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रोटी कपड़ा और मकान

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दो वक्त की रोटी कितने रंग दिखाती है। पहरे देता है कोई रात रात भर गलियों के, तब जाकर परिवार की दो समय की रोटी आती है। जमाने की ठोकरें खाकर अक्सर इंसान निराश हो जाता है। फिर इस तन को ढकने को,अपने अरमानों को दफना कर निकल जाता है। परिवार को छत दिलाने को मजदूर घर से निकलता है। रोटी, कपड़ा और मकान की खातिर पूरा दिन धूप में सड़ता  है। मध्यमवर्गीय परिवारों में, इस रोटी, कपड़ा और मकान की कहानी अजीब हो जाती है। औलाद के सारे सपने पूरे करने को,मां कितनी चीजों की कुर्बानी दे जाती है । यह रोटी,कपड़ा और मकान गलत राह भी दिखला देते हैं। इन जरूरतों को पूरा करने को,बहुत लोग अपनी रूह को भी बेच देते हैं। एक माली भी रोटी,कपड़ा और मकान की खातिर कई काटे हाथों में चुभोता है। फिर जाकर कहीं उसका परिवार चैन से सोता है। इस दुनिया में रोटी, कपड़ा और मकान की खातिर, रिश्ते भी बिखर जाते हैं। पता नहीं क्यों सब,इस रोटी ,कपड़ा और मकान की असल अहमियत समझ न पाते हैं। - नीति अनेजा पसरिचा  रुद्रपुर, उत्तराखंड

दुल्हन और उसके मन की भावनाएं

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आज बैठी हूं सपने संजोने। आज बैठी हूं सपने संजोने।  वहां सब कैसा और क्या क्या होगा। आज बैठी हूं सपने संजोने।  वहां सब कैसा और क्या-क्या होगा। तितली सी उड़ती है मन में यह सोचकर। तितली सी उड़ती है मन में यह सोचकर। कि अब तो पिया जी के घर जाना ही होगा। वही आंखें भी भर आती हैं यह सोचकर। वही आंखें भी भर आती है यह सोचकर। कि अब तो बाबा के घर से जाना ही होगा। क्या कहकर बुलाऊंगी पिया जी को, यह सोचकर भी तो जाना होगा। बचपना छोड़ना है आज से मुझको, बचपना छोड़ना है आज से मुझको, ये भी तो दिल और दिमाग को समझाना होगा। वैसे तो है वहां सब अच्छे, वैसे तो है वहां सब अच्छे, पर कभी कोई कुछ कह भी दे, तो दिल से नहीं लगाना होगा। अब तो सास- ससुर ही है मम्मी पापा, ये भी तो दिल को समझाना होगा। जो हो जाए कभी कोई खटपट ससुराल में, जो हो जाए कभी कोई खटपट ससुराल में, तो मायके को बीच में ना लाना होगा। अच्छी बहू बनकर,अपने मायके की इज्जत को बढ़ाना होगा। आज बैठी हूं सपने संजोने, कि ससुराल में सब कैसा और क्या-क्या होगा। नीति अनेजा पसरिचा रूद्रपुर,उत्तराखंड

शादी का लड्डू

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पति पत्नी पर हास्य कविता कभी वह बर्तन पटकती है, तो कभी गुस्सा दिखलाती है। गुस्सा होता है उसकी आंखों में ,फिर भी काम कराने को मिस्टर हस्बैंड कहकर बुलाती है। सुबह से शाम अपना जीवन बस पत्नी के चरणों में बिताता हूँ। अपने शादीशुदा जीवन के किस्से तुम्हें सुनाता हूँ। जितने कुंवारे बैठे हो, मेरी सलाह सुन लेना । मूसल देख लो पहले, फिर ओखल में तुम सिर देना। सुबह उठते ही सबसे पहले मैडम के लिए चाय बनाता हूँ। फिर डरे कांपते हाथों से अपनी शेरनी को जगाता हूँ। सुबह और दोपहर के खाने का प्रबंध ऑफिस से पहले ही करके जाता हूँ। आकर ऑफिस से जल्दी मैडम का डिनर बनाता हूँ।  अभी नहीं सोया हूँ मैं, सोने से पहले का जरूरी काम तुम्हें बताता हूँ। जरूरी काम यह है कि, रोज सोने से पहले मैडम के पैर भी दबाता हूँ।  कभी वह बर्तन पटकती है, तो कभी गुस्सा दिखलाती है। अगले दिन उठते ही फिर से मै चूहा और वो बिल्ली बन जाती है। -नीति अनेजा पसरिचा

