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Showing posts with the label Ranjana Jha

गरीब

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रेशमी कलम  से लेख लिखने वाले तुम भी अभाव से ग्रस्त कभी रोए हो बीमार बच्चे की की दवा जुटाने मे क्या घर पर तुम भी पेट बाधकर सोए हो देखा है गाँव की अनेक सभाओ को जिन पर आभा की धुल अभी तक छाई है रेशमी देह पर जिन अभागिनो की रेशमी वस्त्र चढ़ नहीं पाई है असहाय किसानों की किस्मत में अनायास जल मे बीज बोते देखा है क्या खाएंगे यह सोच के पागल  बेचारे को नीरब रह जाते देखा है नगरों के लाल, अमीरी के पुतले क्यों व्यथा भाग्यहीनो  की मन मे लाओगे भूख से तडपता उनका परिवार दौड दौडकर कैसे ये आग बुझाएगा कुटिल व्ययंग दीनता वेदना से अधिर आप जिन का नाम दिन रात जपती है है बेकल सारा देश अभाव के तापों में फुटपाथ पे सोते आसमान की नरम रजाई में सर्दियों में सर्द हवाएँ चलती चल रहे गाँव कूंजो के झकोर होती जाती है गर्म दिशाओं की सांसे मिट्टी फिर कोई आग उगलने वाली हो रही फिर सेनाएँ काली काली मेघों मे उभरे नए गजराजो की फिर नये गरूड़ उडने को पंख तोल रहे  फिर झटक झेलनी होगी नूतन बाजो की रंजना झा

अवसर

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ये आदमी जो दौड़ रहा है और भटका सा दिन में लगता है वो शांत रात्रि में संभल जाता है जैसे कोई संत बन जाता है खुद को समझा देता है ख्वाहिशों को जज्बा देता है वो खुद को यही महसूस कराता है के यही तो जीवन हैं उतारचढाव ,धूप छांव, और न जाने क्या क्या  लेकिन धूप की हथेली भी स्वर्णिम प्रतीत होती है गर महसूस करे तो दुःख के क्षण भी तो जीवन के क्षण हैं और जीवन के अमूल्य अवसर है ये क्षण का भी उन्माद से स्वागत हो हर एक पल में कर्म ही पारसमणि हो जीवन तो अद्भुत यात्रा है  में को मिलने की और, में से जुदा होने की हर क्षण अपना गर्व पूर्ण हो हर दम अपना गरिमा पूर्ण हो रंजना झा

हर तस्वीर कुछ कहती है

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हर तस्वीर कुछ कहती है आप ने तस्वीर भेजी मैं ने देखी ग़ौर से  हर अदा अच्छी ख़मोशी की अदा अच्छी नहीं  रंग ख़ुश्बू और मौसम का बहाना हो गया  अपनी ही तस्वीर में चेहरा पुराना हो गया ज़िंदगी भर के लिए रूठ के जाने वाले  मैं अभी तक तेरी तस्वीर लिए बैठा हूँ  अपने जैसी कोई तस्वीर बनानी थी मुझे  मिरे अंदर से सभी रंग तुम्हारे निकले  मुझ को अक्सर उदास करती है  एक तस्वीर मुस्कुराती हुई  चुप-चाप सुनती रहती है पहरों शब-ए-फ़िराक़  तस्वीर-ए-यार को है मिरी गुफ़्तुगू पसंद  भेज दी तस्वीर अपनी उन को ये लिख कर 'शकील'  आप की मर्ज़ी है चाहे जिस नज़र से देखिए  रंजना झा

विज्ञापन की महिलाएँ

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जो हर पल हँसती है गाती है धूम मचाती है स्त्री चाय के लेबल पे कॉम्पलैन की बोतल पे सर्फ के झाग में रिन के दाग में व्यंजन के हर्ष में पेय के उत्कर्ष में सुरा की थिरकन में हर उत्पाद की धड़कन में काश मिल जाए मुझे भी किसी घर, किसी आँगन में अल्हड़ नदी सा बेफ़िकरा उन्मुक्त, मदमस्त स्त्री का ये चेहरा दो पल को ही सही मैं भी देखूँ ले कर अपनी मुट्ठी में दुनिया ! रंजना झा

