तेरी निर्मल मुस्कान


माँ तेरी मुस्कान देखने को,तरसता यह मन हर पल।
तुमसे मिलने के लिए रहती हूं आज भी  विकल।

अकेले में रहती हूं,जब कभी,खोई-खोई सी,
तेरी मुस्कान लगती है,अकेलेपन का साथी सी।

कभी रुठ जाऊं तो मनाती थी ,
तेरी स्नेह भरी मुस्कान से मैं मान जाती थी।

तेरा वो मेरे माथे पर हाथों को फेरते हुए मुझे समझना याद है।
तेरे स्पर्श का जादू से घावों को भरना भूला नहीं है।

तेरी आंचल की छांव कङी धूप में ठंढी छांव मिलती  थी।
तेरा वो हरपल मुझे समझाना, मेरे हौसले को बढ़ाती थी।

अब नहीं रहा वो मुस्कुराता हुआ चेहरा,
 मगर आंखों में वो सदा आकृति नज़र आती हैं।

 तुम्हारी सीख हर क्षण मेरे हृदय में अंकित है, पर तुम नहीं हो माँ!
यादोँ में आज भी बसी हो ,सुरभित पुष्प की तरह माँ।


अर्चना पांडेय, आर्ची

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