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पिशाचों की जंग नरपिशाचों से

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  जंगल के इस हिस्से में पिशाचों की बस्ती बनी हुई थी। अनेकों पीपल और बरगद के पेड़ थे। जिनपर पिशाच रहते थे। रोटी, कपड़ा और मकान मनुष्यों के साथ साथ पिशाचों की भी मूल जरुरत है।     पर मनुष्यों से अलग वे केवल अपनी जरूरतों से ही खुश रहते। भरे पेट पर किसी से कुछ न कहते। जगह की कमी होने पर शाखाएं भी बांट लेते। भोजन तो बांटते ही थे।    पिशाचों का भोजन क्या। सुना जाता है कि पिशाच खून के शौकीन होते हैं। ये भी खून के शौकीन थे। पर नरपिशाचों के खून के।    रात अंधेरी होते होते पिशाचों की टोली शिकार करने निकलती। जंगल में अनेकों जानवर थे। पर इन पिशाचों की जीभ पर तो नरपिशाचों का खून लग चुका था। जैसे किंग कोबरा का भोजन दूसरे सर्प हैं। उसी तरह इनकी मुख्य खुराक नरपिशाच थे।   " चाचा। दो दिन हो गये। पेट में कुछ भी नहीं गया। अब कुछ करना होगा।"   एक नये पिशाच ने अपने सरदार से कहा।   पिशाचों का सरदार गंजे सिर बाला, बड़ा़ दुबला पतला सा पर नरपिशाचों के लिये निर्दयी था। जब वह जिंदा था तो बड़ा शरीफ आदमी था। ठाकुर के आदमियों ने उसके बाप को मारा। उसकी बहन की इज्ज...

फौजी पिता का सपना

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    डाक्टरी की पढाई पूरी करके रोशनी की नौकरी एक बहुत अच्छे अस्पताल में लग गयी। न जाने कितने साल पढाई में लङकी ने खपा दिये। पहले एम बी बी एस किया। बहुत अच्छे से उत्तीर्ण हुई। फिर भी पढाई बंद नहीं हुई। खाली एम बी बी एस से मन नहीं भरा। तो मास्टर की डिग्री भी प्राप्त की। खेलने खाने के दिन पढाई और पढाई को अर्पित कर दिये। अभी तक रोशनी के लिये न कोई दिन था और न कोई रात।     रोशनी की इस सफलता में उसकी मम्मी, दादी और बहुत हद तक उसके पिता का भी हाथ था। पर एक मृतक व्यक्ति का अपनी बेटी की सफलता में भला क्या हाथ हो सकता है। आप भी दूसरों की तरह लेखक की मानसिक स्थिति पर संदेह कर सकते हैं। पर लेखक केवल वही लिख रहा है तो घर की तीनों स्त्रियां मानती आयीं हैं। आज तक रोशनी को उसकी हर सफलता पर उसे उसके पिता से आशीर्वाद दिलाया जाता था। जिन्हें रोशनी ने केवल चित्र में देखा था।     "अरी छोरी । बहादुर से आशीर्वाद लेकर काम पर जाइयो। जी नाहे कि बैसे ही चली जाये। पहली दफा काम पे जा रही है।"     "बिलकुल दादी। पापा को हाय बोले बिना मैं तो घर से भी नहीं निकलती...

