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वृद्धाश्रम भाग १

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उपन्यास से एक अँश-  "क्या होता है वृद्धाश्रम..?" एक बुजुर्ग दंपत्ति चाहता है कि जीवन के उत्तरार्ध में वह अपने पौत्र-पौत्रियों के साथ पुनः अपना बचपन जी ले.. अपने बनाये घरौंदे में खेले.. पर अफसोस कि अब ये सपने अधुरे से लग रहे हैं...आज हमारे देश में शिक्षा पर बहुत जोर दिया जा रहा है.. माता पिता अपने बच्चों को किताबी ज्ञान से परिपूर्ण कर देते हैं.. अनेकानेक मुसीबतों का सामना कर के धनार्जन कर अपने पाल्यों  की ख्वाहिशें पूरी करते हैं..  जिन प्रश्नों का उत्तर बड़े बुजुर्गों के सान्निध्य में प्राप्त हो जाता है, उन प्रश्नों में बच्चे  अकेले उलझ जाते हैं.. उँची उपाधियाँ प्राप्त करने के बाद भी जब बच्चे संस्कार जैसे तत्व से पृथक रहते हैं..ऐसे परिवेश में आवश्यकता होती है वृद्धाश्रम की.. जहाँ कुछ पल के लिए हमारे बुजुर्ग अपनी ब्यथा को एक दूसरे से बाँट सके..!" सुरभी-"थोड़ा खिसक जा यार.. खड़े हो कर थक गई मैं..!  इतनी भीड़ में भी जगह मिल गइ तुझे? मैं तो तबसे धक्के खा रही हूँ.!"  शैली-"हाँ यार बड़ी मुश्किल से यहाँ तक पहुँची हूँ मैं...पीछे नजर दौड़ाया तो यही एक सीट खा...

एक टुकड़ा धूप का भाग २५

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गतांक से आगे मानवेंद्र ने पूरे इलाके में माधव की तलाश की लेकिन वो इतना शातिर दिमाग का था कि वो भागने की बजाय पास के घने जंगल में जाकर छुप गया और संयोगिता को बांध कर एक कोने में फेंक दिया।वो गाड़ी उसने एक खंडहर में छुपा दी। मानवेंद्र के आदमियों और पुलिस ने उन्हें आसपास ढूंढने की बजाय सीधे उसके गांव जाने का निश्चय किया क्योंकि उन्हें विश्वास था कि माधव संयोगिता को लेकर सीधे अपने गांव ही गया होगा। लेकिन वहां जाकर उन्हें निराशा ही हाथ लगी।और जब वो लोग अपने इलाके में उसे तलाशने लगे तब तक माधव संयोगिता को लेकर रात के घटाघोप अंधेरे में ही उस जगह से बहुत दूर जा रहा था । लेकिन शायद दुर्भाग्य उन दोनों के ऊपर मंडरा रहा था।एक घने जंगल को पार करते ही एक गोली सीधे माधव के सीने में आकर लगी और वो वहीं ढेर हो गया। संयोगिता डर के मारे बेहोश हो गई । जब उसे होश आया तो वह एक अनजान जगह अंजान कमरे में अंजान लोगों के बीच एक मखमली बिस्तर पर लेटी हुई थी। वो चौंक कर उठकर बैठ गई। उसने अपने चारों तरफ देखा ना तो उसे माधव सिंह दिखाई दिया और ना ही मानवेंद्र।वो कहां थी?  कौन थे ये लोग ? उसे कुछ भी पता नहीं...