नारी तेरे रुप अनेक

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सत्यम शिवम सुन्दरम की वह अनुरुप काली, लक्ष्मी, दूर्गा का स्वरूप है नारी नारी मे निहित है ये तीनो रुप दुनिया मानेगी नारी की महिमा का स्वरुप खेतो मे लहलहाती फसल है तू इन्द्रधनुष के सातों रंग है तू जीवन का आधार है तू सफलता का ऊचा आकाश है तू नारी तू अबला नहीं सबला है यही तो कमला, विमला व सरला है नारी के अनेक रुप वह जुल्म नहीं सहेगी  और गुलामी ना कर पाएगी वह भी पढने जाएगी, अपना भविष्य उज्जवल बनाएगी रंजना झा

पूरब और पश्चिम

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पश्चिम की तरफ़ चलता हूँ तो  पश्चिम की चीज़ें पूर्व में खिसकने  लगती हैं  देखता हूँ कि  चलना शुरू करते ही  भूगोल से मुक्त होने लगती हैं दिशाएँ  और इतिहास में जाने को उत्सुक हो  उठती हैं  उत्तर के उत्तर में ही जाते ही  दक्षिण में बदल जाता है उत्तर  हालाँकि बर्फ़ वहाँ भी उतनी ही जमी  मिलती है किसी को अजीब नहीं  लगता  कि दिशाएँ हैं चार और सूरज सिर्फ़  एक  चार सूरज होते  तो हर दिशा पूर्व होती  हर दिशा पश्चिम  हर दिशा उत्तर और हर दिशा दक्षिण  हम एक दिशा मे चलते हुए चारों  दिशाओं में जा सकते  चार सूरजों की सुबह होती  चार सूरजों की शाम  रात होती गहरी  चार सूरजों के न होने की  लेकिन तब सूरजों की होती परिक्रमा  या पृथ्वी की  ऋतुओं का क्या होता  क्या होता चार सूरजों के पार पृथ्वियों  के स्वप्न का  रक्त के लौह कणों के लिए उत्तर दक्षिण चुंबकत्व की दिशाएँ तब होतीं या न  होतीं  घर के बीचो बीच खड़ा होकर देखता हूँ  कि चारों दिशाओं मे...

बेटी का कन्यादान

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बडे धूमधाम से मा बाप ने, कर दिया बेटी का कन्यादान... हाथ जोड़कर कहते रहते, रखना मेरी बेटी का ध्यान..  इतने सालों से बहुत ही लाड प्यार से पाला इनको हमनें जोड दिया है रिश्ता इसका, आप लोगो के साथ रबने  अपने जिगर के टूकड़े को सौंप रहे हैं आपको ससुराल में इतना प्यार देना कि भूल जाए मा बाप को इतनी सी प्रार्थना है आपसे, हमारे साथ करना ये इंसाफ भूल हो जाए इससे कोई, बिटिया समझ के कर देना माफ बेटी तुम भी उस घर जाकर, देना सबको प्यार और सम्मान कभी बडो को ना देना जवाब, माँ बाप का रखना सदा मान प्यार से अपनो से छोटे का, रखना सदा तुम ध्यान हर सुख दुःख मे खड़े रहना,भूलना कभी ना ये ज्ञान रंजना झा

वसंतोत्सव

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माँ शारदे कहाँ, तू वीणा बजा रही हैं-2 किस मंजु ज्ञान से तू, जग को रिझा रही हैं-2 किस भाव में भवानी तू मप्र हो रही हो-2 विनती हमारी माता तू क्यों न सुन रही हो-2 माँ शारदे कहाँ, तू वीणा बजा रही हैं-2 हम दीन बाल कब से विनती सुना रहे है-2 चरणों में तेरे माता हम सर झुका रहे हैं-2 माँ शारदे कहाँ, तू वीणा बजा रही हैं-2 अज्ञान तम हमारा माँ, शीघ्र दूर कर दे-2 बल बुद्धि ज्ञान हमसे, माँ शारदे तू भरदे-2 माँ शारदे कहाँ, तू वीणा बजा रही हैं-2 रंजना झा