गलती भाग ३० अंतिम भाग

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  दिन पर दिन गुजरते गये। घर में दया मात्र एक कमरे में सिमट गयी। बार बार अपनी ही गलती सुनते सुनते वह खुद को गलत भी मानने लगी। हाॅ... ।सच में मैं गलत क्यों नहीं हूँ। क्या पैसे की चकाचौंध में मैं अंधी नहीं हुई थी। जिस तरह आज मेहनत कर अपनी बेटी का पालन कर रही हूँ, उस समय नहीं कर सकती थी। मैं क्यों उस अनुचित का विरोध नहीं कर पायी, जिसका विरोध करना अति आवश्यक था। मुझे आखिर लगा ही क्यों कि शुचि के भविष्य के लिये मुझे किसी पुरुष के सहारे की आवश्यकता है। और वह पुरुष भी कौन... । वही जिसके बहशीपन का मैं खुद शिकार थी। पक्का तो नहीं, पर संभव है कि वही शुचि का वास्तविक पिता है। सही ही है कि मुझे ऐसे धूर्त के खिलाफ मुंह खोलना चाहिये था। फिर गलती तो मेरी ही है। इसमें असत्य कहाँ..।   जाड़े आ गये। दया सुबह सुबह काम के लिये निकलती। काफी समय से अभ्यास की कमी और कुछ उम्र का भी प्रभाव, सर्दी की चपेट में आ गयी। फिर भी रोज का काम करना चलता रहा। खुद के लिये लापरवाही बढती गयी। और एक दिन वह बिस्तर पर ऐसी लेटी कि फिर दिन भर न उठी।   सौम्या आतुर थी कि कब दया कमरे से बाहर निकले और उसे आज के हिस्से का ...

गलती भाग २९

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  यदि किसी नजदीकी की मृत्यु जीवन का एक बड़ा दुख है तो मोहन न तो सौम्या के मन के नजदीक था और न हीं दया के मन के। कितने आश्चर्य की बात कि इसी मोहन के लिये दोनों बहनों में एक बड़ी प्रतिद्वंदिता हुई थी। सचमुच धन दौलत के आधार पर किया प्रेम स्थायी नहीं होता है। प्रेम  मन में उठी वह तरंग नहीं जो उठकर जल्दी ही समाप्त भी हो जाती है। प्रेम तो शर्करा का जल के प्रति वह समर्पण है जिसमें शर्करा खुद मिटकर भी मिटती नहीं अपितु उस जल को अपनी ही मिठास से भर देती है।   मोहन की मृत्यु पर न तो सौम्या और न दया का मन रो रहा था। रुदन भी मात्र लोकाचार था। जैसे तैसे तेरह दिन गुजरे। तेरई के बाद जीवन को नवीन तरह आगे बढाना था।   सौम्या और दया दोनों ही नहीं जानती थीं कि अभी उनके जीवन में बहुत कुछ होना शेष है। इतने वर्षों की नफरत दया पर निकालने का अवसर सौम्या को मिलने बाला है। दया के जीवन का सबसे कठिन समय सामने आने बाला है।   मोहन और दया के विवाह का कोई कानूनी आधार तो था नहीं। विभागीय रिकार्ड में भी मोहन की पत्नी के रूप में सौम्या का नाम ही दर्ज था। मोहन का सारा फंड सौम्या को मिल गया। साथ में ...

गलती भाग २८

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  वासना में अंधे बने को जीवन में सुख कब मिलता है। आत्मबोध और मन की धिक्कार भले ही सचेत व्यक्ति के लक्षण हैं। कामी का मन कभी भी उसे उसके कृत्य के लिये धिक्कारता नहीं है। हाॅ जब वह अपनी कामना ही पूरी न कर पाये, उस समय जरूर व्यथित हो जाता है। सम्हलता फिर भी नहीं है। कुमार्ग का राही दूसरे साधन तलाशने लगता है।    मोहन के मन में दया से किये कुकर्म से कोई भी आत्मग्लानि न थी। फिर जब दया भी उसकी पत्नी बन वापस आ गयी तब मोहन के कामी मन को यही लगा कि दया का मन भी उसी की भांति क्षुद्र है। यदि ऐसा न होता तो दया इस विवाह के लिये तैयार ही क्यों होती। एक स्त्री के निर्णय के हेतु तक पहुंच पाने की उसकी मानसिक अवस्था न थी।    दया मोहन से विवाह कर ससुराल वापस आयी पर मोहन जैसे राक्षस को उसने पति का दर्जा न दिया। परिस्थितियों से लड़ते लड़ते अब वह पहले जैसी कमजोर न थी। घायल सिंहनी की तरफ आंख उठा पाना भी मोहन के लिये संभव नहीं था। केवल बेटी के लिये दुबारा विवाह बंधंन में बंधने बाली दया के जीवन का उद्देश्य केवल और केवल शुचि थी।    दिन, माह और वर्ष गुजरते गये। मोहन कभी भी उस उद्...

