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Showing posts with the label नेहा धामा

माँ

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" मातृ ब्रह्मा मातृ विष्णु मातृ देवों महेश्वर: । " मातृ साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री मातुवे नमः ।। यानि ब्रह्मा ..... जिसने सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है । माँ ..... यानि विष्णु ...... जो सम्पूर्ण चराचर जगत के पालन करने वाले हैं। माँ ...... यानि भोलेनाथ ......  जो अपने भक्तों के कष्ट पल में हर लेते है ।उसी तरह माँ अपने बच्चो की परेशानी पल में समझ भी जाती है और निपटा भी देती है। माँ से मीठी- मीठी बात करो । अपनी कोई भी बात मनवायो । माँ.... जो जन्म देने वाली हैं। जो लालन- पालन करने वाली है । सुख -दुःख में साथ निभाने वाली हैं । ममता की मूरत है । क्या देवी क्या देवता ।माँ से बढ़कर कोई नहीं है । माँ...... अपने आप में सम्पूर्ण ब्रमांड को समेटे हुए हैं । समस्त सृष्टि का संचालन माँ ही करती है । माँ ....शब्द बोलने मात्र से ही मनुष्य अपने दुःख दर्द भूल जाता हैं  माँ के अनेकों रूप है ।वो चाहे अपनी माँ हो ।अपने पिता की माँ हो ।या अपने पति की माँ हो । धरती माँ हो या भारत माँ ।गौमाता हो या दुर्गा माँ । वो अपने हर रूप में पूजनीय है।  माँ का विशाल हर्दय होता हैं ।अतुलनीय सहनसक्ति होती है।...

मेरी नन्ही सी परी

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जिसने मुझें सम्पूर्ण नारित्व का अहसास कराया  हृदय की गहराईयों तक ममत्व का आभास कराया जिसकी एक झलक रूह तक सुंकुन दे जाती हैं मासूम सी उसकी हंसी मन को मोह जाती हैं  मनमोहनी सी सुरत में मेरा ही तो अक्ष नजर आता है  देखती रहूं दिन - रैन अपलक मन कहां भर पाता है मीठी - मीठी वाणी से जब मांँ कह कर पुकारती है जहां भर की खुशियों से झोली भर जाती हैं छुपा कर आंचल की छांव में आ तुझे दुलार करू  लें लूं सारी ब्लाईया लाल मिर्च से तेरी नजर उतारू संग - संग रहूं पल- पल तेरी परछाई बन जाऊं छन - छन मतवाली चाल पर बलिहारी जाऊं आज वहीं शुभ दिन हैं जब मेरी गोद में तू आई  मेरी नन्ही परी जन्म दिवस की हार्दिक बधाई मेरी नन्ही कली फूले फले हमेशा ख़ुशबू से महकती रहे  दीर्घायु हो ,स्वस्थ रहे ,खुशियों से हमेशा चहकती रहे नेहा धामा " विजेता " बागपत , उत्तर प्रदेश

विरह वेदना

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जल रही हैं रातें मेरी सुलग रही है सांँसे मेरी  तुमसे पल भर की ये दूरी  कटती नहीं लगे बरसों सी तपती रेत सी तेरी जुदाई  तू जुल्मी तू बड़ा हरजाई देहरी पर बैठी टकटकी लगाए हर आहट पर लगे तुम आए जब से पिया तुम परदेश गए ना भूख रही ना प्यास लगे तेरे विरह में ऐसी अगन लगी  जलती दोपहरी सी जले जिंदगी तेरी याद में हुई मैं बावरिया  अब तो लौट के आजा सांवरिया घर सूना तुझ बिन सूना अंगना चुप है घुंघरू कुछ ना बोले कंगना आ तो सही करनी है तुझसे ढेरों बातें कैसे कटे दिन कैसे कटी मेरी रातें  नेहा धामा " विजेता " बागपत , उत्तर प्रदेश

