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वो तोड़ती पत्थर

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वो तोड़ती पत्थर, श्रम बिंदु पौछ मस्तक, अनुभव करती गर्वित, न किया गलत अब तक, वो तोड़ती पत्थर। मई जून की ग्रीष्मता, न बदल सकी उसका रास्ता, सिर्फ उसका खुद से है, नहीं किसी से वास्ता, वो तोड़ती पत्थर। दो जून की रोटी, बस चाह है उसकी, लिए गोद में बेटी, वो तोड़ती पत्थर। तरुण तन से, मृदुल मन से, बहुत कठोर मगर, जीवन से, वो तोड़ती पत्थर। कितनी चोटें मन पर, तन पर कई निशान, पथरीली चट्टान का, तोड़ रही अभिमान, वो तोड़ती पत्थर, वो तोड़ती पत्थर।

अग्निपथ

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जीवन है अग्निपथ,हांक तू श्वास रथ। न हो विकल,चल तू अविचल। जीवन है अग्निपथ। हो मन व्यथित,तू धैर्य रख। तम से तू ,बिल्कुल न डर। जीवन है अग्निपथ। हो मृत्यु भी गर,सामने तेरे सन्निकट। रख हौसला बस,तू ले निपट। जीवन है अग्निपथ। ये त्रासदी क्या,कुछ भी नहीं। तू सकता न,बिल्कुल भी डर। जीवन है अग्निपथ। इंदु शुक्ला उरई उत्तर प्रदेश

प्रकृति

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विलग हुए पत्तों से पूछा मैंने, दर्द तो हुआ होगा, हवा के झोंके के साथ उड़ते बोले, हां मगर कम, मैं हैरान थी ये क्या जवाब, तभी उत्तर मिला एक नया अंदाज, मेरा विलगन प्रकृति है, नूतन किसलय आने के लिए। दरख़्त से फिर पूछा मैंने, बोला जरूरी था, वो स्वतंत्र थे मुझे छोड़ जाने को, कौन मैं मौन मैं, क्या बहाना बनाता, उन्हें रोक पाने के लिए, यही प्रकृति है, यही नियत है,  नए किसलय आने के लिए। दोनों समर्पित थे विलग हो जाने के लिए। कवयित्री इंदु विवेक  स्वरचित

महंगाई

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आम आदमी बेचारा मरता क्या न करता। बड़े बड़े जो ख़्वाब थे देखे कैसे पूरा करता। महंगाई की मार ने देखो कमर तोड़ दी पूरी। दाम बड़े ज्यों चीजों के कसर रही न थोड़ी। मार मार के मन अपना कैसे न आहे भरता। आम आदमी बेचारा मरता क्या न करता। घर और नौकरी के चक्कर मे फिरता जैसे फिरनी। लोग विराते और चिढ़ाते हालात क्या है करली। देखवे और दिखावे को कैसे न नाटक करता। आम आदमी बेचारा मरता क्या न करता। कितने वादे थे बीवी से कितने माई बाप से। कैसे पूरे कर पाऊंगा पूछे अपने आप से। वादे पूरे करने को चिंता में क्यों न घुलता। आम आदमी बेचारा मरता क्या न करता। इंदु विवेक उदैनियाँ उरई (उत्तर प्रदेश)

संयुक्त परिवार एवं एकल परिवार

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हमारे देश में विभिन्न  जातियों विभिन्न वर्गों के लोग रहते हैं। ऐसे में कुछ संयुक्त परिवार में और कुछ एकल परिवारों में  रहते है।  जहां संयुक्त परिवारों की अपनी समस्याएं होती हैं अपनी सुविधाएं होती है वहीं एकल परिवारों में अलग प्रकार की समस्या और सुविधाएं होती।  संयुक्त परिवारों में बच्चों के दादा-दादी नाना-नानी सभी का स्नेह मिलता है प्रेम मिलता है नई चीजें सीखते हैं पुरानी कहानियां सीखते हैं वही एकल परिवारों में बच्चे उन सब से दूर रहते हैं केवल माता पिता के सम्पर्क में रहते हैं।  संयुक्त एवं एकल परिवारों में और भी कई अंतर होते हैं संयुक्त परिवारों में अलग-अलग तरीकों से  विभिन्न गतिविधियां होती हैं। एकल परिवारों में ऐसा संभव नहीं हो पाता है।   दरअसल आर्थिक युग में सभी पैसे कमाना चाहते है।एक दूसरे से स्वयं को श्रेठ दिखाना चाहते है।एक दूसरे की पारिवारिक कार्यो में मदद को वह फालतू कार्य अथवा गुलामी की श्रेणी में रखते है।और यही से परिवारों में विघटन शुरू होता है।जिसका खामियाजा भुगतती है हमारी आने वाली पीढ़ियां एवम बुजुर्ग। इंदु विवेक उदैनियाँ

