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Showing posts with the label जया शर्मा

उत्सव प्रिया प्रकृति

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नन्ही कली गुलाब की  बिन परवाह किए  कांटों की  फूल बन इठलाती है , तब प्रकृति उत्सव मनाती है । जब निर्मल जल निष्ठुर  पत्खरों में भी,  बनाकर रास्ता , झरना बन सौंदर्य का , जादू  बिखेरता है,  तब प्रकृति उत्सव मनाती है ।  बारिश की बूंदों को   अपनी बाहों में समेट   धरती जब सौन्धउठती है ,   तब प्रकृति उत्सव मनाती है ।   घनघोर बारिश में ,   जब बादल एक दूसरे को पकड़ने की चाह में ,   धमाचौकड़ी मचाते हैं ,   तब प्रकृति उत्सव मनाती है ।   ओस की बूंदे ,   जब पत्तियों पर बिखर मुस्कुराती हैं ,   तब प्रकृति उत्सव मनाती है ।   रंग बिरंगे फूलों को ,   आंचल में समेटकर    प्रति आकर्षण और फूलों को सुला देती है तब ।   प्रकृति उत्सव मनाती है    कल कल की आवाज सुना कर ,   धारा को और लंबी बनाती नदी    को देख प्रकृति उत्सव मनाती है ।   आम की बोर को देख    कूकती कोयल को सुन    चहचाहती चिड़ियों का    कलरव सुन     प्र...

मेरा शहर

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(ऐतिहासिक धरोहर और मिठास का नगर शाहजहांपुर ) कुछ स्थान और जगह अपने भीतर इतना कुछ समेटे होते हैं ,कि परतें खुलने पर उसकी सुगंध चारों और फैलने सी लगती है। ऐसी प्रतिष्ठित जगहों पर जो कभी हो आया तो वहां के मोहपास में ऐसा बंध जाता है कि और लोगों को भी अपनी ओर खींचने को लालायित रहता है । दो दो नदियों के बीच लंबाई में बसा शहर,प्राकर्तिक सौन्दर्य से सुसज्जित, शाहजहाँपुर हिंदू मुस्लिम कीे साझा संस्कृति की मिठास को अपनी मिठास में पिरोए , वैदिक काल से लेकर वर्तमान समय की वस्तु स्थिति को सजीव करता  हुआ प्रतीत होता है । इस जिले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि सदैव ही चर्चा में रही है भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में 1857 से लेकर 1925 के काकोरी कांड तथा 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक इस नगर की प्रमुख भूमिका रही है । शाहजहाँपुर को शहीदों की नगरी के नाम से भी जाना जाता है ।इस नगर ने  देश के स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपने तीन सपूतों को भेंट स्वरूप प्रदान किया है । जब-जब इतिहास में स्वतंत्रता संग्राम को पढ़ा जाएगा स्वर्ण अक्षरों में लिखित तीनों शहीदों के नाम कोहिनूर की तरह दीप्तमान रहेंगे । राम प्रसाद...

खेल खिलौने और हमारा बचपन

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अभी थोड़े दिनों की ही तो बात लगती है ,जब हमारे खेलों में पिट्ठू गर्म ,कंचे ,गिल्ली डंडा और गली क्रिकेट शामिल होता था। गली-गली में इन खेलों का जोश, इन से मिलने वाली खुशी और जीतने का जज्बा  हर चेहरे पर उत्साह झलकता था, गलियां आज भी वही है पर खेल का उत्साह कुछ फीका फीका सा है । पुराने लोग बताते हैं खेलने के लिए उस समय संसाधनों की बिल्कुल भी जरूरत नहीं होती थी । बस दोस्तों का जज्बा हो तो जो मिलता था उसी से खेल लेते थे । आज भी पुराने दिनों को याद कर चेहरे पर बाल सुलभ चंचलता पुराने लोग के चेहरे पर खिलखिला उठती है । पहले क्रिकेट में खेलने में जो मजा आता था आज वह आईपीएल या विश्व कप देखने में भी नहीं आता । घरों से दोस्तों की टोली बगैर मोबाइल के भी तय समय पर बगैर किसी सूचना के लोकेशन पर अपने आप पहुंच जाती थी । हर घर की दीवार विकेट के तौर पर देखी जाती थी । लकड़ी का एक टुकड़ा बैट बन कर और कपड़ों को इकट्ठा करके बाल भी तैयार हो जाती थी । उस समय खेल को लेकर जितना उत्साह और आनंद आता था ,आजकल की पीढ़ी उसको महसूस भी नहीं कर सकती। पहले गांव में या शहर के मध्यमवर्गीय परिवारों में बाजारों में म...