विद्रोह

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अंतर्मन में कोई विद्रोह का बिगुल बजा रहा है तोड़ कर जहांँ भर की बन्दिशें आजाद हो पंख पसार आसमान में दूर निकल जाने को भीतर कोई बेचैन हो ,कब से छटपटा रहा है जकड़ा पड़ा है सदियों से मोह माया के जाल में संघर्षरत हैं खुद ही से खुद की पहचान कराने में अब तलक जान ही नहीं पाया है कौन हूंँ क्या मेरा अस्तित्व हैं क्या मेरा नाम हैं  कर दिया बर्बाद जीवन सारा धन - माल कमाने में होकर मद में चूर अंधेरों में भटकता रहता था जाने कितने मासूमों का खून चूस पला बढ़ा भरता गया मोतियों का खजाना पाप कमाई से सूझ - बूझ खो बैठा माया की चकाचौंध से बना घमंडी झूठी शानों शौकत दिखा रहा भूल गया तू , नश्वर तेरी काया और माया भी  मिट्टी हैं तू ,मिट्टी से बना ,मिट्टी में मिल जायेगा खाली हाथ आया था , लौटकर खाली हाथ जायेगा एक छोटा सा प्रकाश देखकर , आँखे चौंधिया गई  ज्ञान दर्पण में अपना अक्ष देख कर पहचाना कौन हूंँ सर्व शक्तिमान हूं मैं , कब से भ्रम में जी रहा था क्षणभंगुर हूंँ मैं , समझ आया , माया नगरी छूट गई छोड़ छाड़ कर रिश्ते - नाते , बन्धन सारे तोड़ कर  चल पड़ा हूं  , अनंत ,अमिट ,अखंड ज्योति की ओर जह...

मेरी मोहब्बत

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मेरी मोहब्बत को मेरी कमजोरी मत समझ  सुन तू क्या जाने आशिकी क्या होती हैं  हमेशा चाहा हैं मैने पूरी शिद्दत से तुझे  बेवफ़ा तू क्या जाने उल्फत क्या होती हैं जब जब तुझे मेरी जरूरत महसूस हुई इस्तेमाल कर कचरा समझ फेंक दिया तेरी हर बात में सहमति जो दिखाई  तूने मुझे कम अक्ल समझ लिया बीच चौराहे नीलाम कर दिया मुझे तेरे इश्क में बिक जाना भी कुबूल है कमबख्त तेरी सूरत ही इतनी फरेबी है  तुझसे खाएं धोखे भी कम पड़ जाते हैं नहीं जानती बनावट का मुखौटा लगाना मेरी सादगी को तूने पागलपन समझ लिया बेशक तूने मुझे लाखों दर्द दिए हो पर आज भी तेरे जख्मों की दवा हूं मैं मत कर मेरी चिंता तेरी कोई नहीं मैं  मेरी हर दुआ तेरी खैरियत चाहती हैं तू बाहर से खाना खा कर आ बेशक तेरे घर लौटने तक भूखी रही हूं मैं तेरा दिल धड़कता हैं ओरों के लिए मेरी हर सांस तेरे नाम से चलती हैं कुछ नहीं चाहिए बदले में तुझसे  बस कुछ पल देख लूं जी भर हां तेरी बातों में उलझ जाती हूं मैं  हर बार तेरे झांसे में आ जाती हूं मैं तेरे प्रेम में मग्न हो सुध बुध खो बैठी मेरी चाहत को मेरी मज़बूरी मत समझ नेहा...