युद्ध और शांति

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युद्ध पर विराम हो , अब युद्ध पर विराम हो, युद्ध से हुआ नहीं भला किसी का, युद्ध से विनाश है प्रकृति का, शांति की अब बात हो, अब युद्ध का विराम हो, वार्ता हो बैठकर बेहतर होगा, हो न विवाद ये बेहतर होगा, देश का प्रत्येक तब ही कल्याण हो, अब युद्ध पर विराम हो विध्वंस ही विंध्वस मचा है चारों ओर, दे सका न ये युद्ध जन धन की न हानि हो, अब युद्ध पर विराम हो, इंदु विवेक उदैनियाँ

आजादी के रंग

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आजादी के रंग अनेक, केसरिया और हरा सफेद। मिलके मनाय ये त्योहार, कोई भी न रह जाये यार, मन मे हो न कोई भी खेद। केसरिया,,,,, आज अनोखा दिवस ये आया, सबके मन को है हर्षाया, हर व्यक्ति है आज विशेष। केसरिया,,,,,, आज करे हम देश से वादा, जीवन होगा सच्चा सादा, नही रखे हम किसी से बैर। केसरिया,,,,, कोई भी जाति हो कोई भाषा, सबसे अपना अच्छा नाता, घर घर पहुँचे ये संदेश। केसरिया,,,,,, -इंदु विवेक उदैनियाँ

कुछ खट्टी कुछ मीठी

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आज हो गया पतिदेव से सुबह से घमासान। बोले क्या करती हो दिनभर बस खाने का काम। सुनकर ऐसी बातों को गुस्सा में तमतमाई। लेकर खाट पाट सो गई खाना नही बनाई। बोले चलो छोड़ दो गुस्सा पूड़ी साग बना लो। मैंने भी कह दिया तेल न जाओ बाजार से ला दो। आंखे कर के लाल कहा कैसी सम्भाल रही गृहस्थी। कभी खत्म हो जाता तेल और कभी खत्म है हल्दी। गए बाजार तेल लेने जब भाव सुना वापस आये। बोलो सुनो मेरी जान क्यो न आज रोटी सब्जी ही खाएं। कुछ खट्टी कुछ मीठी बातों से जीवन में होती बहार। नोकझोंक जब तक न हो कुछ होता न है प्यार। इंदु विवेक उदैनियाँ

युवा देश का मान है

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युवा देश का मान है, युवा देश की शान है। संघर्षों से लड़ने की हिम्मत, युवा देश की जान है। युवा शक्ति पहिचान है, युवा वीर सम्मान है। युवा के बल संयम से हारे, बड़े बड़े अभिमान है। युवा मार्ग जो चुनता है, चुनकर आगे बढ़ता है। युवा पराजित कर शत्रु को, नहीं समर में डरता है। युवा विजय जयगान है, धर्म और विज्ञान है। युवा शीर्ष उत्थान है, जन जन का कल्याण है। इंदु विवेक उदैनियाँ (स्वरचित)

कोहरे की रात

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आये है दिनकर,        सुबह की सौगात लेके। चल रही ठंडी पवन,         पंक्षियो की बात लेके। अश्व सातों खूबसूरत,           प्रभा भी ये विशेष। रात्रि का तम भी हरेगा,          और हिय का कलेश। भवँर भी फूलों का रस,              पीने को व्याकुल। हँस रहे चकवा चकई,           प्रेम में होकर के आतुर। प्रात की ही बात है,           आलस्य सारा खो गया। अपनी ही हर गतिविधि में,               संसार सारा हो गया। आये है ये भास्कर,       अब इन्हें प्रणाम कर लो। है सुहानी ये सुबह इसको,           नयनों में तो भर लो। कोहरे की रात जैसे             हो गई विदा हो। फैल गया जग में            प्रकाश ये नया हो। इंदु विवेक उदैनियाँ

एक कप चाय

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एक कप चाय,दिन बन जाये। पी के कहे दिल,मजा आ गया हाय। सुबह सुबह पाए ,आलस को भगाय। जाड़े के दिन हो ,तो सर्दी पास न आये। हो रेस्तरां की ,या घर पे बनाये। बस देख के ही, चाय मन ललचाये। पीके कभी दूर हाइवे पर ,ढाबे की चाय। मन कहे एक और ,कुल्हड़ वाली चाय। खुद से बनाये या, किसी के घर जाए। बस एक कप एक कप बस ,अदरक वाली चाय। मुफ्त में कोई पिलाये,तो स्वाद ज्यादा आये। एक कप चाय☕ दिन बन जाये।

