एक टुकड़ा धूप का भाग १४
हम भले ही दस साल के थे लेकिन इतना तो समझते ही थे कि प्रताप दादू को दादी सा बिलकुल पसंद नहीं करती हैं। इसलिए हमें उनके पास जाने से रोकती हैं। हम तो फिर भी चोरी छुपे उनके पास कभी कभी चले जाते थे ।लेकिन मनु पर दादी सा कड़ी निगाह रखती थी, उसे एक पल भी खुद से दूर नहीं होने देती। उसके खेलने, खाने, पढ़ने , हर चीज का ध्यान वही रखती थी। दादी सा के प्यार दुलार से मनु बहुत ही जिद्दी और बदतमीज हो गया था। उसे पढ़ाने के लिए घर में ही गुरु जी आते थे । पहले हम गुरुजी से नहीं पढ़ते थे क्योंकि दादी कहती थी कि छोरियों को पढ़ने लिखने की क्या जरूरत है। लेकिन जब पिता महाराज ने उनको मना लिया तो हम भी गुरुजी के पास बैठने लगे।और मन लगाकर पढ़ने लगे। दादी सा ने गुरुजी को सख्त हिदायत दी थी कि छोरी केवल बैठी रहेगी तुम्हें केवल हमारे राजपूत को ही अच्छे से पढ़ाना है।गुरुजी दादी सा के खौफ से कुछ बोल नहीं पाते और मनु को पढ़ाने का पूरा प्रयास करते , हमें कुछ भी नहीं पढ़ाते लेकिन गुरुजी जो भी कुछ मनु को बताते हम उसे ध्यान से सुनते रहते और वो हमें कब याद हो जाता पता भी नहीं चलता। लेकिन उसके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ता। वो दादी सा की ओढ़नी के पीछे छुप जाता। और पढ़ने के लिए आनाकानी करने लगता। दादी सा जब उसकी बात पर ध्यान नहीं देती तो वो पैर पटक पटक कर फर्श पर लोटने लगता। । तब दादी सा हार मान कर उसकी जिद के आगे झुक जाती और उसे छुट्टी दिलवा देती। फिर क्या था? वो अपनी पतंग उठाता और फिर सीधे बाहर। सारे नौकर उसकी निगरानी करने के लिए उसके आगे पीछे घूमते रहते।
एक दिन तो हद ही हो गई , गुरुजी को आज हम दोनों की परीक्षा लेनी थी इसलिए मनु की कोई जिद नहीं चली, दादी सा उसे बहला फुसलाकर गुरुजी के पास बिठा गई । गुरुजी ने मनु को पर्चा हल करने के लिए दिया। मनु काफी देर से चुपचाप बैठा हुआ था उसने एक भी सवाल हल नहीं किया। हमने अपना पर्चा समय से पहले ही हल करके गुरुजी को दे दिया था। गुरुजी को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि हमने सारे प्रश्नों के सही जवाब लिखे थे। और मनु ने अभी तक एक भी सवाल हल नहीं किया था।
वो दादी सा से बहुत डरते थे उन्होंने सोचा कि अगर वो जान गई कि इस लड़की ने बिना पढ़े ही सारे प्रश्न सही सही हल कर लिए हैं और मानवेंद्र ने कोई भी प्रश्न हल नहीं किया है तो उनकी गाज सीधे मुझ पर ही गिर जायेगी। मेरी नौकरी तो जायेगी ही मार खानी पड़ेगी वो अलग। इसलिए उन्होंने मनु और हमारी कॉपी बदल दी हमारी कॉपी में मनु का नाम लिख दिया और मनु की कॉपी में हमारा। हमारी तरफ देखकर उनकी आंखों में आंसू भर आए और उन्होंने हमसे कहा
