अनजानी सी लड़कियां


अनजान थी मैं सबके लिए और मेरे लिए सब कुछ अनजान था ,नए नए रिश्ते, नया शहर ,नया परिवेश सब कुछ अनजान सा लगता रहा बहुत दिनों तक ।पहले का सब कुछ यादों के डब्बे में भरकर लाई थी ,जो अपने मन के कोने में छुपा लाई थी ।काम करते हुए और कभी फुरसत में खोल बैठती अपने बटुए को और शुरू हो जाती धीमे धीमे चटर पटर सुनहरी यादों की ।
जीवनशैली भी नई नई ,मन में  चुप कर बैठी है अलह्डता  कभी कभी दबे पांव आकर पूछती बड़ी गंभीर लग रही हो कभी आना फुर्सत निकालकर बहुत दिन हो गए ढेर सारी बातें करे हुए, कभी किसी की यादें निकल कर, मन को हौले से हिला देती, अलग रहन-सहन और रीति-रिवाज होने के कारण किसी की नाराजगी का डर रहता जिससे सजगता बढ़ जाती पर पता ही कब अनजान लगने वाली गलियां अपनी हो चली कव अन्जाने अपने अपने से लगने लगे कब मेरी अनुपस्थिति से 2 दिन में ही घर अस्त-व्यस्त होने लगा बहुत कुछ अपना-अपना हो चला धीरे-धीरे अनजान सब अपना हो चला
हर लड़की की यही कहानी अनजानो को अपना बनाती, अपनी विशिष्टता की छाप छोड़ती हुई गौरव के साथ ग्रहणी कहलाती

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