विकास या विनाश

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विज्ञान के दुरुपयोग से विनाश ला दिया, विकास करते करते अभिशाप ला दिया, ----------------------- चारो तरफ है वाहनों का हल्ला शोर, चलता नही व्यवस्थाओं पे कोई जोर, हरी भरी वसुंधरा को मरुस्थल बना दिया। विकास करते करते अभिशाप ला दिया। -------------------–---- धुंआ उगल रहे शहर और फेंकते रहे जहर, उपचार है कोई नही बीमार है रहे टहल, पवित्र पाविनी को भी संकट में ला दिया। विकास करते करते अभिशाप ला दिया। ------------------------ ईमान धर्म बेंच के सब कुछ है खा गए, इंसानियत को मार के हैवान बन गए, नफरत के बीज बो के झगड़ा करा दिया। विकास करते करते अभिशाप ला दिया। ------------------------ इंदु विवेक उदैनियाँ (स्वरचित) जालौन (उत्तर प्रदेश)

शतरंज

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----------- जीवन की शतरंज लगी है, प्यादा समझे खुद को राजा। भरा हुआ कितना अहम है,  पूरा समझे है पर आधा। नहीं उसे अहसास के वो क्या है,  क्या आगे हो सकता। ऊपर जो ईश्वर बैठा है, बाजी सारी पलट सकता। गर्व दम्भ के मारे देखो, कर्मो का भी बोध नहीं। सही है क्या और गलत है क्या, करना जो मन आये वही। अंतिम बाजी होगी जब, तब याद उसे आ जायेगा, प्रभु की सत्ता का अपमान कर, फिर उस दिन पछतायेगा। क्यों इतना तू दम्भशील है, जितना भी कुकृत्य तू कर, याद तुझे सब तब आएगा, जो बोया तूने वो पायेगा। इंदु विवेक उदैनियाँ स्वरचित

तितली

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 --------- खुशबुएँ तितलियां और दीपक मेरे मन को लुभाते बहुत है। क्या कहूँ तुमसे ओ दिलबर मेरे मन को ये भाते बहुत है। देखती हूँ मैं जब जब ये दीपक,रोशनी सी हूँ मैं जगमगाती। मुझमें बाकी अभी बांकपन है,हूँ सितारों सी मैं झिलमिलाती। रोशनी चाँदनी और जुगनू ,मेरे मन को ये भाते बहुत है। देख के तितलियों की उड़ाने,आसमाँ में उडूँ दिल है करता। इनको कितना भी देखूं मगर ये दिल मेरा दिल मेरा जाने क्यों न भरता। रंग पंख और इनकी उड़ाने मेरे मन को ये भाती बहुत है। जब सराबोर हूँ खुशबुओं से, होती मन को खुशी तब बहुत है। भीनी भीनी सी इन खुशबुओं में है महकने का मन मेरा करता। फूल तुम और इतर की ये खुशबू मेरे दिल को भाते बहुत है। खुशबुएँ तितलियां और दीपक मेरे मन को लुभाते बहुत हैं। इंदु विवेक उदैनियाँ स्वरचित

सफलता

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हो तिमिर घनघोर या,शूलों भरा पथ हो कही बढ़ते रहना तुम न रुकना ,पांव डगमग हो कभी इस तरह ही तुम सदा आगे को बढ़ते जाओगे सत्य कहती हूँ यूंही एक दिन सफलता पाओगे देखना न तुम सहारा,आगे ही होगा किनारा पीछे न देखोगे तो ,सैलाब से बच जाओगे सत्य कहती,,,,,,,, जो भी बोले ये जमाना ,मौन हो तुम सुनते जाना जो कहीं देने लगे उत्तर,उलझते जाओगे सत्य कहती,,,,,,,, पथ भ्रमित करने को, बैठे है कई बाजार में तय स्वयं करना तुम्ही ,करना है क्या संसार में सत्य का पकड़े यूं दामन, तुम तो लड़ते जाओगे सत्य कहती हूँ यूं ही एक दिन सफलता पाओगे। इंदु विवेक उदैनियाँ स्वरचित

सैनिक

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जब सर्द रातों में हम घर पे पड़े होते है, तब देखो वीर सैनिक सरहद पे खड़े होते है। जब देश पे संकट आता है , मन जब अपना घबराता है, तब लड़ते ये न डरते है, बस अपनी जिद पे अड़े होते है। तब देखो वीर सैनिक सरहद पे खड़े होते है। छोड़ कर फ़िकर घर द्वार की, चिंता ही नही जीत हार की, बस लक्ष्य पाने को उत्सुक, ये भारत माता के लाल खड़े होते है। तब देखो वीर सैनिक सरहद पे खड़े होते है। रग रग में भर के फौलाद कर शशक्त तन, कर देते न्योछावर ये देश पे तन मन , हर बात में बलिदान की बातें ये मर मिटने को आतुर डटे होते है। तब देखो वीर सैनिक सरहद पे खड़े होते है। इंदु विवेक उदैनियाँ