कोरोना

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मैं कोविद-19, बहन फ्लू से मिलता लक्षण हो कुछ भी समरूपता, जांच कीजिए तत्क्षण भयाक्रांत मुझसे दुनिया विकरालता के डर से यात्राएं स्थगित, लोग निकलते कम घर से अफ़वाहों से बचें, अर्थव्यवस्था लचर हो ना मैं मौत की सौदागर मेरा नाम है कोरोना सम्पर्क में जो आये, पड़े जां से हाथ धोना वुहान में मैं जन्मी, मृत्यु मेड इन चाइना हूं ऐसी महामारी जिसकी दवाई कोई ना मैं मौत की सौदागर मेरा नाम है कोरोना विश्व स्वास्थ्य आपदा की, बनी मैं हूं कारण वायवीय सम्पर्क से, पाती हूं मैं विस्तारण सावधानी बरतने से होता मेरा निस्तारण निरोधक क्षमता वाले रोकते प्रसारण दूराव बनाये रखिए, एक से दूसरे को हो ना भारतीयों को कर पाती नहीं सम्मोहन उनकी जीने की शैली, रोकते अवरोहण तापमान भारत का, वायरस. अवरोधी स्वास्थ्य जागरूकता, संक्रमण विरोधी सतर्क संवेदी रहकर, मुझे दूर करो ना दहशत में दुनिया, मेरे यारी के चलते हाथ मिलाने से डर कर करते नमस्ते रहन सहन भारतीयों का स्वच्छ सर्वोत्तम खान-पान, योग-ध्यान, रोग-रोधी उतम बने रहो भारतीय, मुझसे कभी डरो ना रंजना झा

धूल का फूल

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मुझे दास बना लो माँ, एहसान तेरा होगा,  धूल का फूल बना लो माँ एहसान तेरा होगा मैं धूल का फूल हूँ माँ, मुझे दुनिया ने ठुकराया-2 मैं गिरता समलता माँ, दरबार तेरे आया-2 चरणों से लगा लो माँ एहसान तेरा होगा मुझे दास बना लो माँ, एहसान तेरा होगा,  धूल का फूल बना लो माँ एहसान तेरा होगा तू देख रही हैं मुझे, मैं देख नहीं सकता-2 माँ बेटी में पर्दा हो, ये हो नहीं सकता-2 पर्दे को हटा दो माँ एहसान तेरा होगा-2 मुझे दास बना लो माँ, एहसान तेरा होगा,  धूल का फूल बना लो माँ एहसान तेरा होगा  मेरे दिल के करीब में तस्वीर तुम्हारी है -2 माँ तेरे ही हाथों में तकदीर हमारी है-2 तकदीर बना दो माँ, एहसान तेरा होगा- मुझे दास बना लो माँ, एहसान तेरा होगा,  धूल का फूल बना लो माँ एहसान तेरा होगा

तेरी बिंदिया

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मेंहदी, काजल, बिंदिया क्यों लगाकर आई हो मेरा कत्ल करने या किसी का करने आई हो बे हिसाब नशा ही नशा है तेरे अंग अंग में पीकर आई हो या शराब से नहाकर आई हो तेरे नाम की बिंदी लगाकर जब सज जाती हूँ जब तुझे दिखाने सामने आती हूँ तुम चाहे जितना रहो मुझसे दूर दूर मैं तुझे हमेशा अपने करीब पाती हूँ तेरे माथे पर लगे हैं जैसे चांद तारा जिया मे चमके कभी कभी अंगारा ठुमक ठुमक  चले जब तू मेरा नस  नस खनके  भटकते है तेरे नैना, मैं कुछ नख बोलू रंजना झा

आखिरी खत

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उदास ताहिर पढ के मेरी मेरे सनम मुस्कुरा ना देना ये आखिरी खत लिख रहा हूँ ख्याल करना जला ना देना तडपा रहे हैं तुम्हारे किस्से बिचार के हम को रूला ना देना हकीकत को जरूर लिखना अना की खातिर छुपा ना देना कोई जो पूछे किधर गए वो किसी बसर को बता ना देना मै मर भी गया तो मुस्कुराना अहसास ए गम की ना चोट खाना लहू से ताहिर कर रहा हूँ मैं अपनी सारी कहानी दो पहर भी तो पास रखना हवा में तेरे उड़ा ना देना रंजना झा

कुछ खट्टी कुछ मीठी

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कर्म करें कुछ ऐसे जग में जीवन सबका महका दें रह जाती हैं दिल में केवल कुछ खट्‍टी, कुछ मीठी यादें नैनों में संजोकर रख लो खुशियों के दो-चार पलों को आओ भुला दें वो बातें जो करती हैं बीमार दिलों को कुछ भूलो कुछ याद रखो बस साथ रखो अच्छी यादें रह जाती हैं दिल में केवल कुछ खट्‍टी, कुछ मीठी यादें रात के गहरे सन्नाटे को चीर सुबह जो आती है नई-नई सूरज की किरणें नया उजाला लाती हैं करें नया जो प्रण जीवन में पूर्ण करें अपने वादे रह जाती हैं दिल में केवल कुछ खट्‍टी, कुछ मीठी यादें। करें ज्ञान अर्जित जीवन में रामायण और कुरान से करें उजाला जीवन में गीता के कुछ ज्ञान से। रंजना झा

