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Showing posts with the label अर्चना पाण्डेय

मैं नारी हूं

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हां मैं नारी हूं, प्रभु की अनमोल रचना हुं। कभी दुर्गा कभी शक्ति हुं मै, दुष्टों पर कर प्रहार महा काली हुं हां नारी---- मेरे हैं रुप अनेक कभी राम की सीता बन के त्याग की मूर्ति हूं मैं कृष्ण की राधा रानी बन के प्रेम की प्रतीक मुर्ति हुं मैं हां नारी हूं--- ममतामयी मां पार्वती का प्रतिबिंब हुं मैं  मां सरस्वती के वीणा की झंकार हुं मैं। नारी हूं--- फिर भी ये समाज क्यों नारी के रूप को हीन दृष्टि से देखा है। हर युग में नारी ने अपने बुद्धि कौशल का परिचय दिया है। नारी हूं मैं ममता का परिचायक हूं मैं कभी मां बहन और भार्या बनकर हर रिश्ते को प्रेम के अटुट बन्धन में बांधने की कोशिश हुं मैं नारी हूं मैं। कभी बेटी बनकर एक पिता के आंखों  का तारा हुं मैं। हर रिश्ते को बांध कर रखने की ताकत हुं मैं नारी हूं मैं अर्चना पांडेय''आर्ची गोरखपुर

आखिरी अदालत

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जब कभी मुहब्बत में मेरा  नाम आयेगा तब आख़िरी अदालत में तेरा नाम  जाएगा। तेरी याद में जब कभी मैं रोती हुं, तब   खुदा के पास मेरा पैग़ाम  जाएगा    । तेरे प्यार के  सहारे जी लेती,  सारी उम्र। पर तुने जीने ना दिया ये खबर आख़िरी अदालत में  पहली बार जायेगी। जब- जब मेरे दिल से आह निकलेगी, उसकी दुआ सदा ख़ुदा के  पास जाएगी। तुम अगर साथ देने का ,‌वादा किया होता तो शायद आज , मेरी बारात  तेरे अरमानों के साथ जाती। गर तू मेरे आंखों में बसे प्रेम के,  जज्बातों को पढ़  लेता। तो मेरी जिंदगी की राह में  तेरा साथ होता। तु डर उस खुदा के फैसले से, उसका फैसला आख़िरी बार करते हैं आख़िरी अदालत खुदा की अदालत है चलो दोनों की फरियाद उसके पास करते हैं। अर्चना पांडेय''आर्ची गोरखपुर

बिंदिया ये

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ये तेरी बिंदिया  मुझे तेरी याद दिलाए, हर पल जीने की राह दिखाए। जब जब मैं हतास और ,परेशान हो जाऊं तब  मुझे पथरीले रास्ते पर चलना सीखा गयी  ये तेरी बिंदिया। खुद की पहचान बनाने की प्रेणना दे , जाए तेरी बिंदिया। जब कभी मैंने  खुद को अकेला महसूस किया है तो मेरे अकेलेपन की साथी बन कर, अपने साथ होने का अहसास करा जाए तेरी ये बिंदिया, तेरे रूप का जादू मुझ पर चलाएं ये तेरी बिंदिया। तेरे प्रेम का राग सुनाते, मुझे तड़पाये  तेरी बिंदिया ‌ अर्चना पांडेय''आर्ची गोरखपुर

मकरसंक्रांति का पर्व

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🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 मकरसंक्रांति का पर्व है आया, मिलजुलकर हम पर्व मनाएं। एक दुजे से मन का बैर  मिटाएं आओ हम सब पर्व मनाएं। गुड़ और तिल लड्डू बनाएं, रिश्तों में मिठास भर लाएं। मकरसंक्रांति का पर्व मनाएं। मिलजुलकर हम सब पतंग उड़ाएं, स्वप्नलोक की सैर कर के आए। प्रेम की डोरी में बंधते जाएं                    आओ   हम सब  स्वप्न सजाएं। गुड़ की तरह वाणी  में  मिठास , घोलें जब भी बोले मिठास बोले। तिल जैसी शीतलता हृदय में रखें हर क्षण हम धैर्य बनाए। दान पुण्य हम करते जाएं, अपना जन्म हम सफल बनाएं। उरद दाल  चावल की खिचड़ी गोरखनाथ मंदिर पर चढाएं। उनको हमसब शीश नवाएं, हमसब मिल कर पर्व मनाएं। सुर्य देव की किरणों के हम गुण गाएं। मंगल घड़ी ये है आई , पिता पुत्र के मिलन की तीथि ले आई। आओ हम सब पर्व मनाएं द्वेष और    घृणा की भावनाओं को हम आपस में मिटाएं।  चलो प्रभु को समर्पित हो जाएं। मानवता का धर्म अपनाएं। 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 मकरसंक्रांति दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🌹 अर्चना पांडेय,, आर...

