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एक पाती बचपन के नाम

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प्रिय बचपन, ऐ बचपन तेरी याद मुझे , अब रह-रहकर तड़पाती है। क्यूँ तुम मुझसे रूठ गई, क्यों याद न मेरी आती है। तेरी कोमल गोदी में मैं, अल्हड़, चंचल, मदमस्त रही। जीवन के दुष्कर राहों से, अनजान रही बेफिक्र रही। ये उम्र यूंँ ही हर दिन अपना जब आगे कदम बढ़ाती है, कानों में तेरी मधुर याद इक मीठा तान सुनाती है। जिसकी कीमत उस वक्त मुझे मस्ती में कुछ ना जान पड़ी, अब आगे बहुत निकल आई, पीछे छूटी बचपन की घड़ी। फिर आन मिलो और गले लगो, इसलिए लिखी यह पाती है, ऐ बचपन तेरी याद मुझे, अब रह -रहकर तड़पाती है।                        मीनू 'सुधा' त्रिपाठी                 स्वरचित पूर्णतया मौलिक

प्रकृति आहत है

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कातर आंँखों से चांँद सूरज धरती को गौर से देख रहे, लाखों सवाल है आंँखों में मानो लोगों से पूछ रहे।। भू, जंगल, उपवन बेच दिए तूम नीर, हवा के व्यापारी , क्या शीतलता को बेचोगे लगता है चांँद की है बारी ।। सूरज भी आने में डरता इस धरती के  चौबारों में, मेरी किरणें कहीं कैद ना हो मानव के स्वार्थ सलाखों में।। धरती ने मन की कुछ बातें  पाती में लिखकर भेजा है, तूने मेरी सुंदरता को, क्या तिल तिल कर मरते देखा है।। कर प्रगति चांँद पर जा बैठा, मानव कर्जदार प्रकृति का है दाना ,पानी और सांसों पर भी सर्वाधिकार उसी  का है।। मैं पालनकर्ती मानव की, इसलिए सभी दुख सहती हूंँ, आहत होती हर रोज यहांँ जीवन देकर भी मरती हूंँ।।                      मीनू' सुधा'         स्वरचित पूर्णतया मौलिक

बालमन का सपना

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माँ, मैंने कल सपना देखा। सूरज के कांँधे पर चढ़कर भोर - किरन का डेरा देखा, माँ ,मैंने कल सपना देखा। तितली के संग उड़ते उड़ते फूलों को बहुतेरा देखा, माँ मैंने कल सपना देखा। नदियों के संग बहते- बहते सागर भीतर मोती देखा, माँ ,मैंने कल सपना देखा। चंदा  के संग चलते -चलते अटल खड़ा ध्रुव तारा देखा, माँ ,मैंने कल सपना देखा। सूरज, सागर, तितली, नदिया, चंदा से भी प्यारा देखा, दोनों बाँहों को फैलाए तेरा हँसता चेहरा देखा माँ मैंने कल सपना देखा।                                 मीनू 'सुधा'                            ‌‌  स्वरचित                  पूर्णतया मौलिक

सिद्धार्थ और बुद्ध

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सिद्धार्थ और बुद्ध शाक्य वंश का राज दुलारा शुद्धोधन- गौतमी का प्यारा। राज- वैभव को समझ के माया पत्नी, पुत्र, राज ठुकराया। देख बीमार, अपाहिज, वृद्ध को, रोक न पाया उसने स्वयं को विचलित हुआ देख दुखों को, निकल पड़ा खोजने सत्य को। और फिर..... जब मानव अज्ञानता के , अंधकार में घिरने लगा, ज्ञान का संदेश लेकर दीप एक जलने लगा। था सत्य का ईंधन पड़ा और शांति की बाती सजी, 'सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय' की घंटियांँ बजने लगी। "परिवर्तन ही नियम है" चलो इसे पुनः अपनाएंँ यदि संकल्प सुदृढ़ और विचार शुद्ध हो जाए तो, भारत का हर बच्चा बुद्ध बन जाए। बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ 🙏                               मीनू 'सुधा'                   ऐतिहासिक तथ्यों के   ‌                आधार पर                  स्वरचित

मांँ !मैं फिर मिलुंगी

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मायके में मांँ ने समझाया था पराए घर जाना है, संस्कारों की पोटली को धैर्य की झोली में, सहेज पर रखो। मान और मर्यादा को, आचार और विचारों को, परवरिश की डोली के, पर्दे में रखो । मैं सदैव नहीं रहूंगी तुम्हारी परछाई बनकर, मेरी नसीहतों को हृदय के ताले में रखो। तब मांँ की बातें बकवास लगती थीं, मांँ तो बस बोल -बोल कर थकती थी । ओ मांँ!काश तू फिर से बोले, दिल के हर राज़ तू खोले, वह वक्त न वापस आएगा इतिहास पुनः दोहराएगा। जब मैं मां बनकर, संस्कारों की पोटली , फिर से सिलूंगी मांँ, मै फिर मिलूंगी। हांँ! जब मैं भी मांँ बनूंगी परवरिश के मर्म को, खुद ही समझूंगी मांँ! मैं फिर मिलूंगी।                       मीनू 'सुधा'                      स्वरचित         पूर्णतया मौलिक रचना