लक्ष्मी निलयम् हमारा घरौंदा

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 लक्ष्मी निलयम् हमारा घर, हमारा घरौंदा जिसकी बाहों में दुबक कर मिलने वाला सुख अप्रतिम है, कण कण में हमसब और लक्ष्मी निलयम् आपस में रचे बसे, कितने भी दूर चले जाओ पर हल्की सी याद कर लक्ष्मी निलयम् में ही हम अपनेआप को पाते हैं । लक्ष्मी  निलयम के बड़े दरवाजे की ओट में लगा गुलाब का पेड़ अपनी खूबसूरती और खुशबू से सबको अपने खिलखिलाते सौंदर्य से आकर्षित कर ही लेता है। गेट पर कदम रखते ही प्रत्येक आगंतुक का शालीन स्वागत गुलाब ही करता है । तरह-तरह के पेड़ पौधों को पनपने और खिलने का पूर्ण आनंद प्रदान किया है पिताजी ने लक्ष्मी निलयम् में । पेड़ पौधों के साथ दिनचर्या में रंग भरते पिताजी अधिकतर चाय भी अपने बगीचे में पीना पसंद करते हैं । अधिकतर सुबह की चाय बना लेने पर ,अम्मा पिताजी को चाय पीने के लिए बुलाने के लिए ,बगीचे में ही आती हैं । दोपहर में भी पिताजी खाना खाने के बाद गर्मियों में पेड़ों की प्यास को महसूस कर पेड़ों को पानी देकर पेड़ों की प्यास शांत करते हैं । कहने को तो अमरूद का एक ही पेड़ है ,पर जब उस पर फल लगते हैं तो उसकी डालियां फलों से लद कर प्रसन्नता से धरती को चूम चूम कर...

आधुनिक हुए हम

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बचपन की यादें तब और ज्यादा मन में हिलोरें मारने लगती हैं ,जब बेफिक्र बचपन को उछलते कूदते देखती हूं , तुरंत इच्छा होती है उस आगन में पहुंच जाने की जहां हम सब मोहल्ले के बच्चे धमाचौकड़ी मचाते थे ,औपचारिकता शब्द की उम्र अभी बहुत छोटी है,क्योंकि उस समय हम औपचारिकता से परिचित न थे ।   पर आज के वातावरण में औपचारिकता बड़े व्यापकता से जड़े जमाती जा रही है ,   हमें नहीं पता था किसके घर खाना खाना है और किसके घर खाना नहीं खाना है ,   सब बच्चों के घर आपस में सबके अपने होते ,घर में बच्चा ना दिखाई देने पर मां आसानी से कह देती अरे खेल रहा होगा यही कहीं, आज की तरह बच्चे के लिए बेचैनी बढ़ाने वाला माहौल ना होता ।   पिट्ठू गरम,आइस पाइस,  छुपन छुपाई,  इक्कड़ दुक्कड़ खेल से मचने वाला शोर लोगों को डिस्टर्ब ना करता था।        पतंग उड़ाते बच्चों को ढील दे ढील वो काटा  वो काटा सुनकर बड़े लोग भी पतंग उडाने को उत्साहित नजर आते और आ जाते पेंच लड़ाने  के किस्से लिए छत पर ।        कटी पतंग को जोड़ने के लिए पका आलु और चावल की डिमा...