गाड़ियां लौहार की छोरी भाग 5

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पिछले भाग में हमने पढ़ा कि गाँव का एक लड़का सरवणी लौहार को छेड़ता हैं । पंचायत में गाँव वालों के सामने तो वह सरवणी से माफ़ी माँग लेता है । पर उसके दिमाग़ में उससे बदला लेने की खुराफ़ात चल रही हैं । अब आगें। पंचायत के बाद सब लोग निश्चिन्त हो अपने कामो में लग गए । दो - चार दिन तो सरवणी का भी घर से बाहर जाना बंद था । पर पापी पेट हैं । कब तक  घर में पड़े रह सकती थी । इसलिये फिर से रोजाना सामान बेचने गाँव में आने लगी । कुछ दिन तो सब ठीक ही रहा । पर फिर से कुछ  लड़के जगह - जगह टोली बनाकर बैठने लगें । उस लड़के को सरवणी की समय -  समय पर खबर देते रहतें । वो कब कहा जाती हैं कब कहा से आती हैं । इसी तरह से कुछ दिन आराम से कटे । सब निश्चिन्त हो अपने काम में लग गए । सब नॉर्मल हो गया । पर एक दिन वो समय आ ही गया जिसका उस वहसी दरिंदे को  इंतजार था । खबरियों  ने खबर दी कि सरवणी अकेली  खेतो की तरफ गई हैं । बस फिर क्या था शिकारी ने शिकार पर हमला कर दिया । अचानक हुए हमले में  सरवणी को संभलने का मौका भी नही मिला । उस कुत्ते ने  अपने पंजो से उसे बुरी तरह घायल कर दिया । अपने बचाव...

क्यों

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क्यों तेरी आंखे भावशून्य हैं  क्यों लबो पर ये खामोशी छाई है  आंसूओं से लिख भेजी तहरीर  क्यों तेरे दिल तक नहीं पहुंच पाई हैं   दस्तक दे रही दिल के दरवाजे पर क्यों तुमको नहीं सुनाई दे रही हैं क्यों इतना इम्तहान ले रही जिंदगी  दर कदम दर फासला बढ़ा रही हैं करू कोशिश जितनी पास आने की तेरी बेरुखी तुझे मुझसे दूर ले जा रही हैं नेहा धामा " विजेता " बागपत , उत्तर प्रदेश

तू हैं तो मैं भी हूं

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नर है तू नारायण अगर  तो हूं मैं भी नारायणी  नाको चने चबा दूं अरी को  चाहूं तो भरवा दो पानी  ना जाओ मेरे रंग रूप पर  बेशक नाजुक मैं फूलों सी  आन पड़े कुल की मर्यादा पर   तो ले लूं शत्रु के प्राण भी गर तू हैं पति परमेश्वर  तो हूं मैं भी तेरी अर्धांगिनी  तुझमें सिंह सी गर्जन है तो क्या    मुझ में भी चपला सी तेजी  गर तू करता शंखनाद युद्ध का  मैं भी रण में हूंकार भरू है गर तू बादल तो क्या   रिमझिम बरसात हूं मैं भी तू डाल डाल का बल तो क्या पत्ते पत्ते की हरियाली मैं भी माना तू तेज हवा का झोखा हैं हवा संग उड़ती खुश्बू मैं भी तू अथाह सागर हैं नीर का नदियां बन मैं तुझमे मिलती हैं गर अंबर की ऊँचाई तुझमे  तो हैं धरा सा धर्य मुझमे भी कदम दर कदम संग तेरे चलती  कितने तूफान आये ना डरती फिर तुझ में किस बात का मद देख हूं मैं कितनी सरल सी  नेहा धामा " विजेता " बागपत , उत्तर प्रदेश