स्वामी विवेकानंद जी

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मानवता का पाठ पढ़ाया, नव युग का निर्माण किया। अपने कौशल बुद्धि ज्ञान से धर्म का की ध्वजा लहरायी। भारत मां का वीर पुत्र विवेकानंद, कहलाया। अपनी सभ्यता और संस्कृति  की रीत नीत अपनायी।  मां कालरात्रि  के परम भक्त थे। राम कृष्ण परमहंस के शिष्य कहलाए। जाति-पाति का भेद भाव मिटाकर मानव धर्म अपनाया। पृथ्वी सा धैर्य , चंद्रमा की शीतलता सूर्य जैसा तेज था माथे  ,पर कदम बढ़ाकर हटे नहीं फिर कर्त्तव्य पुर्ण किया था। स्वामी विवेकानंद जी को मेरा सत् सत् नमन🙏🙏🙏 अर्चना पांडेय आर्ची गोरखपुर

संस्कार

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सुहागन                  आजकल समाज संस्कार विहीन सा होता जा रहा है। मानवता जैसे खत्म सी हो गई है। ऐसे ही एक सभ्य परिवार की परिभाषा है, जो अपने संस्कारों को भुल नहीं पाये है। नीलम एक सामान्य परिवार से थी,जिसका विवाह बाल विवाह हुआ था। पर उनके माता-पिता ने उसे ऐसे संस्कारों से पाला था कि वह अपने संस्कारों को कभी भुलाया नहीं, विवाह के बाद नीलम का पति शशांक जो पांच वर्ष तक सीमा पर एक सैनिक बनकर देश की सेवा करने के बाद घर वापस लौट कर आया,तब नीलम का गौना हुआ।नीलम ढेरों सपने संजोए अपने ससुराल पहुंची वहां उसका खूब आदर-सत्कार किया गया।उसे लगा कि वह स्वर्ग में आ गयी है। पर दो ही दिन हुए थे कि शशांक के पोस्टीग की खबर आ गई।शशांक बहुत निराश होगया। मगर जब नीलम को ये मालूम पड़ा तब उसने  शशांक  को बहुत गर्व के साथ विदा किया। नीलम से उसके पति ने कहा कि अगर मैं वापस नहीं आ पाया तो तुम दुसरी शादी कर लेना पता नहीं मैं जीवित रहुं या नहीं,नीलम ने शशांक से कहा कि मैं आपका इंतजार जीवन भर करुंगी। मैं ये जानती हुं कि मेरे कान्हा जी कभी मेरे सुहाग पर को...

मां की सीख

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🌼🌼🌷🌷🌷 आज के दिन का मां को वर्षों से इन्तज़ार था।आज वो दिन नजदीक आ गया। मेरी शादी का दिन मां ने मुझे अपने पास बुलाया और कहा सुन मेरी लाडली बेटी नीलु अभी तक तु हमारी बेटी‌ थी। मगर अब किसी और के घर की बहु बनने जा रही है,बहु की बहुत सारी जिम्मेदारीयां होती है जो निभानी पड़ती है। अभी तुम नये घर में जाओगी सभी को तुम से बहुत उम्मीदें होंगी उन उम्मीदों पर खरे उतरने के लिए तुम्हें बहुत कुछ सहना और करना पड़ेगा बेटी इस लिए तु मेरी एक बात मानना की। कभी किसी का दिल मत दुखाना और ना अपनों का जबाव  देना जब तुम सबको अपना मानोगी तभी सारी मुश्किल दूर हो जाएगी क्योंकि सारी मुश्किलों का हल परिवार में बनी एकता से मिल सकता है। इसलिए तुम सबको अपना बनाकर रखना। सभी को एक डोर मे बांधकर रखना। नीलु चुपचाप सुन रही‌ , मीरा,नीलु को समझाते -समझाते उसकी आंखे भर आई नीलु मां को पकड़ कर गले लगा कर रोने ले। धीरे-धीरे समय बीत रहा था अगली सुबह नीलु की शादी के समारोह चल रहे थे ,शादी के सारे कार्यक्रम अच्छे से सम्पन्न हुआ, नीलु विदाई के बाद अपने ससुराल आ  गई । सभी घर वालों ने उसका स्वागत बहुत प्यार से किय...

