मेरी मां की विदाई
" चलो ध्यान से जाना... अपना ख्याल रखना.. यह सौभद्र भी पगला है पूरा । विवाह हो गया बचपना नहीं गया । कहता है मम्मी आप भी हमारे साथ हनीमून पर चलिए अकेले घर में कैसे रहेंगी..." दरवाज़ा बंद करके खुद में ही मुस्कुराती बोलती आरती कमरे में आ गईं जहां बेड पर सामान ही सामान बिखरा था । उठाती जातीं रखती जातीं कबर्ड को नए सिरे से सुधारना था तो नीचे से भी सामान निकाल कर बाहर रखा । अचानक सरक हाथ में आ गई अपने विवाह की गहरे लाल रंग की लकदक करती सुनहरे सितारों से जड़ी साड़ी । हाथ सहरता चला गया । उठाकर चेहरे पर लगाया तो अभी भी वही 25 बरस पहले की खुशबू बसी थी। कितने अरमान से बाबा ने खुद जा जाकर अपनी और आरती की पसंद से खरीदी थी । बहुत खुश थे । अरमानों से पली नन्ही कली कब बड़ी होकर विदाई की घड़ी में प्रवेश लेती है मां बाप कहां भांप पाते हैं । सबको उदास छोड़कर बेटी नए साथी के साथ जीवन भर की मजबूत डोर में बंध जाती है । साड़ी उठाकर सामने से लगाकर आईने में देखती है तो पीछे अभ्यक अपनी माला पड़ी फोटो फ्रेम में मुस्कुराते हुए झांक रहा था। साड़ी एक झटके से फर्श पर ...