उत्सव प्रिया प्रकृति

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नन्ही कली गुलाब की  बिन परवाह किए  कांटों की  फूल बन इठलाती है , तब प्रकृति उत्सव मनाती है । जब निर्मल जल निष्ठुर  पत्खरों में भी,  बनाकर रास्ता , झरना बन सौंदर्य का , जादू  बिखेरता है,  तब प्रकृति उत्सव मनाती है ।  बारिश की बूंदों को   अपनी बाहों में समेट   धरती जब सौन्धउठती है ,   तब प्रकृति उत्सव मनाती है ।   घनघोर बारिश में ,   जब बादल एक दूसरे को पकड़ने की चाह में ,   धमाचौकड़ी मचाते हैं ,   तब प्रकृति उत्सव मनाती है ।   ओस की बूंदे ,   जब पत्तियों पर बिखर मुस्कुराती हैं ,   तब प्रकृति उत्सव मनाती है ।   रंग बिरंगे फूलों को ,   आंचल में समेटकर    प्रति आकर्षण और फूलों को सुला देती है तब ।   प्रकृति उत्सव मनाती है    कल कल की आवाज सुना कर ,   धारा को और लंबी बनाती नदी    को देख प्रकृति उत्सव मनाती है ।   आम की बोर को देख    कूकती कोयल को सुन    चहचाहती चिड़ियों का    कलरव सुन     प्र...

शहीद का बेटा

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शहीद का बेटा इसी नाम से पुकारते हैं ,उसे आज भी गांव वाले एक साल से भी कम उम्र थी ,उसकी जब आजादी की लड़ाई में ,जब उसके पिता दुश्मन पर सीधे वार कर रहे थे, एक छिपे अंग्रेज की गोली के शिकार हो गए। बचपन में दादा और मां-बापू की बहादुरी के किस्से सुनाते थे ।दादा और दादी को गर्व होता कि मेरे बेटे ने देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए । दादी गर्व करने के साथ संतान का मोह कभी ना छोड़ पाई, और हरदम इंतजार करतीं कि वर्दी पहने हुए आएगा मेरा बहादुर बेटा । ऐसा सोचते सोचते बेटे के पास ही चली गई । मां को ही दादा अपना बहादुर बेटा मानने लगे थे ,मां अब शांत हो चली थी ,। याद आता जब भी कभी मां ,बापू की बात करती तो अपनी आंखों के गीलेपन को छिपाने की हरदम कोशिश करती रहती । दादा सूनी आंखों से क्षितिज को निहारते ,हर शहीद के परिवार का कमोबेश ऐसा ही हाल होता होगा। शहीद का बेटा अब बूढ़ा हो चला है ,देख कर विचलित हो जाता है ,कि आजाद देश में आज भी गरीब अमीर की खाई अभी भी जस की तस है । अपने लोगों के बीच लड़कियों में असुरक्षा की भावना मन को आहत करने वाली है । स्वतंत्र देश में गरीब की थाली में दया की ज...

मिठास का नगर शाहजहांपुर

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कुछ स्थान और जगह अपने भीतर इतना कुछ समेटे होते हैं ,कि परतें खुलने पर उसकी सुगंध चारों और फैलने सी लगती है। ऐसी प्रतिष्ठित जगहों पर जो कभी हो आया तो वहां के मोहपास में ऐसा बंध जाता है कि और लोगों को भी अपनी ओर खींचने को लालायित रहता है । दो दो नदियों के बीच लंबाई में बसा शहर,प्राकर्तिक सौन्दर्य से सुसज्जित, शाहजहाँपुर हिंदू मुस्लिम कीे साझा संस्कृति की मिठास को अपनी मिठास में पिरोए , वैदिक काल से लेकर वर्तमान समय की वस्तु स्थिति को सजीव करता  हुआ प्रतीत होता है । इस जिले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि सदैव ही चर्चा में रही है भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में 1857 से लेकर 1925 के काकोरी कांड तथा 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक इस नगर की प्रमुख भूमिका रही है । शाहजहाँपुर को शहीदों की नगरी के नाम से भी जाना जाता है ।इस नगर ने  देश के स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपने तीन सपूतों को भेंट स्वरूप प्रदान किया है । जब-जब इतिहास में स्वतंत्रता संग्राम को पढ़ा जाएगा स्वर्ण अक्षरों में लिखित तीनों शहीदों के नाम कोहिनूर की तरह दीप्तमान रहेंगे । राम प्रसाद बिस्मिल ,अशफाक उल्ला खां, रोशन सिंह क्रान्ति...