फिर वही रात आई हैं

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लंबे अरसे बाद जब एक  फौजी छुट्टी आता है तो अपनी ब्याहता से   क्या कहता है  जानता हूं पीला रंग  तुम पर खूब जचता है  उस दिन भी तो पीले रंग  का सूट पहना था  जब मैंने तुम्हें पहली बार  देखा था और  देखता ही रह गया था  सरसों के खेत में जब  पीले पीले फूल खिलते हैं  तो नव यौवना से लगते हैं  ऐसा ही रूप तुम्हारा होता है  जब तुम पीले रंग में  नजर आती हो  और तब प्रियतमा  अपने प्रियतम की बात का  इस प्रकार उत्तर देती है  कहती है जानती हूं कि  तुम मुझे कितना  पसंद करते हो  तुम्हारे लिए ही तो इतना  श्रृंगार किया है तुम्हारे लिए  ही तो सज संवरकर  आई हूं ये चूड़ियां ये कंगना ये माथे की    बिंदिया ये पायल ये चुनर  तुम्हारे लिए ही है ये मांग में सिंदूर तुम्हारे नाम  का ही सजाया है  आंखों में काजल होठों पर लाली   लंबे केशों को तुम्हारे लिए   ही तो संवारा है  आज मैंने फिर वही पीले रंग का सूट       तुम्हारे लिए ही तो पहना ...

गाड़ियां लौहार की छोरी भाग 4

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पिछले भाग में हमने  सरवणी लौहार के  रंग - रूप  के बारे में पढ़ा ...... अब आगे की कहानी ....... सरवणी लौहार की बहन अमरूद के पेड़ से गिर गई । सब उसकी तरफ भागें ,कही लड़की को ज्यादा चोट तो नही लग गई । खैरियत रही मामूली सी चोट थी । पर फिर भी मम्मी ने उसे  हल्दी वाला दुध पिलाया जिससे चोट में थोड़ा आराम मिलेगा । फिर गाँव के ही एक डॉक्टर को बुलाकर थोड़ी मरहम पट्टी करवा दी । कुछ दवा भी दी और टेटनस का इंजक्शन भी लगवा दिया । फिर वो सब घर चली गई । अब तो उन लोगो का रोज का रूटिन बन गया था । रोज आना बातें करना , पेड़ पर चढ़कर अमरुद तोड़ना । अब तो उन लोगों से अच्छी दोस्ती हो गई थी । तभी रक्षाबंधन का त्यौहार आया तो वो सब राखी बाँधने आई ,मुझे याद है । मैने अपनी गुल्लक तोड़कर उन सबकों सारे पैसे दे दिये थे । जो मैने अपने भाई को जन्मदिन का तोहफा देने के लिये जमा किये थे । पर उन लोगों की आँखों में जो ख़ुशी और प्यार की चमक थी  । उसके सामने किसी तोहफे की कोई कीमत नही हैं । ख़ुशी - ख़ुशी  समय कट रहा था । पर एक गड़बड़ हो गई । गाँव के कुछ लफंगे लड़के रास्ते में खड़े होकर उन लड़कियों को घूरा करते थे ...

बसंती चोला

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बसंती चोला पहन मां भारती       देखो मुस्कुरा रही है    भांति भांति के पुष्प खिले हैं      देखो खिल खिला रही है     दूर तलक जहां तक दृष्टि जाती है      हरियाली ही हरियाली नजर आती है  प्रस्फ़ुटित हो रहे धरा के गर्भ से                नव अंकुर    खिल रही है आशाओं की बंद       कलियां शर्माकर   उत्साह उमंग मन में भर जन मन              बहुत हर्षाया निराशा के अंधेरों से उजाले की        ओर कदम बढ़ाया  बैर द्वेष को भूल कदम से कदम            मिला आगे बढ़े  आलस को त्याग मेहनत का नया                इतिहास गढ़े   फूलों पर रसपान करने को          भवरे गुंजायमान है  पेड़ों की डाली पर मधुर स्वर में            कोयल गाए गान है  लद गई बोरो से अमव...