पिता और बच्चे का दिल से रिश्ता

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कभी अभिमान तो कभी स्वाभिमान है पिता कभी धरती तो कभी आसमान है पिता जन्म दिया है अगर माँ ने,जानेगा जिससे जग वो पहचान है पिता ऊँगली को पकड़ कर सिखलाता,जब पहला कदम भी नहीं आता नन्हे प्यारे बच्चे के लिए,पापा ही सहारा बन जाता पापा हर फर्ज निभाते है,जीवन भर कर्ज चुकाते है बच्चे की एक ख़ुशी के लिए,अपने सुख भूल ही जाते है फिर क्यों ऐसे पापा के लिए,बच्चे कुछ कर नहीं पाते है ऐसे सच्चे पापा को क्यों,पापा कहने में भी सकुचाते है पापा का आशीष बनाता है,बच्चे का जीवन सुखदायी पर बच्चे भूल ही जाते है,यह कैसी आंधी है आई जिससे सब कुछ पाया है,जिसने सबकुछ सिखलाया है कोटि नमन ऐसे पापा को,कभी कंधे पे बिठा के मेला दिखाता है पिता कभी बनके घोड़ा घुमाता है पिता,माँ अगर पैरों पर चलना सिखाती है,पैरों पर खड़ा होना सिखाता है पिता। रंजना झा

स्वामी विवेकानन्द जी

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जन्म अठारह सौ तिरसठ की बारह जनवरी को पाया विश्वनाथ दत्त जी के घर बेटा बनकर वह आया माता भुवनेश्वरी देवी थी नाम नरेन्द्र धराया परमहंस श्रीरामकृष्ण को अपना गुरु बनाया ऊँचे कुल में जन्मा फिर भी छुआ नहीं अभिमान लाल मिला यह भारत माँ को बनकर पुत्र महान भोग विलास न जिसको भाया सेवा का व्रत धारा संन्यासी योगी बन जिसने जीवन पूर्ण गुजारा भारत के जन के उत्थान को लक्ष्य बनाया घूम घूम कर देश-विदेश में संस्कृति ध्वज फहराया दीन हीन जन की सेवा को जिसने पूजा माना उसे विवेकानंद नाम से सारे जग ने जाना चार जुलाई सन्न उन्नीस सौ दो को स्वर्ग सिधारे चालीस वर्ष से कम उम्र में थे जग के बने सितारे सोया भारत पुनः जगाया स्वाभिमान लहराया जगत गुरु भारत के सुत को सबने शीश नमाया रंजना झा

बुद्धि बनाम सुंदरता

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बुद्धि और सुंदरता में हो गई एक दिन चर्चा दोनों में कौन अधिक अच्छा सुंदरता को था बड़ा अंहकार,   सुंदर होने पर अपनी आकर्षित करने वाली अदाओं पर बुढापा आने पर सारी चमक गायब हो जाए खूबसूरत चेहरे पर झुर्रियाँ नजर आए बुद्धि ने भी अपना मत आगे रखा बल बुद्धि से भी हर कोई आगे बढ़ सकता सही गलत की पहचान भी बुद्धि से होती बिना सुंदर हुए भी बुद्धि वाला विजयी होता आखिर में सुंदरता हारी बुद्धि के आगे,  सच ही कहा है बिना बुद्धि इंसान कुछ नहीं पाता रंजना झा

लोकतंत्र का त्यौहार

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आज़ादी के लिए हमारी लंबी  बड़ी लडाई थी लाखों लोगों ने प्राणों से कीमत बड़ी चुकाई थी व्यापारी बनकर आए और छल से हम पर राज किया हमको आपस में लड़वाने की नीति अपनाई थी गांधी, तिलक, सुभाष, जवाहर का प्यारा यह देश है जियो और जीने दो का सबको देता संदेश है प्रहरी बनकर खड़ा हिमालय जिसके उत्तर द्वार पर हिंद महासागर दक्षिण में इसके लिए विशेष है हमें हमारी मातृभूमि से इतना मिला दुलार है उसके आँचल की छैयाँ से छोटा ये संसार है हम न कभी हिंसा के आगे अपना शीश झुकाएँगे सच पूछो तो पूरा विश्व हमारा ही परिवार है लगी गूँजने दसों दिशाएँ वीरों के यशगान से हमने अपना गौरव पाया, अपने स्वाभिमान से आज तिरंगा फहराता है अपनी पूरी शान से विश्वशांति की चली हवाएँ अपने हिंदुस्तान से। रंजना झा