"बेटा संयोगिता, मैं तुम्हारी प्रतिभा का अपराधी हूं, लेकिन बेटा मैं मजबूर हूं। क्या करूं ?अगर मैं तुम्हारी कॉपी तुम्हारी दादी सा को दिखाता हूं और ये कहता हूं कि ये सारे प्रश्न संयोगिता ने हल किए हैं और मैने उसे कुछ नहीं पढ़ाया। तो भी वो कभी मेरी बात का विश्वास नहीं करेंगी। वो तुम्हें आगे पढ़ने भी नहीं देंगी, उन्हें ये लगेगा कि मैं तुम्हें पढ़ाता हूं और मानवेंद्र को कुछ भी नहीं पढ़ाता। जबकि मैं एक शिक्षक होते हुए भी तुम्हें ना पढ़ाकर तुम्हारे साथ अन्याय कर रहा हूं। साथ ही साथ शिक्षक की गरिमा को भी नष्ट कर रहा हूं। बेटा मुझे माफ कर देना। मैं क्या करूं? मेरे पास भी एक परिवार है , दो छोटे छोटे बच्चे हैं । अगर उनके भरण पोषण की चिंता नहीं होती तो मैं कभी इस हवेली में नहीं आता। "हम देख रहे थे कि गुरुजी बहुत ही शर्मिंदा थे। लेकिन वो मजबूर थे।
हम भले ही दस साल के ही थे लेकिन अपनी उम्र से कहीं ज्यादा समझदार हो गए थे । हम गुरुजी की विवशता समझते थे । उनकी कही गई हर बात अक्षरशः सत्य थी।
हमने गुरुजी से मुस्कुराकर कहा
"गुरुजी, आपने बिलकुल ठीक किया। हमें कोई दिक्कत नहीं है। मनु आखिरकार हमारा भाई ही तो है। उसकी बड़ाई हो या फिर हमारी, बात तो एक ही है।"
गुरुजी ने हमारे सिर पर हाथ फेरा,और अपनी आंखों में आई नमी को छुपाते हुए मनु को पढ़ाने लगे। और अब हम निश्चिंत होकर उनकी बातों को समझने के लिए अपना दिमाग खोलकर बैठ गए।
परीक्षा खत्म हो जाने के बाद जब गुरुजी ने कॉपी जांच ली ।तब दादी सा कुछ समय बाद हमारे पढ़ाई वाले कमरे में आई ।और गुरुजी से मनु का परिणाम पूछा उन्होंने एक बार भी हमारी ओर नहीं देखा। हमें अब बुरा नहीं लगता था क्योंकि अब हम जान चुके थे कि दादी सा हमें पसंद नहीं करतीं हैं, इसलिए अब हमें उनसे प्यार दुलार की उम्मीद भी नहीं रहती।
समय के साथ ये भेदभाव बढ़ता रहा। मनु और हम अब बारह वर्ष के हो गए थे। मनु अब प्रताप दादू को कभी कभी अपशब्द बोलने लगता तो हमें बहुत बुरा लगता। हम उसे टोकने लगते तो वो हम पर हाथ उठा देता। हम जब मनु की शिकायत दादी सा से करते तो दादी उल्टा हमें ही बुरा भला कहती थी कभी मनु को नहीं डांटती। हम चुपचाप अपने कमरे में जाकर रो देते। उस समय हमारे पास हमें चुप कराने के लिए कोई नहीं होता सिवा हमारी मां साहेब की तस्वीर के। और हम सब कुछ उन्हीं से कहते । वो तो भगवान जी के पास थी ही, हमारी बात उन तक जरूर पहुंचा देंगी और शायद भगवान जी हमें माफ करके हमें अपने पास बुला लें मां साहेब की तरह। तब हम और मां साहेब साथ साथ रहेंगे, कितना मजा आयेगा। यहां तो मनु को दादी सा प्यार करती हैं, वहां हमें मां साहेब प्यार करेंगी। दादी सा की तरह हमें अपनी गोद में सुलायेंगी। हमारे बालों में हाथ फेरेंगी। हमारी चोटी बनाएंगी। हमें अपने हाथों से खाना खिलाएंगी और सबसे अच्छी बात हमें स्कूल भेजेंगी। लेकिन ये तो हमें पता ही नहीं है कि भगवान जी की दुनिया में स्कूल होता है या नहीं। कल गुरुजी से पूछूंगी।
क्रमशः
संगीता शर्मा "प्रिया"
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