एक टुकड़ा धूप का भाग २४

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गतांक से आगे जैसे ही मानवेंद्र ने गांव वालों को यह बताया कि संयोगिता का विवाह माधव सिंह के साथ निश्चित हुआ है तो सारे गांव वाले उस औरत की ओर देखने लगे क्योंकि उसके पास वो सबूत था जो यह साबित करता था कि बलात्कारी और कोई नहीं माधव सिंह ही है। उसने मानवेंद्र से कहा कुंवर सा, मने लागे है कि आप छोटी बीबी सा के सगे भाई सा ना हो। अगर होते तो अपनी बहन की शादी एक इज्जत के लुटेरे से ना कराते। क्या बोल रही हो तुम? तुम होश में तो हो ना। मानवेंद्र गुस्से से दहाड़े। हां कुंवर सा, मैं पूरी तरह होश में हूं,  लेकिन थारे को खबर को नी कि यही माधव सिंह मारी इज्जत का लुटेरा है। ये देखो उसका लॉकेट जो  कुकर्म करते बखत वहीं गिर गया था इसमें उसकी पहचान है। उसी ने मारे को जीते जी मार दिया। मैं कहीं की ना रही। मारे खसम ने मारे को छोड़ दिया। मारी सास मारे को ताना देवे है। मारे बच्चों को मारे से दूर कर दिया उसने। के के सहूं मैं? मारी के गलती है। मैं उसे पा जाऊं तो उसका खून पी जाऊं।और आप अपनी बहन की शादी उससे कराने जा रहे हैं। कुंवर सा, अपनी बहन पर दया करो । माधव सिंह ने मारी इज्जत लूटी है वो इंसान...

एक टुकड़ा धूप का भाग २३

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गतांक से आगे माधव ने मानवेंद्र को कुछ कहने से रोक दिया और उस आदमी की ओर देखा और कहा  "देखो, अभी इन्होंने भोजन नहीं किया है तुम  गांव चलो, हम लोग अभी गांव आकर सारा मामला समझते हैं"।साथ ही उसने उस आदमी की तरफ यूं गुस्से से देखकर जाने का इशारा किया कि वो सहम गया।और मानवेंद्र को सिर झुकाते हुए बोला  "मन्ने माफ कर दो कुंवर सा,  ,यह आपके भोजन का समय है, मन्ने पता न था। आप  थोड़ी देर बाद आइए । तब तक मैं खेतों पर चला जाता हूं। ढोर डंगरो के लिए कुछ चारे का भी बंदोबस्त भी करना है मन्ने । चलता हूं कुंवर सा। घणी  खम्मा  ।" "अच्छा ठीक है, तुम चलो मैं अभी आता हूं" ।मानवेंद्र ने उस आदमी को गांव जाने के लिए कहा । माधव और मानवेंद्र ने भोजन कर लिया और फिर दादी सा और संयोगिता को अपने कमरे में बुलाया जब सब लोग आ गए तो मानवेंद्र ने माधव के पास बैठकर रूंधे गले  से कहा। "माधव भैया... आपने  उस समय कहा था कि आप संयोगिता को अपना जीवनसाथी बनाना चाहते हैं। हम कैसे इस बात को मान लें। कहीं आप  मेरी दीदी की सुंदरता से क्षणिक प्रभावित होकर तो ऐसा नहीं कह रहे है...

एक टुकड़ा धूप का भाग २२

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गतांक से आगे मानवेंद्र ने माधव को मार डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी अगर दादी सा ने उनका हाथ नहीं पकड़ लिया होता। दादी सा वैसे तो मानवेंद्र से डरती थी लेकिन यहां बात उनके चहेते नवासे की थी । जिसे वो बहुत प्यार करती थी उसके खिलाफ वो कैसे कुछ सुन सकती थी। उन्होंने मानवेंद्र का हाथ पकड़ लिया और कहा "मनु, खबरदार जो माधव पर हाथ उठाया। आपने ऐसा सोच भी कैसे लिया? हम अपने नवासे को अच्छी तरह जानते हैं। वो इतनी ओछी हरकत कभी नहीं कर सकता।ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती । जरूर संयोगिता भी माधव को पसंद करती हैं। तभी  वो उसके कमरे में आई थी।" "दादी सा आप ये कैसी बात कर रही हैं? हम इन्हें बिलकुल पसंद नहीं करते। और हम इनसे विवाह नहीं करना चाहते। आप सब हमारी बात का विश्वास क्यों नहीं कर रहे। भाई सा आप तो हमारी बात सुनिए।" संयोगिता कभी दादी सा के सामने तो कभी मानवेंद्र के सामने रो रो कर अपनी सफाई दे रही थी। मानवेंद्र ने उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा "दीदी, हमें आपकी बातों पर पूरा विश्वास है। और अगर आप माधव से विवाह नहीं करना चाहती तो हम नहीं करेंगे। आप बिल्कुल चिंता न करें। ...