तुम मैं और चाय

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शादी से पहले यह चाय , नहीं थी मेरी दोस्त खास।  पर शादी के बाद पति के साथ साथ, बन गई यह भी दोस्त कुछ खास।  क्योंकि मेरे प्यारे पति, सुबह की पहली किरण के साथ इसको होठों से लगाते हैं।  और मेरा दिन तब बन जाता है वह मुस्कुराहट देखकर, जो है यह चाय पीकर मुझे दिखाते हैं।  ऐसे ही देखते देखते चाय और मेरा, कुछ खास रिश्ता बन गया है।  ऐसा लगता है मानो शादी के बाद एक नहीं, दो दोस्तों का साथ मिल गया है।  इस चाय ने बस मेरे और मेरे पति के बीच, रिश्ता ही नहीं बनाया।  मानो जैसे उनके दिल तक, जाने का रास्ता मुझे दिखाया।  पता नहीं था एक  दिन, यह चाय भी मेरे लिए इतनी खास बन जाएगी।  सुबह उठते ही सबसे पहले, चाय की प्याली बनाने की बात ख्याल में आएगी।  बहुत बार कुछ अनजान भी, अच्छे दोस्त बन जाते हैं।  जैसे मैं और चाय एक दूजे का साथ, सुबह से शाम तक निभाते हैं।  - नीति अनेजा पसरीचा   रुद्रपुर,उत्तराखंड

कोरोना काल की समय यात्रा

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  गुजरते हुए समय के साथ हर लम्हा कट जाएगा... गुजरा हुआ समय हर लम्हे के साथ कुछ यादें दे जाएगा...  अच्छी यादों के लम्हों को याद करके मन खिल खिल आएगा...  तो बुरी यादों के लम्हों को याद करके दिल रो जाएगा... गुजरते हुए समय के साथ हर लम्हा कट जाएगा...  समय ही तो है ,हंसते-हंसते या रोते-रोते कट जाएगा... बिखरी हुई जिंदगी को यह समय ही तो है, जो पटरी पर ले आएगा...  जब इतना कुछ बीत गया तो थोड़ा सा समय और निकल जाएगा...  गुजरते हुए समय के साथ हर लम्हा कट जाएगा...  यह समय ही हिम्मत देगा हमें और मजबूत बनाएगा...  खुशियों के पल देकर बुरी यादों को मन से हटाएगा...  गुजरते हुए समय के साथ हर लम्हा कट जाएगा...  डरना क्या इस समय से, समय ही तो है यूं ही गुजर जाएगा...  वह समय ही है जो खुद एक नया सूरज लेकर  कल आएगा...  गुजरते हुए समय के साथ हर लम्हा कट जाएगा... हर लम्हा कट जाएगा...  हर लम्हा कट जाएगा.... - नीति अनेजा पसरिचा    रुद्रपुर, उत्तराखंड

यह प्यारा बरगद का पेड़

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कितना विशाल बरगद का यह पेड़ होता है। जहां भी यह पनप जाए, फिर पीढ़ी दर पीढ़ी यादें संजोता है। मां के पूजा पाठ को,रक्षा कवच में पिरोता है। बच्चों के अनगिनत झूले,यह हवा में झूलाता है। इतना गुणकारी होकर भी,क्यों यह अपना अस्तित्व खो रहा है। क्यों आजकल के समाज से,विलुप्त यह हो रहा है। बूढ़ा होकर भी , ताकतवर यह रहता है।  बनो मेरे जैसे, हर व्यक्ति से यह कहता है। इस दिखावे की दुनिया को छोड़कर,अंदर से मजबूत बनो। छोड़कर इस दिखावे को,बरगद का पेड़ तुम बनो। क्या रखा है दिखावे में,जब नींव ही मजबूत ना होगी। मजा तो तब है जीने में,इस जमाने में जब मनुष्य की नींव बरगद जैसी होगी। अपने परिवार की हर जड़ को,बरगद के जैसा मजबूत कर लो। टूट ना पाए परिवार की कोई डाली, इतना प्यार हर डाली में भर दो। - नीति अनेजा पसरिचा    रुद्रपुर,उत्तराखंड

कामयाबी ( सफलता)

