे हमारी मंजिल तक पहुंचाती है ।यही शिक्षा जो जीवन के संघर्षों से लड़ना सिखाती है।क्योंकि  शिक्षा का वास्तविक अर्थ विद्यालय स्तर पर पास होना नहीं है ,बल्कि शिक्षा का अर्थ होता है व्यक्ति का संपूर्ण चारित्रिक विकास।  ताकि जीवन में आने वाले अनचाह...

आसान नहीं था

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आसान नहीं था मीरा बनना लोक लाज की मर्यादा को त्यागना। आसान नहीं था राधा बनना ताउम्र प्रेमाग्नि की आग में जलना। आसान नहीं था पन्ना बनना निज सुत को मृत्यु शैय्या पर सुलाना। आसान नही था संयोगिता बनना पितृ विरोधी को स्वयंवर में चुनना। आसान नहीं था हाड़ी रानी बनना काट अपने सर को निशानी में सजना। आसान नहीं था देवकी बनना पुत्र हेतु मातृत्व सुख से दूर रहना। आसान नहीं था मंदोदरी बनना अधर्मी पति संग धर्म संग रहना। आसान नहीं था लक्ष्मी बाई बनना पति धरोहर हेतु निज प्राण त्यागना। आसान नहीं था मांडवी बनना महल में रहकर त्याग करना। आसन नहीं था श्रुति कीर्ति बनना पति संग फिर भी विरह को सहना। आसान नहीं था मस्तानी बनना प्रेम के लिए कड़वे वचनों को सुनना। आसान नहीं है औरत बनना अपनों को छोड़ परायों को अपना बनना। आसान नहीं है.......। गरिमा राकेश 'गर्विता' कोटा राजस्थान

राम वन गए थे.....।

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क्या लगता है ये क्या सोचते है हम कि राम रावण को मारने के लिए वन में गए थे। उस रावण को तो त्रिलोकीनाथ महल से भी मार सकते थे। राम वन में गए थे अपने मित्र निषाद राज के लिए, मित्र अमीर हो या गरीब फर्क नहीं पड़ता मित्र बस मित्र होता हैं ये संदेश देने के लिए.... राम वन में गए थे अत्रि से मिलने के लिए सुखद दाम्पत्य के गुर सीखने के लिए महल हो या जंगल सुखद जीवन जीया जा सकता है। यही संदेश देने के लिए.... राम वन में गए थे मतंग ऋषि के लिए स्वर्ग का वाहन रोक रखा था जिन्होंने प्रभु के दर्शन के लिए। भगवान भक्त के लिए चलकर आते है यही संदेश देने के लिए..... राम वन में गए थे शबरी के लिए एक भीलनी की तपस्या को पूरी करने के लिए भाव हो तो भगवान जूठे बेर खाते हैं। ऊँच-नीच का भेदभाव मिटे  यही संदेश देने के लिए..... राम वन में गए थे हनुमान के लिए बरसों से जो बाट देख रहा था उस भक्त के लिए। भगवान को भी भक्त की चाहत होती हैं यही संदेश देने के लिए..... राम वन में गए थे विभीषण के लिए उद्धार कर अपने भक्त का परमधाम पहुँचाने के लिए। अधर्म में भी धर्म पल सकता हैं यही संदेश देने के लिए.. राम वन में गए थे अपने भक्तों ...

मोहन को

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मीरा मैं भी तेरी तरह कान्हा को पाना चाहती हूँ। पर राकेश जी से करती हूँ प्रेम बहुत मैं, दोनों बच्चों पर जान छिड़कती हूँ। मीरा मैं भी तेरी तरह गिरधर के लिए जोगन बनना चाहती हूँ। पर भाइयों के नेह डोर से बँधी मैं, माँ-पिता पर अपनी जान वारती हूँ। मीरा मैं भी तेरी तरह माधव की चाकर बनना चाहती हूँ। पर उपाध्याय सर की दी राह भूल नहीं पाती मैं, मंजु मौसी के नेह व आशी के बिना तो चल भी नहीं पाती हूँ। मीरा मैं भी तेरी तरह गोविंद के दरस चाहती हूँ। पाने को अपने सांवरियां को वन-वन भटकना चाहती हूँ। पर पीहर, ससुराल की  मर्यादा मैं, भटक नही पाती हूँ। मीरा मैं भी तेरी तरह मोहन को.......। गरिमा राकेश 'गर्विता' कोटा राजस्थान

ऐ खूबसूरत शख्स

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ऐ खूबसूरत शख्स तू कुछ बात कर तू बात कर कुछ और साबित कर कि तू खुश हैं। ऐ खूबसूरत शख्स तू अपनी खामोशी को तोड़कर, अपने मन की गिरहों को खोल और साबित कर कि तू टूटा हुआ नही हैं। ऐ खूबसूरत शख्स तू कुछ बोल, कुछ कह तोड़ सारी आशंकाओं को बता दें सारी दुनिया को कि तू हारा हुआ नही हैं। ऐ खूबसूरत शख्स तू....... गरिमा राकेश 'गर्विता' कोटा राजस्थान

ऐ खूबसूरत शख्स

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ऐ खूबसूरत शख्स तू कुछ बात कर तू बात कर कुछ और साबित कर कि तू खुश हैं। ऐ खूबसूरत शख्स तू अपनी खामोशी को तोड़कर, अपने मन की गिरहों को खोल और साबित कर कि तू टूटा हुआ नही हैं। ऐ खूबसूरत शख्स तू कुछ बोल, कुछ कह तोड़ सारी आशंकाओं को बता दें सारी दुनिया को कि तू हारा हुआ नही हैं। ऐ खूबसूरत शख्स तू....... गरिमा राकेश 'गर्विता'

कविता। क्यूँ....?

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क्यूँ....? तुम मुझे इतना याद आते हो। क्यूँ.....? तुम मुझे हर जगह नजर आते हो। क्यूँ......? तुम मुझे इतना सताते हो। क्यूँ....…? तुम मुझे इतना रुलाते हो। क्यूँ......? तुम भुलाये नही भूलते हो। क्यूँ......? तुम मुझे इतना तड़पाते हो। क्यूँ......? मेरी सांस पर तेरे नाम का पहरा हैं। क्यूँ......? कान्हा तुम मेरे रोम रोम बसे हो। क्योंकि.....? मीरा की तरह मैं हो नही सकती राधा सा विरह सह नही सकती तो क्यों मेरे मन में भक्ति की लौ जलाते हो। क्यूँ......? कान्ह तुम इतना याद आते हो। क्यूँ...? गरिमा राकेश 'गर्विता' कोटा राजस्थान

भावना

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भावना क्या है भावना व्यक्तित्व का आधार या विचारों का पुंज अच्छी-बुरे मानवीय स्वभाव के भाव है भावना। या अहंकार से भरे स्वार्थ में जकड़े कुंठित मन के भाव है भावना। भक्ति में डूबे करुणा में लीन प्रेम में ज्योतिर्मय प्रकाश पुंज से भाव है  भावना। किसी व्यक्तित्व से प्रभावित श्रद्धा, सम्मान का पवित्र भाव है भावना। कंटक सी मन में चुभती अपमान की आग हैं  भावना या पवित्र -पावन श्रद्धा से सर झुकाती सम्मान का भाव जगाती भावना। गरिमा राकेश 'गर्विता' कोटा राजस्थान, भारत