एक टुकड़ा धूप का भाग २१

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क्यों होते हैं ऐसे लोग जो घिनौने चेहरे रखते हैं टपकती है वहशियत आंखों से काले काले पहरे रखते हैं  माधव एक बहुत ही गंदी फितरत का आदमी था , उसे संयोगिता किसी भी कीमत पर चाहिए थी, वो उसे पाने के लिए कोई भी चाल चल सकता था, कोई भी गंदा खेल खेल सकता था। उसके लिए किसी की इज्जत मान मर्यादा से कोई मतलब नहीं था। वो भी राजपूत था लेकिन जहां मानवेंद्र सबको मान सम्मान देने वाला सच्चरित्र व्यक्ति थे वहीं माधव एक विलासी और क्रूर इंसान था।    मानवेंद्र रोज सुबह गांव में भ्रमण के लिए जाता था   ताकि गांव के लोगों के बारे में जान सके । और अगर किसी को कोई परेशानी हो तो दूर कर सके। माधव अक्सर किसी न किसी शिकार की तलाश में रहता था ताकि वो उसे अपनी वासनापूर्ति का साधन बना सके। उसे यह मौका जल्दी ही मिल गया। उसने रात के अंधेरे में अपनी पहचान को छुपाकर एक स्त्री की गरिमा को कलंकित कर दिया। और चुपचाप हवेली में आकर सो गया । सुबह जब हवेली के सामने उस औरत ने फरियाद लगाई तो  मानवेंद्र उस मामले की तहकीकात के लिए गांव में चला गया। माधव को डर लग रहा था कि कहीं वो औरत उसे पहचान न ले। ...

एक टुकड़ा धूप का भाग २०

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मोहिनी और संयोगिता बचपन की दहलीज को पार करके जवानी में कदम रख चुकी थी। लेकिन उनका अल्हड़पन नहीं गया था अभी भी वो लोग कच्ची कैरियां चुनकर चूनर में रख लेती । और बाद में चटखारे ले ले कर खाती थी। दादी सा की उम्र बढ़ रही थी। अब वो पहले की तरह कट्टर नहीं थी। पहले की तरह पाबंदियां भी नहीं लगाती थी। क्योंकि अब वो चाहकर भी सबके पीछे भाग नहीं पाती थी उनका समय अब पलंग पर बैठे बैठे हुक्म चलाने और पान खाने में बीतता था। रोब तो आज भी वैसा ही था लेकिन शक्ति क्षीण हो चुकी थी इसलिए वह अपने यातनाओं  का क्रियान्वयन अधिक नहीं कर पाती थी। हां.. उनकी वाणी की धार और तेज हो गई थी। अगर संयोगिता थोड़ी देर के लिए बाहर बगीचे में निकल जाती तो वह  पोपली आवाज में चिल्ला चिल्लाकर मोहिनी और  संयोगिता को ढेर सारी गालियां सुनाती । अगर वो डरती थी तो केवल मानवेंद्र से । क्योंकि वो बड़ा होकर बहुत बदल गया था।वो बचपन से ही दादी सा का  अन्याय देखता चला आ रहा था । जिसने उसके कोमल मन पर बहुत गहरा असर डाला था । बाहर से वो बहुत ही अनुशासित रहता लेकिन उसके हृदय में सबके लिए दया का एक स्रोत खुला हुआ था। व...