गलती भाग २७

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  कभी माॅ को रंगीन वस्त्र धारण करता देख दोनों हाथों से ताली बजा रही छोटी सी बालिका शुचि पंद्रह साल की हो गयी। खुद पढाई से दूर भागने बाली दया के ही समझाने और प्रोत्साहन का प्रभाव था कि शुचि की गिनती मेधावी छात्रा के रूप में की जाती थी। पढाई के अलावा भी उसे जीवन की ठीक ठाक जानकारी हो गयी। वह समझ सकती थी कि उस दिन जब उसकी माँ ने चटक रंग के वस्त्र पहने थे, तब उसकी माँ के जीवन से खुशियां पूरी तरह विदा हो रही थीं।   सौम्या का पुत्र कैलाश भी जीवन के बीस बसंत देख चुका था। पढाई में वह भी अच्छा था। अध्यापन कर अपना जीवन बसर करना उसका स्वप्न था। अपने स्वप्न के प्राप्ति की तरफ वह धीरे धीरे आगे बढ भी रहा था।   जुगनू के हिस्से की जिस जमीन को सैरावत ने बचाया था, वह और मोहन के हिस्से की भी जमीन सुरक्षित न रही। आखरी सांस तक पुरखों की निशानी को सम्हालने का दावा करने बाले सैरावत भी उसे बचा न पाये। सत्य बात थी कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिये न तो दया और न सौम्या गांव में रहने को तैयार थी। शहर का बड़ा खर्च। फिर ईर्ष्या का ऐसा प्रभाव कि दोनों ही औरतें एक दूसरे से कम न पड़तीं। किराये के छोटे स...

गलती भाग २६

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  पंचायत के फैसले से केवल दया ही दुखी नहीं थी, अपितु इस फैसले को सुन सौम्या भी बहुत ज्यादा व्यथित हो गयी। वह समझ नहीं पा रही थी कि इस तरह कुछ लोग कैसे कोई फैसला सुना सकते हैं जिससे किसी के जीवन की दिशा ही बदल जाये। पंचायत मात्र दया के अधिकार और उसके दुख दूर करने के लिये बैठी थी। पर किसी पंचायत को क्या अधिकार है कि वह सौम्या के जीवन में हस्तक्षेप करे। वैसे भी वह पति के स्नेह की प्यासी थी। कोई उम्मीद भी नहीं थी कि पति का स्नेह उसे जीवन में कभी मिलेगा। फिर भी सामाजिक रूप से वही तो मोहन की अर्धांगिनी थी। दया के दुख दूर करना उद्देश्य था या जुगनू के हिस्से की संपत्ति बचाना, पर किसी भी उद्देश्य की पूर्ति हेतु वह अपने पति को अपनी चचेरी बहन के साथ क्यों बांटे। पहले किस तरह से परिपाटी चली कि एक भाई की मृत्यु के बाद दूसरा जीवित भाई, उसकी विधवा से दूसरा विवाह कर लेता था। पर आज ऐसी परिपाटी को कैसे स्वीकार किया जा सकता है।   सौम्या को भले ही अपने पति से शिकायत थी फिर भी वह समझती थी कि मोहन इस निर्णय का विरोध करेगा। उसे क्या पता कि इस फैसले के बाद मोहन के मन में किस तरह के लड्डू फूट रहे हैं।...

