एक पाती बचपन के नाम


प्रिय बचपन,

ऐ बचपन तेरी याद मुझे ,
अब रह-रहकर तड़पाती है।
क्यूँ तुम मुझसे रूठ गई,
क्यों याद न मेरी आती है।

तेरी कोमल गोदी में मैं,
अल्हड़, चंचल, मदमस्त रही।
जीवन के दुष्कर राहों से,
अनजान रही बेफिक्र रही।

ये उम्र यूंँ ही हर दिन अपना
जब आगे कदम बढ़ाती है,
कानों में तेरी मधुर याद
इक मीठा तान सुनाती है।

जिसकी कीमत उस वक्त मुझे
मस्ती में कुछ ना जान पड़ी,
अब आगे बहुत निकल आई,
पीछे छूटी बचपन की घड़ी।

फिर आन मिलो और गले लगो,
इसलिए लिखी यह पाती है,
ऐ बचपन तेरी याद मुझे,
अब रह -रहकर तड़पाती है।

                       मीनू 'सुधा' त्रिपाठी
                स्वरचित पूर्णतया मौलिक

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