एक टुकड़ा धूप का भाग १९

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मोहिनी और संयोगिता बचपन की दहलीज को पार करके जवानी में कदम रख चुकी थी। लेकिन उनका अल्हड़पन नहीं गया था अभी भी वो लोग कच्ची कैरियां चुनकर चूनर में रख लेती । और बाद में चटखारे ले ले कर खाती थी। दादी सा की उम्र बढ़ रही थी। अब वो पहले की तरह कट्टर नहीं थी। पहले की तरह पाबंदियां भी नहीं लगाती थी। क्योंकि अब वो चाहकर भी सबके पीछे भाग नहीं पाती थी उनका समय अब पलंग पर बैठे बैठे हुक्म चलाने और पान खाने में बीतता था। रोब तो आज भी वैसा ही था लेकिन शक्ति क्षीण हो चुकी थी इसलिए वह अपने यातनाओं  का क्रियान्वयन अधिक नहीं कर पाती थी। हां.. उनकी वाणी की धार और तेज हो गई थी। अगर संयोगिता थोड़ी देर के लिए बाहर बगीचे में निकल जाती तो वह  पोपली आवाज में चिल्ला चिल्लाकर मोहिनी और  संयोगिता को ढेर सारी गालियां सुनाती । अगर वो डरती थी तो केवल मानवेंद्र से । क्योंकि वो बड़ा होकर बहुत बदल गया था।वो बचपन से ही दादी सा का  अन्याय देखता चला आ रहा था । जिसने उसके कोमल मन पर बहुत गहरा असर डाला था । बाहर से वो बहुत ही अनुशासित रहता लेकिन उसके हृदय में सबके लिए दया का एक स्रोत खुला हुआ था। व...

एक टुकड़ा धूप का भाग १८

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"हाय .. मेरी मिश्री की डली .. कैसी है तू.." सृजन जैसे ही मिशेल के पास उससे गले मिलने के लिए आगे बढ़ी । मिशेल ने उसे हाथ के इशारे से रोक दिया और कहा "सृजन, प्लीज मुझे टच मत करना। हम लोग दूर से ही बात करें तो कैसा रहेगा ? " "क्यों मिश्री, क्या हुआ ? तू ऐसा क्यों कह रही है। तू मुझसे , अपनी बेस्ट फ्रेंड से गले नहीं मिलना चाहती? "सृजन को दुख हुआ। "डोंट माइंड डियर ....बट इट्स वेरी हार्मफुल फॉर अस। पता नहीं कितने बैक्टीरिया हमारे आस पास घूम रहे हैं। जो हमें बीमार कर सकते हैं। गले मिलने से वो एक दूसरे की बॉडी में ट्रांसफर हो सकते हैं। दूर बैठकर ही बात कर लेते हैं ना। " मिशेल ने अपने माथे से लट हटाकर गॉगल्स लगाए और आराम से सोफे पर बैठ गई। "मिश्री, मेरे साथ गले मिलने में अब  बैक्टीरिया से डर लगने लगा है तुझे। मुझे विश्वास नहीं होता कि तू वही मिश्री है जिसके साथ मैं अपने टिफिन के साथ साथ अपने कपड़े तक शेयर करती थी। तेरी कोई ड्रेस मुझसे अछूती नहीं रही  और ना ही मेरे टिफिन के आलू के पराठे खाए बिना तेरी भूख मिटती थी। हम दोनों एक दूसरे के गले का हा...

एक टुकड़ा धूप का भाग १७

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गताँक से आगे मिशेल जैसे ही गाड़ी से उतरी उसका पहनावा देखकर संयोगिता को विश्वास नहीं हुआ कि वो मां साहेब की बेटी हैं , मिशेल लगभग उसी की हम उम्र थी लेकिन उसने स्लीव लेस टॉप और मिनी स्कर्ट पहन रखी थी। हाई हील के जूते , कंधे पर लटकते हुए दो  बैग। दो बैग दोनों हाथों में लिए  , आंखों में ब्लैक गॉगल्स लगाए वो पूरे कॉन्फिडेंस के साथ चली आ रही थी। उसके  सिल्की भूरे बाल हवा में उड़ रहे थे। मां साहेब जितनी सादगी पसंद थी मिशेल उतनी ही ज्यादा आधुनिक। दोनों में कहीं कोई मेल नहीं था। मिशेल बिलकुल अंग्रेज लगती थी और मां साहेब इंडियन । मां साहेब क्रिश्चियन तो कहीं से भी नहीं लगती थी । पूरी तरह हिंदुस्तानी संस्कृति में रची बसी उनकी आत्मा प्रभु यीशु को जितना मानती थी उतना ही भगवान राम और मोहम्मद साहब को भी। वो अपने ईसाई फेस्टिवल्स जितने प्रेम से मनाती उतने ही प्रेम और सदभाव से होली दीवाली और ईद भी। उनके आश्रम में धर्म ,जाति, संप्रदाय को आधार मानकर किसी बेसहारा  औरत को प्रवेश नहीं मिलता था बल्कि हर दुखी और जरूरतमंद स्त्री उनके आश्रम में रह सकती थी। मिशेल को भारतीय संस्कृति से न...