तेरा मेरा साथ

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थामकर हाथों में जब मैने तेरा हाथ    कह डाले थे अपने दिल के सारे जज्बात  याद है मुझे अब तक वो प्यार भरा अहसास नरम नरम हाथों की वो रेशमी गरमाहट गोरे गोरे हाथों में सजी मेहंदी का सुर्ख रंग  कोहनी तक चूड़ियों से भरे हाथ करती खन खन  चंद्रमा भी फिका पड़ जाए देख चेहरे का नूर  एक नजर में छा गया मुझ पर तेरा सुरूर किया वादा खुद से जब थामा तेरा हाथ  ना छूटेगा तेरा मेरा साथ उम्र भर जान भी कुर्बान तेरी एक हसीं पर       डोली में बैठ आई थी दुल्हन बन खुशियों से गूंज था उठा घर आंगन उम्र के इस पड़ाव पर आकर जब  ना रिश्ते नाते साथ हैं  ना शरीर में बाकि जवानी सी  ताकत हैं ना वो एहसास है  पर तू आज भी वही खड़ी हैं  मेरे सिरहाने मुझे जगाने  चाय की प्याली के साथ  अधरों पर लिए मीठी मुस्कान  बदल गया जमाना जीवन के  मायने ही बदल गए  पर आज भी तेरी मेरी   चाहतों का वही दौर जारी है नेहा धामा " विजेता " बागपत , उत्तर प्रदेश

गाड़ियां लौहार की छोरी ( भाग 3 )

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दूसरें भाग में हम लोगों ने गढ़ लुहार के सामाजिक जीवन के बारे में बातें की हैं । जन्म - मरन ,शादी , प्रतिज्ञा ,उनका इतिहास आदि - आदि । अब आगे की बातें करतें हैं । गाड़ियां लुहार का इतिहास जानने के बाद अब आते हैं सीधे  मुद्दे पर । ये उस वक्त की बात हैं । जब मैं लगभग सौलह या सत्तरह साल की उम्र की थी । हमारे गाँव के बाहर एक खाली पड़े मैदान में  गढ़ लोहारों के एक क़बीले ने आकर डेरा डाला था । जैसा की उनका काम होता हैं । गाँव में घूमकर अपने बनाये हुये सामान  बेचना । इस बार भी यही हुआ । चार- पाँच लड़कियों की टोली गाँव में सामान बेचने आई । वैसे तो ये सब लड़कियां ही देखने में आकर्षक रंग - रूप वाली होती हैं । पर उनमें एक लड़की देखने में सबसे अलग थी । पतली सी ,गौरी  रंगत ,लम्बा कद ,मोटी -मोटी  आँखे , सतरंगी ओढ़नी ,पचरंगी घाघरा , ऊपर लाल रंग का चोलीनुमा टाइट फीटिंग कुर्ता ,। कानों में झुमके ,नाक में नथनी ।गले में हँसली ,कंठी । हाथ भरकर चूड़ियां । पैरो में छन - छन करती पायल । चमड़े की जूती ।लंबे घने केश,माथे पर उड़ती लट , मुखड़े पर ऐसा नूर कि नजर ना ठहर पाये । फूलों सी कोमलता , मदहोश करने...

गाड़िया लौहार की छोरी ( भाग 2)

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पहले भाग में हम लोगों ने पढ़ा । गढ़ लुहारों के क़बीले का रहन - सहन पहनना - ओढ़ना । वे लोग  काम क्या करते हैं । कहाँ रहतें हैं ।आदि । अब आगें की बातें ........... वैसे तो इनकी औरतों के रंग ज्यादा गौरे नही होते । अमुमन सांवले ही होते हैं । कोई एक - आध लड़की ही उजले रंग की होती हैं । पर सांवले सलोने रंग में जो गजब की खूबसूरती और कशिश होती हैं ।वो देखने लायक होती हैं ।ज़्यादातर ये लोग अपनी छोरियों के नाम...... चंद्रावल ,फूलमती ,रामकली ,पदमावती, आदि - आदि रखते हैं ।प्यार से उनको चंद्रो ,फुल्लो ,रामो, पदमो ,आदि पुकारते हैं ।जो लड़की ज्यादा खूबसूरत होती हैं उसी का नाम चंद्रो रखा जाता हैं । आप लोगों ने चन्द्रावल मूवी तो देखी ही होगी । अगर नही देखी तो जरूर देखें । देखने लायक मूवी हैं । बिल्कुल रीयल लगती हैं । बताते हैं सच्ची घटना पर आधारित है । इनकी महिलाये अपने शरीर पर जगह - जगह टैटू आदि से नक्कासी करवाती हैं ।शादी में दहेज़ के नाम पर ये लोग अपनी सामर्थ्य के मुताबिक  गाय ,बैल ,गाड़ी ,बर्तन, कपड़े आदि अपनी लड़कियों को दान देते हैं । ये लोग नया कंघा तब तक नही खरीदते जब तक पुराना कंघा टूट नही जाता ...