वृद्धावस्था

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मानव जीवन में चार आश्रम होते हैं मगर वृद्धा अवस्था सबसे दुःखद हैं ये तो सबके साथ होना है आज या,कल मगर बिपुल के पिता कन्हैया लाल जी की स्थति बहुत ही दयनीय थी। कन्हौयालाल पास के गांव में स्कुल के प्रिनंसीपल के पद पर आसीन थे‌। जबतक नौकरी थी,तबतक उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों के लिए बहुत प्रयास किया उनके दो बेटे और दो बेटियां थीं कन्हैयालाल और उनकी पत्नी जीवनभर अपने बच्चों के देखरेख में कोई कमी नहीं की बच्चों के पढ़ाई-लिखाई, पालन-पोषण में भी कभी कमी नहीं की, दोनों लङके अच्छे पद पर आसीन थे‌। बेटीयों की शादी भी कर दी थी । धीरे-धीरे समय बीतता गया उन्हें पता ही नहीं चला दोनों लङके अपना- अपना परिवार लेकर बाहर रहने लगे। सिर्फ एक पति-पत्नी गांव में रहते थे, रिटायरमेंट के बाद वो दोनों अपने बच्चों के साथ रहने लगे। धीरे-धीरे समय बीतता गया और कुछ वर्षों के बाद कन्हैयालाल की पत्नी की मृत्यु हो गई गई। और वह बिल्कुल भी अकेले हो गये। बच्चे भी अपने-अपने काम में लग गए मगर पिता की हालत का किसी को पता नहीं चला। धीरे-धीरे उनका शरीर थकने लगा, वह बहुत वृद्ध हो चुके थे। घर के एक कमरे में खाट पर लेटे रह...

गिलहरी की भूख

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मेरे घर के बाहर आम का एक पेड़ है।उस पर बहुत सारी चिङियां और दो गिलहरी 🐿️ का जोङा रहता था। वो दोनों अपने बच्चों के साथ बहुत प्यार से उस पर रहते थे, उनके चार बच्चे थे। एक दिन बहुत बारिश हो रही थी।।बारिश के वजह से हम सब बाहर नहीं जा पा रहे थे। की गिलहरीयों को कुछ खाने का इंतजाम कर पाते हम सभी यही सोच रहे थे।कि अचानक खिङकी के दरवाजे पर एक गिलहरी आ कर बैठ गई। लगा  जैसे वह मुझसे कुछ कह रही हो। मैंने खिड़की के पास देखा कि ये क्या कर रही है। मैं उसके पास ज्यो गई वह पेङ पर चढ गई। मैंने बाहर जा कर देखा की वह पके हुए आम को खाने की सोच रही थी। तभी एक चिङिया ने अपने चोंच से आम को गिरा दिया । और गिलहरी ने पेङ पर से उतर कर गिरे हुए आम को अपने बच्चों के साथ खाने लगी,खाकर वो सब उसी पेड़ पर जा कर बैठ गए। मुझे ऐसा लगा कि उनकी भूख शांत हो गई। मेरे आंखों से ये नजारा ओझल ही नहीं होता। ये मनोरम दृश्य देख कर मेरा मन प्रसन्न हो गया।आज भी मुझे याद है वो दिन। अर्चना पांडेय,, आर्ची

परोपकार

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💐🌻🌼🌺 शशिकांत एक बहुत बड़ा व्यापारी था, वह गांव और शहर दोनों जगह उसका व्यवसाय अच्छा खासा चल रहा था।उसका  एक नौकर था, जो उनके यहां काम करता था।उसका नाम सोमनाथ था, वह दिन रात शशिकांत के खेत खलिहानों की देखभाल करता था।उस के दो बेटे थे।सुरज और आकाश दोनों पढ़ने में बहुत अच्छे थे। सोमनाथ मजदुरी करके जो कुछ कमाता उससे वह अपना  घर चलाता था। और बच्चों को पढ़ाता था। एक दिन उसकी तबीयत खराब हो गई तो उसकी जगह उसके बेटे सूरजऔर आकाश दोनों खेतों में काम करने चले गए, उसी समय शशिकांत उधर से गुजर रहा था,तब उसने पूछा कि सोमनाथ क्यूं नहीं आया?सुरज ने कहा कि पिता जी की तबीयत खराब है इस लिए हम लोग‌‌‌ आए हैं शशिकांत ने कहा कि तुम दोनों पढ़ने जाओ,वे दोनों भाई वहां से पाठशाला में पढ़ने चले गए। शशिकांत सोमनाथ के घर पहुंचा तो सोमनाथ खाट पर से उठकर नीचे बैठ गया, और मालिक से कहा कि मालिक आप यहां बैठें, शशिकांत बैठ गया उसने पूछा कि अब तुम्हारी तबीयत कैसी है? उसने उत्तर दिया ठीक हूं साहब! शशिकांत ने फिर कहा बच्चों को शहर पढ़ने के लिए क्यूं नहीं भेजते तब सोमनाथ ने कहा! साहब इतना पैसा कहां है की बच्...