एक टुकड़ा धूप का भाग १६

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गतांक से आगे संतोष अपनी भाभी के विषय में संयोगिता को बताता है कि जब से बुआ जी ने भाभी के खिलाफ मां के कान भरें है तब से भाभी को बहुत बुरा लगा है और वो अपने आपको खत्म करने के लिए जा रही थी अगर मैं इनके पीछे पीछे जाकर इन्हें बचा नहीं लेता तो ये अपने साथ साथ उस नन्हें से चिराग को भी खत्म कर देती जो अभी इस दुनिया में आया भी नहीं था। वो बच तो गई लेकिन उन्होंने यह ठान लिया है कि अब वो घर नहीं लौटकर जाएंगी , वो यहीं रहेंगे आश्रम में रह कर अपना शेष जीवन बिता लेंगी। हमने उन्हें लाख समझाने की कोशिश की लेकिन वो मान ही नहीं रही हैं। हारकर जबरदस्ती घर ले जाना चाह रहे थे हम, ताकि घर की इज्जत बनी रहे।तो वो चीखने चिल्लाने लगीं। अब आप ही बताइए हम क्या करें? अगर भाभी यहां रहती हैं तो हमारी समाज में कितनी थू थू होगी। लोग हमारा जीना हराम कर देंगे। लोग यही कहेंगे कि भाई के मरने के बाद हमने भाभी को घर से निकाल दिया। आप उन्हें समझाइए शायद वो आपकी बात मान जाएं। और अपनी जिद छोड़कर हमारे साथ घर चलने को तैयार हो जाएं। हम लोग इलाहाबाद के रहने वाले हैं यहां भैया भाभी रहते थे। भाभी की प्रेगनेंसी की खबर ...

एक टुकड़ा धूप का भाग १५

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गतांक से आगे संयोगिता अपने बचपन की यादों में खोई हुई थी कि तभी किसी औरत के जोर जोर से चिल्लाने की आवाज़ आने लगी। आज सिस्टर मारिया अपनी बेटी मिशेल से मिलने गई थी क्योंकि आज उसका जन्मदिन था। संयोगिता  अपने कमरे से बाहर निकल कर बरामदे में आ गई। वहां उसने देखा कि एक स्त्री बदहवास हालत में चीख रही है, चिल्ला रही है। और एक आदमी उसे संभालने की पूरी कोशिश कर रहा है। लेकिन वो औरत उसके काबू में नहीं आ रही है। उसका पहनावा और हालत किसी की भी आंखों में आंसू ला सकते थे।22 -23 साल की उम्र में सफेद साड़ी में लिपटी हुई दुबली पतली सी लड़की जिसके माथे पर अभी भी बिंदी की हल्का सा निशान बना हुआ था। श्रृंगार विहीन उदास चेहरा, लगातार रोने से सूजी हुई बड़ी बड़ी आंखें ,  कमर तक लंबे लेकिन उलझे हुए बाल, चूड़ियों से खाली कलाइयां , जिसमें टूटी हुई चूड़ियों के टुकड़ों से जख्म बन गए थे।खूबसूरत मुलायम नाजुक से पांव जिसमें बिछिया  पहनने से बने  निशान उसकी वर्तमान स्थिति पर रो रहे थे। जो पैर एक छोटा सा कंकड़ भी बर्दाश्त नहीं कर पाए उन पैरों में चप्पलें भी नहीं थी ।नंगे पांव वो आश्रम  मे...