लीलाधर

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टेडी मेड़ी बातों से क्यों मुझको बड़ा सताते हो  थोड़ी सी भी फ़िक्र नही  मुझकों बड़ा रुलाते हो  नाम तुम्हारा लीला धर  नित लीला दिखाते हो  पल में गुस्सा पल में प्यार  मीठी बातों में फसाते हो बन जाऊं कितनी होशियार  फिर आ जाती तेरे झांसे में  कितना भी नाराज हो जाऊ  कभी ना मुझको मनाते हो  तेरे उलाहनों से तंग आकर  रोऊ मैं दूर बैठ मुझें निहारे  चुपके से आकर कानों में  मुरली मधुर बजाते हो  नेहा धामा " विजेता " बागपत , उत्तर प्रदेश

" अब तो कुछ कहने दो "

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मेरे मनोभावों की सरिता को प्रखर हो बहने दो , मौन रहूं कब तक ,अब तो कुछ कहने दो , ना बांधो मुझे तहज़ीब की खोखली  जंजीरों में , ना समेटो मेरे भाग्य को हाथों की लकीरों में , खुला गगन , उड़ते परिंदो संग कुछ दूर तो उड़ने दो , बहती पवन , ठंडा झोखा बन कुछ दूर तो बहने दो, काले घने बादल ,बरखा बन एक बार तो बरसने दो , सावन में झूले पड़े ,कोई गीत तो गुनगुनाने दो ,  फूलों संग खिल जाऊ , जरा बगिया को महकाने दो , घना जंगल हरियाली चहुं ओर ,मृग बन विचरण करने दो,  गहरा समन्दर मीन बन , लहरों संग तैरने दो ,  पूर्णिमा चन्द्र की चांदनी बन,आसमां में चमकने दो , प्रकाशित भानु रश्मि बन ,सृष्टि में उजियारा फैलाने दो , हाथ कलम ,दिल के जज़्बात कागज पर लिखने दो , रो - रो थकी - हारी , शुकुं की चन्द सांसे तो लेने दो , मौन रहूं कब तक, अब तो कुछ कहने दो , नेहा धामा  " विजेता " बागपत , उत्तर प्रदेश

सुनहरी यादें

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 मेरा बचपन मुजफ्फरनगर के छोटे से गांव में बीता , सुरुआती शिक्षा भी यही हुई , गांव में स्कुल के नाम पर एक प्राइमरी स्कूल था, जो हमारे घर के पीछे ही था , आगे की पढ़ाई के लिए लड़कों को तो पास के शहर भेज दिया जाता था , और लड़कियां बेचारी बिना पढें ही रह जाती ,  गांव में एक " सत्यवती " नाम की महिला अपनी जान पहचान में आई थी ,  अच्छी पढ़ी लिखी थी , गांव में बच्चियों की शिक्षा के बारे में जानकर बहुत दुःखी हुई , गांव के लोगों को बेटियों को शिक्षित करने के फायदों के प्रति जागरूक किया ,  उसके प्रयास से गांव में कन्या पाठशाला खोलने का प्रस्ताव रखा गया , उस पर काम भी शुरू हो गया ,फिर कुछ लोगों के सहयोग से चंदा इक्क्ठा किया गया , एक महाशय ने स्कुल के लिए जमीन भी दें दी , इमारत भी बन कर तैयार हो गई , लेकिन स्कुल को सरकार से मान्यता प्राप्त नही हो पाई ,  अब क्या कर सकते थे , आशा की जो किरण दिखी थी , वो भी धूमिल हो गई ,  लेकिन कहते हैं ना , जहाँ चाह हैं वहां राह हैं ,  " सत्यवती " बहन जी ने मन में ठान ली थी ,कि बच्चियों को शिक्षा दिला कर ही मानेंगी , सब लोग उन्हें " बहन जी...