सिंधु ताई

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कुछ आखें जो कभी सोई नहीं बचपन की मासूमियत जिसे बोई नहीं हर कस्बे, हर कोने में रोते हुए वो अनाथ किलकारियों की जगह भीख मांगने लगे नन्हे हाथ आपने अम्बर थामा था,  सागर को भी रोक लिया  जो विपत्ति आयी  रास्ते में ,  सबका मुँह मोड़ दिया  गरीबी में आटा गीला ,  इस मुहवारे को भी झुठला दिया पति ने ठुकराया तो ,  आपने ममता का झरना  बहा दिया।        गया के बीच बेहोसी में ,  बच्चे को जन्म दिया आपने  वक़्त ने लात मारी तो ,  जानवरो ने प्यार दिया 16 पत्थर मार कर नाल तोड़ी थी  रेल की पटरी पे बैठ कर , जीवन जीने की उमंग जगायी थी शमशान की चिता पे रोटी बनाकर खायी थी  अंधकार में भी रौशनी की चिंगारी जलाई थी चार राष्ट्रपति के हाथ से अवार्ड पाये  बुझते हुए दीप में भी जीने की चाह जगायी थी आज दुनिया आपकी गाथा सुनाती है  आपके आगे सर झुकाती है  क्यूंकि मुश्किलो के आगे घुटने टेक कर नही बल्कि दीपक की लौ से अंधकार मिटाया आपने रंजना झा

कोहरा

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  तेरा शाम का सूरज बन ढल जाना,  मेरा शबभर यूं भटकना सेहराओं में। फिर जिस्म तेरी छुअन से जल उठे   ये ओस की बूंद तेरी निगाहों की मीठी-सी शरारत, मेरे चेहरे से उलझती जाती-सी नजर। फिर तेरा नेह बनकर यूं बरसना    ये ओस की बूंद बर्फ-सी जम-जम जाती सांसें,  पिघलती-सी ठहरी-ठहरी शमा-सी मैं। कंपकपाता, ठिठुरता-सा रोम-रोम     ये ओस की बूंद तेरी चाहतों का ओढ़ कर आसमान, अपने अरमानों का सुलगा कर अलाव। सेंक लूं वेणी में गुंथी हुई कुछ उम्मीदें  ये ओस की बूंद तेरी बातों-बातों में आंचल की नरमी,  कानों को छूकर निकलता रूहानी स्पर्श। रंगीन हो जाते स्याही के स्याह रंग ये ओस की बूंद कोहरे की चादर में लिपटे कुछ ख्याल,  धुंध में धुंधलाता सर्द-सा तेरा अक्स। बिछुड़े को ढूंढता पागल दिल . ये ओस की बूंद तेरी यादों की वो जानलेवा अंगड़ाई,  तुझे ही सोचना, लिखना और गुनगुनाना। चांदनी-सी खिलती कमसिन हंसी   ये ओस की बूंद  रंजना झा

मानो या ना मान

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मुरली वाले घनश्याम, तुम मानो या ना मान-2 मुझे रास्ते में ना छेडो, कल सवेरे मिलना-2 वृदांवन की कुंज गलीन में फिरते रास रचाते-2  नित  चोरी से माखन खाते, हमको खूब सताते-2 कान्हा तुम हो बईमान, अब तो फस गई मेरी जान-2 मुझे रास्ते में ना छेडो, कल सवेरे मिलना मुरली वाले घनश्याम, तुम मानो या ना मान-2 गोरी गोरी बइया, तने काहे को मरोरी हो -2 ग्वाले संग में गैयाँ चराते, हमको खूब सताते-2 मेरी बाली है उमरिया, मेरे सिर पे है गगरिया-2 मुझे रास्ते में ना छेडो, कल सवेरे मिलना मुरली वाले घनश्याम, तुम मानो या ना मान-2 हाईकोर्ट में चला मुकदमा खूब लगाया पैसा-2 करदो  मोदी से फरियाद, जिसकी चलती है आवाज-2 मुझे रास्ते में ना छेडो, कल सवेरे मिलना मुरली वाले घनश्याम, तुम मानो या ना मान-2 रंजना झा