गलती भाग २५

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  " नहीं माॅ। ऐसा निर्णय क्यों। मेरे हित चाहते चाहते मेरे ही हित की अवहेलना क्यों। इसकी तुलना में तो अच्छा रहता कि पंचायत ही न बुलाई जाती। चोट लगे हुए की चोट पर मलहम लगाने के स्थान पर उस घाव को छेड़ना... । क्या चोटिल के कष्ट का अनुमान नहीं है।"   दया अपने मन के रोष को मन में न रख पायी। " इसमें परेशानी ही क्या है। हमारी बिरादरी में तो पहले भी ऐसा होता रहा है। "   बेटी की तकलीफ सबसे ज्यादा माॅ समझती है। पर कभी कभी स्वार्थ की पराकाष्ठा जब होने लगती है तब माॅ भी माॅ नहीं रहती। सुरैया मानतीं थी कि इस निर्णय का दया के जीवन में कोई अच्छा प्रभाव नहीं होगा। फिर भी मानतीं थी कि स्त्री को बार बार समझोता करना चाहिये। बिना समझोते के स्त्री का क्या जीवन।   " पर माॅ।"   " अब कुछ नहीं। यह तेरे दादा का निर्णय है। सभी रिश्तेदारों का निर्णय है। फिर खुद अपनी ही क्यों सोचती हों। शुचि का भविष्य क्यों बर्बाद करना चाहती हों।"   " शुचि। उसका क्या हित।"   " किसी भी संतान का हित केवल उसके परिजन ही सोच सकते हैं। किसी अन्य से क्या आशा। "   दया चुप रह गयी।...

गलती भाग २४

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  पंचायत में कभी कालीचरण का पलड़ा भारी रहा तो कभी सैरावत के पक्ष में माहौल गया। दोनों ने ही भावनाओं का खुलकर प्रयोग किया। कालीचरण के लिये दया को उसके अधिकार सहित ससुराल भेजना ज्यादा महत्वपूर्ण था तो सैरावत को दया के आगमन से परेशानी न थी। पर जुगनू की विधवा को वह जुगनू के हिस्से की पैत्रिक संपत्ति का अधिकारी बनाना नहीं चाहता था। दोनों के अपने अपने तर्क थे। बिना अधिकार दया को ससुराल भेजने से कौन सी स्थिति बदलती। और दया को उसका अधिकार देने के बाद क्या संभव नहीं है कि उस संपत्ति को बेच फिर दया दूसरा विवाह न कर ले। वैसे भी अभी उसकी उम्र भी कौन ज्यादा है।   पंचायत करा रहे रिश्तेदारों के अनुसार भी इस तरह विधवा को संपत्ति की मालकिन बना देना कोई समझदारी नहीं है। कई बार पंच भी घटनाओं को खुद के जीवन से जोड़ देखने लगते हैं। कालीचरण और सैरावत जैसी स्थिति किसी के भी घर आ सकती है। फिर कोई भी विधवा अपने अधिकार की मांग करने लगेगी। इस पंचायत को दृष्टांत के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। तथा पंचायत के पंच को उसे खुद के घर में भी अस्वीकार कर पाना आसान न होगा।   आखिर जब पंचायत समाप्त हुई तब द...

गलती भाग २३

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  कालीचरण ने बहुत से रिश्तेदार इकट्ठे कर लिये। सैरावत के घर पंचायत बैठी थी। ऐसी पंचायतों में कुछ को अपना रौब दिखाने का, समाज में अग्रणी बनने का मौका मिल जाता। अक्सर सही गलत की बात महत्वहीन हो जाती। जो पक्ष ज्यादा खुशामद कर पाने में समर्थ होता, ज्यादातर लोग उसी के पक्ष में बोलते। फिर खुशामद का परेशानी से सीधा संबंध होता है। दया से परेशानी तो कालीचरण को ही ज्यादा हो रही थी। वही दोनों पक्षों के रिश्तेदारों को इकट्ठा कर लाया था।   " भाइयों। मेरी बात में कुछ भी गलत लगे तो मुझे फटकार देना। सही बात है कि मेरी नातिन दया सैरावत जी के छोटे बेटे को ब्याही। इससे पहले भी मेरी बड़ी नातिन भी इनके ही बड़े बेटे को ब्याही है। आप ही बताइये कि शादी के बाद बेटी का मायके में क्या काम। डोली उठने के बाद फिर अर्थी ससुराल से ही उठती आयी है। इसमें कौन गलत बात है। "   कालीचरण की बात पर कोई अपना मत व्यक्त करता कि उससे पहले सैरावत बोल उठे। " मना किसने किया है। आपकी नातिन खुद ही तो मायके जाकर रहने लगी। वह ससुराल आ जाये। यहाँ रहे। "   " हाॅ। सही तो बात है। " सैरावत के पक्षधर बोलने लगे। क...