एकांशी भाग २

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किसी की गहरी सांसो की आवाज सुनाई दे रही थी!  एकांशी उसी दिशा में बढ  गयी, जिधर से कुछ हलचल महसूस हो रही थी!  दीवार का टेका लिए हुए एक परछाई नजर आ रही थी!  अब धूप भी कुछ चमकीली हो गयी थी!  कौन है उधर ठिठक गयी एकांशी, फिर अहिस्ता अहिस्ता आगे बढ़ गयी, ताकि उसके पैरों की धमक उसे सुनाई न दे " कुछ ही पलो में उसके ठीक सामने पहुँच गयी!  वो एक नवयुवक था! एकांशी की नजर उसकी नजरों से मिली,  वो झेप गयी, पलकें खुद बाद खुद नीचे झुक गयी!  अब वो क्या बोले उसे समझ न आया, उसे लगा उसकी जुबान तालू में चिपक गयी!  वो नवयुवक भी कुछ अचकचा गया, अखिर इतनी खूबसूरत बला उसके सामने कहाँ से अचानक आ गयी!  वो एकांशी को, बिना पलकें झपकाये, बस निशब्द सा देखे जा रहा था! जो समाने पलकें झुकाये, पैर के अगूंठे से छत को कुरेदे जा रही थी!  अभि, भैया चलो, एक बच्ची उस नवयुवक के हाथों को खीचकर बोली, नीचे सारी रस्में हो रही  है काकी सा ,ने बुलाया है!  हा चलो, उस बच्चों के साथ वो नवयुवक सीढियों की ओर बढ़ गया, एकांशी ने चैन की सांस ली, जैसे मुडी,, वो नवयुवक सामन...

एक टुकड़ा धूप का भाग १४

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गतांक से आगे हम भले ही दस साल के थे लेकिन इतना तो समझते ही थे कि प्रताप दादू को दादी सा बिलकुल पसंद नहीं करती हैं। इसलिए हमें उनके पास जाने से रोकती हैं। हम तो फिर भी चोरी छुपे उनके पास कभी कभी चले जाते थे ।लेकिन मनु पर दादी सा कड़ी निगाह रखती थी, उसे एक पल भी खुद से दूर नहीं होने देती। उसके खेलने, खाने, पढ़ने , हर चीज का  ध्यान वही रखती थी। दादी सा के प्यार दुलार से मनु बहुत ही जिद्दी और बदतमीज हो गया था। उसे पढ़ाने के लिए घर में ही गुरु जी आते थे । पहले हम गुरुजी से नहीं पढ़ते थे क्योंकि दादी कहती थी कि छोरियों को पढ़ने लिखने की क्या जरूरत है। लेकिन जब पिता महाराज ने उनको मना लिया तो हम भी गुरुजी के पास बैठने लगे।और मन लगाकर पढ़ने लगे। दादी सा ने गुरुजी को सख्त हिदायत दी थी कि छोरी केवल बैठी रहेगी तुम्हें केवल हमारे राजपूत को ही अच्छे से पढ़ाना है।गुरुजी दादी सा के खौफ से कुछ बोल नहीं पाते और  मनु को पढ़ाने का पूरा प्रयास करते , हमें कुछ भी नहीं पढ़ाते लेकिन गुरुजी जो भी कुछ मनु को बताते हम उसे ध्यान से सुनते रहते और वो हमें कब याद हो जाता पता भी नहीं चलता। लेकिन उसक...