एक जासूस

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हर पल रखता था जो हर खबर दिल की, बार बार टकराती जिससे नजर मगर नहीं मिलती, जाने क्या सोच थी समझ न आई उसकी, मगर मुस्कान बड़ी कातिल लगी उसकी, मुहं पर मुखौटा लाज़मी था जिसके, पता नहीं दिल में छिपा क्या?  राज था उसके, क्यों वो सामने होकर भी सामने न आया। इंसान था या साया समझ नहीं आया। भाव जिसके दिल का हो सका न महसूस था। हां वही शायद मेरे इश्क़ का  जासूस था। इंदु विवेक उदैनियाँ स्वरचित

तेरे इश्क़ में

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है तेरे इश्क़ में पागल मेरी नजरें,, बस तुझे ही ढूंढती रह जाती  है। जाने क्या कहना चाहती है?,,लेकिन कुछ नही कह पाती है। -------------------------------- चाहती है कि बांट ले खुशियां तुमसे,,और ले ले तुम्हारे सारे गम। चाहती है कि रौनकें हो तेरी निगाहों में,,और न हो एक छोटा सा भी गम। है तेरे इश्क़ में पागल मेरी नजरें...... ---------------------------------- कभी किसी महफ़िल में जिक्र तेरा हो,तो ये शर्म से यूं ही झुक जाती है कभी बेशर्म हो ढूंढती तुमको ,,देखती ही तुम्हे ये बदल जाती है है तेरे इश्क़ में पागल ये मेरी नजरें...... ---------------------------------- देखती राह तुम्हारी कि ये तन्हाई में तुम आओगे कभी। और कर कर के इंतजार तुम्हारा  ये बहुत थक जाती है। है तेरे इश्क़ में पागल ये मेरी नजरें...... ---------------------------------- रातभर गिनती है चाँद सितारे और पूछती है पता तुम्हारा कहाँ हो तुम। कही कोई हमनवां तो मिल न गया है तुमको बस यही सोच के घबराती है। है तेरे इश्क़ में पागल ये मेरी नजरें........ ---------------------------------- इंदु विवेक उदैनियाँ(स्वरचित)

मुक्ति

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भाव समर्पण का हो मन में,तो सब कुछ पा जाता है। हर रस्ता आसान सा लगता, लक्ष्य नजर भी आता है। प्रेम करो तो करो समर्पण,वरना कोई बात नहीं। तुमसे अच्छा प्रेम तो फिर,पशुओं में पाया जाता है। भाव समर्पण का हो मन में,तो सब कुछ पा जाता है। धर्म कर्म और भक्ति मुक्ति की बातें, कितनी भी कर ले। मगर बात जब दान की आये,कौड़ी न दे पाता है। भाव समर्पण का हो मन में,तो सब कुछ पा जाता है। साम दाम और दंड भेद से,करवा लो तुम मन की बात। प्रेम मगर प्यारे देखो केवल मन से हो पाता है। भाव समर्पण का हो मन में,तो सब कुछ पा जाता है। इंदु विवेक उदैनियाँ (स्वरचित)

आंगन

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खिली जो तुम आंगन में मेरे ,मन मे ये आया, जैसे कोई तिजोरी मेरी धन से भर आया, नए नए छोटे से पौधे,,लिए बालपन आभा ओढ़े, बढ़ते हुए तुम्हे जब देखा मन मे आया, जैसे कोई तिजोरी मेरी धन से भर आया। हुए बड़े जब थोड़े थोड़े ,बाली आई पुलकित डोले लहराते पत्तियों के झोंके मन मे ये आया, जैसे कोई तिजोरी मेरी धन से भर आया। विष्नु प्रिया तुम हरि को प्यारी,महकी तुमसे मेरी क्यारी, हुआ आरोग्य सभी का तन मन,मन मे ये आया जैसी कोई तिजोरी मेरी धन से भर आया। अदभुत रूप निराली छाया,जिस आंगन में तुमको पाया, जीवन मेरा धन्य हुआ ये, निर्मल मन हर्षाया। जैसे कोई धूप से आहत निधिवन में आया। जैसे कोई निर्धन अनमोल रत्न पाया। इंदु विवेक उदैनियाँ(स्वरचित) जालौन उत्तर प्रदेश