गलती भाग २२

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  समय कितनी जल्दी बदल जाता है। मनुष्य का व्यवहार भी कभी कभी इतनी शीघ्र बदलता है कि यकीन करना भी कठिन होता है कि यह वही व्यक्ति है जिसके मन में कभी स्नेह की विशाल दरिया बह रही थी। जहाँ कभी लहलराता नीर था, अब वहाँ सूखी धूल भरी हुई है जो कि वायु के जरा से प्रवाह से ही उड़कर आंखों को कष्ट पहुंचाने लगती है।   कभी दया से अतिशय प्रेम के कारण विंदु सौम्या को उसके हिस्से का प्रेम नहीं दे पायी थी, आज वही दया विंदु के लिये पूरी तरह उपेक्षित थी। वैसे जिसका युवा पुत्र काल का ग्रास बना हो, उस माॅ की व्यथा सही तरह लिखी नहीं जा सकती है। पर दुखी तो दया भी थी। दोनों एक दूसरे से अपना दुख बांट सकती थीं। पर ऐसा न हो पाया।   दया गर्भवती थी। आगामी नाती के इंतजार में जो थोड़ा बहुत उसे पूछ लिया जाता था, वह भी उस दिन बंद हो गया जबकि दया ने एक बेटी को जन्म दिया। सचमुच पुत्र की इच्छा ही ज्यादा बलबती होती है। एक कन्या की माॅ को तो उचित सम्मान भी नहीं मिलता है।   दिन और रात की उपेक्षा बढती गयी। दया मात्र काम करने की मशीन बन गयी। उस पर भी उसकी बेटी शुचि का ध्यान रखने बाला कोई न था। जहाँ सौम्या के ...

गलती भाग २१

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  रात के लगभग नौ बज रहे थे। जुगनू साइकिल से फैक्ट्री के लिये निकला पर फैक्ट्री पहुंचा नहीं। एक दिन पूर्व ही  पगार मिली थी। किसी तरह उधार देने बाले से बचा हुआ था। जेब में रखे पैसे कुलबुला रहे थे। फिर जुगनू फैक्ट्री कैसे पहुंचता।    शहर के बाहर देशी शराब और बिदेशी शराब के दो ठेके पास ही पास थे। हर रोज की तरह देशी शराब के ठेके पर भीड़ लगी हुई थी। मजदूर वर्ग वहीं अपनी मेहनत की कमाई बर्बाद करता था। जुगनू भी देशी के ठेके का नित्य ग्राहक, पर आज उसकी जेब में पैसे थे। अंग्रेजी शराब के ठेके पर जाकर उसने कुछ नोट दिखाए। भीतर बैठे आदमी ने उसे शराब पकड़ा दी। फिर कुछ नमकीन बगैरह के साथ वहीं एक कौने में पीने लगा। नशा सर चढने लगा। हालत ऐसी हो गयी कि जुगनू के पैर जमीन पर चलने में ही लड़खड़ाने लगे।    पैर भले ही जमीन पर भी न चल पा रहे थे, पर उसका दिमाग आसमान पर था। वहीं से कुछ सौ मीटर की दूरी पर हीराबाई के कोठे पर महफिल जमी हुई थी। हीराबाई कोई छोटी मोटी वैश्या न थी। बड़े बड़े रईसों को ही उसके कोठे में जगह मिल पाती। व आज तो वह शहर के एक बाहुबली नेता बाबूलाल के साथ थी। नेता जी ...

