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पर्यावरण दिवस

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जीवन भर गाते सभी,वसुधा के तो गीत। हरियाली को रोपकर,बन जाएँ सद् मीत।। हरियाली से सब सुखद,हो जीवन अभिराम। पेड़ों से साँसें मिलें,विकसित नव आयाम।। धरती माता पालती,संतति हमको जान। धरती माता के लिए,बेहद है सम्मान।। अवनि लुटाती नेह नित,करुणा का प्रतिरूप। इसकी पावन गोद में,सूरज जैसी धूप।। वसुधा का संसार तो,बाँटे सुख हर हाल। हवा,नीर,भोजन,दुआ,पा हम मालामाल।। धरा-गोद में बैठकर,होते सभी निहाल। मैदां,गिरि,जंगल सघन,सुख को करें बहाल।। हरियाली के गीत नित,गाती वसुधा ख़ूब। हम सबको आनंद है,बिछी हुई है दूब।। वसुधा का सौंदर्य लख,मन में जागे आस। अंतर में उल्लास है,नित नेहिल अहसास।। धरती माँ करुणामयी,बनी हुई वरदान। नित हम पर करती दया,देती है अनुदान।। धरा आज प्रमुदित हुई,करती हम पर नाज़। पेड़ों का रोपण किया,हुई सुखद आवाज़।। गाती रोज़ वसुंधरा,हरियाली के गीत। जब साँसें सबको मिलें,होगी तब ही जीत।। वसुधा का है नेह यह,जो देती है अन्न। वरना हम रहते सदा,भूखे और विपन्न।।         --प्रो(डॉ)शरद नारायण खरे                        प्रा...

महात्मा बुद्ध के

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मानवता की सीख से,जगा दिया संसार। हे गौतम ! तुमने दिया,हमको जीवन-सार।। सामाजिक नवचेतना,का बाँटा उजियार। प्रेम-नेह के दीप से,दूर किया अँधियार।। कपिलवस्तु के थे कुँवर,किया सभी पर त्याग। ज्ञान-खोज में लग गए,गाया सत् का राग।। संन्यासी बन तेज का,दिया दिव्य उपहार। बुद्ध ज्ञान के पुंज थे,परम मोक्ष का सार।। धम्मं शरणम् ले गए,सारे जग को बुद्ध। प्रेम,शांति की सीख से,बंद किए सब युद्ध।। मार्ग दिखाया सत्य का,मानवता का गान। हर दुर्गुण को दूर कर,सौंप दिया उत्थान।। बौद्धधर्म के दर्श से,किया नवल यह लोक। सतत् साधना से किया,दूर सभी का शोक।। सबके मन को जीतकर,मानव बने महान। सचमुच में सिद्धार्थ थे,परम शक्ति का मान।।   सदियों तक जग बुद्धमय,युग-युग तक गुणगान। हर मानव मानव बना,सचमुच में इनसान।।   नमन् करूँ,वंदन करूँ,गाऊँ श्रद्धागीत। हे गौतम ! तुम हो सदा,मानवता के मीत।।      --प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे                   प्राचार्य प्रमाणित किया जाता है कि प्रस्तुत रचना व अप्रकाशित है -प्रो शरद नारायण खरे

श्रीराम के दोहे

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राम नाम है वंदगी,राम नाम यशगान। राम नाम सुख-चैन है,राम नाम उत्थान।। राम नाम में ताप है,राम नाम में साँच। राम नाम हो संग तो,नहिं आती है आँच।। राम नाम सुख से भरा,राम नाम रसधार। राम नाम के तेज से,महके नित संसार।। राम मोक्ष हैं,दिव्य हैं,जग के पालनहार। राम शरण में जो गया,पाता वह उपहार।। राम नाम तो सूर्य है,राम नाम अभिराम। राम नाम आवेग है,है नित तीरथधाम।। राम नाम तो श्रेष्ठ है,राम नाम आदर्श। तरे मनुज भव से सदा,मिले राम का दर्श।। राम नाम शुचिता लिए,राम नाम में सार। राम नाम वरदान है,राम नाम उपहार।। राम नाम उजियार है,हर ले जो अँधियार । राम नाम यशगान है,राम नाम जयकार।। राम नाम मधुरिम-सुखद,राम नाम उद्घोष। राम नाम है वंदगी,राम नाम है जोश।।   राम नाम आशीष है,राम नाम विश्वास। राम नाम तो आस है,है नेहिल अहसास।। राम नाम तो ज़िन्दगी,है जीने का भाव। राम नाम में ताज़गी,गरिमा लिए प्रभाव।। राम नाम तो सत्य है,जो देता मुस्कान।  करके हर जीवन सुखी,रचता जो नित मान।।         -प्रो(डॉ)शरद नारायण खरे                    प्राचार्य...