यादों की जंजीरे

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बचपन में  रेलगाड़ी में जल्दी से चढ़कर और कूदकर बच्चों का खिड़की वाली सीट पर बैठना, सीट ना मिलने पर बैठे हुए यात्री से सीट मांगना ,कितना मनमोहक था । छोटा बच्चा देमख यात्री भी थोड़ा सा सरककर पहले बच्चे को बैेठाते या अपनी ही गोद में बैठा लेते । रास्ते भर बच्चे शोर मचाते देखो ,वह पेड़ पीछे छूट गया और नदी भी छूट गई, देखो देखो घर छूट गए ,वह देखो कितने सारे आम के पेड़ ,दूर-दूर तक खेतों को देखकर खुश होते । पुल पर से गुजरती ट्रेन के नीचे सड़क देख बच्चे चिल्लाते अरे हमारे नीचे तो लोग जा रहे हैं ,हम उन से ऊपर जा रहे हैं। कभी-कभी खिडकी वाली सीट पर बैठे बच्चे गांव से गुजरती ट्रेन के साथ भागते बच्चों को देखकर खुशी से ताली बजाते ,और कहते हैं हमने उन्हें पीछे छोड़ दिया, हम तो आगे पहुंच गए । वह तो बहुत पीछे रह गए, पर यह सब बचपन में बचपना था ,पर अब देखती हूं सच में सब कुछ आगे आगे बढ़ने के लिए हमने बहुत कुछ पीछे छोड़ दिया। हमारे बचपन को सहेजे हुए हमारा प्यारा घर, वह नीम का पेड़ भी जरूर हमें याद करता होगा ,जो अपनी बाहों में पड़ी रस्सी पर हमें झूला झूलाता था ,और हम पींगे भर भरकर हवा से बात करते थे , घर...

कोई चिट्ठी आई है

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पोस्टकार्ड शब्द देखकर  ,फिर बचपन ने झकझोरा ,और याद आया पिताजी का कॉलेज से घर पहुंचकर ,पानी पीने के साथ साथ यह पूछना, कि कोई चिट्ठी तो नहीं आई ,और भागकर आयी हुई चिट्ठी का देना आनन्ददायक होता, दोपहर में डाकिया का इन्तजार और देखते ही हमारी कोई चिट्ठी आई है ,  और उसके हां कहने पर बहुत खुशी  अनुभव करना ,आज बहुत रोमांचकारी लग रहा है ।   हमें किसी की शादी की खबर हो या किसी की नौकरी लगने की खबर हो या किसी की पारिवारिक समस्या ,इस सब को जाने का माध्यम चिट्ठी ही होता था और चिट्ठी से ही समाधान भी किया जाता था, और किसी की बधाई का इंतजार भी चिट्ठियों के इंतजार से ही होता था, किसी रिश्तेदार के आने की खबर हमें चिट्ठियों से ही मिलती थी और पत्र देखकर ही पूरा परिवार उत्साहित होकर ,रिश्तेदार के स्वागत की तैयारियों में लग जाता था। कहीं-कहीं रूठने मनाने का काम भी चिट्ठियों के द्वारा ही हो जाता था। आज टेक्नोलॉजी के कारण हर हाथ में फोन आ चुका है पर वीडियो चैट के द्वारा आमने सामने देखकर भी उस आनंद की अनुभूति नहीं होती, जो इंतजार के बाद एक पत्र को पाकर होती थी । उंगलियों के इशारे पर अ...

प्राकृतिक आपदाओं का कारण और हम

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भारत आज विकसित देशों से हाथ मिला रहा है ,और विकसित देश भी भारत के विकास में सहायता कर रहे हैं। पर भारत की आधी से ज्यादा जनसंख्या ,समस्याओं से जूझ रही है । हम अंग्रेजों के अत्याचारी शासन से अवश्य स्वतंत्र हो गए, पर हमारी समस्याओं ने भारतीयों को अब तक अपने अधीन किया हुआ है । समस्या घटने के स्थान पर, नित नए विस्तृत आकार में हमारे सम्मुख खड़ी हो रही है। बाढ़ ,भूकंप, सूखा आदि से जनता आखिर कब तक बेघर होती रहेगी ,कब तक गरीब इन समस्याओं के आगे घुटने टेकते हुए ,भुखमरी के शिकार होते रहेंगे । हरसाल समुद्री तूफान कब तक तबाही मचाएगा ,?आखिर कब थमेगा प्रकृति का तांडव ? प्राकृतिक आपदा से बेघर हुए भूखे नंगे लोगों  का नेताओं द्वारा हवाई सर्वेक्षण और खाने के पैकटों के वितरण मात्र से अस्थाई राहत ही मिलती है । इन सब समस्याओं को प्राकृतिक आपदा कहकर ,स्वयं को हम इससे मुक्त करना चाहते हैं । समस्या पीड़ित परिवार हर बार अपनी अनिश्चित  गृहस्थी को तिनका तिनका एकत्र कर जोड़ता है ,और अचानक सब कुछ धूमिल हो जाता है । प्राकृतिक आपदाएं इनको सदियों पीछे धकेलती जाती हैं। इन परिवारों के लिए समस्याओं से रा...