गलती भाग २०

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  विश्वास वह गहन तत्व है जो कि पाषाण को भी ईश्वर बना देता है। विश्वास पोखर के जल को भी गंगाजल बना देता है। विश्वास किसी भी मनुष्य को ईश्वर के समकक्ष बना देता है। विभिन्न प्राकृतिक तत्वों को देव बना देता है। फिर जब वही विश्वास टूटता है तब बहुधा ईश्वर का अस्तित्व भी संदेह के घेरे में आ जाता है।एक विश्वास पर चोट कितने ही विश्वासों को धराशायी कर देती है।     दया को खुद पर विश्वास था कि वह जुगनू को एक जिम्मेदार आदमी बना देगी। उसे विश्वास था कि उसके प्रयासों से जुगनू किसी पर आश्रित नहीं रहेगा। विश्वास था कि जुगनू के विषय में व्याप्त पूर्व धारणा समाप्त हो जायेगी।   दया को खुद पर विश्वास के अतिरिक्त जेठ मोहन पर भी विश्वास था। तभी तो वह एक अकेली स्त्री शहर में रहने आ गयी। पर जब मोहन ने दया के एक विश्वास को तार तार कर दिया, फिर दया को न तो खुद पर विश्वास रहा और न ही पुरुष जाति पर। सचमुच यह पुरुष जाति कभी भी विश्वास के योग्य नहीं है। इनकी कथनी हमेशा करनी से अलग होती है। इनका मन पूरी तरह कलुषित होता है। ये केवल मौके को तलाशते रहते हैं। जब इनके हाथ किसी को सहारा देने के लिये...

गलती भाग १९

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  आसमान में काले बादल छा गये। तेजी से आवाज हुई। लगा कि जैसे बिजली गिरी हो। हवाओं की रफ्तार बढने लगी। तेज तूफान के साथ मूसलाधार बारिश की संभावना थी । वैसे तूफान की घोषणा मौसम विभाग ने पहले से कर रखी थी। पर इन बातों से फैक्ट्री तो बंद नहीं हो जाती। रात की शिफ्ट में जुगनू की ड्यूटी लगी थी। घर से निकलने से पहले एक बार फिर से उसने अपने सुपरवाइजर को फोन किया। मन की आशा बड़ी बलबती होती है। आखरी क्षणों तक हर संभव मार्ग तलाशती है।   सुपरवाइजर कोई मालिक तो था नहीं। वह पहले से ही जला भुना बैठा था। आज खराब मौसम में भी मालिक ने छुट्टी न की। अक्सर मनुष्य अपने मन का गुस्सा किसी न किसी पर तो निकालता ही है। मालिक पर वश न था। पर जब जुगनू का फोन पहुंचा, वह जुगनू पर खुलकर बरस पड़ा।   " मौसम खराब है तो क्या फैक्ट्री बंद हो गयी। इस तरह तो हर रोज कोई न कोई बात बनी रहेगी। खराब मौसम को देख जल्द निकलना चाहिये।"   जुगनू घर से चला तो एक बार उसने दया की तरफ देखा। दया को शहर आये लगभग छह महीने हुए थे, वह शहर के सारे तौर तरीके सीख गयी। हालांकि घर में उसका जेठ मोहन भी रहता था पर उसे कोई परेशानी नहीं...

गलती भाग १८

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  एक प्राइवेट फैक्ट्री में जुगनू को काम मिल गया। ड्यूटी की शिफ्ट लगती थी। किसी सप्ताह दिन की ड्यूटी तो किसी सप्ताह रात की ड्यूटी। अब जुगनू भी दया के लिये उपहार खरीदने की स्थिति में था। हालांकि उसकी आय मोहन की आय के सामने बहुत कम थी। फिर भी जुगनू के ऊपर से नाकारा का ठप्पा हट गया।   फैक्ट्री में काम करने बाले ज्यादातर मजदूर देशी शराब के शौकीन थे। जुगनू भी पुराना शराबी। खुद जैसे लोगों की संगति उसे मिली तो शराब का पान पहले से भी ज्यादा बढ गया।   शहर में एक कमरा लेकर दोनों भाई रहते थे। जुगनू की कमाई या तो दया के लिये तोहफे खरीदने में जाती। या शराब की भेंट चढती। घर के खर्च के लिये पैसा देने की उसकी हालत न थी। उसकी जेब हमेशा खाली रहती।   दया की छठी इंद्रियां संकेत दे रही थीं कि कुछ गलत हो रहा है। जुगनू पर  नकेल जरूरी लग रही थी।यदि समय रहते न चेता गया तो अनर्थ हो सकता है। सौम्या की बतायी बातों पर पूरा विश्वास न था। पर यदि वे बातें सही हुईं तो आदमी सारी कमाई व्यसनों पर ही उड़ाता रहेगा। पर गांव में रहते हुए जुगनू की निगरानी करना संभव न था। आखिर उसने जुगनू के साथ शहर जाकर ...

