ग़ज़ल
मैं वक़्त का मारा. मुसाफ़िर हूं,
कर दिया है आपनों ने रुसवा,
मुझे बर्बाद कर सब हस रहे है,
मैं हालात का मारा मुसाफिर हूँ|
थका बैठा हूँ बीच राहों में,
सोच में डूवा हूंँ जाना कहाँ है,
मुझे न मिला हमसफ़र कोई,
मैं मंजिल का हारा मुसाफिर हूँ,|
कई अरसों से हूँ अंजाने सफर में,
न रास्ता न मंजिल का ठिकाना है|
जल रहा धूप में सूखा हलक है,
कई बरसों से प्यासा मुसाफिर हूँ |
हनुमान कुमार
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