साधना में रत हम सब

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साधना अधिकतर हम इस शब्द को पूजा पाठ से जोड़ कर ही देखते हैं , हमारी प्राचीन आर्य संस्कृति में असंख्य अलौकिक उदाहरण है कठोर तपस्या के ,भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए सुकमारी पार्वती की कठोर साधना ,जगत में सर्वोच्च स्थान पाने के लिए मां के निर्देशानुसार भक्त ध्रुव  की बाल्यावस्था में कठोर साधना ,ऐसे असंख्य अलौकिक उदाहरणों से हमारी संस्कृति विश्व में पूजनीय है । पर लौकिक जगत में भी हम देख सकते हैं साधनारत लोगों को ,एक बच्चे को शैशवावस्था से उच्च पद पर आशीन होने तक माता-पिता की पालन पालन पोषण रूपी सुगठित व्यवस्था साधना का ही तो रूप है । बच्चे के उज्जवल भविष्य के लिए निस्वार्थ माता पिता का संलग्न होना साधना ही तो है ,उन्नत पद पर शोभायमान पुत्र मां पिता की निरंतर साधना का ही तो प्रमाण है , घर को कुशलता से संचालित करना घर के सभी सदस्यों को संतुष्ट करना एक स्त्री की साधना ही तो है ,।घर के सभी सदस्यों की जरूरतों को समय पर कुशलता से पूरी करना एक पुरुष की साधना है । छात्रों के उन्नत भविष्य के लिए एक शिक्षक की लगन भी महत्वपूर्ण होती है और छात्रों के उन्नत परीक्षा फल की प्राप्ति श...

यादों की खिड़की

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बीसवीं सदी से आए हुए हम ,जब 21वीं सदी के लोगों को नववर्ष मनाते देखते हैं, तो बहुत कुछ क्या सब कुछ नया नया ही पाते हैं ,। बच्चे बच्चे के हाथ में फोन की संस्कृति पुरानी तो नहीं। हमारी सदी में दिल के उद्गार होठों के माध्यम से अपने लोगों के बीच मिठास घोलते थे ,अब होंठ चुप है अब फोन के कीबोर्ड पर चलती अंगुलियां बोलती हैं ,और आपसी संबंधों को औपचारिकता के तराजू में तोल देती हैं । चरण स्पर्श ,प्रणाम ,नमस्ते शब्द दुर्लभ हो चुके हैं ,महानगरों में पैर छूने के नाम पर घुटने तक अंगुलियां पहुंच जाएं तो अपने को धन्य समझने में कतई देर नहीं करनी चाहिए। सुबह उठने के फायदे और कारण हमारी अम्मा जी की बातों में विराजते थे ,सुबह नहा कर  बड़ों को सूरज को जल चढ़ाने की परंपरा बच्चे बखूबी निभाते किसी बच्चे की उत्सुकता बेमतलब प्रश्न करने की ना होती, बड़े कर रहे हैं तो हमें करना ही है ,यह सोच  सभी धार्मिक परंपराओं को हम सींचते रहते थे । नए साल के पहले दिन हम जितनी जल्दी उठेंगे ,तो साल भर जल्दी उठेंगे ,अम्माजी की इस बात को हमारा पूरा परिवार फॉलो करता ,आजकल नए साल का स्वागत आधी रात तक चली न्यू ईयर पा...