गलती भाग १७

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  जब जीवन में कुछ सुखद होने लगता है, उस समय भी विपत्ति का मारा मनुष्य घबराता है। कभी कभी तो ऐसे सुखद क्षणों में भी विपत्ति तलाशने लगता है। कभी कभी वह शांति को एक नवीन तूफान के आगमन का सूचक समझने लगता है। चित्त में उठती बैचेनी के कारण को तलाशता है। पर जब उसे ऐसा कोई कारण नहीं मिलता तो मान लेता है कि शायद उसके बुरे दिन बीत चुके हैं।   वैसे किसी के भी जीवन के सुख और दुख केवल उसी के कर्मफलों का परिणाम होते हैं। पर न जाने कहाँ से किसी अन्य को श्रेय देने की धारणा व्याप्त हो गयी। घर में किसी वधू के आगमन के बाद ही परिवार में कुछ अप्रिय होने का दोष उस नवविवाहिता को मिलता है। तो कुछ सुखद होने का श्रेय भी उसी के चरणों को दिया जाता है।   जब से दया घर में बहू बनकर आयी थी, मोहन बहुत बदल गया था। पहले सौम्या की आवश्यकता का भी उसे ध्यान न रहता। अब बिना कहे दोनों स्त्रियों का ध्यान रखता। घर का बड़ा और एकमात्र कमाऊ पुत्र होने के कारण उसकी जिम्मेदारी भी अधिक थी। सौम्या अपने भाग्य पर खुश थी। इसे दया के चरणों का प्रभाव मान दया से अधिक स्नेह कर रही थी।    दया के कारण ही सौम्या को पत्न...

गलती भाग १६

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   जब सागर से उठकर कहीं बहुत दूर मेघ बरसते हैं तब कुछ का मन मयूर नृत्य करने लगता है। अच्छी खेती की आशा में बादलों की राह देख रहे कृषकों के घरों में सावन के तराने गाये जाते हैं। वहीं एक कुंभकार परिवार जल्द से जल्द बादलों के हटने की राह देखने लगता है। एक ही प्राकृतिक घटना सभी पर अलग अलग प्रभाव दिखाती है।    दया विवाह होकर ससुराल पहुंची तो उसे सौम्या की बतायी बातें एकदम झूठ प्रतीत हुईं। इतनी स्नेहमयी सास कि उसे किसी काम से हाथ न लगाने दें। रोज निकट बिठा परेशानियों के विषय में पूछतीं।दया को लगा ही नहीं कि वह विवाह के बाद अपनी ससुराल में आयी है।    रूप का आकर्षण ही कुछ ऐसा होता है कि जुगनू जो आवारा के नाम से बदनाम था, अब अक्सर घर में रहता। घर पर भी कठोर पुरुष न बन एक सहयोगी पति था जिसे पत्नी के साथ छोटे मोटे कामों को करने में भी परहेज न थी। हालांकि जुगुनू का कोई धनोपार्जन के लिये प्रयास न करना दया को जरूर अखरता था। पर इतनी सी बात के लिये किसी आदमी को बदनाम कर देना तो कभी उचित नहीं है। पुरुष तभी प्रयास करता है जबकि उसके ऊपर जिम्मेदारी आती है। जिम्मेदारी मिलने के ...