मेरे पापा

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पापा ओ मेरे पापा, प्यारे-प्यारे पापा। जल्दी घर तुम आए जाना। जब तुम घर आओगे, चाकलेट, टाफी ले आना। पापा ओ मेरे पापा-------- पापा जब घर आते है मुझ पर प्यार लुटाते हैं सीने से लगाते हैं पापा ओ मेरे पापा----- पापा जब घर तुम आना,ढेर खिलौना ले आना रेल,कार,बैट ,बाल सारे खिलौने ले आना पापा ओ मेरे पापा------ पापा जब तुम आओगे मुझको घुमाने ले जाना। आइसक्रीम, गोलगप्पे खूब खिलाना पापा ओ मेरे  पापा------ पापा जब शाम को घर तुम आना चांद तारों की सैर करा देना पापा ओ मेरे पापा------ अर्चना पांडेय,, आर्ची गोरखपुर

मौन

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धरा और अम्बर मौन जीवन का परिवर्तन है मौन। सत्य की गति भी मौन प्रकृति का नियम है मौन। मन और तन   संतान भी मौन मौन रहेगी। जीवन का हर क्षण है मौन। राधे कृष्ण भी मौन दोनों का प्रेम है मौन। भक्ति और भक्त भी मौन भगवन् की शक्ति है मौन। प्रिय और प्रियतम भी मौन एक दूजे के बीच का प्रेम है मौन। शिव और शिवा भी मौन प्रकृति है मौन। समय और दिशाएं मौन धरती मां की संतान मौन है। पर्वत, नदियां मौन मानव की मानवता है मौन। हम, तुम दोनों मौन मानव का अन्तःस्थल है मौन। कबतक   मौन रहेगी मनुष्य की मानवता। अर्चना पांडेय,, आर्ची

रोटी की भुख

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बिटु एक गरीब परिवार से था उसके माता-पिता जैसे तैसे अपना जीवन यापन कर रहे थे। मजदूरी कर के अपना परिवार का भरण-पोषण करते थे।उनकी मजदुरी से जो कुछ भी मिलता था, वो उससे किसी तरह दो वक़्त के भोजन का इंतजाम कर पाते थे, जैसे तैसे जिंदगी कट रही थी मगर विधात को कुछ और ही मंजूर था, यकायक उनकी मौत हो गई। जिससे उनके जीवन में दुखों का पहाड़ टुट पङा उस वक्त बिटु महज दस वर्ष का था, वो ये समझ नहीं पा रहा था कि क्या होगया है, वक़्त बीतता गया पर वह अपने पिता के यादों से बाहर नहीं निकल पा रहा था, क्युकी की उसकी उम्र भी छोटी थी मां ने अपने दिल पर पत्थर रख कर अपने बेटे के भरण-पोषण करने में लग गई। वह दिन भर पत्थर तोड़ती और शाम को जो पैसे मिलते उन्ही से अपने बेटे का पेट भरती, धीरे-धीरे समय बीतता गया और बिटु भी अपने पिता के ग़म से उबर रहा था कि उसका भाग्य फिर उससे रूठ गया, उसकी मां की तबीयत बिगड़ी ने लगी और उसकी अवस्था भी बढ़ गई थी। वो परेशान रहने लगी की उसके बाद बिटु का क्या होगा, उसने बिटु को अपने पास बुलाया और उसके सिर पर अपना हाथ फेरते हुए कहा कि बेटा मेरे मरने के बाद तुम अपना ख्याल रखना, बिटु चुप...

तेरी निर्मल मुस्कान

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माँ तेरी मुस्कान देखने को,तरसता यह मन हर पल। तुमसे मिलने के लिए रहती हूं आज भी  विकल। अकेले में रहती हूं,जब कभी,खोई-खोई सी, तेरी मुस्कान लगती है,अकेलेपन का साथी सी। कभी रुठ जाऊं तो मनाती थी , तेरी स्नेह भरी मुस्कान से मैं मान जाती थी। तेरा वो मेरे माथे पर हाथों को फेरते हुए मुझे समझना याद है। तेरे स्पर्श का जादू से घावों को भरना भूला नहीं है। तेरी आंचल की छांव कङी धूप में ठंढी छांव मिलती  थी। तेरा वो हरपल मुझे समझाना, मेरे हौसले को बढ़ाती थी। अब नहीं रहा वो मुस्कुराता हुआ चेहरा,  मगर आंखों में वो सदा आकृति नज़र आती हैं।  तुम्हारी सीख हर क्षण मेरे हृदय में अंकित है, पर तुम नहीं हो माँ! यादोँ में आज भी बसी हो ,सुरभित पुष्प की तरह माँ। अर्चना पांडेय, आर्ची