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एक दिन सूरज चमकेगा, आकाश नया सा छाएगा, मौसम फिर बहारों वाला, कामयाबी मुझे दिलाएगा, मेरी डूबी किस्मत का सूरज फिर उग जाएगा । हर एक पेड़ मुझे छांव देगा, धूप में ना कोई जलाएगा।  मौसम फिर बहारों वाला, कामयाबी मुझे दिलाएगा, चांद से भी ज्यादा चमकेगी मेरी किस्मत। रात का अंधेरा ना मुझे डराएगा। मौसम फिर बहारों वाला, कामयाबी मुझे दिलाएगा, एक दिन तो आएगा ऐसा जो हर आशा पूरी कर जाएगा । मन के हर कोने कोने में खुशी का दीप जल जाएगा । मौसम फिर बहारों वाला, कामयाबी मुझे दिलाएगा, खुशियां ही खुशियां होंगी चारों ओर दुख ना मुझे कोई छू पाएगा। जुगनू सा चमकूंगा मैं ,पर ना कोई मुझे पकड़ पाएगा । एक दिन सूरज फ़िर चमकेगा, आकाश नया सा छाएगा,  मौसम फिर बहारों वाला, कामयाबी मुझे दिलाएगा,  कामयाबी मुझे दिलाएगा, कामयाबी मुझे दिलाएगा।।।।।। - नीति अनेजा पसरिचा   रुद्रपुर, उत्तराखंड

सपनों भरा साजन का घर

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आज बैठी हूं सपने संजोने, आज बैठी हूं सपने संजोने, वहां सब कैसा और क्या-क्या होगा। आज बैठी हूं सपने संजोने, वहां सब कैसा और क्या-क्या होगा। तितली सी उड़ती है मन में यह सोच कर, तितली सी उड़ती है मन में यह सोच कर, कि अब तो पिया जी के घर जाना ही होगा। वही आंखें भी भर आती है,कि अब तो बाबा घर से जाना ही होगा। क्या कह कर बुलाऊंगी पिया जी को, क्या कहकर बुलाओगे पिया जी को, यह सोचकर भी तो जाना होगा। बचपना छोड़ना है आज से मुझको, यह भी तो दिल को समझाना होगा। वैसे तो है वहां सब अच्छे, वैसे तो है वहां सब अच्छे, पर कभी कोई कुछ कह भी दे,तो दिल से नहीं लगाना होगा। आज बैठी हूं सपने संजोने, वहां सब कैसा और क्या-क्या होगा। अब तो सास-ससुर ही है,मम्मी पापा। यह भी तो दिल को समझाना होगा। जो हो जाए कभी कोई खटपट ससुराल में, जो हो जाए कभी कोई खटपट ससुराल में, तो मायके को बीच में ना लाना होगा। अच्छी बहू बनकर, अपने मायके की इज्जत को बढ़ाना होगा। आज बैठी हूं सपने संजोने, कि ससुराल में सब कैसा और क्या-क्या होगा। वहां सब कैसा और क्या-क्या होगा। - नीति अनेजा पसरिचा   रूद्रपुर, उत्तराखंड

आराधना और कलयुग

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ऐ मेरे इस सृष्टि के कर्ता-धर्ता, करूं मैं तेरी आराधना। तू देने वाला सब कुछ इस जग में, तेरे आगे कोई कुछ भी ना। तेरी आराधना से ही प्रभु, हर दिन शुभमय बन जाता है। तू ही इस जग का पालनहारी, तेरी मर्जी के बिना कोई कुछ न पाता है। पर इस कलयुग में मानुष ने,आराधना को भी पाप का हिस्सा बनाया है। इस कलयुगी संसार की हालत देखकर ,मेरा प्रभु मानुष की उत्पत्ति पर पछताया है। आराधना का लेकर सहारा,कलयुगी मानुष इस धरती को कलंकित कर रहा। जो थी किसी युग में प्रभु को पाने की कुंजी,आज मानुष उस आराधना को भी शर्मसार कर रहा। हे मेरे प्रभु आओ इस कलयुग में भी,इस संसार का उद्धार करो। समझाओ आकर इस कलयुगी मानुष को, कि मानुष जन्म को सुधारो और आराधना करो। - नीति अनेजा पसरिचा   रुद्रपुर,उत्तराखंड

यादों की बारात

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जब नहीं होंगे पास, कभी तुम और मैं। तो क्या मेरी यादें तुम्हें सताएगी। वो मेरी चूड़ी का खनकना। वो मेरी पायल का छनकना। क्या ये सब तुम्हें,मेरी याद दिलाएंगी। अक्सर पूछती हूं, मैं खुद से। अक्सर पूछती हूं, मैं खुद से। क्या जगह है मेरी,तुम्हारी जिंदगी मे। अक्सर पूछती हूं, मैं खुद से। क्या जगह है मेरी, तुम्हारी जिंदगी मे। मेरी जिंदगी हंसकर जवाब देती है। मेरी जिंदगी हंस कर जवाब देती है। तू खुद ही बता, क्या तू उसके बिना जी पाएगी। जी पाएगी। जी पाएगी। - नीति अनेजा पसरिचा   रुद्रपुर,उत्तराखंड