गलती भाग १५

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  जल का क्या आकार। आकार रहित हर पात्र में समाने बाला कितने ही आकार रख लेता है।  यही निराकार और साकार के मध्य का संबंध है। निराकार कितने ही तरह के आकार रख लेता है। तथा कितने ही आकार को रखने बाला निराकार भी है।    बच्चे बहुत जल्द नवीन माहौल में ढल जाते हैं। फिर लगता ही नहीं कि नवीन परिस्थिति में उन्हें कोई दिक्कत भी है। लगता है कि मानों हमेशा से ही वह ऐसे रहते आये हों।   उस दिन कैलाश घबराया सा माॅ की गोद में सिमट रहा था। कुछ ही दिन निकले कि कालीचरण का वह छोटा सा घर कैलाश की किलकारियों से गूंज रहा था। कालीचरण को देखते ही उनकी मूंछ खींचने दोड़ता। माॅ फटकार लगाती तो नानियों के पीछे छिप जाता। मामा को तो दिन भर घोड़ा बना उसकी पीठ पर सवारी करता। शाम होते ही मामा के साथ ग्राम भ्रमण के लिये निकलता। बच्चों का नेता बन कितने ही तरह के खेल रचाता।   अब कालीचरण के पास कोई भैंस नहीं थी। दया भी पोखर पर नहीं जाती थी। दोनों बहनों की क्रीड़ा स्थली भी शायद दोनों की याद में सूख रही थी। गर्मी का प्रकोप, पोखर पहले से कुछ छोटी लग रही थी।   बहुत दिनों बाद सौम्या की जिद के कारण द...

गलती भाग १४

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  दया के विवाह की बात सैरावत जी के छोटे बेटे जुगनू के लिये चल रही थी। निम्मो और सुरैया का वैर भी अचानक प्रेम में बदल गया। अब सुरैया निम्मो का बहुत ध्यान रखती। काम के बोझ में अगर निम्मो कलेऊ करना भूल जाये तो सुरैया खुद थाली लगाकर उसके पास आ जाती।   "काम तो जीजी पूरे जीवन खत्म न होगा । समय से नाश्ता करना बहुत जरूरी है।"   "अरे मैं तो आ ही रही थी। फिर अभी देर ही कितनी हुई है।"   "देर जीजी। अरे पूरे दस बजने बाले हैं।"   निम्मो ने थाली हाथ में पकड़ ली। हाथ से बनायी रोटी के दो ही कौर मुंह में गये कि वह रुक गयी। " अरे। अभी तूने भी तो कलेऊ नहीं किया सुरैया। " " मुझे क्या है जीजी। अभी तो मैं जवान हूँ। थोड़ी देर से मेरा क्या बिगड़ जायेगा। " " बहुत जवान है। बेटी की शादी होने बाली है। और इधर जवानी भी हाजिर है। ज्यादा बात ना बना।"   यह सब देखना सुखद लगता। वैसे सौम्या के विवाह तक यही स्थिति थी। दोनों के मध्य अपार स्नेह था। दोनों एक दूसरे का बहुत ध्यान रखतीं थीं। पर सौम्या के विवाह के बाद से अब वह स्थिति आयी है।  " जीजी। बड़े लोगों के क...

गलती भाग १३

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  बदलाव ही जीवन है। फिर भी यकायक इतना बदलाव किस तरह उचित है। मनुष्य को बदलने में भी जरा समय लगता है। एक परिवार जो मेहनत मजदूरी कर अपना पेट पालता था, यकायक संपन्न बन गया। यहाँ तक तो ठीक है। पर यकायक वही परिवार विपत्ति के असीम सागर में डूबने लगे। क्या यह ईश्वर का अन्याय नहीं है।   वैसे माना तो यही जाता है कि ईश्वर पूर्ण समदर्शी हैं। हमेशा निष्पक्ष रहते हैं। फिर जो सुख और दुख सामने आते हैं, वे भी ईश्वर प्रदत्त नहीं होते अपितु कर्मफल होते हैं। कब किस जन्म का किया शुभ कर्म किसी को आनंद देने लगता है। तो कब किसी जन्म की भूल सामने आकर अपार कष्ट दे जाती है। सौम्या का विवाह हुए कुछ महीने ही गुजरे थे। ठाकुर रोशन सिंह जो कि कालीचरण के अन्नदाता थे, जिनकी कृपा से वह प्रधानी का सुख भोग रहा था, पुश्तैनी जायदाद का मुकदमा हार गये। पुश्तैनी जायदाद में परिवार के बीसियों की भागीदारी को अदालत ने स्वीकार कर लिया। ठाकुर साहब की शान वह हवेली कई टुकड़ों में बट गयी। इतने छोटे छोटे भाग हो गये कि खुद ठाकुर रोशन सिंह ने अपना हिस्सा दूसरे परिजन को बेच दिया। जब गांव में रहना ही नहीं है तो फिर गांव में घर रखक...