धड़कनें सुन रही हो

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"बैठा था शान्त समुद्र सा, जाने तू कहाँ से हैं आई। तेरी आँखों की शरारत, मेरे इस दिल में है समाई।। एक झलक बस देखा तुमको, दिल में हलचल मचा गई। तेरी खूबसूरत नशीली आँखे मेरे मन को भा गई।। निज कर स्पर्श से अधखिली कली  को खिला फूल बना गई। तेरे अंग-अंग से निकली जो खुशबू, मेरे तन-मन को महका गई।। तेरा सुन्दर अक्स जो मेरे दिल में उतर गया । आँखें खुली हो या बन्द तेरा चेहरा नजर आया ।। तुम्हें देखूँ तो मेरी आँखें झुक जाती हैं। जो नहीं होती पास तो साँसें रुक जाती हैं।। ये कैसा नशा सा छाया तेरा,  कांपते होंठ धड़कनें सब कह जाती हैं।। कब से चाहत जगी इस मन में कहने से घबराता हूँ। सुनूँ तुझे, मैं देखूँ तुझे बस ख़्वाबों में कर पाता हूँ।। अब तो कल्पना में ही तुम्हीं महसूस हो रही हो, लगकर नेहा कलेजे से तुम धड़कनें सुन रही हो।।" नेहा धामा " विजेता "  बागपत , उत्तर प्रदेश

तलाश

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  बुझी बुझी सी उदास उदास मौन मौन मन बड़ा अशांत हैं जिससे मन की बातें कह सकूं ऐसी एक सखी की तलाश है दिल के रंजो गम बांट सकूं जिसके कंधे पर सर रख कर मन भर रो सकूं  ऐसी एक सखी की तलाश है उतार फेंकू मन के सारे बोझ को अपनी बातों से मन मेरा बहला दे  रोते हुए मेरे आसुओं को  पोंछ कर ढाढस बंधाये  ऐसी एक सखी की तलाश है भूल जाऊं जिसके सानिध्य में आकर अपने सारे दुःख दर्द जी भर कर हंस लूं खिलखिला    मिटा दे मेरे सारे कष्ट  ऐसी एक सखी की तलाश है नेहा धामा " विजेता "  बागपत , उत्तर प्रदेश

कान्हा तेरे इंतजार में

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जोग ले लिया जोगनियां बनी  कान्हा तेरे इंतजार में  कभी मीरा बनी कभी राधा बनी  ओ कान्हा तेरे प्यार में  माखन मिश्री और दही की  सर पर लेकर मटकी  माखन चोर छुपकर बैठा वन वन फिरू ढूंढ़ती  गिरधारी बनवारी सुन लें  तू ही तो मनमीत मेरा सात सुरो का संगम बांसुरी तू ही तो संगीत मेरा  जन्म जन्म से फिरु भटकती  जीवन डोर तुझी से बांधी दर्शन की ये अंखियां प्यासी  सुन लें ओ घट घट के वासी  दरस दिखा जा प्यास बुझा जा  प्रीत लगा जा तू मुझसे  कब से बैठी यमुना किनारे राह निहारू सांझ सकारे इंजतार में हिम्मत हारी  तन मन धन तुझ पर वारी अब तो दर्शन दो घनश्याम  जीवन शाम होने को आई  नेहा धामा " विजेता "  बागपत , उत्तर प्रदेश