अनजानी सी लड़कियां

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अनजान थी मैं सबके लिए और मेरे लिए सब कुछ अनजान था ,नए नए रिश्ते, नया शहर ,नया परिवेश सब कुछ अनजान सा लगता रहा बहुत दिनों तक ।पहले का सब कुछ यादों के डब्बे में भरकर लाई थी ,जो अपने मन के कोने में छुपा लाई थी ।काम करते हुए और कभी फुरसत में खोल बैठती अपने बटुए को और शुरू हो जाती धीमे धीमे चटर पटर सुनहरी यादों की । जीवनशैली भी नई नई ,मन में  चुप कर बैठी है अलह्डता  कभी कभी दबे पांव आकर पूछती बड़ी गंभीर लग रही हो कभी आना फुर्सत निकालकर बहुत दिन हो गए ढेर सारी बातें करे हुए, कभी किसी की यादें निकल कर, मन को हौले से हिला देती, अलग रहन-सहन और रीति-रिवाज होने के कारण किसी की नाराजगी का डर रहता जिससे सजगता बढ़ जाती पर पता ही कब अनजान लगने वाली गलियां अपनी हो चली कव अन्जाने अपने अपने से लगने लगे कब मेरी अनुपस्थिति से 2 दिन में ही घर अस्त-व्यस्त होने लगा बहुत कुछ अपना-अपना हो चला धीरे-धीरे अनजान सब अपना हो चला हर लड़की की यही कहानी अनजानो को अपना बनाती, अपनी विशिष्टता की छाप छोड़ती हुई गौरव के साथ ग्रहणी कहलाती

प्रवासी समीर

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घर में सबके सपने पूरे करने के लिए समीर विदेश जा बसा था ,बहुत मुश्किल था अपने को ढालना, वहां की आबोहवा में । जब समीर जा रहा था, तब मां को पक्का यकीन हो चला था कि अब मेरा समीर ऊंची ऊंची बिल्डिंग और पैसों के बीच में ऐसा खोएगा कि फिर दोबारा ना आ पाएगा । उसने देखा था ,या उसकी जिंदगी का तजुर्बा था जो एक बार विदेश गया ,वह वापस ना आ पाया । अपने देश की मिट्टी की खुशबू हर पल बुलाती है उसको, अभी मां की ममता की डोर जकड़न से निकल,जिम्मेदारियों का बोझ उसको विदेश खींच ले गया था । विदेश में सब कुछ था ,पर ना थे बचपन के संगी साथी, मां का आंचल ,पिता की डांट ,भाई बहनों के साथ मस्ती, पर फिर भी ना लौट पाया समीर । घुट घुट कर रेंग रेंग कर हरपल बढता आगे । मां की याद सताती तो ,बहन की शादी की जिम्मेदारी याद कर अपनी आंखों के पानी को छुपा कर आगे बढ़ता ।छोटे भाई को एक उच्च पद पर  पहुंचाने का सपना लिए ,फिर यादों को पीछे धकेलता, अपने साथियों के साथ की हंसी मजाक को याद कर यादों के डब्बे को खोलता कुछ हल्का महसूस कर यादों का डब्बा ढककर आगे चल रहा था । धीरे धीरे बढते हुए अब रास आने ही प्रवासी जिन्दगी । हर पल ...

मेरे हिस्से का खुला आसमान

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  खुला आसमान है मेरे पास,  इच्छाओं के पंख भी  हैं मेरे पास  उडना है  उडकर  उडती हुई चिडिया के  पंख को छूना भी है,  मेरी इच्छा है, यह । पर मेरी इच्छा,  मेरी इच्छा क्यों नहीं बनती । कब बनेगी मेरी इच्छा मेरी,  उस कब और क्यों का इन्तजार, अब और  इंतजार नहीं रखना चाहती हूं । (जया शर्मा प्रियंवदा )

यादों में बसा मेरा बचपन

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मेरा बचपन जिसको मैंने कभी भूला ही नहीं ,अपनी यादों में संजो कर रखा है ,जो मेरी सुनहरी यादों में कस्तूरी सा महकता रहता है ।हर समय यादों के झरोखों में बसने वाली मुझे  बचपन याद ना आए ऐसा हो नहीं सकता । हमारा बचपन फोन वाला बचपन नहीं था हमारा बचपन चिट्ठियों वाला बचपन था किसी के भी घर कोई रिश्तेदार और जानकार अचानक आकर सबको आनंद से सराबोर कर देता , छुट्टियों में हम सब बच्चे नानी के घर जाते ,नानी के घर में सबको ,हम सब बच्चों की छुट्टियों का  इंतजार होता ,हम सबके बीच टीवी ना होता फोन ना होता, बस होता तो बातों और मस्ती का पिटारा ,नानी तरह-तरह के खाने पीने से हमारा स्वागत करती और मामा मौसी हमारी छुट्टियां हर तरीके से यादगार बनाने की कोशिश करते , औपचारिकता का शब्द ना होता आज भी याद आता है नानी दोपहर में ठाकुर जी का भोग लगाकर हम सबको इकट्ठा बैठा कर खाना परोसतीं और हम सब एक साथ बैठकर खाना खाते ,और दोपहर में बातों का पिटारा खोल कर बैठ जाते ।बहुत याद आते हैं वह बचपन के दिन आज फोन पर कितनी भी बातें कर ले पर बातों के मिठास की खुशबू नहीं आती नानी के  कमरे में आला था जिसमें उनके ठाकु...