नारी

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नारी अब तेरे लिए , खुले सभी हैं द्बार। आज सफलता मिल रही, नहीं रही अब हार। घर की चौखट लांघ के, उड़े आज आकाश। संस्कारों के नाम से, डालो मत तुम पाश।। चूनर ओढ़े लाज की,  उसे बना के पंख। सपनों को पूरा करे, बजे जीत का शंख।। कविता झा 'काव्या कवि' रांची, झारखंड

चेतनता की रात-महाशिवरात्रि

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 हे!भोले शिव है विनय,तुम हो कृपानिधान। तुम बनकर रहना सदा,मेरे प्रिय भगवान।। चेतनता की रात है,शिव विवाह की बात। जग जड़ था चेतन हुआ,यह सबको सौगात।। शिव गौरा कल्यामणमय,सच में पावन मेल। इक बाती सी जल रहा,दूजा उसका तेल।। हे! शिवशंकर,है नमन् ,करना जगकल्याण। पाप मारता है हमें,नित ही तीखे बाण।। गौरापति,गौरीश तुम,रखना मेरी लाज। गिरा झूठ,अन्याय पर,हे! प्रभुजी अब गाज।। गंगाधर,डमरू बजा,तभी डरेगा पाप। जो नैतिकता नहिं रखें,दे दो उनको शाप।। विषय-वासना बढ़ रही,हैं कपटी आसार। नयन तीसरा खोलकर,कर डालो संहार।। अंधकार ने ग्रस लिया,सिसक रहा उजियार। कौन करेगा सत्य से,तुम जैसा अब प्यार।। औघड़दानी जय करूँ,देते तुम वरदान। इसीलिए हम सब करें,तेरा नित गुणगान।। महादेव शिव की दया,करते जो उपकार। जिनके कारण हो गए,स्वप्न सभी साकार।। शिवबाबा मंगलमयी,औघड़दानी नाथ। नहीं छोड़ना साथ तुम,थामे रखना हाथ।। भोलेभंडारी करूँ,मैं तेरा यशगान। तुम हो मालिक़ तुम सदा,रखते सबकी आन।।                        -प्रो(डॉ)शरद नारायण खरे         ...

ज्यो सोने की खान

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मन के भाव समेट कर, दिया अनोखा रूप।  धीरे-धीरे    हो     गया,   वह  तेरे  अनुरूप।। पुष्पों  के  मानिंद  हैं ,  अधर  तुम्हारे  लाल। कानों  में  करते  लगे ,  कुंडल मुझे कमाल।। भौंहें  बनीं  कटार  सी  , नयना बने विशाल। ग्रीवा  सांचे  में   ढली  ,  दमक रहा है भाल।। मुख  मंडल  ऐंसा  लगे ,  चांद  कोई   बेदाग। कोयल  जैसे  वयन  से ,  बरस  रहा अनुराग।। गर्दन  की  शोभा  बना ,  प्रिय  सोने  का  हार। बाजूबंदों   को   मिला  ,  बांहों का अति प्यार।। नागिन  सी  चोटी  रही  , कम्मर तक बल खाय। शोभा कटि की बन रही ,  करधौनी    लहराय।। सांचे   में   ढाला   बदन  ,  हिरणी   जैसी  चाल। कुदरत  की  अनुपम कृती, क्या दूं तुम्हें मिशाल।। यौ...

पुष्प वाटिका के दोहे

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पुष्प  वाटिका  में गए, लक्ष्मण के संग राम। पुष्प संग्रहित कर रहे, देखो खुद सुखधाम।। आज जनकपुर की हुई, बड़ी सुहानी भोर। कोयल  कूके  बाग  में , नाच  रहे  हैं  मोर।। दर्शन  के  हित  आ  गए , देखो सब खग पास। पुष्प  वाटिका  में  खिला , एक नवल मधुमास।। जनक  दुलारी  आ  गईं ,  तब  सखियों  के  संग। स्वागत  में   करने   लगे ,  कलरव सकल विहंग।। लखन  न  लख  पाए तनिक, लखन लगे श्रीराम। सिय  की   शोभा   देखकर , मुदित हुए सुखधाम।। कंगन   नूपुर   बज   रहे  ,  पकड़े  लय अरु ताल। पुष्प  वाटिका  में  मुदित ,  हो  गए अवधभुआल।। आज  वाटिका  में   खिले ,  पुष्प  कई  तत्काल। अनुपम  जोड़ी  के   लिए ,  बन  जाएं जयमाल।। सीता  प्रमुदित   हो  गईं ,  लख  रघुवर  को रू...

दोहे

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🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷   प्रेम रोग में बाबरी,।  खत लिखे दिन रैन,। पिया को देखत सावरी,।  छत पर लागत नैन,।। लत बुरी है प्रेम की,।  मन में उठता पीर,।। प्रेम के रंग मैं रची,।  मन हो गया कबीर।।                            संगीता वर्मा, ✍️✍️