प्रतीक्षा

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प्रतीक्षा है उस पल की जब, मैं मां शब्द किसी के मुख से सुन पाऊंगी। जब रोएंगी मेरी अखियां खुशी से, और वह खुशी के आंसू हर किसी को मैं दिखाऊंगी। नन्हे नन्हे कदमों वाला कोई, मेरे घर भी खुशी से खिल खिलाएगा। उसकी प्यारी सी खुशबू से, मेरे आंगन का हर कोना कोना महक जाएगा। कब होगा यह इंतजार खत्म, और मेरा ममता भरा रूप सामने आएगा। कहीं ऐसा तो नहीं, कि बस इस मन में ही यह ममता का दीप बुझ जाएगा। ममता का दीप बुझ जाएगा। - नीति अनेजा पसरिचा   रुद्रपुर,उत्तराखंड

भूख

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कुछ दिन पहले मैं अपनी बेटी का दाखिला करवाने के लिए अपना नंबर आने का इंतजार कर रही थी। तभी मेरी नजर सामने बैठी एक माँ और बेटे की ओर चली गई। वह माँ अपनी सीधे हाथ की हथेली को बंद किए बैठी थी और हर 2 मिनट में अपनी हथेली को खोलकर मुट्ठी में रखी किसी रहस्यमई चीज को देखती और बंद कर लेती।  कुछ देर मैं यूं ही उसको देखती रही, फिर मेरे अंदर जिज्ञासा उठी यह जानने की कि आखिर उसकी मुट्ठी में ऐसा क्या है । आखिर मैंने जाकर उससे पूछा -"बहन आपके हाथ में ऐसा क्या है ? फिर क्या था उसके उत्तर ने मेरी आत्मा को छू लिया।बच्चे की माँ ने जवाब दिया-" कुछ खास नहीं बहन जी, मेरी मुट्ठी में यह 2000 रूपये हैं।जिनको मैं बार-बार देख रही हूँ और सोच रही हूँ ;कि क्या मैं इन 2000 रूपये को जमा करा कर अपने बच्चे की अच्छी शिक्षा पाने की भूख मिटा पाऊंगी? क्या इन 2000 रूपये से यह स्कूल चलाने वालों की फीस की भूख खत्म कर पाऊंगी ?" पर यह सब कुछ इन 2000 रुपए पर निर्भर करता है।    मैं अपने बच्चे की जिद पर इस स्कूल में उसका दाखिला करवाने की कोशिश करने आई हूं ।कि क्या पता ये 2000 रूपये ही मेरे बेटे की और इस स्कू...

"कलयुगी मानव"

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मिट्टी का है पुतला तू, तभी अभिमान करता जाएं तू।  किस बात का हैं ये अभिमान तूझे, जो सर्वनाश करता जाएं तू।  मानव बन कर आया इस धरती पर, पर भगवान बनना चाहे तू। कहने को तो हैं तू धरती माँ का रक्षक, पर भक्षक बनता जाएं तू। मिट्टी का है पुतला तू, तभी अभिमान करता जाएं तू।  किस बात का हैं ये अभिमान तूझे, जो सर्वनाश करता जाएं तू।  जब जानता है जीवन की हर सच्चाई तू , तो क्यू अनजान बनना चाहें तू।  जान कर भी अनजान बने ये नादानी , क्यू करना चाहें तू।  मिट्टी का है पुतला तू, तभी अभिमान करता जाएं तू।  किस बात का हैं ये अभिमान तूझे, जो सर्वनाश करता जाएं तू।  जब हार गई ये मानवता आगे तेरे, अब मानव कहा कहला पाएं तू।  मानव को मानव ना समझे, भक्षक बनता जाएं तू।  मिट्टी का है पुतला तू, तभी अभिमान करता जाएं तू।  किस बात का हैं ये अभिमान तूझे, जो सर्वनाश करता जाएं तू।  मानवता की राह को छोड़, ये किस राह पर बढ़ता जाएं तू।  छोड़ दे इस दलदल भरी राह को,बाद में कहीं पछता भी ना पाएं तू। मिट्टी का है पुतला तू, तभी अभिमान करता जाएं तू।  किस बात का हैं ये...