यादगार खिरनीबाग का दशहरा मेला

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 शारदीय नवरात्रि वर्ष के सर्वश्रेष्ठ दिवस। दो-दो ऋतु ओं का सुखद मिलन, हर तरफ उत्सव का हर्षोल्लास नवरात्रि में शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा की स्तुति के साथ वातावरण को भक्तिमय करता जगह जगह रामचरित्र का गुणगान करती रामलीलाओं का सुखद मंचन इस भक्ति में वातावरण में लिप्त भारतीय संस्कृति ,ऐसा लगता है अपने चिर यौवन के पूर्ण श्रृंगार को धारण करते हुयी सुशोभित हो रही हो , बहुत याद आता है शाहजहांपुर नगर का खिरनी बाग मोहल्ला जो स्वतंत्रता सेनानी रहे राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म स्थल है ,उस पवित्र भूमि पर मेरा बचपन सौहार्द में पगा है , रामलीला के दिनों में खिरनी बाग पूर्ण रूप से उल्लसित होता है ,वहां का विख्यात कालीबाड़ी मंदिर मां दुर्गा के स्वरूप की प्रतिमाओं से सुसज्जित होता है रात दिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन चलता है मां का प्रसाद ग्रहण करने के लिए भक्तों की प्रतीक्षा और सामूहिक भोजन का आयोजन भक्ति रस का अमूल सौंदर्य है भक्तों की भीड़ में हर भक्त में असुरक्षा की भावना का लेश मात्र भी नहीं होता ,बाहर सड़क पर दोनों और सजा तरह तरह के खेल खिलौने रंग बिरंगी चीजों से सुसज्जित मिट्टी के छ...

बेटियाँ

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सभी रिश्तो का  खूबसूरत गठबंधन होती है बेटियां  मां पिता की लाडली होती हैं बेटियां भाई के मन का आनंद होती है बेटियां  बड़ी बहन की रौनक होती है छुटकी , छोटी बहन की गुल्लक होती है दीदी  राखी पर इंतजार करती भाभी का  सौभाग्य होती है बेटियां  दादी की सहेली होती है बेटियां  बुआ का बटुआ होती है बेटियां  सभी के दिल का अरमान होती है बेटियां सादर  सबकी दुलारी बिटिया जया शर्मा

हमारी अमूल्य और अनमोल आजादी

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हमारा देश पिच्हरतवां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। अवस्था बढ़ने पर ,व्यक्ति की जरावस्था बढ़ती जाती है ,परंतु भारत देश में दिन प्रतिदिन होते चहुंऔर विकास के कारण हमारी आजादी की  अवस्था युवावस्था के सौंदर्य को बढ़ाती जा रही है । आज भारत औपनिवेशिक दासता को दूरकर, प्राप्त की गई आजादी का पर्व मना रहा है । जहां खौफ और क्रूरता अपनी सारी हदें पार कर जाती है, वहीं से हौसला जन्म लेता है ,इस हौसले की मिट्टी ने देश के स्वाधीनता संग्राम को शिखर पर पहुंचाने का अटल निर्णय ले लिया था । यह आजादी चुटकी बजाकर नहीं अपितु जान की बाजी लगाकर ली गई है । हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने, दिल्ली को अपने खून को बहाकर बचाया और लाल किले पर अपनी जीत का परचम लहराया । भारत में औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध चला राष्ट्रीय आंदोलन  स्व के भाव से प्रेरित था ,जिसका स्वधर्म ,स्वराज, और स्वदेशी के स्वरूप को प्रदान कर, पूरे देश को अपने साथ कर रहा था।  युगो युगो से भारत की आत्मा में बसा स्व अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में प्रकट हुआ।   विदेशी शक्तियों ने भारत की आर्थिक ,सामाजिक, सांस्कृतिक और ...