एक टुकड़ा धूप का १३

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गतांक से आगे पांच साल की बच्ची भले ही कुछ ना समझती हो लेकिन दादी सा को सब पता था कि कि लड़कियों पर क्या क्या बंदिशें लगानी चाहिए। रजवाड़े खत्म हो चुके थे अंग्रेज देश छोड़कर कब का चले गए थे लेकिन दादी सा का रोब आज भी कायम था। मजाल था कि कोई भी गांव वासी बिना हवेली को सिर झुकाए वहां से चला जाता। हवेली अब जर्जर हालत में पहुंच गई थी। हजारों का कर्जा लदा हुआ था लेकिन बिना नौकरों की फ़ौज के अभी भी काम नहीं चलता था। ये बात अलग थी कि अब कई नौकर बेगार पर थे जो केवल दो वक्त की रोटी के लिए हवेली के गुलाम बन गए थे। दादी सा उन पर कठोर शासन करती थी, छोटी सी गलती हो जाने पर नौकर की शामत आ जाती थी। ये सब बड़े हो जाने पर हमें माला दीदी ने बताया था । माला दीदी ने अपनी आंखों से वो खौफनाक दृश्य देखा था । जब भयानक शीत के कारण हरी  एक पेड़ की पतली सी डाल उनसे बिना पूछे उठा ले गया था । जब दादी सा को पता चला तो उन्होंने हरी की बेंतो से इतनी पिटाई की कि उसकी पीठ जख्मों से नीली पड़ गई। वो कई दिनों तक कराहता रहा। उसकी बीवी हल्दी चूना लगाती रही। पूरे पंद्रह दिनों तक वो बिस्तर पर पड़ा रहा। हवेली में एक...

एक टुकड़ा धूप का भाग १२

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गतांंक से आगे सिस्टर मारिया ने संयोगिता को अपने कमरे में जाते देखा, उन्होंने उसे आवाज लगाई लेकिन संयोगिता अपने ही खयालों में ही खोई हुई थी । उसने उनकी आवाज नहीं सुनी और अपने कमरे में आ गई। आज उसे पता नहीं क्यों बहुत थकान लग रही थी । शरीर की थकान तो इस बीमारी के साथ मिलती ही है लेकिन उसकी अंतरात्मा तो बचपन से ही उपेक्षा और दुर्व्यवहार से थक गई थी। संयोगिता अपने बिस्तर पर लेट गई और अपने बचपन में पहुंच गई। दो बूंद आंसू उसकी आंखों के किनारों से ढलक गए। मां साहेब तो वापस अपनी दुनिया में चली गई थी बिना ये सोचे समझे कि हमारे बिना हमारे नवजात बच्चे कैसे रहेंगे। अब हम दोनों भगवान जी के ही भरोसे थे। भगवान जी हमें जिस हाल में रखेंगे हम उसी हाल में तो रहेंगे ना। लेकिन शायद हम थोड़ा सा गलत थे। मेरे भाई की देखभाल करने के लिए तो हवेली में  बहुत सारे लोग थे। लेकिन हमारी देखभाल करने वाला कोई नहीं था , पिता महाराज हमें बहुत प्यार करते थे लेकिन दादी सा उनको हमारे पास नहीं आने देती। उनका कहना था कि मेरे भाई को उनके लाड़ प्यार की ज्यादा जरूरत है । हम तो लड़की जात है हमें तो बस खाने खेलने से मतल...

अधूरे जज़्बात भाग :- २७

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                         मैं  दिल ही दिल में अरण्या को चाहता हूॅं और स्वप्न में ना जाने कितनी बार उससे अपने जज्बातों को कह चुका हूॅं  लेकिन जैसे ही वह सामने आती है  दिल की बात अधरों तक  आती ही नहीं । कहीं अधर में ही रह जाती है । ऐसे में बिना कुछ उससे बोले अपने जज्‍बातों को कैसे बयां करूंगा ? मेरा  दिल इस बात की गवाही पहले ही  दे चुका है कि मुझे आपसे  प्यार है‌  और आपको मुझसे तो फिर ऐसे में  शरमाना कैसा ?  आज आपसे अपने प्यार का इजहार करने में कोई कसर नहीं छोडूंगा ।' सुजाॅय ने तैयार होते हुए अपने आप से कहा ।  क्यों न  अरण्या जी के लिए  फूलों का   गुलदस्ता लें लूं ? मन में सोचते हुए सुजाॅय के कदम अनायास ही फूलों की दुकान की तरफ बढ़ने लगे । मुहब्बत का पैगाम माने जाने लाल गुलाबों का गुलदस्ता  अपने हाथों में लिए  सुजाॅय रोज की तरह  स्वप्न की दुनिया में चला गया होता  अगर उसके साथ आएं मनोज ने उसे झकझोरा ना होता ।  ' आई. लव. ...