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रच दिया इतिहास

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रच दिया इतिहास उसने,  बन गयी वीरांगना,  अपने शौर्य का जौहर दिखाया,  नाम है जिसका लवलीना| जीत कर तुमने पदक,  बढ़ाया राष्ट्र का स्वाभिमान,  तुम्हारे इस पराक्रम का,  सदा करते है हम सम्मान| नारी के साहस का तुमने,  एक नया आयाम दिया,  नारी मैदान फतेह कर सकती है,  दुनिया को ये पैगाम दिया | दे कर शिकस्त प्रतिद्वंदी को ,  अरमान मिलाये माटी में,  भारत का रोशन नाम किया,  भारत माँ की इस बेटी ने | देश की बेटी लवलीना ने,  रण में दिखलाया है दम ख़म,  विजय पताका फहरा कर,  जीत लिया हम सब का मन |        हनुमान कुमार ✍️✍️

नारी अबला नहीं सबला

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            नारी अवला नहीं सवला है निर्बल समझे जो नारी को  मैं उन्हें बताना चाहता हूँ  नारी ने स्वयं की शक्ति से  जीती है हर एक स्पर्धा  हर रण मैं ध्वज है फहराया  युद्ध हो या प्रतिस्पर्धा  मैं नमन करूँ उस नारी का यौवन को अर्पित कर डाला  राष्ट्र के हित में नारी ने  जीवन को समर्पित कर डाला  मुझे गर्व है तेरे साहस पर  तूने राष्ट्र जनों को हरसाया अपनी शौर्य कला प्रदर्शित कर  परदेश राष्ट्र ध्वज लहराया            हनुमान कुमार 

गीत

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                             तेरी मन मोहनी सूरत, मेरे दिल को  लुभाती है| तेरे गजरे की ये खुशबू मेरा   मन मोह  लेती है| चले तेरे नैनों के जो तीर मेरा   दिल हुआ घायल | मेरा मन झूमने लगता है जब खनकाती हो पायल| चमन में फूल खिल जाते हैं जो तू मुस्कराती है | तेरी मन मोहनी सूरत  मेरे दिल को  लुभाती है | मैं हरपल खोया रहता हूंँ तुम्हारे ही ख्यालों में | मैं हरदम देखता रहता हूँ तेरे घर की  राहों में | मुझे अब हर घड़ी हर पल सदा तेरी याद आती है| तेरी मन मोहनी सूरत   मेरे दिल को  लुभाती है | गुलाबी ओष्ठ तेरे लग रहे जैसे कोई   गुलकंद | भ्रमर बन के चुरा लूँ मैं तेरे अधरों से ये मकरंद | तेरे अधरों की ये तपिश मेरे हिय को जलाती है | तेरी मन मोहनी सूरत मेरे दिल को लुभाती है |                    हनुमान कुमार 

तुमसे कितनी है चाहत

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तुमसे कितनी है चाहत ओ मेरे सनम,  अब न होता  सबर में बता दूँ तुम्हे| देखो कितनी मोहब्बत है तुमसे हमें,  दिल धड़कता है हरदम ये बेचैन मन,  तुमसे कितनी है चाहत ओ मेरे सनम,  अब न होता सबर में बता दूँ तुम्हें| हो गया है गिला कोई हमसे अगर,  भूल जाओ गिले माफ कर दो हमें,  दिल मिलने को तुमसे तरसता है अब,  ये फासलों को मिटाने का कर लो जतन| तुमसे कितनी है चाहत ओ मेरे सनम,  अब न होता सबर में बता दूँ तुम्हें| क्यों रूठी हो हमसे क्या है मेरी खता,  पास आओ मेरे और बता दो हमें,  रह न पाउंगा अब में तुम्हारे बिना,  करीब आओ मेरे और लगा लो गले,  हो जाये मेरे दिल का तेरे दिल से मिलन | तुमसे कितनी है चाहत ओ मेरे सनम,  अब न होता सबर में बता दूँ तुम्हें|                    हनुमान कुमार

ग़ज़ल

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                                मैं वक़्त का मारा.   मुसाफ़िर हूं,  कर  दिया  है आपनों ने  रुसवा,  मुझे  बर्बाद कर  सब हस रहे है,  मैं हालात  का मारा मुसाफिर हूँ| थका   बैठा   हूँ  बीच   राहों  में,  सोच  में डूवा हूंँ  जाना  कहाँ  है,  मुझे  न  मिला  हमसफ़र   कोई,  मैं  मंजिल  का हारा मुसाफिर हूँ,| कई अरसों से हूँ अंजाने सफर में,  न रास्ता न मंजिल का ठिकाना है| जल रहा धूप  में सूखा  हलक  है,  कई बरसों से प्यासा मुसाफिर  हूँ |               हनुमान कुमार